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गुरुपूर्णिमा विशेष आलेख - गुरु: शरणं प्रपद्ये // डा. सूर्यकांत मिश्रा

27 जुलाई गुरुपूर्णिमा पर विशेष...

गुरु: शरणं प्रपद्ये

गुरुपूर्णिमा विशेष आलेख - गुरु: शरणं प्रपद्ये // डा. सूर्यकांत मिश्रा

गुरु पूर्णिमा पर्व अर्थात प्राचीन भारत की गुरु-शिष्य परंपरा की स्मृति। हमारा देश शुरू से ही गुरुओं के प्रति अकाट्य श्रद्धा का प्रतीक रहा है। वैसे गुरु पूर्णिमा का पर्व महाग्रंथ, महाभारत के रचयिता श्री कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेद-व्यास जी के अवतरण दिवस के उत्सवी रूप में मनाया जाता है, किन्तु वर्तमान में दिग्भ्रमित समाज को यह पर्व एक चेतावनी भी देता दिख रहा है कि गुरु के महत्व को नकारना उसके लिए भारी संकटों का मार्ग खोल सकता है। यह दिन प्रत्येक मनुष्य के लिए अपने आराध्य से लेकर जीवन की हर उम्र की दहलीज पर मिले गुरुओं के आदर-सम्मान का प्रतीक है। फिर वह गुरु माँ से लेकर प्रारंभिक शिक्षा की दहलीज पर मिले गुरुओं के रूप में हो या फिर खेल के मैदान में मिले प्रशिक्षक की भूमिका में प्राप्त हुए हों। कला के क्षेत्र से लेकर संगीत की साधना तक का सफर बिना गुरु की शरण में गए पूरा होना असंभव ही प्रतीत होता है। प्राचीन भारत में किसी भी शिष्य के लिए गुरु की एक आज्ञा बड़े आदेश से कम नहीं हुआ करती थी। चाहे परिस्थितियां विषम ही क्यों न हों गुरु की आज्ञा की अवहेलना करना शिष्य के विचारों तक पहुंच ही नहीं पाती थी। यही कारण था कि प्रत्येक गुरु अपने शिष्य को उस ऊंचाई पर पहुंचाने की कामना किया करता था, जिसकी उम्मीद से वह गुरु की शरण मे आया हो, इसलिए कहा गया है...

गुरुरेको जगत सर्वम, ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम।

गुरो: परतरं नास्ति, तस्मात्सम पूजयेद गुरुम।।

अर्थात अकेला गुरु पूर्ण विश्व है जिसमें ब्रह्मा विष्णु और शिव समाये हुए हैं। गुरु से महान और कोई नहीं इसीलिए गुरु की पूजा का विधान है।

एक गुरु का प्रथम कर्तव्य भी यही है कि वह अपने ज्ञान के द्वारा उनके शरण में आए शिष्यों के मार्ग-दर्शन करें। भारतवर्ष विश्व में गुरुओं के देश की उपमा के रूप में जाना गया और विश्व गुरु बनकर प्रतिष्ठा पाई। आज उक्त उपमा में ग्रहण भले लगा दिख रहा हो फिर भी गुरु की महत्ता हमारे अपने समाज में कहीं अधिक है। देश और विश्व का परिदृश्य भले ही बदलता गया हो, हम सभी विकास की नई परिभाषा गढ़ रहे हों, विज्ञान भले ही आविष्कारों का आसमान छू रहा हो, लेकिन यह कटु सत्य आज भी जीवित है बिना किसी गुरु या शिक्षक के समाज विकास का इतिहास नहीं लिख सकता। किसी भी समाज, किसी भी वर्ग और किसी भी क्षेत्र का कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, उसकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा का बीजारोपण एक अध्यापक, एक गुरु अथवा शिक्षक द्वारा ही किया जाता रहा है। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि शिक्षक का स्थान किसी भी समाज में सर्वोपरि रहा है और प्रगति की हर राह पर गुरु रूपी प्रतिछाया ही सामने आती रही है। गुरु कोई भी हो यह सुनिश्चित है कि वह दिव्य प्रकृति का ठोस स्वरूप होता है। इसी कारण यह भी माना जाता है कि शिष्य का व्यवहार भी गुरु के प्रति गहन विनम्रता से भरा होना चाहिए। स्वयं को गुरु के आगे नतमस्तक कर हृदय को निर्मल बना लेना ही एक शिष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए। गुरू चरणों में हमारा नि:स्वार्थ समर्पण जीवन-ज्योति को प्रकाशित कर प्रज्ज्वलित रखने में घी का काम कर दिखाता है। इन्हीं विचारों को हम कुछ इस तरह कह सकते हैं:-

आसनं शयनं वस्त्रम, वाहनं भूषणादिकम।

साधकेन प्रदातव्यं, गुरु संतोषकारणम।।

गुरु शिष्य परंपरा और आदर्श सत्कार का एक दृश्य मुझे आज्ञाकारी शिष्य ‘आरूणि’ और उनके गुरु के रूप में अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। प्राचीन भारत में धौम्य आश्रम में एक ऋषि रहा करते थे। वे अपने शिष्यों से कही करते थे मुसीबत चाहे जितनी भी बड़ी हो, उससे भागना नहीं चाहिए। उनकी यह बात शिष्य ‘आरूणि’ ने अपने मन में बैठा लिया। गुरु ने भी अपने शिष्य की परीक्षा लेने की ठान ली। बरसात के दिनों की बात है, गुरु ने ‘आरूणि’ से कहा कि तुम खेतों पर चले जाओ और इस बात का ध्यान रखो की कोई भी मेढ़ पानी के बहाव में न बह सके। साथ ही टूटी मेढ़ों को भी बांध देना, जिससे फसल खराब न हो। ‘आरूणि’ जब खेत पर पहुंचा तो बारिश काफी तेज हो चुकी थी। मेढ़ पानी के बहाव से टूट गयी थी। पानी पूरी तीव्रता के साथ खेतों में घूस रहा था। ‘आरूणि’ ने मिट्टी डालकर पानी को रोकना चाहा, किंतु तेज बहाव के कारण सारी मिट्टी ही बहती जा रही थी। अब ‘आरूणि’ थक चुका था। उसी समय उसे गुरु के कहे शब्द याद आ गये। ‘मुसीबत चाहे जितनी भी बड़ी हो, उससे भागना नहीं चाहिए।’ ‘आरूणि’ के मन में ऐसे स्मृति शब्द आते ही उसने फैसला कर लिया कि अब किसी भी स्थिति में पानी को रोकना ही होगा और वह स्वयं मेढ़ पर लेट गया। काफी समय गुजर जाने पर जब ‘आरूणि’ नहीं लौटा, तब ऋषि स्वयं अन्य शिष्यों सहित खेत पर जा पहुंचे। उन्होंने देखा पानी के तेज बहाव को रोकने ‘आरूणि’ मेढ़ पर लेट गया है। गुरु को यह देख काफी आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसके कष्टों का अहसास कर उसे स्वयं उठाया और गले लगा लिया। गुरु ने ‘आरूणि’ की गुरु भक्ति को देख सदैव सफल होने का आशीर्वाद दिया:-

नृत्यं ब्रह्म निराकारं, निर्गुणं बोधयेत्परम्।

भासयेन, ब्रह्मभावंच, दीपो दीपांतरं यथा।।

एक शिष्य के अंदर गुरु के प्रति आकर्षण, ध्यान समर्पण और सम्मान ही उसके कल्याण का तत्व माने जा सकते है। एक शिष्य किस प्रकार से पूर्ण शिष्य का दर्जा पा सकता है, किस प्रकार से अपने जीवन को श्रेष्ठता प्रदान कर सकता है, तथा अपने में शिष्यत्व के गुण समाहित कर गुरु का योग्य शिष्य बन सकता है, इस पर विचार जरूरी है। जहां तक मैं समझता हूं, शिष्य का अर्थ है, गुरु के नजदीक जाना। जो साधक जितना ज्यादा गुरु के समीप जाता है, उसके हृदय के स्पर्श करता है उसके मन में स्थापित होता है और पूर्ण समर्पण के भावना के साथ गुरु से एकाकार कर लेता है, वही असली शिष्य होने का हकदार होता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि शिष्य को परीक्षक नहीं होना चाहिए, उसे यह अधिकार नहीं है कि वह गुरु की परीक्षा ले। साथ ही एक गुरु की तुलना दूसरे गुरु से करना भी उसके गुणों का हिस्सा नहीं होना चाहिए। एक शिष्य को यह विचार भी करना चाहिए कि मैं गुरु से जो उम्मीद लगाये बैठा हूं, क्या उसके लिए मैं कर्तव्य निभा रहा हूं? क्या मैं शिष्य की कसौटी पर खरा उतरा हूं? गुरु और शिष्य का संबंध शीशे की तरह नाजुक और साफ होता है। गुरु और शिष्य के बीच मतिभ्रम होने पर इस पर दरार आने से नहीं रोका जा सकता। संपूर्ण समर्पण तथा खुद को अहंकार-रहित बनाये रखना ही आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी है। यह शक्ति और साधना केवल गुरु कृपा से ही प्राप्त हो सकती है:-

नृत्यं शुद्धं निराभाशं, निराकारं निरंजं।

नृत्य बोधम चिदानंदं, गुरूं ब्रह्म नमाम्यहम्।।

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डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)

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