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कहानी // कलियुग का असर // चरण गुप्त

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कहानी कलियुग का असर चरण गुप्त सेठ रूप नारायण के चार पुत्र थे, राम, भारत लक्ष्मण और शत्रुघ्न। शत्रुघ्न पूर्णिमा के दिन पैदा हुआ था तथा उसका स...

कहानी

कलियुग का असर

चरण गुप्त

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सेठ रूप नारायण के चार पुत्र थे, राम, भारत लक्ष्मण और शत्रुघ्न। शत्रुघ्न पूर्णिमा के दिन पैदा हुआ था तथा उसका स्वभाव भी बहुत शीतल और कोमल था अत: घर वाले उसे चंद्रकांत बुलाने लगे थे। सेठ ने यह तो सोच लिया था कि बड़े होकर उसके पुत्र भी त्रेता युग के पुरूषोत्तम राम तथा उनके भाईयों की तरह उसका नाम रोशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। परन्तु सेठ यह न सोच सका कि अब कलियुग चल रहा था और त्रेता युग तथा कलियुग में बहुत अंतर है।

त्रेता युग में आपसी प्रेम, सदभावना, सत्यता, आदर-सत्कार, विश्वास, इंसानियत और भाई चारा इत्यादि बहुत महत्त्व रखते थे। प्राण जाए पर वचन न जाई को निभाने में अपना गर्व समझते थे। परन्तु कलियुग में आपसी अविश्वास, घृणा, झूठ, निरादर, धोखा, फरेब तथा अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की अपकीर्ति का प्रचलन शुरू हो गया था।

इतनी गनीमत थी कि कलियुग का अभी आगमन हुआ ही था इस वजह से सेठ रूप नारायण के लड़कों पर इस युग का अधिक असर नहीं हो पाया था परन्तु वे कलियुग की तरंग अर्थात लहर से अछूते भी नहीं रह पाए थे।

जैसे राजा दशरथ को राम प्यारे थे उसी तरह सेठ रूप नारायण को अपना बड़ा बेटा राम बहुत प्यारा था। सेठ निस्वार्थ भाव से कोई भी काम करने से पहले राम की सलाह जरूर लेता था। परन्तु राम ‘बाप बड़ा न भईया सबसे बड़ा रूप्पया’ को ध्यान में रखकर ही कोई कदम बढाता था। अमूमन राम बहुत ईमानदारी से काम करता था परन्तु कभी कभी वे अपने फायदे के लिए अपने अंदर से निकलती तरंग के वशीभूत नाजायज तथा अपने असूलों के खिलाफ भी कदम उठाने से नहीं चूकते थे।

ऐसी ही विचार धारा के चलते राम ने सेठ की कई सलाह को नकार दिया जिससे वे परवान न चढ़ सकी। रूप नारायण द्वारा सुझाई गई कई जमीन के सौदों को राम ने अलग अलग बहाने बनाकर जैसे यह सैयद की है, यह शमशान के पास है, यह सर्प मुंह वाली है इत्यादि बताकर लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उनमें उसके भाई हिस्सेदार बन जाते। इसके विपरीत अपने भविष्य की कल्पना से उन्होंने एक मकान का सौदा करने में कोई आनाकानी नहीं की जब रूप नारायण ने पूछा, “बेटा वह सामने वाला अपना मकान गिरवी रखने को कह रहा है।”

राम एकदम बोला, जैसे वह ऐसे किसी सौदे का इंतज़ार ही कर रहा था, “रख लो गिरवी रखने में कोई हर्ज तो है नहीं।”

रूप नारायण को मकान मालिक द्वारा बताई गई कीमत कुछ ज्यादा ही लग रही थी अत: कहा, “वह १००००/- रूपये मांग रहा है।”

राम ने भी अपने पिता जी के दिल की बात का समर्थन किया, “यह तो बहुत ज्यादा रकम है।”

रूप नारायण ने अपने तजुर्बे से बताया, “गिरवी क्या इतनी तो इस मकान की कीमत भी नहीं होगी।”

राम ने इस बारे में अपने स्वार्थी मन के वशीभूत सलाह दी, “पिता जी वैसे गिरवी के लिए ज्यादा पैसा देना भी हमारे पक्ष में ही रहेगा।”

राम की सोच रूप नारायण की सोच से बहुत ऊपर की थी। उसे कुछ समझ न आया इसलिए आश्चर्य से पूछा, “वह कैसे ?”

“मकान मालिक की माली हालत दर्शा रही है कि वह हमारा पैसा समय पर चुकता नहीं कर पाएगा।”

“बेटा फिर भी इस मकान की कीमत छह हजार से ज्यादा की नहीं है।”

“पिता जी बात करके देख लो शायद वह मान जाएगा।”

मकान मालिक से बात हो गई वह छह हजार में माँ गया। रजिस्ट्री कराने के समय रूप नारायण ने पूछा, “रजिस्ट्री किसके नाम कराई जाए ?”

राम ने अपनी मंशा न बताते हुए जवाब दिया, “देख लो।”
रूप नारायण ने अपने दिल की बताई, “चंद्रकांत के नाम करा देते हैं।”

अपनी आशा को निराशा में परिवर्तित होते जान राम बोला, “पिता जी अभी तो गिरवी रख रहे हैं जब रजिस्ट्री की बात आएगी तो देखा जाएगा।

“फिर ?’

“पिता जी आप अभी तो अपने नाम से बयाना करा लो।”

रूप नारायण अपने बेटे राम की बात से सहमत होकर, “ठीक है।”

और मकान का बयाना हो गया। समय पर पैसा चुकता न करने पर मकान मालिक को रूप नारायण के हक में मकान बेचना पड़ा। समय व्यतीत होने लगा। रूप नारायण का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बिगड़ने लगा था। इसलिए समय पर अपनी दिनचर्या के लिए उन्होंने अपने बेटे भरत को दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही रख लिया था। अब राम और लक्ष्मण पुराने मकान पर रह गए थे। फिर भी यह एक संयुक्त परिवार ही था।

अचानक रूप नारायण का स्वर्गवास हो गया। उनके जाते ही घर में लड़कों के बीच स्वार्थ सिद्धी की होड़ मच गई। अचानक घर के शांत वातावरण में तूफ़ान आने की सम्भावनाएं मुँह उठाने लगी। राम के अंदर से निकली तरंग ने अपनी दबी आकांक्षाओं को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया। भरत तो पहले से ही अपने पिता जी की देखभाल के नाम पर अपनी रसोई अलग कर चुका था। अब राम ने भी मन बना लिया कि उसे भी लक्ष्मण से अपनी खिचड़ी अलग पकानी शुरू कर देनी चाहिए। मौक़ा भी अच्छा था। रूप नारायण के तीन मकान थे। चंद्रकांत बाहर सर्विस करता था। सब भाई यही सोच रहे थे कि वह तो जीवन भर अब यहाँ आकर बसने से रहा। इस बात को ध्यान में रखकर राम ने अपनी पुरानी रिहाइस को छोड़कर लिए गए नए मकान में डेरा जमाने का मंसूबा बना लिया।

इसके तहत एक दिन राम ने बिना अपने मन की इच्छा जाहिर किए तथा अपने भाईयों के मन की टोह लेने के लिए उनसे पूछा, “अब क्या करना है ?”

छोटे भाईयों ने राम की बात न समझ उल्टा प्रश्न किया, “किस बारे में ?”

“पिता जी के न रहते अब सम्मिलित परिवार चलाना तो मुश्किल है।”

लक्ष्मण ने हामी भरी, “हाँ यह तो सही है।”

भरत ने असमंजसता दिखाई, “हमारे पास तीन मकान हैं परन्तु हम भाई चार हैं।”

लक्ष्मण अधीरता से एक दम बोला, “चंद्रकांत तो बाहर नौकरी करता है और उसके वापिस आने का भी नामुमकिन लगता है।”

राम बनते हुए जो पहले से ही दूसरे के कंधे से बन्दूक चलाना चाहता था, ने पूछा, “तो ?”

“हम तीनों एक एक मकान ले लेते हैं।”

लक्ष्मण की बात से राम को बहुत शकुन मिला। क्योंकि वह यही चाहता था तथा उसकी मनोइच्छा को लक्ष्मण ने जाहिर कर दिया था। भरत पहले से ही एक अलग मकान में रह रहा था अत: उसे कोई आपत्ति क्यों होनी थी। इस प्रकार तीनों भाई ने एक एक मकान के मालिक बनने की ठान ली।

चंद्रकांत जो बाहर रहता था उसका कुछ सामान रूप नारायण के पुराने मकान में रखा था। जब कभी वह घर पर छुट्टी आता था तो उसका इस्तेमाल करता था। जब उसकी माँ को अपने तीनों बड़े बेटों की मंशा पता चली तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि उस मकान के नीचे का हिस्सा जिसमें चंद्रकांत का सामान रखा था वह खाली नहीं करने देगी तथा वह चंद्रकांत के लिए ही रहेगा। इतने बड़े मकान में से थोड़ा सा हिस्सा चंद्रकांत के लिए सुरक्षित रखने में किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई।

चंद्रकांत के अपने पिता जी की तेरहवीं के जाने के बाद कुछ ही दिनों में संदेशा मिला कि उसके सब भाई अलग रहने लगे थे। रूप नारायण की अन्य संपत्ति का निपटारा भी भाईयों ने आनन् फानन में चंद्रकांत की अनुपस्थिति में कर दिया। उसका हिस्सा उसकी माँ के सुपुर्द कर दिया गया। चंद्रकांत को अपने बड़े भाई राम पर पूर्ण विश्वास था कि हिस्सा बाँट में वे किसी प्रकार की कोई बेईमानी नहीं होने देंगे। इसी वजह से उसने इस बारे में कोई आपत्ति नहीं उठाई तथा जैसा उन्होंने किया उस को मान लिया।

चंद्रकांत ने जब अचानक बाहर से नौकरी छोड़कर अपने घर बसने की कोशिश की तो उसके जीवन में एक तरह का भूचाल सा आ गया था। पहले वह जब भी कुछ दिनों के लिए छुट्टियों पर आता था,तो उसके भाई यह कहते नही थकते थे कि बाहर की नौकरी में क्या रखा है उसे छोड़कर यहीं आ जा यहाँ करने को बहुत काम है अब उसे कोई काम कराने के नाम पर कन्नी काटते नजर आए।

यह तो भगवान ने उसकी माता जी को सद्बुद्धि दे दी जिसकी वजह से वह अपने घर में घुसने का मौक़ा पा सका अन्यथा उसके तीनों भाई, उसे भूल कर एक एक मकान के मालिक बन बैठे थे। जब चंद्रकांत नौकरी छोड़कर आया था तो उसके तीनों भाई हर प्रकार से संपन्न थे। उनके पास सुख पूर्वक जीने के हर साधन मसलन गाड़ी, टेलीविजन, कूलर, सोफा,, फ्रिज इत्यादि सभी कुछ था परन्तु उसके पास इनमें से एक भी नहीं था।

इन्हीं सभी बेजान वस्तुओं के कारण भाई के परिवार के बड़े सदस्यों के माध्यम से बच्चों के बीच ईर्षा फैलाने का काम शुरू हो गया। चंद्रकांत के बच्चे अपने ताऊ जी के घर जब टेलीविजन देखने जाते तो उन्हें कुर्सी या चारपाई पर न बैठाकर नीचे जमीन पर बैठा दिया जाता। गर्मियों में अगर प्यास लगती तो ठंडा पानी नहीं दिया जाता। अगर वे अकेले कमरे में रह जाते तो कूलर बंद कर दिया जाता। वे ईर्ष्या वश आपस में ऐसी बहुत सी बाते करते जो चंद्रकांत की हीनता दर्शाती थी।

धीरे धीरे चंद्रकांत को महसूस होने लगा कि उसके पास इन भौतिक वस्तुओं की कमी के कारण दो भाईयों के बीच, जो कभी एक थाली में रोटी खाए बिना नहीं रहते थे एक गहरी खाई बनती जा रही है। यह खाई दिन पर दिन इतनी चौड़ी होती गई कि एक दिन ऐसा आया जब चंद्रकांत को साफ़ कह दिया गया, “तेरा इस मकान में रहने का कोई हक नहीं है तू अपना कही और इंतजाम कर ले।”

घर में कलह का वातावरण व्याप्त होने लगा था। चंद्रकांत के परिवार को घर से बाहर खदेड़ने कि लिए हर कदम पर उन्हें तंग करना शुरू कर दिया गया था। चंद्रकांत किसी प्रकार का कोई फसाद खड़ा करना नहीं चाहता था। उसने निजात पाने के लिए अपना मन बना लिया था कि वह गुड़गांवा में अपने एक जमीन के टुकड़े पर मकान बना कर चैन से रहेगा। परन्तु उसके भाई लक्ष्मण को शायद उसका सुख चैन मंजूर न था एक दिन उन्होंने माँ से कहा, “माँ मैंने एक मकान बनवा लिया है मैं उसमें जाकर रह लूंगा तू मुझे इस मकान के एवज में चंद्रकांत का प्लाट दिलवा दे।”

“कहाँ बनवा लिया है ?”

“चलो दिखा लाता हूँ।”

और वास्तव में ही वे माँ को एक मकान दिखा लाए जो बनकर पूरा होने वाला था। चंद्रकांत ने माँ के कहने पर वह अपना प्लाट भाई के नाम कर दिया। लक्ष्मण ने वह प्लाट बेचकर ठेंगा दिखाए हुए कहा, “न तो मैं यह घर छोड़कर जाऊंगा तथा न ही प्लाट बेचे के पैसे लौटाऊंगा। जिसे जो करना है कर ले।”

यही नहीं दो तीन और ऐसे प्लाट जो उन दोनों भाईयों ने मिलकर खरीदे थे उनका भी तिकड़म भिड़ाकर मुनाफ़ा वे खुद ही हड़प कर गए। चंद्रकांत जब बाहर नौकरी करता था तो घर आकर कैसे जीवन व्यतीत करना बेहतर रहेगा अधिकतर इनसे ही सलाह लेता था परन्तु नौकरी छोड़ने के बाद ये ही सबसे ज्यादा उसके खिलाफ रहे। अपनी भाभी जी को, जब उनके रिश्ते अपने भाई लक्ष्मण के साथ ठीक नहीं चल रहे थे तो, चंद्रकांत ने ही उन्हें सान्तवना देने का फर्ज निभाकर उनके जीवन की खुशियाँ लौटाने का काम किया था परन्तु न जाने क्यों ये भी उसके तथा उसके परिवार के प्रति भाई लक्ष्मण के व्यवहार से दो कदम आगे ही दिखाई देती थी। चंद्रकांत उनके इस घर्णात्मक रवैये का राज उनके आख़िरी दम तक समझ न पाया फिर भी उसने अपनी तरफ से कभी भी उनका प्रतिरोध नहीं किया तथा उन्हें हमेशा अपने बड़े भाई का दर्जा दिया।

बेकार से बेगार भली को ध्यान में रखकर चंद्रकांत ने अपने घर में एक दुकान खोलने का मन बना लिया। भरत ने उसे थोड़ा सामान का सहारा देते हुए जनरल मर्चेंट की दुकान खुलवा दी। जिस पर लक्ष्मण ने टोंट कसते हुए कहा था, “कुर्सी पर बैठना सभी की किस्मत में नही होता नमक मिर्च की चुटकी उड़ाने वाले तो बहुत मिल जाते हैं।” परन्तु भगवान की दया से चंद्रकांत की दुकान का काम किसी की भी सोच से दस गुना ज्यादा फायदेमंद रहा। उसकी दुकान अच्छी चल रही थी। भगवान ने चंद्रकांत को छप्पर फाड़ कर पैसा दिया कुछ ही दिनों में उसके पास भी ग्रहस्थी का हर प्रकार की सुविधा का सामान आ गया था।

चंद्रकांत की दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की ने उसके भाई लक्ष्मण के परिवार के सदस्यों में उसकी तरक्की के अनुपात में ईर्षा बढ़ा दी। जो जिस प्रकार से चंद्रकांत के परिवार को नुकसान तथा तंग कर सकता था करने लगा। चंद्रकांत की भाभी जी की ईर्षा तो इस हद तक पहुँच गई कि उसने चंद्रकांत की दुकान का काम बंद कराने के मकसद से उसकी दुकान की छत को ही मुस्ली की चोट से तोडना शुरू कर दिया।

अपने बड़े भाई साहब राम को चंद्रकांत अपने तथा लक्ष्मण के बीच पनप रहे तनाव से अवगत करा देता था परन्तु उसे सुलझाने का उन्होंने कभी कोई कारगर कदम नहीं उठाया। चंद्रकांत को उनका ऐसा रूखापन कई बार बहुत खटकता था परन्तु यही सोचकर चुप रह जाता था कि शायद वे केवल अपने परिवार में ही उलझे रहना चाहते थे। वैसे जब भी कभी ऐसा मौक़ा आता था जहां चारों भाईयों को मिल कर खर्च करना पड़ता था तो वे बड़े कायदे से उस काम को अंजाम देते थे हालाँकि चंद्रकांत के दूसरे भाई उनके काम की नुक्ताचीनी कर भी देते थे परन्तु उसने कभी भी उनसे किसी प्रकार का विरोध नहीं किया तथा अपनी हैसियत न होते हुए भी जो उन्होंने खर्चे का हिस्सा माँगा उन्हें चुकता कर दिया। चंद्रकांत उन्हें अपने पिता के समान समझता था।

चंद्रकांत के दोनों बड़े भाई सुख चैन से अलग अलग अपने मकानों में रह रहे थे। इधर लक्ष्मण तीसरे मकान पर अपना पूरा मालिकाना हक समझते हुए चंद्रकांत को परेशान करता रहता था। एक बार दोनों छोटे भाईयों के मकान को दुरूस्त कराने के लिए दोनों बड़े भाईयों ने हमदर्दी जताते हुए महज पांच पांच हजार रूपये सहयोग देने का ऐलान किया। लक्ष्मण ने तो वे पांच हजार रूपये पकड़ लिए परन्तु चंद्रकांत ने हाथ नहीं फैलाए। वैसे चंद्रकांत आज तक नहीं समझ पाया कि लक्ष्मण जैसा व्यक्ति जो जमीनों एवं मकानों के बड़े बड़े फैसले कराता हो वह भला अपने मकान का आधा हिस्सा महज पांच हजार में कैसे छोड़ सकता है। चंद्रकांत के विचार से ऐसा केवल एक साजिश के तहत ही हो सकता है।

चंद्रकांत को अपने ईश्वर पर भरोसा था वह अपने हिस्से का घर ठीक करवा रहा था। मकान का काम धीरे धीरे रेंग रहा था जितनी कमाई होती थी उसी अनुसार उसे थोड़ा थोड़ा बनवाया जा रहा था। एक दिन चंद्रकांत के बड़े भाई आए और बीच गली में खड़े होकर जोर से चिल्लाए, “चंद्रकांत तू बेईमान है।”

चंद्रकांत राम की इस अप्रत्याशित उपाधि से सकते में आ गया। उसकी समझ में नहीं आया कि आखिर उसने ऐसा क्या कर दिया था जो आज वे मुझे यह उपाधी दे रहे हैं। उसने उनसे पूछने की कोशिश की परन्तु जवाब न देकर वे वापिस मुड़े और चले गए।

दिन प्रतिदिन लक्ष्मण एवं भाभी जी का चंद्रकांत के परिवार के प्रति घर्नात्मक एवम ईर्षालु  रवैया बढ़ता जा रहा था, उसके मन का गुबार भी भारी एवं असहनीय होता जा रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि वह अपना मन हल्का कैसे करे। वह लड़ाई झगड़े एवें कोर्ट कचहरी से कोसों दूर रहना चाहता था।

जब घर के भाईयों में मन मुटाव होता है तो भेडिये की तरह मौके की तलाश में ऐसे कई लोग होते हैं जो अपनी पुरानी रंजिश या ईर्षा को भुनाने की कोशिश करते हैं। जब चार भाईयों के बीच मन मुटाव चल रहा था तथा चंद्रकांत के बड़े भाई साहब ने उसे सरे आम बेईमान कहा था तो उसके चाचा के लड़के ने अपना उल्लू सीधा करने के लिहाज से उसके प्रति सहानुभूति दिखाते हुए कहा, “मेरा एक रिश्तेदार बहुत नामी वकील है तुम्हें तुम्हारा हक दिला देगा।”

“कौन सा हक, कैसा हक, भाई साहब मैं कुछ समझा नहीं ?”

चाचा के लड़के ने ऐसे कहा जैसे चंद्रकांत एक बहुत बड़ा मूर्ख था, “अरे यही बाप की जमीन जायदाद का हक।”

“परन्तु वह तो मुझे मिल गया है।”

“मिल गया”, अपनी चाल सफल न होते देख उसने फिर कोशिश की, “परन्तु आपको पूरा कहाँ मिला है ?”

चंद्रकांत नें बड़े संयम से कहा, “भाई साहब जो मिल गया मैं उसी में खुश हूँ अगर मैं ज्यादा के लिए मुकदमे बाजी करूँगा तो तो सालों बाद जितना मुझे मिलेगा उतना तो मैं बर्बाद कर चुका हूँगा। ऊपर से मन की शांति भंग रहेगी। किस्मत में होगा तो ईश्वर मुझे और किसी रास्ते से दे देगा। यह किसी गैर ने नहीं बल्कि मेरे भाईयों ने ही तो लिया है जिन्हें इसकी जरूरत है।

चंद्रकांत के विचार सुनकर उसके चाचा के लड़के को उठना भारी पड़ गया और उसने हताश सा होकर यह कहते हुए, “मैं तो आपकी मदद करना चाहता था आगे आपकी मर्जी” कहकर अपने घर की राह पकड़ी।

थोड़े दिनों बाद चंद्रकांत को अपने बड़े भाई राम की इस हीन भावना तथा उसके प्रति स्वार्थ भरी ईर्षा का पता चल गया। कुछ दिनों पहले वे एक राजी नामे का पत्र लाए थे। पत्र को चंद्रकांत की तरफ बढ़ाकर कहा था, “इस पर अपने दस्तखत कर दो।”

“यह क्या है ?”

“पढ़ ले।”

चंद्रकांत ने पढ़ा। लिखा था, “रूप नारायण के चार पुत्रों की सहमती के अनुसार राम और भरत अलग मकानों में रहेंगे तथा लक्ष्मण और चंद्रकांत ऊर्फ शत्रुघ्न पुराने मकान में आधे आधे के हकदार होंगे।”

चंद्रकांत ने अपनी खोजी नजर अपने बड़े भाई की तरफ देखकर पूछा, “इसकी क्या जरूरत है ?”

“बस ऐसे ही कि बाद में बच्चों के बीच आपस् में कोई तकरार न हो।”

चंद्रकांत ने उन्हें याद दिलाने के लहजे में जवाब दिया, “तकरार तो मैंने तब भी नहीं करी थी जब आपने मेरे बिना पिता जी की संपत्ति का बंटवारा कर दिया था।”

राम के पास इसका कोई जवाब नहीं था। उन्होंने इतना ही कहा, “हमारी बात और थी आगे वैसा समय नहीं रहेगा।”

चंद्रकांत ने अपने भाई को आश्वासन दिया, “भाई साहब मुझे इसमें कोई एतराज नहीं है।”

इतना सुनते ही राम ने पैन चंद्रकांत के हाथ में थामत्ते हुए बताया, “यहाँ दस्तखत कर दो।’

उस पत्र के अनुसार राम सभी भाईयों से उस मकान का मालिकाना हक चाहते थे जिसमें वे रह रहे थे। हालाँकि उस मकान पर चंद्रकांत का हक था क्योंकि रूप नारायण ने यही सोचकर वह मकान खरीदा था। फिर भी चंद्रकांत ने उनके पत्र पर चुपचाप दस्तखत कर दिए थे।

चंद्रकांत से दस्तखत कराने के बाद राम ने लक्ष्मण से भी राजीनामा लेना चाहा तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया था। बल्कि उन्होंने राम पर बहुत से इल्जाम लगा कर यहाँ तक कह दिया कि वह पंचायत बुलाकर पूरा फैसला कराएगा।

लक्ष्मण के एतराज ने राम की रातों की नींद उडा दी। राम परेशान रहने लगा कि उस समस्या से कैसे पार पाया जाए। उनके दिमाग ने या किसी की सलाह से उन्होंने लक्ष्मण का भरोसा हासिल करने के लिए अपने ईमानदार भाई से ईर्षा करने का नाटक करने का फैसला ले लिया। इन्हीं विचारों के चलते राम ने अपने दिल पर पत्थर रख कर चंद्रकांत को बेईमान कहने से कोई गुरेज नहीं किया था।

चंद्रकांत को अपने प्रति राम की बेरूखी का राज पता चल गया था। इसके कारण ही जब भी चंद्रकांत उनसे लक्ष्मण की कोई शिकायत करता था तो राम चुप्पी साध लेते थे। वास्तव में अपने बड़े भाई की बेबसी और संतान मोह को भांपकर चंद्रकांत खुलकर रोए बिना न रह सका था क्योंकि वह भी अपने आप को उनके बेटे के सामान ही समझता था। यही वजह रही कि राम द्वारा अपना तिरस्कार सहने के बाद भी चंद्रकांत ने उनके प्रति अपनी इंसानियत व श्रद्धा कायम रखी और अपने भाई राम के प्रति मन में कोई गिलानी नहीं लाया।

एक छोटे से प्रलोभन के लिए अपने बेटे तुल्य भाई से ईर्षा करने का नाटक भी राम को अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचा पाया क्योंकि लक्ष्मण ने उनके पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए। इससे राम को बहुत पश्चाताप हुआ और एक दिन खाने के समय वह आकर चंद्रकांत के घर बैठ गया और चुपचाप खाना खाकर चला गया। उनके इस व्यवहार से चंद्रकांत समझ गया कि असलियत में उनकी वह ईर्षा नहीं थी बल्कि उनकी बुद्धि पर कलियुग के कारण अपनी वास्तविक संतान मोह का असर था।

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रचनाकार: कहानी // कलियुग का असर // चरण गुप्त
कहानी // कलियुग का असर // चरण गुप्त
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