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हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 3 : आतंकवाद के नये-नये चेहरे // असग़र वजाहत

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

असग़र वजाहत

लेखक

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक


भाग 1  ||  भाग 2

-- पिछले अंक से जारी

आतंकवाद के नये-नये चेहरे

एक मित्र वर्धा (महाराष्ट्र) से लौटकर आये और उन्होंने जो बताया उस पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि वे जो बता रहे हैं उसका चित्रा भी उनके पास है। मैंने उनसे चित्र लिए तो पता चला मित्र झूठ नहीं बोल रहे थे। मित्र ने बताया था कि उन्होंने वर्धा (महाराष्ट्र) की आर.वी. चौक नाका पर एक जुलूस देखा। जुलूस में काफी लोग शामिल थे और जुलूस में एक खुले ट्रक पर एक झांकी भी बनाई गयी थी। झांकी में एक सुंदर गाय खड़ी थी। गाय की एक ओर एक आदमी खड़ा जो पहनावे तथा अन्य चिन्हों से हिंदू लगता था। गाय की दूसरी तरफ एक ऐसा आदमी खड़ा था जो वेश-भूषा से पक्का मुसलमान लगता था। इस मुसलमान लगने वाले आदमी के हाथ में एक लम्बा-सा छुरा था जो वह गाय को मारना चाहता था लेकिन हिंदू व्यक्ति उसे रोक रहा था।

चित्र देख कर यह साफ हो जाता है कि झांकी का संदेश है कि मुसलमान गाय के हत्यारे हैं और हिंदू गाय की रक्षा करते हैं। अब सवाल यह उठता है कि भारतीय कौन हैं जो लोग गाय की हत्या करते हैं? इससे पहले यह देखना होगा कि भारत में गाय की हत्या कहाँ-कहाँ होती है?

गाय की हत्या को भारतीय संविधान ने प्रांतों की इच्छा और अनइच्छा पर छोड़ दिया है। कुछ प्रांत जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, महाराष्ट्र आदि राज्य ऐसे हैं जिन्होंने गऊ हत्या को कानूनी रूप में अवैध करार दे दिया है और कुछ प्रदेश जैसे नागालैंड, केरल, मिज़ोरम आदि ऐसे हैं जहाँ की प्रांतीय सरकारों ने गऊ हत्या को गै़र-कानूनी नहीं माना है।

अरुणाचल प्रदेश, केरल, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, लक्षद्वीप में गऊ हत्या पर प्रतिबंध संबंधी कोई कानून नहीं है। जबकि भारत के एकमात्र मुस्लिम बाहुल्य प्रदेश जम्मू कश्मीर में गोहत्या प्रतिबंधित है। महराष्ट्र में गोहत्या प्रतिबंधित है। इसलिए....इस प्रकार की झांकी निकालने का क्या मतलब है कि मुसलमान महाराष्ट्र में गाय की हत्या करते हैं। और हिंदू उसे बचाते हैं? दरअसल देश...के जिन प्रदेशों में गोहत्या होती है वहाँ इस झांकी का कोई अर्थ हो सकता है लेकिन उन सब प्रदेशों में मुसलमान ही गोहत्या करते हैं यह भी विवाद का विषय हो सकता है। नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय में प्रायः मुसलमान नहीं हैं। वहाँ गोहत्या करने वाले स्थानीय लोग हैं। इसलिए झांकी में मुसलमानों के बजाय नागा, मिज़ोरम आदि लोगों की छवियाँ होनी चाहिए थीं। लेकिन ऐसा नहीं है।

मुसलमान को ही गोहत्या करते दिखाये जाने का स्पष्ट उद्देश्य यह स्थापित करना है कि मुसलमान ही गोहत्या करते हैं। हिंदू समाज की गाय के प्रति आस्था और अपमान करने वाले मुसलमानों के प्रति दर्शकों के मन में यही आता होगा कि मुसलामान हिंदू धर्म और विश्वासों के विरोधी हैं। गउभक्षक हैं, हिंसक हैं। इस कारण उनसे घृणा करनी चाहिए। हिन्दुत्व की रक्षा करनी चाहिए। इन विचारों और भावनाओं की परिणति हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य में होती है। हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे को शत्रु मानने लगते हैं। कभी-कभी भयानक दंगे हो जाते हैं। देशवासियों में फूट पड़ती है।

हिंदू मुसलमानों के बीच शत्रुता बढ़ाने वाले दरअसल देश को अंदर से कमज़ोर करते हैं। उनका कुप्रचार सामाजिक अस्थिरता और विघटन को जन्म देता है। आतंकवादी भी यही काम करते हैं। वे बमों द्वारों विस्फोट करके सैकड़ों लोगों की जान ले लेते हैं। देश के दो समुदायों के बीच घृणा अविश्वास और हिंसा का वातावरण बनाना भी एक प्रकार का आतंकवाद है। इन ‘विस्फोटों’ का प्रभाव यह पड़ता है कि देशवासियों के मन में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास, घृणा, हिंसा और बदला लेने की भावनाएँ बढ़ जाती हैं।

हमारा इतिहास साक्षी है कि जब एक देश में रहने वाले लोगों के बीच घृणा और हिंसा बढ़ जाती है तो क्या होता है। क्या आज समाज को घृणा और हिंसा की आग में झोंकने वाले किसी भी तरह देशप्रेमी कहे जा सकते हैं? दरअसल ये पक्के देशद्रोही हैं और समाज के सबसे बड़े शत्रु हैं।

हमें देश की सुरक्षा सीमाओं पर ही नहीं सीमाओं के अंदर भी करने की ज़रूरत है। ये समाज-विरोधी तत्व समाज को बाँध कर अपना राजनीतिक स्वार्थ पूरा करते हैं। ये वही काम करते हैं जो कभी पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने किया था। इन्हें शायद यह नहीं मालूम कि देश में घृणा और हिंसा की आग भड़का कर ये अपने राजनीतिक हित तो साध सकते हैं लेकिन इससे देश और देशवासियों को एक ऐसा नुकसान होता है जिसकी भरपाई संभव नहीं होती।

अभी हाल ही मैं शफीकुर्रहमान बर्क बसपा के सांसद सदन से उठ कर चले गये थे क्योंकि वहाँ वंदे मातरम् की धुन बज रही थी। अगर किसी का इस्लाम इतना कमजोर है कि वह वन्दे मातरम् की धुन से खंडित हो जाता है तो उसे पहले अपने धर्म को पक्का करने पर ध्यान देना चाहिए।

श्री बर्क को यह भी मालूम होना चाहिए कि वे किसी इस्लामी देश में नहीं बल्कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं, जहाँ मुसलमान कई मुस्लिम देशों से ज्यादा सुरक्षित और सम्मानित हैं। पाकिस्तान में मुसलमान अपने को जितना असुरक्षित महसूस करते हैं उतना भारत में नहीं करते। क्योंकि भारत में मुस्लिम समुदाय एक-दूसरे से उस तरह युद्धरत नहीं हैं जैसे पाकिस्तान में है। बर्क साहब अगर वंदे मातरम् की धुन को इस्लाम विरोधी मानते तो क्या वे हिंदू बाहुल्य देश में रहने को गै़र इस्लामी नहीं मानते, जबकि अब भी दुनिया में इस्लामी देश हैं। जहाँ जाया जा सकता है। बर्क साहब का इस्लाम हिंदू वोट लेने और सांसद हो जाने की अनुमति तो देता है देश और संसद की आचार संहिता पर विश्वास करने की अनुमति नहीं देता यह आश्चर्य की बात है। धर्म की आग पर रोटियाँ सेंकने वाले ही समाज में द्वेष, घृणा और अलगाव पैदा कर रहे हैं।

धर्मांधता फैलाकर वोटरों का समर्थन मिल जाता है। धर्मांध मुस्लिम नेताओं को शायद नहीं मालूम कि वे मुसलमानों का जितना अहित कर रहे हैं। उतना कोई और नहीं कर रहा है। लोकतंत्र मुसलमानों और दूसरे धर्मों का सम्मान करता है। इसलिए लोकतंत्र का सम्मान करना और मज़बूत बनाना बहुसंख्यकों की तुलना में अल्पसंख्यकों के लिए ज्यादा ज़रूरी है। श्री बर्क जैसे लोगों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि कुछ ‘झांकियाँ’, ‘वक्तव्य’ या ‘बहिष्कार’ भी वही काम करते हैं जो आतंकवादियों के बम विस्फोट करते हैं।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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