अभिषेक शुक्ला "सीतापुर" की कविताएँ

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1.बेटियाँ

बेटियों ने आज अपनी पहचान बना ली है,
दुनिया मे अपनी सफलता से शान बना ली हैं।
पढ़ लिखकर बेटियों ने सबका मान बढ़ाया है,
शिक्षक ,डॉक्टर बनकर माँ बाप का गौरव बढ़ाया है।
पहन वर्दी सीमा पर दुश्मन को मजा चखाया है,
बेटियों ने तो अंतरिक्ष में भी अपना परचम लहराया है।
बेटियों ने हर पल हर रिश्ते को खूब निभाया है,
उसकी ममता और दुलार की गहराई कोई समझ नहीं पाया है।
सभी क्षेत्रों में उनकी पहचान निराली है।
बेटियाँ अब नहीं केवल अबला नारी है।।

2..:- तेज धूप

गर्मी में तेज धूप से सब बेहाल हो रहे हैं,
जरूरी काम को सुबह-शाम का इंतजार कर रहे हैं।
गर्मी से बचने के सब उपाय ढूंढ रहे हैं,
सब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं।
ए. सी, फ्रिज और ऑटोमोबाइल का खूब प्रयोग हो रहा है,
"ग्लोबल वार्मिंग" इनका बड़ा योगदान हो रहा है।
मई- जून में तापमान 40 के पार हो रहा है,
सभी का गर्मी में बुरा हाल हो रहा है।
हमें न पर अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है,
हमारे कारण ही हमारा जीना दुश्वार हो रहा है।
हम कब सुधरेंगे अब किस बात का इंतजार हो रहा है,
लगाओगे पेड़ पौधे जब इस धरा पर।
तब देखना हरियाली और छाँव से मन हर्षित बारम्बार हो रहा है।।


3: तुम मुझसे कहते थे

तुमने मुझ संग प्रीत लगायी थी
मुझे प्रेम की भाषा सिखलायी थी।
हम एक -दूजे संग जीते थे
संग हँसते,जीते,रोते थे
तुम हर पल मुझसे कहते थे
प्रणय को परिणय तक पहुँचाऊँगा,
सात जन्मों तक यह रिश्ता निभाउंगा
निज स्वजनों का ले आशीष
तुम्हें घर की वधू बनाऊंगा
अकस्मात! मैं दुर्घटना का शिकार हुई,
मुझ पर यह कैसी दुर्भाग्य की मार हुई
मेरे रंग रूप के बदलते ही,
प्रियतम तुम भी बदल गये
जीवन भर साथ निभाने की,
सारी कसमें तुम छोड़ चले
चेहरे के इस परिवर्तन को देख,
तुम मेरा प्रेम व सद्गुण भूल चले
जी लेती तुम संग भूल,यह एसिड अटैक की घटना।
पर तेरे धोखे के शूल,वह जीवन की बड़ी दुर्घटना।।


4:सब कहते हैं

"सत्तर प्रतिशत जनसंख्या है कृषि पर आधारित,
फिर भी किसान हित के सब मुद्दे है विवादित।
हर दल फ़सल कर्ज माफी का वादा कर रहा हैं,
पर वास्तविकता के धरातल पर कुछ भी न दिख रहा है।
फिर भी सब कहते है कि मेरा देश बदल रहा है।।
किसान खाद,पानी और बीज की समस्या झेल रहा है,
महंगे डीज़ल और मौसम की मार झेल रहा है।
अपनी फ़सल का न उसे उचित दाम मिल रहा है,
कर्ज में डूबा किसान निरन्तर फांसी लगा रहा है।
फिर भी सब कहते है कि मेरा देश बदल रहा है।।
देश मे गैर मुल्क के नारे लग रहे हैं,
अब्दुल हमीद,चंद्रशेखर आजाद की धरा पर देशद्रोही पल रहे हैं।
कश्मीर में जवानों पर पत्थर फेंके जा रहे हैं,
जो फेंक रहे हैं वो माननीयों द्वारा बच्चे समझे जा रहे हैं।
फिर भी सब कहते हैं कि मेरा देश बदल रहा है।।
महिला सुरक्षा पर कई सवाल उठ रहे हैं,
दहेज के लिए उनके जनाजे उठ रहे हैं।
अब तो छोटी बच्चियों की भी अस्मत लुट रही है,
अब तो कोई भी महिला न अपने को सुरक्षित समझ रही है।
फिर भी सब कहते है कि मेरा देश बदल रहा है।।
पढ़ा लिखा युवा रोजगार को तरस रहा है,
बेरोजगारी का अभिशाप झेल रहा है।
अनपढ़ बन नेता रौब झाड़ रहा है,
और डिग्रीधारक पकौड़ा तल रहा है।
फिर भी सब कहते हैं कि मेरा देश बदल रहा है।।"



5.बचपन

" वो झिलमिल बचपन की यादें,
अपनों से अपनों की बातें।

प्यार भरा अपना संसार,
सुख से भरा अपना घर द्वार।

सब कुछ जानने की चाहत,
दोस्तों संग रहने की आदत।

सबके संग हँसी ठिठोली,
दोस्तों संग रंग बिरंगी होली।

अपनों का असीम प्यार,
वो मास्टर जी की फटकार।

छुट्टियों का हर पल इन्तेज़ार,
घर आये बड़ों को नमस्कार।

वो झिलमिल बचपन की यादें।
अपनों से अपनों की बातें।।'


6.तेरी नजर

"तेरी क्या मैं बात करूं,
तुझसे ख्वाबों में मुलाकात करूँ।
तेरी पहली नजर की मदहोशी में,
मैं तो अब दिन रात रहूँ।
आंखें हैं तेरी बहुत कुछ कहती,
मैं उन्हें समझने का प्रयास करूँ।
छिपाना चाहते हो मुझसे तुम कई बातें,
पर इज़हार कर जाती है तुम्हारी आँखें।
आँख हो भरी तो कैसे मुस्कुरा लेते हो,
दर्द में हँसने का हुनर कहाँ से लाते हो।
जब भी नम होते है तुम्हारे नैन,
तो मन हो उठता है मेरा बेचैन।
तुम्हारे नैनों के हर मंजर को समझने लगा हूँ।
लफ्ज है चुप पर तेरी आंखों की भाषा समझने लगा हूँ।।"



7.दस्तूर दुनिया का

दस्तूर दुनिया का निराला है यहाँ,
कौन किसका प्यारा है यहाँ।
सबने देखा और आपने जान भी लिया ,
अपनों की नफरतों को पहचान भी लिया।
प्रेम , रिश्ते व नाते सब केवल ढाढ़स बंधाते हैं,
अवसर पड़ने पर सब वादे से मुकर जाते हैं।
आपकी अच्छाईयो को कोई समझे कैसे,
सब आपकी एक गलती के इंतजार में बैठे हैं।
मुँह मोड़ लेंगे अपने ही पल भर में,
ये तो पहले से ही मंसूबे बनाये बैठे हैं।
चले जिनकी खुशी की खातिर आप पत्थरों पर,
वो तो आपके लिए शोले जलाये बैठे हैं।
कोई देता नहीं यहाँ गलतियों की माफ़ी,
सब दिल में नफ़रत की शमा जलाये बैठे हैं।
पल भर में बदल जाते है अपने यहाँ,
सबने देखा और आपने जान भी लिया।"



8.मोबाइल

"आजकल 'मोबाइल' का बड़ा नाम हो रहा है,
इससे बहुत सा काम हो रहा है।
कैसे कह दूं कि इसने अपनों को दूर या पास कर दिया,
इसने 'सोशल मीडिया' पर अपनेपन का एहसास दे दिया।
'फ़ेसबुक' और 'व्हाट्सएप्प' ने भी कमाल कर दिया,
अपनों से अपनों का पल भर में पैगाम दे दिया।
अब तो इसी से समस्याओं का समाधान हो रहा हैं,
'ट्विटर'और 'जनसुनवाई एप्प' पर सब सम्भव हो रहा है।
आज का युवा ड्यूल सिम 'स्मार्ट फ़ोन' रख रहा है,
'गूगल' से सभी जानकारियां 'सर्च' कर रहा है।
अपनों को सुनना,देखना और संदेश पहुंचाना आसान हो रहा है,
'आई.एम.ओ' और 'गूगल डुओ' पर दीदार हो रहा है।
आजकल 'मोबाइल' का बड़ा नाम हो रहा है।
इससे बहुत सा काम हो रहा है।। "

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9 पिता है सहारा

पिता का प्रेम अतुल्य,अनन्त होता है,
उनका हृदय वात्सल्य से परिपूर्ण होता है।
तात वट वृक्ष समान होते है,
जिनकी छत्र छाया में सब अभिमान से जीते है।
परम् अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखता है,
इसलिए वह स्वयं कठिन परिस्थितियों से गुजरता है।
जनक को अपने बच्चों को दिए गए संस्कारों पर नाज़ होता है,
इसलिए बेटी पापा की परी और बेटा राजदुलारा होता है।
पिता को अपनी संतानों पर हर पल अभिमान रहता है,
जग में उसका नाम करेंगे ये सबसे वह कहता है।
पिता के आशीर्वाद से ही सबको सुखमय जीवन मिलता है,
अभिषेक निज तात के चरणों में कोटिशः नमन करता है।

10 क्यों चल दिये

"मुझे न होश था अपना न ही थी कोई फिकर,
जिंदगी थी बेरंग सी चल रहा था बेख़बर।
तुमने आकर इसे नए आयाम दे दिए,
बोलो फिर दामन छुड़ाकर क्यों चल दिए।

तुमने जीने का मुझे हर सलीका सिखाया,
दुनिया में रह सकूँ वो हुनर बताया।
मेरी अच्छाईयों से मुझे रूबरू कर गये,
बोलो फिर दामन छुड़ा कर क्यों चल दिये।

तुझमें ही सारी दुनिया देखने लगा,
तुझसे मिलने को तुझसे ही लड़ने लगा।
प्रेम के ढ़ाई आखर भी तुझसे मैंने बोल दिये,
बोलो फिर क्यों दामन छुड़ा कर चल दिये।

कैसे रहेगा तुम्हारे बिन ये मचलता मन,
कैसे थमेंगे ये आंसू बोलो तुम्हारे बिन।
कैसे रहूं उस दुनिया में जहाँ तुम बस गये,
बोलो फिर दामन छुड़ा कर क्यों चल दिये।

सुबह सवेरे अब कैसे तुम्हारे लब्ज सुनूंगा,
तुम बिन ये जिंदगी अब मैं कैसे रहूंगा।
मेरे उद्गारों को तुम क़लम दे गये,
बोलो फिर दामन छुड़ाकर क्यों चल दिये?"


11 मित्रता का मान

रिश्तों में छाँव सा है दोस्ती का मान,
इससे मिलता है हर पल अभिमान।
मित्र हर परिस्थिति में बढ़ाता है हाथ,
कर्ण ने दिया समर में दुर्योधन का साथ।
श्रीकृष्ण ने सुदामा संग मित्रता निभाई,
क्षण भर में ही दरिद्रता मिटाई।
हजारों की भीड़ में कोई ऐसा होना चाहिए,
जो आपको समझे और आप सा होना चाहिए।
दोस्ती की परिभाषा श्रीकृष्ण व कर्ण ने समझाई,
सम्पूर्ण विश्व को इस रिश्ते की सच्चाई समझाई।
मित्र हो श्रीकृष्ण व कर्ण समान,
इन्हीं से बढ़ता है मित्रता का मान।।

12

माँ का दुलार

"जो नज़रों से परख ले

वो माँ होती है।

दर्द को दिल में जो रख ले

वो माँ होती है।

कर कोई काम तू बुरा  खुदा से चाहे हो छुपा,

जो तेरा चेहरा भांप ले,

वो माँ होती है।                          

जो कष्ट तेरे छीन ले

चुभते कांटे बीन ले

तुझपे प्यार वार दे,

वो माँ होती है।।                      

जब भी तू उदास हो

भले कोई ना पास हो

जो सदैव साथ दे ,

वो माँ होती है।                          

जो तुझको जन्म दे

तेरे मुख को चूम ले

हो तू कष्ट में तो रोती है,

वो माँ होती है।।

अभिषेक शुक्ला "सीतापुर"
शिक्षक,विचारक,समाजसेवी व सहित्य साधक

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