कान्ता रॉय की लघुकथाएँ

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लघुकथाएँ

कान्ता रॉय

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बैकग्राउंड


"ये कहाँ लेकर आये हो मुझे।"

"अपने गाँव, और कहाँ!"

"क्या, ये है तुम्हारा गाँव?"

"हाँ, यही है, ये देखो हमारी बकरी और वो मेरा भतीजा "

"ओह नो, तुम इस बस्ती से बिलाँग करते हो?"

"हाँ, तो?"

"सुनो, मुझे अभी वापिस लौटना है!"

"ऐसे कैसे वापस जाओगी? तुम इस घर की बहू हो, बस माँ अभी खेत से आती ही होगी"

"मै वापस जा रही हूँ! सॉरी, मुझसे भूल हो गई। तुम डॉक्टर थे इसलिए ...."

"तो ....? इसलिए क्या?"

"इसलिए तुम्हारा बैकग्राउंड नहीं देखा मैंने।"

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विलुप्तता

"जोगनिया नदी वाले रास्ते से ही चलना। मुझे नदी देखते हुए जाना है।" रिक्शे पर बैठते ही कौतूहल जगा था ।

"अरे,जोगनिया नदी ! कितनी साल बाद आई हो बीबी जी? ऊ तो, कब का मिट गई।"

"क्या? नदी कैसे मिट सकती है भला?" वो तड़प गई।

गाँव की कितनी यादें थी जोगनिया नदी से जुड़ी हुई। बचपन, स्कूल, कुसुमा और गणेशिया। नदी के हिलोर में खेलने पहुँच जाते जब भी मौका मिलता और पानी के रेले में कागज की कश्ती चलाना। आखिरी बार खेलने तब गई थी जब गणेशिया को जोंक ने धर लिया था। मार भी बहुत पड़ी थी।

फिर तो माई ही स्कूल लेने और छोड़ने जाने लगी थी।

रिक्शा अचानक चरमरा कर रूक गया। तन्द्रा टूटी।

"हाँ,बहुत साल बाद अबकी लौटी हूँ। कैसी सूखी ये नदी,कुछ बताओगे?"

"अरे, का बताये, भराव होते-होते उथली तो पहले ही हो चुकी थी और फैक्ट्री वालों को भी वहीं बसना था। वो देखो, आपकी जोगनिया नदी पर से उठता धुँआ।"

चिमनी से उठता गहरा काला धुआँ उसकी छाती में आकर जैसे बैठ गया।

"गाँव तो बचा है ना?" घुट कर बस इतना ही पूछ पाई।

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विलासिता

डोर बेल बजी। रामदीन की नजर दरवाजे की ओर उठती हुई फिर सामने दीवार पर टंगी आलीशान घड़ी पर जा टिकी। रात के दो बजे थे।

"जरूर रोमिला बिटिया होगी।"

दरवाजे से अंदर आते ही वह लडखडाती हुई बूढे रामदीन की बाँहों में झूल गई। उसका आना इस तरह से अटपटा लगता था। उसे बचपन से बाँहों में झूलाना जो शुरू किया तो अब तक बाँहों में ही संभाल रहा है।

मेम साहब पार्टी से लौट कर कमरे में जाकर सोई ,सो होश में अभी तक नहीं आई है। यहाँ उसके सिवाय किसी की भी नींद नहीं खुलती है।

वह फिर से फर्श पर बिछी दरी पर जाकर लेट गया। जैसे ही जरा आँखों में नींद आई कि फिर से डोर बेल बजी। नजर फिर घड़ी की ओर .... सुबह के साढ़े तीन बजे थे।

"जरूर साहब होंगे।"

दरवाजे से अंदर आते हुए साहब के नथुने से भभक आई । मन कसैला हो गया।अजीब -सा मुंह बनाया। उनकी कलाई में मोगरे की माला बंधी हुई ,आँखों में रंगीनी अब तक समाई हुई थी।

साहब को सलाम करके बाहर अपने क्वार्टर में वह सोने चला आया।

नींद नहीं आई ,सुबह होने ही वाली थी। कुछ देर बाद वह बिस्तर से उठ, बगीचे की ओर निकल गया। स्वस्थ गुलाब महक रही थी। रात की रानी की खुशबू कामिनी के गुच्छों में दिन होते ही मानो उतर गयी। महंगे सुसज्जित बेल बूटों से आच्छादित वातावरण में लाखों रुपये की तरावट थी। क्यों ना हो , शहर का सबसे अच्छा माली जो तराशता है इसे। इस बगीचे का बागवान अच्छा था जो इसे सुसज्जित बना गया।

सुबह के बारह बजे सब नाश्ते के टेबल पर हाय हैलो करते हुए फिर दूसरे दिन के भेंट के लिए विदा लेकर बागबान सहित एक-एक कर घर के बगीचे के अनदेखे फूल, धुल से उड़ते हुए चलते बने,आधी रात को फिर से बेहोशी में लौटने के लिए।

इधर हर महीने की तरह आज भी रामदीन अपनी छोटी-सी पगार घर के मंदिर में रख,अपनी बेटी और पत्नी को देख संतुष्ट हो दुआ कर रहा था कि --"हे ईश्वर, इससे अधिक मुझे कभी मत देना।"

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चेहरा

आधी रात को रोज की ही तरह आज भी नशे में धुत वो गली की तरफ मुड़ा। पोस्ट लाईट के मध्यम उजाले में सहमी-सी लड़की पर जैसे ही नजर पड़ी, वह ठिठका। लड़की शायद उजाले की चाह में पोस्ट लाईट के खंभे से लगभग चिपकी हुई सी थी। करीब जाकर कुछ पूछने ही वाला था कि उसने अंगुली से अपने दाहिने तरफ इशारा किया। उसकी नजर वहां घूमी। चार लडके घूर रहे थे उसे। उनमें से एक को वो जानता था। लड़का झेंप गया नजरें मिलते ही। अब चारों जा चुके थे। लड़की अब उससे भी सशंकित हो उठी थी, लेकिन उसकी अधेड़ावस्था के कारण विश्वास ....या अविश्वास ..... शायद!

"तुम इतनी रात को यहाँ कैसे और क्यों?"

"मैं अनाथाश्रम से भाग आई हूँ। वो लोग मुझे आज रात के लिए कही भेजने वाले थे।" दबी जुबान से वो बडी़ मुश्किल से कह पायी।

"क्या..... ! अब कहाँ जाओगी?"

"नहीं मालूम!"

"मेरे घर चलोगी?"

".........!"

"अब आखिरी बार पुछता हूँ, मेरे घर चलोगी हमेशा के लिए?"

"जी!" ....मोतियों सी लड़ी गालों पर ढुलक आयी। गहन घुप्प अंधेरे से घबराई हुई थी। उसने झट लड़की का हाथ कसकर थामा और तेज कदमों से लगभग उसे घसीटते हुए घर की तरफ बढ़ चला। नशा हिरण हो चुका था। कुंडी खड़काने की भी जरूरत नहीं पडीं थी। उसके आने भर की आहट से दरवाजा खुल चुका था। वो भौंचक्की-सी खड़ी रही।

"ये लो, सम्भालो इसे! बेटी लेकर आया हूँ हमारे लिए। अब हम बाँझ नहीं कहलायेंगे।"

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पथ का चुनाव

आज फिर किसी विधुर का प्रस्ताव आया है। जवान बच्चों की माँ बनने के ख्याल से ही मन सिहर उठा। इस रिश्ते को ना कह कर अपने धनहीन दुर्बल पिता को संताप दूँ, या बन जाऊँ हमउम्र बच्चों की माँ। सुना है तहसीलदार है। शायद पिता की वे मदद भी करें उनकी दूसरी बेटियों के निर्वाह में। आज कॉलेज में भी मन नहीं लगा था। घर की तरफ जाते हुए पैरों में कम्पन महसूस की थी उसने।

घंटे की टनकार, मंदिर से उठता हवन का धुँआ, कदम वहीं को मुड़ गये। ऊपर २५० सीढ़ियाँ, ऐसे चढ़ गई जैसे सारी साँसें आज इन्हीं को सुपुर्द करनी है। पहाड़ पर ऊपर मंदिर के, चारों ओर खाई। बिलकुल किनारे मुंडेर पर जाकर खड़ी हो गई। क्या करें, नीचे खाई में कूद जाये, या वापस घर जाकर तहसीलदार के बच्चों की माँ बने, या अपनी बी. ए. की पढ़ाई पूरी कर कोई ट्यूशन, या नौकरी।

हथेलियों में पसीना भर आया और आँखों में आँसू। वह मरना नहीं चाहती।

उसने महसूस किया कि वह किसी भी हाल में जिंदा रहना चाहती है। मंदिर की घंटी अब शांत हो चुकी थी। चढ़ाई से दुगुना जोश उसका अब सीढ़ियों से उतरने में था। साँसें काबू में थी।

"पापा, मै तब तक शादी नहीं करूँगी जब तक कोई नौकरी ना मिले मुझे।" अस्तित्व के प्रति धर्माचरण का पालन करते हुए, अब दृढ़ता से अपने पथ का चुनाव कर चुकी थी।

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प्यार

पति को ऑफिस के लिये विदा करके ,सुबह की भाग-दौड़ निपटा पढ़ने को अखबार उठाया, कि डोर बेल बज उठी।

"इस वक्त कौन हो सकता है!" सोचते हुए दरवाजा खोला। उसे मानों साँप सूँघ गया। पल भर के लिये जैसे पूरी धरती ही हिल गई थी। सामने प्रतीक खड़ा था।

"यहाँ कैसे?" खुद को संयत करते हुए बस इतने ही शब्द उसके काँपते हुए होंठों पर आकर ठहरे थे।

"बनारस से हैदराबाद तुमको ढूँढते हुए बमुश्किल पहुँचा हूँ।" वह बेतरतीब सा हो रहा था। सजीला-सा प्रतीक जैसे कहीं खो गया था।

"आओ अंदर, बैठो ,मैं पानी लाती हूँ।"

"नहीं, मुझे पानी नहीं चाहिए, मैं तुम्हें लेने आया हूँ, चलो मेरे साथ।"

"मैं कहाँ, मैं अब नहीं चल सकती हूँ कहीं भी।"

"क्यों, तुम तो मुझसे प्यार करती हो ना!"

"प्यार! शायद दोस्ती के लिहाज़ से करती हूँ।"

"तुम्हारी शादी जबरदस्ती हुई है। हमें अलग किया गया है। तुम सिर्फ मुझे प्यार करती हो।" "नहीं, तुम गलत सोच रहे हो प्रतीक। मैं उस वक्त भी तुमसे अधिक अपने मम्मी-पापा से प्यार करती थी, इसलिए तो उनके प्यार के आगे तुम्हारे प्यार का वजूद कमजोर पड़ गया।"

"लेकिन जिस इंसान से तुम्हारी शादी हुई उससे प्यार ......"

"बस, अब आगे कुछ ना कहना, वो मेरे पति है और मै सबसे अधिक उन्हीं से प्यार करती हूँ। उनसे मेरा जन्मों का नाता है।"

"और मैं, मैं कहाँ हूँ?"

"तुम दोस्त हो,तुम परिकथाओं के राजकुमार रहे हो मेरे लिए, जो महज कथाओं तक ही सिमटे रहते है हकीकत से कहीं कोसों दूर।"

"अच्छा, तो मैं अब चलता हूँ। तुमसे एकबार मिलना था सो मिल लिया।"

बाहर आकर जेब में हाथ डाल टिकट फाड़ कर वहीं फेंक बिना पलटे वो निकल गया और वह जाते हुए उसे अपलक, उसके ओझल होने तक,यूँ ही, वहीं ठिठकी निहारती रही।

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तमाशबीन

वह अपने सीधेपन से असंतुष्ट होकर , करवट बदल , नया चेहरा अख्तियार कर रहा है । जब नॉर्मल आदमी था तब वह भीड़ का हिस्सा हुआ करता था , लेकिन अब भीड़ का हिस्सा नहीं है ।

चरित्र में उग आये टेढ़ेपन की वजह से भीड़ में अलग, अपनी तरह का वह अकेला व्यक्ति है।

पिछले कई दिनों से वह कूड़े-करकट का एक पहाड़ खड़ा करने में लगा हुआ था जो आज पूरा हो गया।

उसके मुताबिक पहाड़ बहुत ऊँचा बना था। हाथ में एक झंडा लेकर उस पर चढ़ गया।

कुछ लोग उसकी तरफ ताकने लगे। उसे देख कर लोगों के चेहरे पर सवालिया निशान उभरने लगे। धीरे-धीरे लोग सवाल बन गये।

शलाका पुरूष .... मिथक पुरूष, ढोंगी इत्यादि अलग-अलग तरह के नामों से सम्बोधित कर, कुछ-कुछ कह, सवाल बने लोग अब अपने-अपने भीतर की तमाम गन्दगी उलीच रहे थे।

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सावन की झड़ी

"भाभी, निबंध लिखवा दो!" चीनू ने उसका ध्यान खींचा।
"किस विषय पर?" चीनू की स्कूल डायरी उठा, फिर से नजर बरामदे की ओर लग गयी।

जब से सुषमा बरामदे में खड़ी हुई है और उधर वो गुजराती लड़का, उसका ध्यान वहीं है।
कितनी बार मना कर चुकी थी इसे लेकिन.....!

बाऊजी नजीराबाद वाले से रिश्ता जोड़ना चाहतें हैं और ये है कि इस गुजराती में अटकी है!

ननद के चेहरे पर छाई मायूसी उसे बार-बार हिमाकत करने को उकसा जाती थी इसलिये कल रात आखिरी बार फिर से हिम्मत करी थी।
"बाऊजी, वो पड़ोस में गुजराती है ना....!"

"हाँ, सो?"

"अपनी सुषमा को पसंद करता है, उसकी नौकरी भी वेयर हाऊस में है।"

"वो....? शक्ल देखी है उसकी, काला-कलूटा, जानवर है पूरा का पूरा! ऊपर से दूसरी जात!" बाऊजी की आवाज़ इतनी सर्द ...., उसकी हड्डियों तक में सिहरन उठी थी।

पति ने उसकी ओर खा जाने वाली नजरों से देखा था।

चीनू ने हाथ से डायरी छीन ली और जोर से आँचल खींच कर फिर से पूछा, "बताओ ना, जानवरों की क्रिया कलापों पर क्या लिखूँ?"

सुषमा और चीनू के लिए वह भाभी कम माँ अधिक थी।

"भाभी, मोर क्यों नाचता है?" चीनू ने इस बार सबसे सरल प्रश्न पूछा था।
वैसे चीनू के प्रश्नों के जवाब उसे ढूँढ-ढूँढकर तलाशने होते हैं। आज कल के बच्चे कम्पयूटर से भी तेज, और चीनू, उन सबमें भी अव्वल!

"मोरनी को रिझाने के लिए ही मोर नाचता है।" उसने स्नेह से कहा।

"और जुगनू क्यों चमकता है?

"अपने साथी को आकर्षित करने के लिए।"

सुनते ही क्षण भर को वह चुप हो गया।

"आप हमारे भैया की साथी हो?"

"हाँ!" उसके ओर आँखें तरेरती हुई बोली।

"भैया ने आपको कल रात मारा क्यों?"

"चीनू!" वह एकदम से सकपका गयी।
"क्योंकि मैं उन पर ध्यान नहीं देती हूँ?" भर्राये स्वर में धीरे से कहा।

"तो उनको भी आपको रिझाने के लिए जुगनू की तरह चमकना चाहिये, मोर की तरह नाचना चाहिये था ना?"

"धत्! वे क्यों रिझायेंगे, जानवर थोड़ी ना हैं!"

"भैया जानवर नहीं हैं,लेकिन गुजराती तो जानवर है ना, इसलिये तो सुषमा जीजी को रिझाता रहता है।" कह कर चीनू जोर-जोर से हँसता रहा लेकिन वह सुनकर सुन्न पड़ गयी।

"ये क्या ऊटपटाँग बातें कर रहा है तू?"

"भाभी, मैं खुद ही निबंध लिख लूँगा, बस सुषमा जीजी को उसका मोर दिला दो! फिर वो कभी आपकी तरह छुप-छुपकर नहीं रोयेगी।" कहते हुए चीनू की नजर भी बरामदे में जाकर टिक गयी।


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कतरे हुए पंख

वह किशोरी थी या युवती, कहना मुश्किल था। लड़की थी, बड़ी हो रही थी, पर मुझे तो प्रौढ़ा लगती थी। सुबह के ठीक नौ बजे गेट खड़काती और बिना मालिक के अनुमति के इंतजार किए धड़ाधड़ घोड़े पर सवार अंदर घुस आती।

वर्गभेद की मिसाल, एक तरफ अपने स्कूल के साधन-सम्पन्न बच्चों को देखूं और दूसरी तरफ ये नवजात प्रौढ़ा कम्मो!

"आज क्या बनाऊं?" फिर से सीधे एक कठिन सवाल दागती सामने आकर तोप-सी खड़ी हो जाती है।

टिक-टिक सरकती हुई घड़ी की सुई, चढ़ते दिन, वक्त से अनजान, लिखते हुए मैं चौंक उठती हूँ और अकबकाई-सी उसकी ओर देखती हुई पूछती, "क्या बनाऊं आज?"

सच कहूं तो मैं खुद में ही अब तक बचपने को जी रही थी, ऐसे में झड़बेरियों सी अस्त-व्यस्त यह उगती, झड़ती-सी लड़की/प्रौढ़ा या......!

"आप जो कहोगी, बना लूँगी!" अचानक वह प्रौढ़ा से नन्हीं बालिका में परिवर्तित हो जाती है। वह बुद्धिमती है, इसलिए मेरी आंखों की उदासी पढ़ लेती है।

"आज राजमा-चावल बना ले, तेरा काम जल्दी निपट जाएगा।" मैंने बचपने को स्थिर रखना चाहा।

"मुझे जल्दी नहीं है, आप सोच लो, और जो कहोगी,बना लूँगी।" वह धुन की पक्की, कर्मठ थी।

"फिर ऐसा कर, चार परांठे भी बना ले।"

"ठीक है!" आँखें मटकाती रसोई में घुस गई। मैंने भी मन की उदासीनता को वहीं किताबों में दबाकर, अपनी पढ़ाई-लिखाई समेट, नहाने की तैयारी में जुट गई।

केमिस्ट्री के लिए नए शिक्षकों की भर्ती के लिए साक्षात्कार लेने के लिए जल्दी जाना था। मैं स्वयं स्कूल की प्रिंसिपल ही वक्त पर ना पहुंचूँ तो बाकियों को अनुशासित रखना कैसे सम्भव होगा!

"कम्मो, इधर आ, जरा उधर रैक से शैम्पू लाकर दे तो!"

"अभी लाई!"

"लीजिए! आज बाल धोएंगी?" वह फिर से प्रौढ़ावस्था में पहुंच गई थी।

"हाँ!"

"मत धोइए, आज शनिवार है!"

"शनिवार से बाल धोने का क्या संबंध है?"

"शनिवार को बाल नहीं धोते हैं!" फिर बड़ों सी बातें।

"बाल क्यों नहीं धोते शनिवार को?" मैंने उस पर नजर टिकाए हुए पूछा।

"वो तो नहीं मालूम, बस नहीं धोना चाहिए, माँ-दादी सब ऐसा ही कहती हैं।" कहते कहते फिर से उसके चेहरे पर मासूमियत उभर आई।

"माँ-दादी से पूछा नहीं कि क्यों शनिवार को बाल नहीं धोते?"

उसने आँखें चौड़ी की। और ठुनक भरे स्वर में बोली,

"पूछा था, उनको भी नहीं मालूम। उन्होंने कहा कि बड़े बूढ़े जब कहते हैं तो कुछ तो होता ही होगा।"

"सब कहते हैं बस इसलिए मान लेती हो? यानी कि भेड़चाल! कल से तुम यहाँ काम करने मत आना।" मैंने रोष भरे स्वर में कहा।

"मुझे माफ कर दीजिए, अबसे ऐसा नहीं कहूँगी!" वह गिड़गिड़ाई, अब वह न बालिका थी ना ही प्रौढ़ा...!

"नहीं, कोई माफी नहीं मिलेगी, अब तुम्हें मेरे स्कूल में पढ़ने की सजा काटनी होगी। घर से सीधे-सीधे मेरे स्कूल पहुँचना, अब तुम्हें रोटी बनाने की नहीं, पढ़ाई करने की पगार मिलेगी, समझी कि नहीं!" वह फिर से प्रौढ़ा न बन जाए, मैं घबरा गई थी।

संक्षिप्त परिचय

कान्ता रॉय

जन्म दिनांक- २० जूलाई, १९६९ जन्म स्थान- कोलकाता
शिक्षा- बी. ए.
लेखन की विधाएँ-लघुकथा, कहानी, गीत-गज़ल-कविता और आलोचना
सचिव: लघुकथा शोध-केंद्र भोपाल, मध्यप्रदेश
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (वेवसाईट विभाग की जिम्मेदारी)
ट्रस्टी- श्री कृष्णकृपा मालती महावर बसंत परमार्थ न्यास।
सामाचार सम्पादक: सत्य की मशाल (राष्ट्रीय मासिक पत्रिका)
संस्थापक : अपना प्रकाशन


पुस्तक प्रकाशन :
घाट पर ठहराव कहाँ (एकल लघुकथा संग्रह),
पथ का चुनाव (एकल लघुकथा संग्रह),
आस्तित्व की यात्रा (प्रेस में)
सम्पादक:
चलें नीड़ की ओर (लघुकथा संकलन)
सोपान-4 (काव्य संकलन),
सहोदरी लघुकथा-(लघुकथा संकलन)
सीप में समुद्र-(लघुकथा संकलन)
बालमन की लघुकथा (लघुकथा संकलन)

भारत की प्रतिनिधि महिला लघुकथाकार(प्रकाशाधीन)
अतिथि संपादक-दृष्टि, लघुकथा पत्रिका, महिला लघुकथाकारों का अंक।

अतिथि संपादक -साहित्य कलश
एकल लघुकथा-पाठ : निराला सृजन पीठ, भारत भवन, भोपाल।
आकाशवाणी भोपाल से कहानी, लघुकथाएँ प्रसारित, दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण.
लघुकथा कार्यशाला :
1. ग्लोबल लिटरेरी फेस्टिवल फिल्म सिटी नोयडा, उ.प्र. में लघुकथा वर्कशॉप का आयोजन किया।
2. हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश भोपाल में 2016 में
दून फिल्म फेस्टिवल कहानी सत्र में अतिथि वक्ता के तौर पर सहभगिता।


उपलब्धियाँ :
साहित्य शिरोमणि सम्मान, भोपाल।
इमिनेंट राईटर एंड सोशल एक्टिविस्ट, दिल्ली।
श्रीमती धनवती देवी पूरनचन्द्र स्मृति सम्मान,भोपाल।
लघुकथा-सम्मान (अखिल भारतीय प्रगतिशील मंच,पटना)
तथागत सृजन सम्मान, सिद्धार्थ नगर, उ.प्र.
वागवाधीश सम्मान, अशोक नगर,गुना।
गणेश शंकर पत्रकारिता सम्मान.भोपाल।
शब्द-शक्ति सम्मान,भोपाल।
श्रीमती महादेवी कौशिक सम्मान (पथ का चुनाव, एकल लघुकथा संग्रह) प्रथम पुरस्कार सिरसा,
राष्ट्रीय गौरव सम्मान चित्तौरगढ़,
श्री आशीष चन्द्र शुल्क (हिंदी मित्र) सम्मान, गहमर, तेजस्विनी सम्मान,गहमर.
लघुकथा के लेखन के
'लघुकथा के परिंदे' मंच की संचालिका।
कोलकाता में अपने छात्र जीवन के दौरान कई सांस्कृतिक संस्था से जुडी रही। महाजाति सदन, रविन्द्र भारती, श्री शिक्षा यतन हॉल में मैंने कई स्टेज शो किये हैं।


संपर्क- कान्ता राय
मकान नम्बर-21
सेक्टर-सी सुभाष कालोनी ,
नियर हाई टेंशन
गोविंदपूरा
भोपाल- 462023
ई मेल - roy.kanta69@gmail.com

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1 टिप्पणी "कान्ता रॉय की लघुकथाएँ"

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