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संस्मरण // पिंजड़ा // मीनाक्षी_वशिष्ठ

#पिंजड़ा#

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""हाँ मैंने ही खोला था पिंजड़ा और आज मुझे ये स्वीकार करने में कोई डर नहीं । न तो सुखदेव काका का ( जिनके खरगोश कई बार मैंने भगाये थे और कई बार उनके तोते भी उड़ाये )

और न ही नानी की डांट का ।। - मुझे उन्हें उड़ते देखना अच्छा लगता था बस इसीलिये मैंने कई सारे पिंजड़े खोल दिये !!

.. मैंने कई पक्षियों को उनके मालिक के प्रेम से मुक्त कर दिया क्योंकि उस प्रेम में उनकी उड़ान पिंजड़े में कैद हो गई थी ! अगर ये अपराध था तो हो गया था मुझसे ......,,अरे वो कैसा प्यार जो अस्तित्व ही मिटा दे .. ..!!

मुझे पिंजड़ों से चिढ़ थी ,मैं छोटी थी पर बंधनों की छटपटाहट कैसी होती है जानती थी, कैसा लगता होगा जब किसी की 'उड़ान' कैद की जाती है, समझती थी बस इसीलिये पिंजड़ो में लटके ये तरह -तरह के पंक्षी मुझे पसंद नहीं थे| अच्छे लगते थे जब वो मेरी बगिया में आ के शोर करते थे,,कनेर की नाजुक टहनियों पर झूलती हुई मैना,सुबह-सुबह टेर लगाती कोयल,बबूल की फलियाँ और अमिया कुतरते हुऐ तोते सब अच्छे लगते थे पर पिंजड़ों के सींखचे कुतरता हुआ कोई पक्षी नहीं,,घर से लेकर स्कूल तक लगभग हर द्वारे पर तरह तरह के पंछियों को लिये पिंजड़े टँगे होते थे और मैं बस इस फिराक में कि कैसे इन पिंजड़ो को खोलूं ,,- - -और इसीलिये हर पिंजड़े को बहुत गौर से देखा करती थी ,'पिंजड़ों में जो नये कैदी होते थे वो बहुत बेचैन रहते थे कभी पंख फड़फड़ाते, कभी पूरे पिंजड़े में चक्कर लगाते,कभी चोंच से सींखचों को कुतरने की कोशिश करते कभी सींखचों पर सर पटकते,कभी जोर-जोर से चिल्लाते और फिर उदास हो जाते...., बस हर पल मुक्त होने की कोशिश में होते थे और उनके मालिक को लगता वो नाच रहे है,गा रहे है ,मालिक उनकी छटपटाहट पर बड़ा खुश होता ! जो पुराने और अभ्यस्त कैदी होते ,जिन्होंने बंधन को स्वीकार कर लिया था बिल्कुल शांत रहते ,मालिक के कहने पर गाते और चुप होते थे उसके इशारे पर खाते, नाचते सोते थे ! उड़ते हुऐ पंछियों के झुण्ड को देखक़र ये बेचैन नहीं होते थे और न ही शोर मचाते थे, बस उन्हें सलाखों के पीछे से टुकुर-टुकुर देखते रहते थे ,जब मैं मौका पाकर कुछ ऐसे कैदियों का पिंजड़ा खोलती थी तो ये डर कर पिंजड़े की पिछली सलाखों से चिपक जाते थे, बंधन को ऐसा अपनाया था कि तोड़ना ही नहीं चाहते थे जब मैंने इन्हें हाथों में उठाकर उड़ाना चाहा तो देखा कि ये कैदी तो इतने पुराने हो गये थे कि अपनी उड़ान भूलकर फुदकना सीख गये थे ,,"किसी के प्रेम ने इन्हें अस्तित्वहीन कर दिया था !! ये वो पक्षी थे जिन्होंने पिंजड़े में ही होश सम्भाला था जिस कारण वो अपनी क्षमतायें भूल गये थे ,,मैं जब भी इनका पिंजड़ा खोलकर उड़ाने की कोशिश करती ये लौट फिर कर फिर पिंजड़े में ही पहुंच जाते थे इन्हें आजाद किया ही नहीं जा सकता था !!

- -- - अब तक मैं पहचानना सीख गयी थी कौन आजाद होना चाहता है और कौन नहीं ...,,जो मुक्त होना चाहते थे उनकी छटपटाहट अलग ही दिखती थी ;

मैं जब भी किसी पिंजड़े को देखती और आस पास कोई ना दिखता तो चुपके से पिंजड़े का द्वार खोल कर भाग जाती थी !इस तरह कई सारे पिंजड़े खोले (बस अपना छोड़कर )

वो लड़की जो औरों का पिंजड़ा खोला करती थी अपना पिंजड़ा खोलना ही भूल गयी । वो जिसे किसी के भी बंधन विचलित कर देते थे अपने बँधन पहचान ही न पाई ।वो भी उसी पिंजड़े में थी जिससे उसे चिढ़ थी बस उसे समझाया गया था कि ये तुम्हारा 'सुरक्षा चक्र' है जो कि तुम्हारे लिये जरुरी है, ...और उसने मान लिया "")

..... खैर- - -

इस बात की खुशी है कि

मैंने कई पिंजड़े खोले पर कभी किसी की नजर में नहीं आई!!

अगले दिन जब मालिक का उदास चेहरा और बातें देखतीं ,सुनती "हमने तो पिंजड़ा कसके बंद किया था मुहल्ले में जाने कौन ऐसा बदमाश है जो खोल गया पकड़ में आ जाता तो सबक सिखाते""

सुनकर बड़ा मजा आता !!

मुझे बहुत खुशी मिलती थी उन्हें उड़ता देखकर ,,

उनके नाजुक पंखों पर भारी भरकम पिंजड़ों का बोझ क्यों हो ?? उनकी उड़ान को बाँधने वाले पिंजड़े अब खुल चुके थे ,,

मैंने उन्हें आजाद कर दिया क्योंकि मैं उन्हें प्यार करती थी /करती हूँ ।

_यादों__के_झरोखे_से

_बचपन_ की_शैतानियाँ

- -मीनाक्षी_वशिष्ठ

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