हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 16 : अपाहिज // असग़र वजाहत

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कहानी संग्रह हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ असग़र वजाहत लेखक डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सम्पादक भाग 1   ||  भाग 2 ...

कहानी संग्रह

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

असग़र वजाहत

लेखक

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक

भाग 1  ||  भाग 2  || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 || भाग 8 || भाग 9 || भाग 10 || भाग 11 || भाग 12 || भाग 13 || भाग 14 || भाग 15 ||

-- पिछले अंक से जारी

भाग 16


अपाहिज

आप्पिज्जी चिंटू का सिर और फिर आईने मे मुंह देखते रह गए। उनके हाथ में कैंची और कंघा कुछ ठहर-सा गया। ऊंची कुर्सी के हत्थों पर पटरा लगाकर उन्होंने चिंटू को बाल काटने के लिए बिठाया था। उन्होंने एक बार फिर चिंटू की शक्ल देखी। चश्मा उतार देने की वजह से चिंटू की गोल-गोल आंखें और छोटी लग रही थीं।

आप्पिज्जी को पता है यहां इस इलाके में उनको आप्पिज्जी कहने वाले दरअसल उन्हें हाफिज जी कहते हैं। अब जल्दी में या मजबूरी में उनके मुंह से आप्पिज्जी ही निकलता है तो इससे किसी की गलती नहीं है। घर और वतन छोड़कर जब आदमी कहीं जाता है तो अपनी बहुत-सी चिन्हारियां घर छोड़ जाता है। आप्पिज्जी रायबरेली से यहां नरेशनगर आ गए हैं। किसी जानकार ने बताया था कि आप्पिज्जी नरेशनगर में दुकान कर लो तो अच्छी कमाई हो जाएगी। हाफिज जी अपना बक्सा लेकर आ गए थे और नीम के नीचे बैठने लगे थे। कोई दो-चार आने ज्यादा दे देता तो घर भी चले जाते थे। धीरे-धीरे दुकान हो गई। दुकान पर हिन्द हेयर कटिंग सैलून का बोर्ड लगा गया। दुकान के पीछे हाफिज जी की मेहनत तो है ही, रहमत के कराची से भेजे हुए पैसे भी हैं। रहमत न होता तो यह सब न होता। रहमत कहता है नसीर भाई न होता तो कुछ न होता यानी रहमत को पाकिस्तान जाने के लिए रुपया नसीर भाई ने ही दिया था। नसीर भाई को वक्त ने आप्पिज्जी बना दिया है।

पाकिस्तान जाने को लेकर दोनों भाइयों में कई साल लड़ाई चली थी। पहले बहस-मुबाहिसा हुआ था। फिर चीख-चिल्लाहट हुई थी। रहमत चिल्लाता - ‘अरे तुम्हें पता है वहां हजामत बनवाई कितनी है? दस रुपये?’ नसीर यानी आज के आप्पिज्जी कहते थे, ‘तो पाकिस्तान के लिए वतन छोड़ेगा।’ यह चीख चिल्लाहट, यानी-गलौज में बदल जाती थी। फिर बातचीत बन्द हो जाती थी। रहमत के ऊपर कराची का भूत सवार हो गया था। वह सपने में कराची देखने लगा था। सोते जागते ‘तेज गाम’ पर बैठ जाता था। मोहल्ले के उन लड़कों के साथ पाकिस्तान के किस्से सुना करता था जो पाकिस्तान हो आए थे और कहते थे पाकिस्तान में सग इंपोर्टेड है। ओमेगा की घड़ियां, सोने की टेप रिकॉर्डर, जीलट के ब्लेड, जापानी खिलौने...और न जाने क्या-क्या है। रहमत इन्हीं ख्यालों में खोया रहता था। उसकी दीवानगी बढ़ती जाती थी...। एक दिन उसने कह दिया कि उसे पाकिस्तान न जाने दिया तो वह धतूरा खा लेगा। आखिर नसीर भाई ने हथियार डाल दिए थे। दिल को समझाया कि चलो किस्मत में भाई से बिछुड़ना लिखा था तो क्या कर सकते हैं। वह कभी न खत्म होने वाली रात उन्हें याद है जब रहमत को रेल पर खोखरापार के लिए बिठाया था और वह कभी न खत्म होने वाला दिन भी बाद है जब आप्पिज्जी पाकिस्तान की धरती पर रहमत से गले मिले थे।

पचास सालों की कितनी खट्टी-मीठी यादें हैं। कभी यह कहते हुए डरते थे कि उनका भाई पाकिस्तान में है। कभी ऐसा वक्त होता था कि वह पाकिस्तान से खरीदे कपड़े पहने अपने आपको जनरल अय्यूब समझा करते थे। उनकी रग-रग में पाकिस्तान कराची की नाजमाबाद कॉलोनी की डी ब्लॉक का मकान नम्बर एक सौ सात है जो रहमत और जुलेखा का घर है जहां से सबीहा और अफसाना की शादी हो चुकी है, लेकिन जहां रहमत का अपाहिज बेटा अदनान आसमान देखने के लिए बरामदे में बिठा दिया जाता है। अब तो उसकी उम्र भी सत्ताइस की हो गई है। अदनान न बोल सकता है, न सुन सकता है। चलना-फिरना तो दूर की बात है, हाथ-पैर भी नहीं हिला सकता। लाखों-करोड़ों की दवा-इलाज के बाद रहमत ने सब कुछ अल्लाह पर छोड़ दिया है। वह सोचता है, पाकिस्तान मुल्के खुदादाद-यानी खुदा का दिया हुआ मुल्क है। अदनान भी खुदा का ही दिया हुआ है...सब्र के अलावा क्या कर सकते हैं। चाहे जो हो, रहमत और सुलेखा ही नहीं दोनों बहनें भीअदनान का जान छिड़कती हैं। आप्पिज्जी की शादी नहीं हुई बच्चे नहीं हुए। रहमत के बच्चों को वह अपने बच्चे समझते हैं। कमाल की बात है कि अदनान पूरी दुनिया में किसी को पहचानता है तो सिर्फ आप्पिज्जी को। उन्हें देखते ही उसके चेहरे पर पहचान का भाव उभर आता है। बोल नहीं सकता, लेकिन चेहरे के भावों को छिपा भी नहीं सकता। आप्पिज्जी उस पर जान छिड़कते हैं। पता नहीं, कहां-कहां उसके ठीक होने की मन्नतें मान चुके हैं।

चिंटू ने आप्पिज्जी को ऊपर से नीचे तक अधेड़ दिया था। तीसरी गली में पांडेजी की लड़की सुषमा का लड़का चिंटू गली में रात-दिन एक किए रहता है। चौथी क्लास में जाता है, लेकिन बातें ऐसी करता है जैसे सबका बाप हों आज उसके बाल काटते हुए पता नहीं क्यों आप्पिज्जी ने पूछ लिया था-क्यों चिंटू तुम बड़े होकर क्या बनोगे?

- मैं फौज में जाऊंगा।

- अच्छा?

- कैप्टन बनूंगा।

- फिर क्या करोगे?

- फिर मैं देश के दुश्मनों से लड़ूंगा।

- कौन है देश का दुश्मन?

- पाकिस्तान।

- पाकिस्तान।

- हां पाकिस्तान।

आप्पिज्जी के ऊपर से एक लहर गुजर गई वह अपने को संभालने की कोशिश करने लगे। चश्मे के धुंधले शीशे से उन्होंने चिंटू को देखा। उसकीगोल-गोल आंखें नाच रही थीं। उन्हें पता है कि यह सब चिंटू ने मोहल्ले के लड़कों से सीखा है। वरना सात साल का चिंटू क्या जाने कि पाकिस्तान किस चिड़िया का नाम है?

- कैसे लड़ोगे पाकिस्तान से,

- मैं वहां एटम बम गिरा दूंगा।

- एटम बम!

- हां एटम बम!

आप्पिज्जी धीरे-धीरे बाल काटते रहे। उनके अन्दर ही अन्दर जहरीले गैस के बादल बरसते रहे। उन्होंने चश्मा साफ किया, पर धुंधला दिखाई पड़ता रहा। फिर उन्होंने आंखें रगड़ डालीं। आंखों की पोरों से पानी सूख जाने के बाद भी उन्हें साफ दिखाई नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि वह चिंटू को बता दें कि पाकिस्तान में अदनान रहता है, वह न अपने हाथों खा सकता है, न पी सकता है। वह चल-फिर भी नहीं सकता। वह सिर्फ देखता है। पर पता नहीं क्या देखता है। उसके हाथ-पैर भी नहीं मिलते। वह अपने आप इधर-उधर लुढ़क जाता है और जब तक कोई सीधा न करे, वह सीधा नहीं हो पाता। लेकिन वह बड़ा प्यारा नौजवान है। उसकी रंगत सफेद है। उसके हाथों कीरगें नीली हैं। उसके बाल काले हैं चेहरा लम्बोत्तरा है...वह बड़ा प्यारा है...हां कभी-कभी उस पर दौरे पड़ जाते हैं। पता नहीं उससे कहां से ताकत आ जाती है। वह अपने आपको जख्मी कर डालता है। जख्मों से खून निकल आता है। जब वह शान्त होता है तो आसमान पर उड़ते जहाजों को देखता रहता है। उसकी जबान मजेदार और बदमजा खाने में फर्क कर लेती है। बदमजा खाना वह उगल देता है।

उन्होंने सोचा, चिंटू से कहें, बेटा अपाहिज पर एटम बम गिराकर क्या करोगे? उस पर तो खुदा ने ही कहर ढा दिया हे। उन्हें लग रहा था कि पाकिस्तान पर एटम बम गिराते तो सिर्फ अदनान पर ही गिरेगा। अदनान मुल्के खुदादाद में रहता है और जिसके जिस्म पर खुद अपने किए घाव हैं। एक घाव भरने भी नहीं पाता, पपड़ी सूखने भी नहीं पाती कि वह दूसरा घाव कर लेता है। यानी जब से वजूद में आया है अपने आपसे ही लड़ रहा है। अपने जिस्म के हिस्सों को ही काट रहा है...वह अपाहिज है, नासमझ है, अपने बालों को इस तरह नोचता है कि जड़ो से उखड़ जाते हैं। वैसे अक्ल और समझदारी का तो उसमें नामोनिशान भी नहीं है कि लेकिन कभी-कभी गुस्से में इतना पागल हो जाता है कि अगर बस चले तो अपने जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर डाले...।

चिंटू के बाल कट चुके है। उसे उन्होंने कुर्सी से नीचे उतार दिया। सुषमा आ गई। उसने चिंटू के कटे बाल इधर-उधर से घूमकर देखे और आप्पिज्जी के हाथ पर ढाई रुपए रख दिए।

- सुषमा! देख तेरा बेटा पाकिस्तान पर एटम बम गिराना चाहता है।

- क्यों रे! यह क्या बकता रहता है?...किसने सिखाया यह सब तुझे?

सुषमा चिंटू का हाथ पकड़कर उसे खींचती हुई बाहर निकल गई। आप्पिज्जी पैसे थामे मोड़े पर बैठ गए। सामने दीवार पर मक्के-मदीने वाला पुराना कैलेंडर पंखे की हवा में इधर-उधर हिल रहा था।

उन्होंने दीवार पर लगी रहमत की तस्वीर को देखा जो धुंधली पड़ती जा रही थी। उन्होंने दिल ही दिल में ‘या अल्लाह’ कहा और वीरान आंखों से गली में देखने लगे। इससे पहले कि वह कुछ सोचते, राजवीर आया, बोला आप्पिज्जी, क्या बात है, गुमसुम क्यों बैठे हो?

- नहीं-नहीं, वैसे ही थक गए?

- सुबह-सुबह थक गए?

- थकान का क्या भरोसा मेरे भाई। बिना बताए चली जाती है।

यह कहकर वह बाल काटने में जुट गए। लेकिन बहुत कोशिश के बाद भी उनका ध्यान पाकिस्तान यानी अदनान से हट नहीं पा रहा था।

बेखयाली में आप्पिज्जी के उस्तरे से राजवीर के गाल पर पड़ा छोटा-सा दाना कट गया।

- यह क्या कह रहे हो आप्पिज्जी? राजवीर बोला।

माफ करो बेटा...मैं फिटकिरी लगा देता हूं।

आप्पिज्जी कटे पर फिटकरी लगाने लगे फिर भी उनका ध्यान वही रहा जहां था।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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रचनाकार: हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 16 : अपाहिज // असग़र वजाहत
हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 16 : अपाहिज // असग़र वजाहत
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