व्यंग्य // धन्य हैं छपासप्रेमी // राजा चौरसिया // प्राची - जून 2018

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व्यंग्य

धन्य हैं छपासप्रेमी

राजा चौरसिया

साहित्यकार का छपासप्रेम उसके कृतित्व तथा अस्तित्व के प्रति अति लगाव का द्योतक है। ‘जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा’ इस कुंठा से बचाव न हो तो नदी किनारे ‘घोंघा प्यासा’ की कहावत ही चरितार्थ होती है। ऐसे भी रचनाकार हैं जो अपनी रचनाओं के धुआंधार प्रचार हेतु हर स्तर को फॉलो करने पर उतारू रहते हैं। वे धिक्कार के पात्र हैं जो अपने साहित्य को हवा तक नहीं लगने देना चाहते हैं। जो गढ़ते हैं उसे स्वयं तक नहीं पढ़ते हैं। उन्हें पता नहीं हैं कि सिमट कर रह गया सृजन कंचन होकर भी कूड़ा-करकट है और प्रचारित हुआ कूड़ा-करकट भी कंचन कहलाता है। छपास कोई रोग नहीं, बल्कि संयोग है।

यह कैसी विडंबना है कि वे सुखी हैं जो तथाकथित हैं, पर तपस्वी जैसे साहित्यकार व्यथित हैं। वर्क लगी मिठाई घटिया होकर भी बढ़िया नजर आती है। प्रदर्शनप्रियता निरंतर बढ़ रही है। किसी भी छपास से सरोकार यह सिद्ध करता है कि साहित्य से अधिक उसके छपास के प्रति घोर प्रतिबद्ध होना ठीक एवं नीक है। स्वांतः स्वार्थाय को सिद्धांत मानने से यह बोध होता रहता है कि जमाने की हवा हमें भी अच्छी तरह लग रही है। अपने खपने की चिंता छोड़कर छपने को प्राथमिकता देने की मानसिकता सामयिक है। कोई पढ़े या न पढ़े भाड़ में जाए, हमें यहां-वहां छपते रहना चाहिए। अखबारों के साहित्यिक परिशिष्ट के साथ अनियतकालीन पत्रिकाओं के भी ढेर लगे हैं। संपादकों से सम्पर्क बनाए रखने अर्थात उन्हें पटाए रखने में कहीं भी कोताही नहीं बरतनी चाहिए। चापलूसी की दरबारी कला से हमेशा भला होता है। छपास चेहरे के मेकअप की तरह खास है।

जो अच्छे चलते-पुर्जे सरस्वतीपुत्र हैं, वे थोक में अर्थात पुस्तकाकार रचनाएं न छपवाकर फुटकर प्रकाशन पर जोर देते हैं। संभवतः उन्हें पता है कि सोशल मीडिया की चांदी के दिनों में पठनीयता स्वाहा हो रही है। रद्दी कागज से भी कम कीमत होने के कारण कबाड़ी लोग धरोहर कही गई पुस्तकों तक के उद्धार को नकार देते हैं। स्मार्ट और शार्ट के युग में छोटी रचनाओं के छपने की गुंजाइश कमतर है जबकि समास के बदले व्यास शैली में लेखन की पहुंच बहुत कमतर है। वे साहित्यकर्मी मात्र संज्ञा हैं जिनके पास छपास का विशेषण नहीं है। पुरस्कार, सम्मान, उपाधि, अलंकरण आदि से विभूषित होने के लिए छपना एक सशक्त विज्ञापन है। पत्रिकाओं और रचनाओं के स्तर पर सोचने-विचारने की कतई आवश्यकता नहीं है। गुणवत्ता एवं सार्थकता को केन्द्रित करने से कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। सार की बात यह है कि आत्ममुग्घता ही आदि से अंत तक सही है। वित्त के बदले चित्त में यश की चाहत से ही राहत है।

यह भी देखा गया है कि छपासप्रेमी साहित्यकार उन संपादकों को उत्कृष्ट मानते हैं जो उनकी रचनाओं को आंखें मूंदकर छापते हैं। उनकी नजर में वे निकृष्ट हैं जो ढेर सारी सामग्री प्राप्त कर भी उसे छपास की हवा तक लगने नहीं देते हैं। एक स्वनामधन्य कवि हैं जिनके खून में यह जुनून सवार रहता है कि ज्यादा छपकर ही अपने बैरियों को ज्यादा से ज्यादा नीचा दिखाया जा सकता है। हमबिरादर के प्रति ‘जाति देख गुर्राऊ’ की तर्ज में नीचा दिखाऊ, टांग-खिचाऊ अभियान यह सिद्ध करता है कि लिखने और दिखने में अंतर होना ही चाहिए। ऐसे भी महानुभाव हैं कि जो अपनी छाती ठोंककर कहते हैं कि वे सचमुच में लिटरेरी डॉक्टर हैं, अंधेरे की छाती पर धूप के हस्ताक्षर हैं। अगर अवसरवाद को स्वीकार्य तथा अनिवार्य माना जाए तो उक्त विसंगति पर कटाक्ष नहीं करना चाहिए। बाहर से उजियारे भीतर से कारे ही बड़े सुखी कहलाते हैं। इनकी फेस जैसी विशेष कृपा से ही आज भी हाथी के दांत, ऊंच निवास नीच करतूती, पर उपदेश कुशल बहुतेरे, छद्म से पद्म, ढोल में पोल आदि कहावतें बहुत खूब फल-फूल रही हैं। साहित्य को जीने की फुरसत ही किसको है। साहित्यिक झोलाछाप जहां देखो वहां उतरा रहे हैं। गुटग्रुप कंपनी के चलते वे प्रतिद्वंदिता की रचनात्मकता से लैस रहते हैं और कहते हैं कि जो साहित्य से अधिक यथार्थ को भजता है, उसी का बाजा बजता है।

उनका तो जवाब नहीं जो अध्येता न होकर भी कई दर्जन पुस्तकों के प्रणेता बनने की रिकॉर्ड तोड़ मचाए हुए हैं। वे सम्मानित पुरस्कृत और अलंकृत होने के लिए संस्थाओं के मठाधीशों को खुश किए रहते हैं। आजकल प्रायोजित सम्मान समारोह धुआंधार होते रहते हैं।

धन्य हैं वे छपासप्रेमी जो छपने के लिए रचनाओं का पुलिंदा भेजते रहने में सुई की नोंक बराबर भी कोताही नहीं करते हैं। धन्य हैं ऐसे छपासप्रेमी प्राणी।

कोई पढ़े या न पढ़े पुस्तक को खोलकर पन्ने तक पलटे या न पलटे, इससे क्या फर्क पड़ता है। जब छपास की भुखास बढ़ने लगती है तब नैन, दिन-रैन चैन को तरस जाते हैं। ऐसे में आत्मतुष्टि की पुष्टि हेतु तिकड़म अपनाना ही पड़ता है। थोड़ा तोड़-मरोड़ के साथ चोरी के माल पर अपनी मौलिकता की मुहर लगाना ही चाहिए। जो छपते-छपते रह जाते हैं वे किनारे लगते-लगते बह जाते हैं।

बिना पढ़े और समझे दूसरों के साहित्य सृजन की बड़ाई आंखें मूंदकर करने में भलाई है। एक्सचेंज ऑफर एवं रिटर्न गिफ्रट के हिसाब से यह जरूरी है। आपस में एक दूजे की वाहवाही झोंकते रहने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही अपनी करनी-करतूत में दम नहीं फिर भी हम किसी से कम नहीं हैं। आईना दिखाने का युग समाप्त हो गया है, इसलिए अब कोई चोखेलाल किसी खोटेलाल की तनिक भी निंदा नहीं करता है, क्योंकि वह गेट आउट किए जाने से डरता है।

हाथ धोकर छपास के पीछे पड़े एक व्यक्ति से जब मैंने इसका कारण पूछा तो उसने मन की बात कह दी। उसका कहना था कि दुनिया नाम के लिए मरी जाती है। नाम ही सार है, बाकी बेकार है। अपनी कविताएं, कहानियां छपाने से नाम कमाना बहुत आसान है। लोगों के बीच सुचर्चित होने का उपाय इससे बढ़कर दूजा नहीं है। असलियत तो पर्दे में ही रहने की चीज है। मैंने पूछा- क्या लेखक और साहित्यकार एक ही हैं। उसका उत्तर था- ‘दोनों एक ही चीज हैं भाई।’ साहित्य की यात्रा के नाम पर छपास की मात्रा को ध्यान में धरने वाले हस्ताक्षर वंदनीय है। ऐसे छपास प्रेमियों को पता है कि चेहरे पर मुखौटों का जमाना है। समय को नकारना बाद में स्वयं को धिक्कारना है। जो सत्य के साथ संकल्प से सिद्धि की ओर हैं ऐसे विशिष्ट या वरिष्ठ महानुभावों को चाहिए कि वे इनके विरोध में नाहक न धुआंते रहें, बल्कि इनकी पीठ ही थपथपाते रहें। इन लोगों के आयोजनों में ही धुरंधर सम्मानित के मोह में गधे को भी घोड़ा मान लेना चाहिए।

शादी के बाद लड़के बच्चे न हों तो कैसा लगेगा। इसी तरह रचनाकार की रचनाएं न छपें तो ऐसा जरूर लगेगा कि उसकी प्रतिभा बांझ हो रही है। दूसरी बात यह है कि छपने पर ही लोग बधाई देते हैं। फकत लोकाचारी होने पर भी
बधाई दूध पर मलाई से भी बढ़िया दिखती है। ‘हम क्या लिख रहे हैं?’ इससे ज्यादा प्रासंगिक यह प्रश्न है कि हम कितना लिख रहे हैं। छपास का आधार लिक्खाड़ होना है। गोष्ठी से लेकर विभिन्न साहित्यिक बैनर वाले कार्यक्रमों में पधारने के चांस और रिस्पांस से मन गार्डन-गार्डन होना स्वाभाविक है। संसार में शो बाजी का चलन देखते हुए इन छपास प्रेमियों की प्रशंसा ही करनी चाहिए। इनके लिखने छपने को करतूत न कहकर वर्तमान के सच का सबूत कहना सरासर उचित है। मानसिक तनाव से उबरने और साहित्य जगत में उभरने हेतु छपास एक सेतु है। जिसका पानी उतारने के बदले हमें उसकी आरती उतारने पर उतारू होना चाहिए।

संपर्क : उमरियापन,

जिला- कटनी, (म.प्र.) 483332

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