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हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 1 : भूमिका // असग़र वजाहत

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

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साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

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असग़र वजाहत

लेखक


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डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक


भूमिका

भारत विभाजन से पहले साम्प्रदायिकता इतनी बढ़ गयी थी कि रेलवे स्टेशनों पर पानी पिलाने वाले हिन्दू पानी-मुस्लिम पानी की आवाज़ लगाते थे। साम्प्रदायिकता ने केवल देश का विभाजन कर दिया था बल्कि धर्म के नाम पर राजनीति का एक ऐसा पौधा लगा दिया गया था जो विशाल कांटों का जंगल बन गया है। विभाजन के बाद दोनों देशों में साम्प्रदायिकता समाप्त नहीं हुई बल्कि बढ़ गयी। आशा की जाती थी कि यदि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को मान लिया जायेगा तो हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बेहतर संबंध बनेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दरअसल उप-महाद्वीप के राजनीतिज्ञ यह समझ गये थे कि सत्ता प्राप्त करने के लिए सबसे सरल रास्ता साम्प्रदायिकता ही है और यही कारण कि आज दोनों देशों में साम्प्रदायिकता का पूरा उत्थान देखा जा सकता है।

प्रस्तुत पुस्तक के प्रारंभ में साम्प्रदायिकता विषयक कुछ लेख दिये गये हैं जो समय-समय पर पत्रा-पत्रिकाओं में छपते रहे। इन लेखों का केन्द्रीय विषय साम्प्रदायिकता ही है लेकिन लेख किसी क्रम में नहीं है। कहानियाँ देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता को सामने लाती हैं।

-असग़र वजाहत


अनुक्रम

वैचारिक पृष्ठभूमि

1. सांप्रदायिकता : पुनर्विचार की ज़रूरत

2. भारत का विभाजन एवं देश की वर्तमान राजनीति

3. आतंकवाद के नये-नये चेहरे

4. मुस्लिम राजनीति की दिशा

5. लोकतंत्र में धर्म और जाति

6. हिजाब : पर्दे के पीछे क्या है?


कहानी :

1. गुरुगुरु-चेला संवाद

2. सारी तालीमात

3. जख़्म

4. मुश्किल काम

5. मेरे मौला

6. शाह आलम कैम्प की रुहें

7. अपाहिज

8. ताजमहल की बुनियाद

9. लकड़ी के अब्दुल शकूर की हँसी

10. तीन तलाक

11. आवाज़ का जादू


सांप्रदायिकता : पुनर्विचार की ज़रूरत

सांप्रदायिकता के संबंध में बुनियादी अवधारणा तथा उसके स्वरूप को सही परिप्रेक्ष्य में न समझ पाने के कारण सांप्रदायिकता के विरुद्ध छेड़ा गया अभियान एक अर्थ में विफल हो गया है। पूरी समस्या पर सिरे से विचार करने के लिए यह आवश्यक है कि सबसे पहले सांप्रदायिकता को परिभाषित किया जाए। किसी संप्रदाय विशेष में दूसरे संप्रदाय विशेष के लिए धार्मिक विश्वासों या इतर कारणों से घृणा, द्वेष तथा हिंसा की भावना का प्रदर्शन सांप्रदायिकता कही जायेगी। हमारे देश में चूंकि यह स्थिति कुछ हिन्दुओं और कुछ मुसलमानों के बीच रही है इसलिए सांप्रदायिकता को हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता खानों में विभाजित किया गया था। यह भी तय है कि किसी भी सांप्रदायिकता का आधार केवल संकीर्ण मनोवृत्ति, द्वेष, घृणा, हिंसा जैसे विचारों को माना जाता है इसलिए किसी भी व्यक्ति या दल के लिए यह सरल होता है कि वह अपने बयानों, वक्तव्यों या विचारों को बदल दे और असांप्रदायिक हो जाये। इसका अर्थ यह हुआ कि सांप्रदायिकता का कोई ठोस आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक आधार नहीं माना गया उसे केवल बयानों वक्तव्यों आचरण तक सीमित कर दिया गया। जबकि ऐसा नहीं है।

साम्प्रदायिक शक्तियों की रणनीति पर यदि विचार किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि आजादी के बाद मुस्लिम विरोध का स्वर राष्ट्रीय संस्कृति वाद में इस तरह ढ़ाल दिया गया है कि उसे व्यापक समर्थन मिल गया। सांप्रदायिक शक्तियों ने धर्म-निरपेक्षता को तुष्टिकरण करके खारिज कर दिया और सांप्रदायिकता को अपने विरोधियों के एक ऐसे नारे में बदल दिया जिसका उद्देश्य केवल सत्ता में प्राप्त करना बताया गया। इस तरह लोकतांत्रिक और वामपंथी राजनीतिक शब्दावली से दो शब्द हटा ही दिए गये। इससे पहले कि लोकतांत्रिक वामपंथी ताकष्ते कुछ सोच-समझ पातीं राष्ट्रीय संस्कृतिवाद से हल्ला बोल दिया गया। अब स्थिति यह है कि धर्म निरपेक्षता चलती नहीं और सांप्रदायिकता विरोध केवल एक खोखला नारा होकर रह गया है। ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’ जैसे नारे अधूरे हैं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जवाब नहीं हो सकते, कांग्रेस और वामपंथी दलों के पास राष्ट्रीय संस्कृतिवाद की टक्कर में कुछ नहीं है क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिकता को पूरे सामाजिक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करके सैद्धांतिक आधार विकसित नहीं किए हैं। जिस गति से विकास होना चाहिए था, संस्थाओं का निर्माण और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का विकास होना चाहिए था लोकतांत्रिक माहौल बनना चाहिए वह नहीं बन सका। यानी सांप्रदायिक शक्तियों को लोकतांत्रिक चुनौती नहीं मिल पाई। यदि लोकतांत्रिक वामपंथी शक्तियाँ कोई ऐसा एजेंडा सामने लातीं जिससे हमारी जर्जर समाज व्यवस्था हिल जाती और आगे बढ़ने के रास्ते साफ नज़र आते, जनहित सर्वोत्तम ठहराया जाता तो सांप्रदायिक शक्तियाँ मंदी पड़ती। उदाहरण के लिए कांग्रेस राजीव गांधी के समय में यह कह सकती थी कि कांग्रेस ने 1952 मे ग्रामीण क्षेत्रों की ज़मीदारी खत्म की थी और 1985 में शहरी क्षेत्रों की ‘ज़मीदारी’ खत्म कर रही है। यदि यह नारा दिया गया होता और इस पर प्रभावकारी ढंग से काम किया गया होता तो जनता के जीवन स्तर और सरकार के संसाधनों में बढोत्तरी होती और राष्ट्रीय बहस लोकतांत्रिक वामपंथी दलों के हाथ में रहती। न्याय व्यवस्था में आमूल परिवर्तन, सरकारी कर्मचारियों को जवाबदेही के घेरे में लाना, भ्रष्टाचार उन्मूलन के परिणाम देने वाले कार्यक्रम, प्रशासन को संवेदनशील और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाना, शोषण के नये तरीकों को ख़त्म करना आदि ऐसे काम हो सकते थे जो समाज की पूरी धारा को मोड़ देते और उस वातावरण में कोई राम मंदिर और बावरी मस्जिद की बात सुनने पर तैयार न होता। लेकिन हम सब जानते हैं ऐसा नहीं हुआ। यदि कुछ किया भी गया तो वह छद्म था और उसका कोई प्रभाव लोगों के जीवन पर नहीं पड़ा। लोकतांत्रिक और वामपंथी दल इमेरजंसी के बाद वैचारिक रूप से दीवालिए हो चुके थे। इमेरजंसी से कोई सहमत नहीं हो सकता पर इतना तय है कि सरकार यदि दृढ़ता से कुछ करना चाहती है तो कर सकती है बशर्तें कि लोग उसके पीछे हों और उद्देश्य सही हो तथा परिणाम जनहित में निकल रहे हों।

आज स्थिति भयावह है। साम्प्रदायिक शक्तियाँ न केवल राजसत्ता में हैं बल्कि इतनी सशक्त हैं कि संसद, सुप्रीम कोर्ट तक की अवहेलना कर सकती हैं, न केवल उनके पास अपार धन है बल्कि अपार बल भी है। यही नहीं उनके पास चतुराई और चालाकी भी है। विपक्ष या लोकतांत्रिक और वामपंथी दलों के पास न तो इतने साधन हैं और न कोई ऐसी प्रभावकारी रणनीति है जो सांप्रदायिक शक्तियों का सामना कर सके हो सकता है सांप्रदायिकता से लड़ाई एक हारी हुई लड़ाई हो। फिलहाल वस्तुस्थिति यही है। इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का वैचारिक दीवालियापन और वाम की निष्क्रियता है।

सत्ता में रहते हुए दक्षिणपंथी ताकतें शायद उतनी ख़तरनाक न हो सकें जितनी वे विरोधी दल के रूप में हो जायेंगी, गुजरात के चुनावों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सांप्रदायिक ताकतें अपने फंडे तले बहुसंख्यक समाज को ला सकती है। इस कारण सबसे पहले तो मैं शक्तियाँ चुनाव के माध्यम से ही सत्ता में आने लगातार बने रहने का प्रयास करती रहेंगी और अपना फासीवादी एजेंडा लागू करती रहेंगी। यदि यह संभव न हो पाया तो वे शक्ति प्रदर्शन और प्रयोग कर राजसत्ता हासिल करेंगी। विश्व के इतिहास में यह कोई अनहोनी घटना न होगी, एक करोड़ लोग संसद को घेर सकते हैं। सरकार से इस्तीफे लेकर अपने पसंद की सरकार और नया संविधान बना सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ख़तरा फासीवादी दल से नहीं बल्कि फासीवादी दल के व्यापक जन-समर्थन से पैदा
होता है।

आज देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गिरफ्त में आ चुकी हैं। पन्द्रह-बीस वर्ष पहले जो आर्थिक सुधार सरलता से किए जा सकते थे वे अब नहीं हो सकते। लगता यह है कि सरकार चाहे जिस दल की हो आर्थिक नीतियाँ पूँजीवाद के हित में रहेंगी। ऐसी स्थिति में वर्तमान सामाजिक ढाँचा जस का तस रहेगा ओर उसका पूरा लाभ दक्षिणपंथी सांप्रदायिक राजनीति को मिलता रहेगा। विश्व पूँजीवाद की रुचि भारत की समस्याओं के समाधान में नहीं बल्कि भारत जैसी विशाल बाज़ार पर अपना
अधिकार जमाये रखने की है जिसके लिए केवल इतनी शांति की आवश्यकता पड़ती है कि लोग बेचने-खरीदने की स्थिति में बने रहें। इस तरह भारतीय समाज की सांप्रदायिकता विश्व पूंजीवाद के रास्ते में नहीं आती। विश्व पूंजीवाद सांप्रदायिक शक्तियों को अपना एजेंडा लागू करने की पूरी छूट देता है। यह भारतीय सांप्रदायिक राजनीति को विश्व पूंजीवाद का समर्थन है।

प्रश्न यह पैदा होता है कि ऐसी भयावह स्थिति में लोकतांत्रिक वामपंथी शक्तियाँ, फासीवाद से, जो अब तक लोकतंत्र के छद्म रूप में मौजूद है, कैसे संघर्ष कर सकती हैं? सबसे पहले वैचारिक दीवालिएपन से निकलना होगा। कांग्रेस को एक जीवंत और गतिशील नेतृत्व और कार्यक्रम की आवश्यकता है। सोनिया गाँधी या प्रियंका गाँधी से काम नहीं चलेगा। वामपंथी राजनीति को भी नयी परिस्थितियों में अपनी नयी रणनीति तय करनी होगी और केवल जोड़-तोड़ की राजनीति में लगे आधारहीन और चुके हुए नेतृत्व से अपना पीछा छुड़ाना पडे़गा।

दरअसल सांप्रदायिकता से संघर्ष एक राजनैतिक संघर्ष है। अब तक हम इसे सामाजिक-सांस्कृतिक संकट के रूप में देखते आये हैं यही कारण है किसी लोकतांत्रिक वामपंथी दल ने सांप्रदायिकता को कभी गंभीरता से नहीं लिया। वापमंथी दलों ने तो ‘सहमत जन नाट्यमंच, जनवादी लेखक संघ, इप्टा जैसे सांस्कृतिक संगठनों के कमजोर कंधों पर इसका पूरा भार डाल दिया और सिर्फ पीठ थपथपाने का काम करने लगे।

लोकतांत्रिक और वामपंथी शक्तियों को कुछ निकट आकर प्रभावकारी और परिणामकारी राजनीति करनी होगी। अब तक देश की राजनीति का स्वरूप एकांगी है। सरकार के समांतर संगठनों का बनाया जाना, उसमें लोगों की भागीदारी और उसे परिणामकारी बनाने से ही लोगों का विश्वास जीता जा सकता है; सही मुद्दे सामने आ सकते हैं, लोगों के जीवन में परिवर्तन की लहर आ सकती है। लेकिन यह हिमालय की चोटी फतेह करने वाला काम कठिन और गंभीर है इस पर राष्ट्रीय परिसंवाद की आवश्यकता है।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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