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जिज्ञासाओं के समाधान और कर्मपथ की प्रेरणा देता है , उपन्यास - को अहम

जिज्ञासाओं के समाधान और कर्मपथ की प्रेरणा देता है , उपन्यास - को अहम

पुस्तक समीक्षा - " को अहम "
लेखक - अशोक जमनानी
प्रकाशक - श्रीरंग प्रकाशन , होशंगाबाद
मूल्य - ₹250 /-


जिज्ञासाओं के समाधान और कर्मपथ की प्रेरणा देता है , उपन्यास - को अहम
         साहित्य के क्षेत्र में नर्मदांचल के युवा रचनाकार अशोक जमनानी अब अनजाना नाम नही है। वे देश के प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में तो प्रमुखता से लिखते ही हैं । अलावा इसके उनकी प्रकाशित कृतियों ने उन्हें वरिष्ठ और सम्माननीय साहित्य सृजकों की श्रेणी में स्वतः ही सम्मिलित कर लिया है। यही उनके प्रभावी लेखन की एक बड़ी विशेषता भी है ।
        लेखन के साथ ही वे नवोदित रचनाकारों के लिए अलग - अलग स्थानों पर जाकर कार्यशालाएं आयोजित कर उन्हें मार्गदर्शन और लेखन की विधियां बतलाते हुए अक्सर दिख जाते हैं ।
       ओजस्वी , प्रभावी और प्रखर वक्ता तो वे हैं ही। सहज , सरल व्यक्तित्व के धनी अशोक जमनानी का उपन्यास " को अहम " इन दिनों चर्चा में है । इससे पहले उनकी अन्य कृतियाँ - बूढी डायरी , व्यास - गादी , छपाक - छपाक , खम्मा , और अमृत वेलो प्रकाशित हो चुकी हैं । यही नहीं चार खंडों में उनके कहानी संग्रह भी  प्रकाशित हुए हैं ।


       मुझे अभी उनका उपन्यास - " को अहम " मिला है। इस पर लिखना आसान नहीं है।
       " को अहम " का अर्थ ही है - कौन हूँ मैं !
        इसे जानना - समझना इतना आसान नहीं । इसकी खोज में ही अनेक ऋषि - मुनि , संत , महात्माओं ने अपना सारा जीवन खपा दिया ।
.....पर क्या सबको इसका सम्यक उत्तर मिल पाया ?
फिर कोई युवा व्यक्ति यदि इस प्रश्न के उत्तर की लालसा में विचलित हो जाए और अपने कर्तव्य पथ से हटकर इसके समाधान के लिए निकल जाए तो क्या हो ? क्या यह सिर्फ उसका भटकाव होगा या फिर उसे इसका समाधान भी मिलेगा ?
       जीवन यात्रा या उससे पलायन को जितना सहज - सरल हम समझते हैं । क्या वह वाकई उतनी  ही सहज सरल है  ? क्या कर्म पथ को बीच में ही छोड़कर ,सन्यासी पथ को अपना लेना उचित है ?
      " को अहम " कहता भी है - सन्यास हर किसी के लिए जिज्ञासा तो हो सकती है पर यह सबका स्वभाव नहीं हो सकता और जब यह जिज्ञासा शांत होती है तो सन्यास भी व्यर्थ ही लगने लगता है।
          " को अहम " में - माँ नर्मदा के माध्यम से कहीं सांकेतिक तो कहीं स्प्ष्ट तौर पर बड़े ही सरल संवादों तथा घटनाओं के द्वारा , तर्क और श्रद्धा के भंवर में फंसे जीवन से विचलित युवा " सदानंद " का समाधान किया गया है । यह मनःस्थिति किसी भी वैचारिक व्यक्ति की हो सकती है , जिसे सदानंद के माध्यम से सामने लाया गया है।


     लेखक नेअपनी भूमिका में पात्र के माध्यम से लिखा है -  " नर्मदा का नदी होना या शिवपुत्री होना एक ही बात है , क्योंकि जब नर्मदा शिव पुत्री है तो शिव का विस्तार है और जब नर्मदा नदी है तो शिवत्व का विस्तार है । " सदानंद का यह कथन वैसे तो श्रद्धा और तर्क के मध्य संतुलन स्थापित करता है लेकिन वही सदानंद अपने जीवन में श्रद्धा और तर्क के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाया।
     सदानंद के भीतर का यह संघर्ष ही  - " को अहम " में परिणित होकर हमारे सामने आया है।


     इस उपन्यास में - प्राकृतिक सौंदर्य है । शैक्षणिक स्थिति में गुरु - शिष्य का सामंजस्य है । ग्रामीण परिवेश की उदारता है। मित्रता का अटूट बंधन है। ममतामयी माँ और पिता का स्नेह है तो युवा शिक्षित पुत्र का वियोग और मिलन भी है। सच्चे प्रेम की सार्थकता है तो उसे अनभिज्ञ स्थिति में भी स्वीकार लेने का विश्वसनीय संदेश भी है। छुआछूत , संकीर्णता और पांडित्य लोभ पर प्रहार है तो जीवन को समर्थ बनाने वाले अनेक सूत्र वाक्य भी हैं ।
      " को अहम " में सच्चे गुरु की महत्ता है तो कथित सन्यासियों द्वारा मात्र चेला बनाने का प्रलोभन भी देखने को मिलता है। इसमें जीवन और सन्यास को रेखांकित करते हुए अनेक जिज्ञासाओं का समाधान है तो अंततः कर्म पथ की श्रेष्ठता की फलित प्रेरणा भी है।


       यदि कहूँ कि - जब तक आप श्रीरंग जी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास को खुद नहीं पढेंगे , तब तक -  " को अहम " अर्थात कौन हूँ मैं ?  का समाधान भी नहीं मिलेगा । जीवन के अनेक अनसुलझे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जायेंगे ।
अशोक जमनानी द्वारा लिखित इस उपन्यास को पढ़ना तो अवश्य चाहिए ही ।
                      - देवेन्द्र सोनी , इटारसी।

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