देवेन्द्र कुमार मिश्रा की दो लघु कहानियां // प्राची - जून 2018

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लघु कहानी

देवेन्द्र कुमार मिश्रा की दो लघु कहानियां

अपने घर

रते-डरते सुमन ने मां से कहा- ‘मैंने शादी कर ली है।’ दूसरी तरफ से मां के रोने की आवाज सुनाई देने लगी। अचानक पिता की आवाज सुनाई दी। शायद मां से फोन ले लिया था पिता ने।

‘तुम हमारे लिए मर चुकी हो।’

सुमन को भी रोना आ गया। उसने उदास स्वर में कहा- ‘ऐसा क्यों कह रहे हैं आप। मैंने बिना बताये शादी ही तो की है। अब बता रही हूं। पहले बताती तो आप मना कर देते। लड़का पढ़ा-लिखा है। सरकारी नौकरी में है। बस जाति भर अलग है।’

पिता का स्वर क्रोध से भरा था. ‘तुमने अपने परिवार को बताना भी जरूरी नहीं समझा। तुमने एक लड़के के प्रेम में पड़कर अपने परिवार को भुला दिया। कितने लाड़-प्यार से पाल पोसकर हमने तुम्हें बड़ा किया। क्या इसी दिन के लिए कि तुम भागकर अपनी मर्जी से शादी कर लो। हम तुम्हारे कुछ नहीं लगते। चार दिन की जान-पहचान वाला लड़का इतना महत्वपूर्ण हो गया कि घर-परिवार के लोग दुश्मन लगने लगे। वो सबकुछ हो गया और हम कुछ भी नहीं। अपनी शक्ल मत दिखाना आज के बाद।’

सुमन दुखी हो गई पिता की बात सुनकर। उसने कहा- ‘जब भैया ने अपनी मर्जी से दूसरी जाति में शादी की थी, तब तो आपने उसे कुछ नहीं कहा। बल्कि एक बड़ी पार्टी देकर उसके विवाह को स्वीकार किया था आपने। फिर मेरे साथ ये दुर्भाव क्यों? क्या इसलिए कि मैं बेटा नहीं बेटी हूं।’

‘बेटी हो इसलिए तो बड़े अरमान थे तुम्हारी शादी के। मैं तलाश तो रहा था तुम्हारे लिए अच्छा वर।’ पिता ने कहा। स्वर में कुछ नरमी थी।

‘और अच्छे के लिए आपको लाखों रुपये का इंतजाम करना था। जिसके लिए आपने घर तक बेचने की बात कही थी मां से। हरदम दहेज की रकम जुटाने के लिए आप परेशान रहते थे। रातों की नींद हराम हो चुकी थी आपकी।’ सुमन के स्वर में उदासी थी।

‘वो मेरा कर्त्तव्य था। मेरी जिम्मेदारी थी तुम। हर पिता करता है। इससे तुम्हें चिंतित होने की क्या जरूरत थी?’

‘जो आप लाखों रुपये खर्च करके करते, कर्ज लेकर करते। मकान बेचकर करते। वो मैंने बिना कुछ खर्च करके कर लिया। आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। फिर गुस्सा किस बात का?’

‘गैरजाति में विवाह अच्छा नहीं माना जाता। फिर माता-पिता, परिवार से भागकर-छिपकर शादी करना, ऐसे संस्कार तो नहीं दिये थे हमने तुम्हें। बेटियों के साथ यही तो दिक्कत है...।’

पिता अपनी बात पूरी कर पाते, इससे पहले सुमन का वर्षों से भरा गुस्सा निकल पड़ा,’ लड़कियों के साथ दिक्कत होती है। क्या कह रहे हैं आप? लड़कियों को कितनी पीड़ा पहुंचती है सोचा है कभी आपने। जब बचपन से ही उन्हें कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है। जब जनक और जननी अपनी बेटी से कहें कि ये घर तुम्हारा नहीं। तुम्हारा घर तो वो होगा, जहां तुम्हारी शादी होगी। क्या बीतती होगी मुझपर? सोचा है कभी आपने। ये परिवार के दिये हुए संस्कार ही तो हैं कि माता-पिता का घर मेरा नहीं था। उनके लिए पराया धन हूं मैं। आप ही अक्सर कहा करते थे, तुम्हारे हाथ पीले कर दूं तो मुक्ति पाउं। अपनी ही बेटी से मुक्ति। मां आपसे कहती थीं कि बेटी को उसके घर भेज दूं तो चैन की नींद सो सकूंगी। मैं आप लोगों के लिए इतना बड़ा बोझ थी कि मेरे कारण मां की नींद उड़ गई थी। आप मुक्ति पाना चाहते थे अपनी बेटी से। भाई अक्सर कहता था कि तुम्हारी शादी में लाखों खर्च होंगे। समझ लेना तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल गया। अब पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सेदारी मत मांगना। आप लोगों के ये सब कहने से मैं खुद को पराया समझने लगी। मैं स्वयं सोचते हुए डरती थी कि जिस घर में पैदा हुई, वो घर मेरा नहीं। तो कौन-सा अंजान घर होगा, जहां मुझे जाना होगा? पता नहीं वहां के लोग कैसे होंगे? मुझे अपना पायेंगे या नहीं। मैं हमेशा डरती रही कि मेरे माता-पिता का घर मेरा नहीं और किसी नये घर ने नहीं स्वीकारा तो फिर घर कौन सा होगा? होगा भी या नहीं। या सभी जगह पराया धन ही कहलाउंगी। शादी के लिए लड़के वाले पूरे झुण्ड के साथ आते और मुझे सिर से पैर तक निहारकर देखते। जमाने भर के प्रश्नों की झड़ी लगाते। कहां तक पढ़ी हूं. क्या-क्या काम आता है? मां हर बार चाय-नाश्ता बनाती और आपकी गर्दन झुकी रहती। आप लड़के वालों को मेरे गुण गिनाते रहते और लड़के वाले आराम से चाय-नाश्ता करते हुए प्रश्न पर प्रश्न पूछते रहते। लड़की की लंबाई ज्यादा है तो लड़की रिजेक्ट। लम्बाई कम है तो भी रिजेक्ट। लड़के से ज्यादा पढ़ी-लिखी तब भी रिजेक्ट। इन सबसे बच गये तो लड़की की कुण्डली में दोष निकल आते। सारे दोषों से मुक्ति के लिए आप से दहेज की राशि बढ़वाई जाती। ये आपके साथ मेरा भी अपमान था। किंतु मुझे तो चुप रहना ही सिखाया गया था। मेरा जाना तो तय था। पराया धन जो थी में।’

सुमन कहती जा रही थी और पिता सुन रहे थे। बिना कोई बात काटते हुए. न ही डांट रहे थे, बस सुन रहे थे। ‘पापा, और जब मेरी शादी नहीं जमती। तो भी आप लोग कितने उदास रहते थे। बताइये इस सब में मैं कहां दोषी थी? मां मेरे भाग्य को कोसती। अक्सर कहती- ‘न जाने क्या लिखाकर लाई है भाग्य में। कब ये बोझ सिर से उतरेगा?’ मैं बेटी थी या बोझ। फिर ज्योतिषियों के चक्कर। शादी कब होगी? क्या उपाय करना है? और आप जमाने भर के पूजा-पाठ, व्रत, उपवास मुझसे करने के लिए कहते। इससे मेरे आत्म-सम्मान को कितनी ठेस लगती। घर आकर लोग रिजेक्ट करते पूरी अकड़ से और आप लोग अपना गुस्सा मुझ पर उतारते। मैं क्या थी आपके लिए। घर तो मेरा था ही नहीं। पराया धन थी मैं, क्योंकि बेटी थी मैं। क्या यही दोष था मेरा। मैं आपके लिए ऋण थी, भार थी। मुझे लेकर कितनी आशंकायें, कितना डर था आपके अन्दर। बेटी की शादी नहीं हुई अभी तक। क्या सोचेंगे लोग? क्या कहेगा समाज? घर के सामने से लड़के निकलते तो आपका दिल धड़कने लगता। आप मुझसे कहते। घर के अंदर रहा करो। मैं अपने ही घर में बाहर के कमरे में नहीं बैठ सकती। यही संस्कार तो मिले थे मुझे। और आज जब मैंने आपका ऋण चुकाकर आपको सारे भार से मुक्त कर दिया, तब भी आप कह रहे हैं कि मैं मर चुकी हूं आप के लिए। कहीं इस बात का बुरा तो नहीं लगा आपको कि आपके पराये धन ने मालिक से बिना पूछे अपना नया मालिक कैसे चुन लिया? पराये धन से इतना मोह क्यों? इतनी नाराजगी क्यों? क्या अंतर हुआ आप लोगों में और इतिहास के क्रूर बादशाहों में जो औरत को सम्पत्ति समझते थे। इस घर में भी लोग कहेंगे, मेरी जाति दूसरी है, मैं दूसरे खानदान की हूं लेकिन इनकी बातों का बुरा नहीं लगेगा, क्योंकि ये सच होगा। ये तो मुझे आपके परिवार, खानदान का ही मानेंगे। लेकिन दुख इस बात का है कि जिस रक्त से बनी हूं, जिस घर में पैदा होकर जीवन पाया, देखा, समझा. जो सच में मेरा घर था. उस घर में पराया धन कैसे थी?’ कहते-कहते सुमन रोने लगी। कुछ देर पिता मौन रहे। फिर पिता ने आंसू रोकते हुए कहा- ‘अच्छा ठीक है। ये बताओ दामाद को लेकर अपने घर कब आ रही हो?’ पिता के मुंह से अपना घर सुनकर सुमन की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे।

सुमन ने आंसू पोंछते हुए कहा- ‘बहुत जल्द पापा।’

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2-

सरनेम

क जोड़ी आंखें किसी लड़की को देखें तो उसे देखना कहते हैं। लड़की देखे तब भी। लेकिन दो जोड़ी आंखें आपस में मिलें और हृदय में कुछ हो तो ये प्यार के शुरूआती लक्षण हो सकते हैं। लड़का और लड़की स्कूल के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे। वे एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उस समय उन्होंने आपस में कोई रुचि नहीं दिखाई। लड़की अब गर्ल्स कॉलेज में और लड़का डिग्री कॉलेज में पढ़ रहा था। वे बाजार में अचानक मिले। पलभर के लिए उनकी नजरें मिलीं और जादू सा हो गया। दोनों एक-दूसरे के बारे में सोचने लगे। दोनों एक ही मुहल्ले में रहते थे। एक निकलता बाजार या कॉलेज के लिए तो दूसरा भी उसे निकलता देख निकल जाता। रास्ते में नजरें टकरातीं। वे मुस्करा देते। कुछ दिन यूं ही चलता रहा। फिर एक दिन लड़के ने कहा- ‘कुछ आगे की बात करो।’ लड़की ने कहा- ‘मैं कैसे कर सकती हूं? शुरूआत तुम्हें ही करनी होगी।’

लड़के ने पूछा- ‘चाट खाओगी।’

लड़की ने स्वीकृति में सिर हिला दिया। इस तरह वे कभी चाट खाते। कभी आइस्क्रीम और आपस में बात भी करते रहते। बात यहां तक तो हो गई थी कि वे एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे। लेकिन बात इससे आगे भी बढ़नी थी. अब इस तरह की बातों के लिए चाट, आइस्क्रीम की दुकानें ठीक नहीं थीं। उन्होंने आपस में तय किया और दूसरे दिन वे शहर के पार्क में मिले। प्यार भरी बातों के आदान-प्रदान के बाद लड़की ने कहा- ‘आगे क्या होगा?’

लड़के ने कहा- ‘इसके बाद शादी।’

‘वो कैसे संभव है? हमारी जाति अलग है। रहन-सहन और स्टेट्स अलग है। कौन तैयार होगा इस शादी के लिए?’ लड़की के इस प्रश्न पर लड़के ने कहा- ‘प्यार हमने किसी से इजाजत लेकर नहीं किया। शादी भी हम अपनी मर्जी से करेंगे। आजकल कोर्ट मैरिज, आर्य समाज, सभी में शादी होती है। फिर हम बालिग हैं, हमें शादी करने से कौन रोक सकता है?’

लड़की ने चिंता भरे स्वर में कहा- ‘तुम्हें लगता है इतना आसान है।’

‘मुश्किल भी नहीं है।’ लड़के ने निश्चिंत भाव से कहा।

ऐसी बातें छुपती नहीं हैं। पता नहीं कौन, कहां से, कैसे देख लेता है। किसी ने देख लिया।

घर पर लड़के-लड़की दोनों को डांट पड़ी। लड़की का घर से निकलना बंद हो गया। उसके माता-पिता ने कहा- ‘यदि तुमने विजातीय लड़के से शादी करके खानदान की इज्जत उछाली तो हम सब जहर खाकर मर जायेंगे। लेकिन मरेंगे तुम्हें और तुम्हारे उस आशिक को मारकर।’

लड़की डर गई। उसे अपनी नहीं, अपने प्यार की चिंता थी। लड़के के घरवालों ने भी लड़के को डांटा- ‘समाज में लड़कियों की कोई कमी है जो परजात की लड़की से शादी करने पर तुले हो। तुम्हारे इस कदम के बाद तुम्हारी बहनों की शादी कैसे होगी? समाज में हुक्का पानी बंद हो जायेगा। खबरदार जो दुबारा उस लड़की से मिले।’

कुछ समय के लिए दोनों को लगा कि ये शादी दो परिवारों को नष्ट कर सकती है। लेकिन वो प्यार ही क्या जो समझाने से समझ जाये। लड़के ने अपनी एक परिचित लड़की से अपने प्यार के पास खबर पहुंचाई. ‘सच्चा प्यार करती हो तो जमाने की परवाह मत करो। मैं कल रात तुम्हें स्टेशन पर मिलूंगा। किसी भी तरह से स्टेशन तक आ जाओ। हम ये शहर छोड़कर किसी दूसरे शहर में बस जायेंगे।’

लड़की नियत समय पर स्टेशन पहुंच गई, बचते-बचाते। ट्रेन ने सीटी दी। वे दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हो गये। दोनों ने चेन की सांस ली। लड़की ने लड़के से पूछा- ‘हम करेंगे क्या?’ रहेंगे कहां? तुमने कुछ सोचा है?’

लड़के का जैसे यथार्थ से परिचय हुआ। उसने कहा- ‘ये तो मैंने सोचा ही नहीं। क्यों न हम अपने पैरों पर खड़े होने तक अपने घर में रहें। मैं नौकरी की तैयारी करता हूं। नौकरी नहीं लगी तो कोई व्यापार करने की सोचूंगा। जब कमाने-खाने लायक हो जायेंगे तब शादी करेंगे।’

दोनों अगले स्टेशन पर उतर गये और वापिसी वाली ट्रेन में सवार हो गये। लड़की ने कहा- ‘तुम्हारी कॉस्ट में तो नौकरी मिल जाती है जल्दी। मुझे लगे या शायद न लगे।’

ये बात लड़के को बुरी लगी। उसने कहा- ‘कॉस्ट से तुम्हारा मतलब मेरी जाति से है। तुम मेरा अपमान कर रही हो। नौकरी की मारामारी हर जगह है। बिना रिश्वत, सोर्स या पहचान के नौकरी लगना इतना आसान नहीं है। ये तो तुम लोगों ने बदनाम कर दिया है कि आरक्षण मिलता है तो नौकरी मिल ही जायेगी।’

‘मेरा मतलब वो नहीं था। हमारी तुलना में तुम्हारी जात वालों को मिल जाती है।’

‘हम प्यार करते हैं। तुम मेरी जात लेकर बैठ गई। आज ये हाल है तो शादी के बाद तो तुम अपनी जात की अकड़ में बात-बात पर मुझे नीचा दिखाओगी। मेरे माता-पिता का भी सम्मान नहीं करोगी।’ लड़के ने गुस्से में कहा।

लड़की ने समझाया- ‘मेरे लिए जात महत्वपूर्ण होती तो तुमसे प्यार क्यों करती? मैं तुम्हें चाहती हूं। मुझे तुम्हारी जात से कोई लेना-देना नहीं। मेरी एक बात समझ में नहीं आती। तुम लोगों को अपनी जात से इतनी समस्या क्यों है? जबकि जाति के नाम पर आरक्षण लेते समय गर्व से फार्म में जाति लिखते हो, लेकिन जब कोई पूछता है तो तुम्हें बुरा लगता है।’

लड़के ने कहा- ‘अपमानित करने के लिए पूछना और सहज भाव से पूछने में अंतर होता है।’

‘मैं सहज भाव से ही बात कर रही थी। तुमने गलत मतलब निकाला।’

‘मतलब तो तुम्हारा वही है जो तुम्हारे लोगों का होता है।’

‘मेरे लोग मतलब। मेरे तो तुम हो।’

लड़के ने कुछ न कहा। जैसे ही वे स्टेशन पर उतरे, लड़की के पिता पुलिस सहित प्रतीक्षा कर रहे थे। लड़की को डांट डपटकर घर ले जाया गया। लड़के को पुलिस थाना लाया गया। जब लड़के के परिवार वाले इकट्ठे हुए तो बात लड़ाई-झगड़े तक आ गई। लड़की ने परिवार और समाज के दबाव में लड़के के खिलाफ बयान दिये। लड़का जेल चला गया। लड़की घर में कैद कर दी गई। अब जब-जब लड़की की शादी के लिए लड़के वाले आते तो उन्हें लड़की के परजात प्रेम के बारे में पता चल जाता। शादी टूट जाती। ऐसा कई बार हुआ। तंग आकर लड़की के परिवार वाले भी लड़की को ताने मारने लगे।

‘ये है तुम्हारे कर्मों की सजा, जिसका खामियाजा हम सब भुगत रहे हैं। तुम्हारी बदनामी दूर-दूर तक फैल चुकी है। समाज में शादी होना मुश्किल है तुम्हारी। अब तुम जानो, तुम्हारा काम जाने.’

लड़की ने जेल पहुंचकर लड़के से मुलाकात की। उसे अपनी मजबूरी बताई। लड़के ने कहा- ‘तुम कोर्ट में ये कह दो कि तुम अपनी मर्जी से मेरे साथ गई थी, तभी मैं इस आरोप से बरी हो सकता हूं।’

‘पहले वादा करो कि तुम मुझे नहीं छोड़ोगे। मैं तुमसे आज भी उतना ही प्यार करती हूं। तुम करते हो या नहीं।’

‘बिल्कुल करता हूं लेकिन तुम भी वादा करो कि अब हमारे बीच जातिगत कोई बात नहीं होगी।’

‘जो तुम्हारी जाति वो मेरी जाति, लेकिन तुम भी वादा करो कि अपनी जाति से तुम चिढ़ोगे नहीं। अपमानित् महसूस नहीं करोगे। तुम्हें गर्व करना सीखना होगा अपने पर, अपनी जाति, अपने समाज पर। उतना ही गर्व जितना उंची जाति वाले करते हैं स्वयं पर।’

‘मैं वादा करता हूं।’

लड़की पहले लड़के के परिवार वालों से मिली। उन्हें अपनी बात से सहमत करवाया। कोर्ट में लड़के के पक्ष में गवाही दी। फिर उन दोनों की शादी हो गई। लड़के वालों ने अपनी लड़की को मृत समझकर भुला दिया। लड़के वालों को लगा कि लड़की के प्रेम और हिम्मत के कारण उनका बेटा बाइज्जत रिहा हुआ है।

लड़के को सरकारी नौकरी मिल चुकी थी। उनका जीवन अच्छे से कट रहा था। दो बच्चे भी हो चुके थे। लड़का गर्व से बताता कि उसकी पत्नी उच्च समाज से है। लेकिन दो बच्चों की मां बनने के बाद लड़की से जब कोई उसका नाम पूछता बाहर कहीं भी तो वह अपने नाम के आगे पिता का सरनेम ही लगाकर बताती। यहां तक कि सोशल साइट्स पर वह जहां-जहां भी थी, वहां अपने पिता की जाति का ही उल्लेख करती। लड़के ने एक बार पूछा भी- ‘यह क्या है?’

लड़की ने कहा- ‘तुम्हारी नौकरी के लिए जो सरनेम जरूरी थी, वह नौकरी तक ठीक है। अब सामाजिक स्टेट्स के हिसाब से तुम भी जहां जरूरत पड़े, मेरे सरनेम का उपयोग करो. हमें समय स्थिति के अनुसार चलना चाहिए. जहां जिसमें सम्मान मिले. नौकरी, प्रमोशन, में तुम अपनी जाति का उल्लेख करो और चार लोगों में मेरे सरनेम का। जहां जिससे फायदा मिले। इसमें क्या हर्ज है?’

लड़के को अपनी पत्नी की बात ठीक लगी। उसे समझ में आ गया कि उसकी पत्नी संसार के हिसाब से चलने वाली प्रणी है। अब वह भी यही करने लगा। आखिर नौकरी प्रमोशन और साथ में सम्मान कौन नहीं चाहता? जहां उसके समाज के लोग ज्यादा होते वहां लड़का अपना सरनेम बताता। जहां उच्च वर्ग वाले ज्यादा होते, वहां वह पत्नी का सरनेम बताता। बहुत से लोग फर्जी जाति प्रमाण-पत्र बनाकर सिंह लिखने लगे नौकरी के फार्म में। वही समाज में वे गर्व से कहते सिंह है हमारी जाति. मनुष्य के प्रति मनुष्य के भेद ने हमें नराधम बना दिया है। जब तक जाति नहीं जाती, मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जाता। तब तक हम अधम ही बने रहेंगे। नरोत्तम नहीं बन पायेंगे। मंदिर-मस्जिद की लड़ाई से निकले तो मूर्तियां गिराने में लग गये। हमें समझना होगा कि महापुरुष मनुष्य जाति के प्रेरणा स्रोत है। वे किसी जाति विशेष के नहीं। हम न जाने कब तक आदमी-आदमी में भेद करके अपमान करते रहेंगे, ईश्वर का, मनुष्यता का।

संपर्क : पाटनी कॉलोनी, भरत नगर,

चन्दनगांव, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001

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