डॉ आर बी भण्डारकर की 5 लघुकथाएँ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

5 लघु कथाएँ

snip_20180629165452

         (1) * इनकी भी तो सुनो *

              

             पुस्तकों के एक पैकेट को चिपकाना था सो दादा जी सैलो टेप का छोर ढूंढ रहे थे,जो ऐसा चिपक गया था ,कि मिल ही नहीं रहा था।

      नाखून की सहायता से सब जगह आजमा लिया;छोर नहीं मिला सो नहीं ही मिला।

        उनके पास में बैठी हुई उनकी ढाई वर्षीय पोती बीच बीच में  कुछ कुछ बोल रही थी,जिस पर अपनी धुन में मस्त दादा जी ध्यान ही नहीं दे रहे थे।

        दादा जी को उपाय सूझा। कैंची के एक किनारे से टेप के बंडल को एक जगह पर हलके से खुरचा। बस छोर मिल गया इसी के सहारे; वे टेप को इच्छानुसार निकाल

ने लगे।

     पोती बोली "मैं तो कब थे यही बोल लही थी आप थुन ही नहीं लहे थे,अपनेहहहह  ही काम में लदे थे।"

.........................///.............................


      (2) * छोटी छोटी खुशियाँ *

             

        " कितनी भव्य कुर्सी है यह।है तो मेरे ही समकक्ष पर केवल इस कुर्सी पर बैठने से ही कितना जमता है ,यह। "

    बेचारे सारंग सिंह यही सोच सोच कर दुबले होते रहते।स्वाति की बूँद जैसी हो गयी थी वह कुर्सी उनके लिए।

    सरकारी कार्यालय का रवैया अपना ; कभी किसी तरह की कुर्सी खरीदी गयीं,तो कभी तरह की।ठलक का प्रभारी तो भिन्न भिन्न स्तर के अधिकारियों के लिए नियम के अनुसार ही कुर्सियां खरीदता है;अलग अलग खरीदी में बनावट के अनुसार कुर्सियों में कुछ फ़र्क हो ही जाता है।

    भले ही समान स्तर के अधिकारी हों,पर कुर्सी किसी को यह मिल जाती है तो किसी को वह।

     ऐसा यहाँ लागू तो नहीं होना चाहिए पर चलो इसे ऐसा ही मान लेते हैं कि एक दिन घूरे के भी दिन फिरते हैं।सारंग सिंह के भी दिन फिरे।

   वह अधिकारी पहले आया था सो उसका टेन्योर पहले पूरा हुआ;उसका ट्रांसफर हो गया।जब सब फेयरवेल पार्टी में व्यस्त थे तब सारंग सिंह ने सबकी आँख बचाकर वह कुर्सी उठवा कर अपने कार्यालय में रखवा ली और अपनी वाली वहाँ रखवा दी।

    अगले दिन स्थानापन्न अधिकारी आये।उन्हें क्या पता किस्सा कुर्सी का ; पर आज सारंग सिंह की खुशी का तो ठिकाना ही नही; पीयूष-वर्षा सी हो गयी है,उन पर।

.........................................................


              (3) * घुन *

                       

मुझे पाँच वर्ष हो गए हैं।

अरे !मुझे तो पूरे दस वर्ष हो गए हैं;तब से विपत्ति ग्रस्त क्षेत्र(Difficult Area) में ही खट रहा हूँ।

इतने दिनों से ? कायदे से तो आपकी पोस्टिंग अब तक शांत क्षेत्र में हो जानी चाहिए थी;कुछ कोशिश नहीं की?

आप कुछ कर रहे हैं क्या?

कुछ खास नहीं।मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार हैं,उनकी पहचान अपने विभाग में काफी उच्च स्तर पर पदस्थ रह चुके एक अधिकारी से है;उन्होंने उन्ही से कहा है।

आप नाम जानते हैं,उन अधिकारी का?

जी;फलाँ साहब।

कुछ देने-लेने की भी बात हुई है क्या?

अरे नहीं।मेरे वे रिश्तेदार हैं जो किसी भी प्रकार के दें-लेन के सख्त खिलाफ हैं।

तो नहीं होगा आपका  काम।

क्यों?

जिन अधिकारी का नाम लिया है न आपने, वे बिना दिए लिए कुछ करते ही नहीं हैं,बन्धु.........बिल्कुल आप जैसा मुगालता मैंने भी पाला था,कभी।

..................................


                 (4)* पिता *

     

          आपका लड़का बहुत होशियार है पढ़ने में;प्रथम श्रेणी में पास हुआ है।सीधा,सरल है,बड़ा आदमी बनेगा ,एक दिन।"

    हेड मास्टर साहब के मुँह से यह सुनकर घोर गरीबी जनित अभावों से कुड़मुडाया सुखईं का सीना दोगुना स्फीत हो गया।यद्यपि सुखईं न प्रथम श्रेणी समझे थे न होशियार का सही मतलब समझे।समझ में आया था तो केवल इतना कि "बड़ा आदमी बनेगा एक दिन।"  पिता की खुशी का यही आधार था ;यही आधार उनके हर काम से,हर परिचय से ,हर साध्य से, हर साधन से लिंक था। यहाँ तक कि उनके कैशोर्य का अल्हड़पन,युवा के ख्वाब सब भेंट चढ़ गए,घर-गृहस्थी में जो ; उनके सांसारिक जीवन मे वह भी जुड़ गए थे इस आधार से।

  अभी अभी लौटा है वह हल जोत कर दुपहर का भोजन करने।खटिया पर कापी पड़ी है बेटे की;उठा लेता है,उलटता,पलटता है।आनंद की एक लहर दौड़ जाती है शरीर में,ज्यों गूंगौ मीठे फल कौ रस अंतर्गत ही भावै।

   जबकि सही यह है कि यह पिता नहीं खा पाया है कभी मीठे फल,इसी मीठे फल की उम्मीद में ही।

..... ........................................

...

(5)

* रहिमन धागा प्रेम का *

          -डॉ आर बी भंडारकर।

     एक सम्भ्रांत किसान का पोता परसू छोटा था।छोटा था इसीलिए नाम भी छोटा था-केवल तीन अक्षरों का।समझ भी अल्प थी सो वह समझ ही नहीं पाता था कि घर के बाहर के चबूतरे पर नीम का जो पेड़ है उसकी एक डाल पर रस्सी के एक गुच्छे(सींके) में अइया

(दादी) ने मिट्टी का एक सकोरा क्यों टाँग रखा है,अइया उसमें रोज पानी क्यों भर देती हैं?

     कुछ बड़ा हुआ परसू  तो नाम भी बड़ा हो गया परशुराम।स्कूल से लौट कर आता तो देखता कि सकोरे पर पक्षियों का झुंड मंडरा रहा है ,वे एकल या समूह में सकोरे का पानी पी रहे हैं।उसे पक्षी बहुत अच्छे लगते हैं ,वह उनके पास जाना चाहता है पर वे फुर्र से उड़ जाते हैं।यह हो गया है,रोज का क्रम।

     आज छुट्टी जल्दी हो गयी;दरवाजे पर पहुँचते ही वह देखता है कि अइया सकोरे में पानी भर रही हैं,उन्होंने ज्वार के एक मुट्ठी दाने भी सकोरे की एक बगल में सुव्यवस्थित ढंग से बनाये गए एक स्थान पर बिखेर दिए हैं।पक्षी अइया के पास मंडरा रहे हैं, टूट पर रहे हैं दानों पर ,पानी पर।अइया कहती जाती हैं-अरे,रुक भाई, ऐसे तो सब दाने फैल जाएंगे।आश्चर्य ! पक्षियों की छीना-झपटी कुछ देर के लिए बंद।अपना काम कर अइया कहती हैं लो अब खाओ सब;फैलाना नहीं भाई।

मुझ छोटे बच्चे से डर कर भागने वाले पक्षी अइया से क्यों नहीं डरते?

        साल भर में ही मैं परशुराम सिंह हो गया हूँ।अब जान पाया हूँ अइया के प्रति पक्षियों के प्रेम का कारण।आप भी जान गए होंगे?तो देर क्यों।

      सब पक्षी आपके मित्र;उनका सुबह-सवेरे का कलरव।अहा ! ऐसा संगीत कि आपके हृदय की सम्पूर्ण गांठे खुल जाती हैं।

--


डॉ आर बी भण्डारकर

पूर्व उपमहानिदेशक:दूरदर्शन

सी-9,स्टार होम्स,रोहितनगर फेस 2

भोपाल 462039

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "डॉ आर बी भण्डारकर की 5 लघुकथाएँ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.