नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

बरसात की कवितायेँ // मंजुल भटनागर

बरसात की कवितायेँ

बरसात की कवितायेँ // मंजुल भटनागर

मंजुल भटनागर


रचना १

कुछ बहुत गहरे
आसमान से
रंग चुरा कर बारिश ने
बादल के पंख लगा
मुठ्ठी भर ख्वाब गुने.

हवा के झूलने पर बैठ
आसमान के घर से
उतरी बारिश मेरे आंगन
सौगातों संग
रिमझिम रिमझिम ---.

आँखों में भरी धूप
दरक गयी
सपनों  ने पहन लिए
इन्द्रधनुषी रंग के चश्मे
कुछ पल को  ही सही
बादलों संग फैल गया
सतरंगा इन्दर धनुष.

डूबती शाम ने सूरज से
मुट्ठी भर रंग उधार मांग कर
उड़ा  दिए   रंगों के बादल .
कुछ पल के लिए ही सही
मन आंगन  पर
और बरसता मेह।




रचना २

मैं हूँ ,मौसम है
  और है ख़ामोशी
मौसम की आँख मिचौनी  
कभी बादल का उड़ना
छू लेना ,मन के तार को

कभी हवा का सर्द झोंका
बारिशों के ले साथ
दालान पर बरस जाना

मंद समीर सी मुग्ध होती मैं
कभी कोयल की कूक
उत्तर प्रति  संवाद 
फिर गहरी चुप्पी
----और मैं .

बारिश में पत्तों की मुस्कराहट
मौन आमन्त्रण
नव  कलिका का
घूंघट की आड़ से निरखना
 
एक नवजात शिशु पौधे का
धरा के गर्भ से झांकना
फिर ख़ामोशी और मैं

कभी दूर तक आसमान में कुछ नहीं
और फिर गहरे काले बादलों का
अनायास ही बरस जाना
और भीगती मैं ......


रचना ३

क्या लिखूं
बादल सा हुमड़ रहा कुछ
बिजली बरखा
बरसात लिखूं कुछ

या फिर 
मन के  डर का साया
भुतहा साये
कुछ ,अनसुलझे अनुत्तरित  प्रश्न
का विषाद लिखूं कुछ

सुनसान डगर जो
  पहुंची कहीं नहीं
सन्नाटे में
उस पर चल कर
धुआँ बनी
संवेदनाओं का मर्म लिखूं कुछ
 
या बारिश की बूंदों से
भूली यादों को  धो लूँ
  आंखों के छिपे मोतियों से
कलम भिजों कर 
कुछ भूली यादों के गीत लिखूं कुछ।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.