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लघुकथा // सम्मान को सींचना // राजेंद्र ओझा

*सम्मान को सींचना* 

    मुझे अपने चेम्बर में आता देख, वे हाथ जोड़कर खडे हो गये।

     उन्होंने जो किया वह बिलकुल ही अप्रत्याशित था और मेरे लिए लगभग पहला अनुभव। मैंने उन्हें 'धन्यवाद' कहा।

   'आप मेरी माँ के बराबर है, आप कृपया ऐसा मत कहिये।'

    उनकी इन बातों से भीतर से आर्द्र हुई मैं चेम्बर से बाहर आ गयी।

   अपने बालों की समस्या को लेकर मैं एक चिकित्सक के पास गई थी। अटेन्डेन्ट  ने नाम आदि पूछ कर पर्चा बनाया और प्रथम बार की निर्धारित फीस 500/- लेकर इंतजार करने के लिए कहा।

      सेन्टर टेबल किताबों से भरा पड़ा था। ओशो, महर्षि अरविंद, माँ अमृतामयी के प्रवचनों के संग्रह के साथ सुडोकू, शब्द पहेली जैसी किताबें उस टेबल पर थीं। ये किताबें 'बीमारी की सोच से राहत' का एक उपाय थीं।    उनमें से एक किताब मैं पढने लगी और मैंने राहत के छींटों को महसूस भी किया।

   मेरा नम्बर आ चुका था। अब मैं चिकित्सक के सामने थी।         बातचीत में उन्हें मेरे डाक्टरेट होने एवं लेखन क्षेत्र से जुड़े होने के साथ ही साथ लम्बे समय तक शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े होने एवं वहाँ से ही सेवानिवृत होने की जानकारी भी हुई।

    उन्होंने चिंता न करने एवं स्वस्थ हो जाने के प्रति आश्वस्त किया और कुछ दवाएं लिख और समझा कर मेरा पर्चा अटेन्डेन्ट को दे दिया।

       मैं भी अटेन्डेन्ट के साथ बाहर आ गई। उन्होंने मुझे 500/-  का नोट दिया और दवाइयां निकालने लग गये। जब उन्होंने दवाइयां और उनका बिल मुझे दिया तब मैंने इस 500/- के बारे में उनसे पूछा।

   उन्होंने जो कहा वह  अकल्पनीय था - 'सर ने फीस  की राशि  वापस देने कहा है'।

     मेरे -  'क्यों?' का उनके पास कोई जवाब नहीं था।

   500/- रूपये उस डाक्टर के लिए बहुत बड़ी राशि नहीं थीं, लेकिन इस वापस की गई राशि ने सह्रदयता और सम्मान के सूखते पेड को सींचने का काम किया।

   मैं भी आंखों की कोर को गीला होने से रोक न सकीं। यह सींचना भी था, फूलों का बरसना भी।


राजेंद्र ओझा

पहाड़ी तालाब के सामने

बंजारी मंदिर के पास

कुशालपुर

रायपुर (छत्तीसगढ़)

492001

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