डॉ.शैल चन्द्रा की 5 लघुकथाएँ - बारिश की बौछार, दोनों हाथों में लड्डू, बैकवर्ड, नई पहल, प्राइवेसी

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लघुकथाएँ डॉ.शैल चन्द्रा   बारिश की बौछार मैँ बाजार जाने के लिए निकली ही थी कि बारिश शुरू हो गई। थोड़ी दूर पर ही मैंने अपनी स्कूटी रोक दी और ड...

लघुकथाएँ

डॉ.शैल चन्द्रा की लघुकथाएँ - बारिश की बौछार, दोनों हाथों में लड्डू, बैकवर्ड, नई पहल, प्राइवेसी

डॉ.शैल चन्द्रा 

बारिश की बौछार

मैँ बाजार जाने के लिए निकली ही थी कि बारिश शुरू हो गई। थोड़ी दूर पर ही मैंने अपनी स्कूटी रोक दी और डिक्की से रेन कोट निकालने लगी। तभी अचानक बिजली कड़कने लगी। बारिश और भी तेज हो गई। मैंने रेनकोट वापस डिक्की में डाला और छतरी निकाल कर पास के दुकान में जाकर खड़ी हो गई। मेरे साथ ही वहाँ आस-पास पसरा लगाकर बेचने वाले लोग भी अपने पसरे पर पालीथीन बिछाकर पास के पक्के छत की दुकानों पर खड़े हो गए पर एक पसरे वाला लड़का अपने पसरे के पास पालीथीन बिछाकर उसे हाथ से दबाए वहीँ खड़ा रहा।

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी तेज बारिश में भी वह लड़का टस से मस नहीं हुआ। मुझसे रहा नहीं गया। मैँ छतरी थामे उसके उसके पास पहुंची और कहा-अरे भई, इतनी बारिश में तुम यहाँ क्यों खड़े हो? देखो सभी पसरी वाले अपने सामान पर पालीथीन डालकर सूखे स्थान पर खड़े हैं। तुम भी चले जाओ।

उसने कहा," हाँ मेमसाहब, उनका सामान पालीथीन में सुरक्षित रहेगा पर मैं इसे छोड़कर चला गया तो मुसीबत आ जायेगी।"

मैंने कहा, बेटे, इतनी बारिश में खड़े रहोगे तो तुम बीमार पड़ जाओगे।

उसने हँसते हुये कहा," मेमसाहब, मैँ बीमार पड़ भी जाऊं तो एक रूपये की बुखार की गोली से ठीक हो जाऊंगा। हमारी तो रोज की आदत है पर यह सामान खराब हो जायेगा तो महीने भर हमें भूखे रहना पड़ेगा फिर माँ की दवाई भी तो इसी से लानी है ।"

मैंने उसे कहा, चलो ठीक है। तुम यह छतरी रख लो मेरे पास रेन कोट है। अच्छा ये बताओ ।आखिर इस पसरी में तुम क्या बेचते हो जो इतना मूल्यवान है ?

उसने मुस्कुराते हुये कहा," मेमसाहब, इसमें मेरी मां के हाथों का बना हुआ मुरकु और सेवईयां हैं जिसे उन्होंने बड़ी मेहनत से बनाया है। आप ही बताइये भला मैं अपनी माँ की मेहनत पर कैसे पानी फेर सकता हूँ।" यह कहते हुए उसने छतरी अपनी पसरी पर तान लिया।

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        " दोनों हाथों में लड्डू"

विधान सभा में मानसून सत्र चल रहा था। सत्र के पश्चात सारे विधायक नेतागण लजीज भोजन का लुत्फ़ उठा रहे थे। बाहर बरखा रानी अपने पूरे शबाब पर थी। पूरा वातावरण भीगा- भीगा मादक सा था।

तभी एक विधायक से उनके किसी मित्र ने पूछा,"नेता जी, आपको यह बारिश का मौसम कैसा लगता है?"

नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा,"भई हमारे लिए तो बारिश का मौसम दोनों हाथों में लड्डु ही देता है।"

मित्र ने पूछा," वो कैसे?"

नेता जी ने कहा," अगर बारिश हो तो अतिवृष्टि का मुआवजा लोगों को देना पड़ता है। इससे हमें भी मुआवजा मिल जाता है। अच्छा खासा कमीशन मिलता है। साथ ही बाढ़ ग्रस्त इलाके का दौरा भी हम लोग हेलीकॉप्टर से शान से करते हैं। इससे भी हमें लाभ ही लाभ होता है। हमारे परिवार के लोगों को भी हेलीकॉप्टर में भ्रमण और पिकनिक का मजा मिल जाता है। और अगर बारिश नहीं हुई ।सूखा पड़ा तो सूखा राहत का आबंटन मिलता है । इससे हमें भी अच्छा - खासा आबंटन मिल जाता है। है न हमारे दोनों हाथों में लड्डू। अब बारिश हो या न हो हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। "

यह कहते हुए वे हँस पड़े।

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बैकवर्ड

पोते का जन्म दिन था। दादी बड़ी ही उत्साहित थीं। उन्हें याद आया कि जब प्रदीप छोटा था तब उसके जन्मदिन पर वह घर पर ही केक, आइसक्रीम वगैरह बनातीं थीं। तब प्रदीप बहुत खुश हो उठता था।

उन्होंने कई वर्षों बाद आज बड़ी मेहनत से केक बनाया। आइसक्रीम का सारा सामान मंगवाया। जब केक आइसक्रीम तैयार हो गए तो उन्होंने पूरे घर को नौकर की सहायता से गुब्बारों और रंग- बिरंगे कागजों से सजाया। बस अब उन्हें बिट्टू और अपने बहु- बेटे का इंतजार था।

जैसे ही बिट्टू घर पहुँचा। दादी ने उसे गले से लगा लिया और लाड़ करते हुये कहा,"देखो बेटा, आज आपकी दादी ने आपके लिए केक और आइसक्रीम बनाया है।"

दादी की बात बीच में ही काटते हुए बिट्टु ने कहा,-"पर दादी,अभी-अभी तो पापा ने एक बड़े से होटल में एक बड़ा सा केक का आर्डर दिया है।"

तभी प्रदीप ने कहा,-" अम्मा,आपने इतनी मेहनत क्यों की ? क्या जरूरत थी आपको घर को सजाने और केक वैगरह बनाने की?आप समझती नहीं है? अब जमाना बदल गया है। लोग अब घर पर कहाँ बर्थ डे, मैरिज और एनिवर्सरी वैगरह की पार्टी देते हैं। अब घर पर पार्टी देने वाले बैकवर्ड कहलाते हैं। हमने होटल प्रिंस पैलेस में हॉल बुक करवा लिया है ।खाने- पीने की सारी चीजें आर्डर कर दी है। "

यह सुनकर दादी के सारे उत्साह पर पानी फिर गया। वे अवाक् खड़ी रहीं।

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    " नई पहल"

       " निन्नी कहाँ है? अब तक घर क्यों नहीं पहुंचीं?  तुम तो जानती हो न आजकल जमाना कितना ख़राब है?" दादी चिंतित स्वर से निन्नी की मम्मी से पूछ रही थीं।

मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा,"हाँ मांजी, जानती हूँ। तभी तो उसे आज से कराटे क्लास भेज रही हूँ। शहर में आजकल कराटे क्लास का क्रेज़ एकाएक बढ़ गया है। ज़माने के हिसाब से जरुरी भी हो गया है। अरे हाँ, कल उसके स्कूल में महिला पुलिस सेल का कार्यक्रम है। जिसमें लड़कियों को बेड टच, गुड टच के बारे भी बताया जायेगा। साथ ही साथ संकट की घड़ी में बलात्कारियों से निपटने के गुर भी सिखाया जायेगा।"

दादी बहुत ध्यानपूर्वक बहु की बातें सुन रही थीं। उन्होंने गंभीर स्वर से कहा,"हाँ, बहु, लड़कियों को सिखाना- समझाना तो जरुरी है पर क्या तुम्हें नहीं लगता कि अब लड़कों को लड़कियों की तुलना में कहीं ज्यादा सिखाने की आवश्यकता है क्यों की बलात्कारी भी तो कोई न कोई लड़का ही होता है न। आज जरुरी है कि हम समाज में , घर में , स्कूल में लड़कों को शालीनता, मर्यादा, नैतिकता तथा आत्मसंयम का पाठ पढ़ाए । इस पुरुष प्रधान समाज में हम लोगों ने लड़कों को कुछ ज्यादा छूट दे दी है ।जिसका परिणाम सामने है। उन पर भी अब लडकियों की तरह अंकुश लगनी चाहिए। रात को उनका भी घर से निकलने पर बंदिशें लगनी चाहिए ।क्यों की ज्यादा अपराध रात को होते हैं। आज से नई पहल हम करेंगे । "

दादी की बात सुनकर बहु ने ताली बजाते हुए उनकी इस पहल का स्वागत किया।

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  "  प्राइवेसी"

अम्मा को दिल्ली आये हुए आज महीना भर हो गए हैं। बहु- बेटा दिल्ली में नौकरी करते हैं। पोते की देखभाल करने हेतु वो यहाँ आईं हुईं हैं।

बेटा-बहु सुबह नौ बजे अपने -अपने दफ्तर चले जाते हैं। मुन्ना भी दिन भर सोता रहता है। अम्मा जी घर पर अकेले बोर हो जाती हैं। दोपहर में वे आठवें माले के फ्लैट से शहर को देखती हैं ,पर कहीं कोई चेहरा परिचित सा उन्हें नजर नहीँ आता है। आस- पास के फ्लैट पर वे नजर दौड़ाती हैं पर कोई दिखाई नहीं देता। हाँ सड़कों पर भीड़ का सैलाब बहता सा नजर आता है।

अम्मा सोचती हैं ,क्या शहर के लोग अपने घरों में ताला लगाकर सड़कों पर घूमते रहते हैं। तभी तो चौबीसों घंटे भीड़ दिखाई देती है। पड़ोस में हमेशा सूना पसरा रहता है। कभी -कभी कोई आता-जाता दिख जाता है ।तब वे खुश हो जाती हैं। बगल वाले पड़ोसी के साथ उन्हें अक्सर एक अपंग और बीमार सा बच्चा दिखता है। कई बार मन करता की उस बच्चे के बारे में उन लोगों से पूछे ।उन लोगों से बातें करें पर जब भी अम्मा जी उन लोगों के निकट जाने का प्रयास करती । वे लोग उनको बिल्कुल भी नोटिस नहीं करते और अपने फ्लैट का दरवाजा जोर से बंद कर लेते। वे मन मसोस कर रह जातीं।

एक बार इस बारे में उन्होंने नौकरानी से पूछा,"हमारे गांव में तो पड़ोसी ही दुःख-दर्द में हमारे काम आते हैं। हम सब पड़ोस की औरतें साथ में ही हर त्यौहार-पर्व मनाती हैं। दुख-सुख की बातें करती हैं। क्या तुम्हारे शहर में इसका रिवाज नहीं है क्या?"

अम्मा की बात सुनकर नौकरानी हँस पड़ी। उसने कहा,"अम्मा जी ,यह शहर है। यहाँ किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वो आपसे बेवजह बातें करें। इस शहर के लोगों को अपनी प्राइवसी बहुत पसंद है। वे इसलिए किसी से घुलना - मिलना नहीं चाहते। प्राइवेसी समझिए उनका स्टेटस सिम्बाल है।"

  " ओह, तभी ये लोग एक-दूसरे को पहचानते नहीं हैं। भगवान न करे अगर कोई अपनी फ्लैट के अंदर ही मर जाये तो ?" अम्मा ने चिन्तित होकर पूछा।

     "तो क्या?, कई लोग तो यूँ ही मर भी जाते हैं। आस-पास के लोग जानते-पहचानते तक नहीं । अगर फ्लैट में नेम प्लेट है तो ठीक वरना बेनाम लाश को लावारिस मान लिया जाता है।"

नौकरानी ने सपाट शब्दों में कहा।

यह सुनकर अम्मा कांप उठीं ।

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परिचय

डॉ. शैल चन्द्रा

जन्म- 9.10.66

शिक्षा- एम्.ए. बी. एड.एम्. फिल. पी. एच. डी. (हिंदी)

उपलब्धियां- अब तक पांच किताबें प्रकाशित

दो लघु कथा संग्रह 'विडम्बना', घर और घोंसला को कादम्बरी सम्मान।

राष्ट्रीय स्तर की पत्र -पत्रिकाओं में लघुकथा, कहानियां ,कविताओं का निरंतर प्रकाशन। यथा-हंस, कादम्बनी, पाखी, नारी अस्मिता, नारी का सम्बल, साहित्य प्रभा , विकास संस्कृति आदि आदि में । विभिन्न अखबारों में जैसे हरिभूमि, नई दुनिया, नवभारत, पत्रिका, दैनिक भास्कर अमृत सन्देश , देश बंधु  में लगातार रचनाएं प्रकाशित।

सम्मान एवं पुरस्कार-अनेक सम्मान प्राप्त उल्लेखनीय - नारी अस्मिता द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की लघुकथा प्रतियोगिता में सर्व प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

सम्प्रति-प्राचार्य, शासकीय हाई स्कूल टांगापानी ,तहसील-नगरी, जिला धमतरी में  छत्तीसगढ़ में कार्यरत

संपर्क- रावण भाठा, नगरी, जिला- धमतरी

छतीसगढ़ 493778

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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रचनाकार: डॉ.शैल चन्द्रा की 5 लघुकथाएँ - बारिश की बौछार, दोनों हाथों में लड्डू, बैकवर्ड, नई पहल, प्राइवेसी
डॉ.शैल चन्द्रा की 5 लघुकथाएँ - बारिश की बौछार, दोनों हाथों में लड्डू, बैकवर्ड, नई पहल, प्राइवेसी
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