उपन्यास - रात 11 बजे के बाद - भाग 2 - राजेश माहेश्वरी

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उपन्यास रात  11 बजे के बाद - राजेश माहेश्वरी भाग 1 || भाग 2 आनंद एक सफल उद्योगपति के साथ साथ बहुत ही भावुक एवं दयालु व्यक्तित्व का धनी था। ...

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उपन्यास

रात  11 बजे के बाद

- राजेश माहेश्वरी


भाग 1 ||


भाग 2

आनंद एक सफल उद्योगपति के साथ साथ बहुत ही भावुक एवं दयालु व्यक्तित्व का धनी था। वह जीवन में व्यवहारिक व्यक्ति था और उसने अपनी सारी संपत्ति, धन दौलत को चार हिस्सों में बांट दिया था, जिसमें से तीन हिस्से अपनी पत्नी एवं दोनों बेटों के नाम कर दिये थे। चौथा हिस्सा उसने अपने स्वयं के लिये रखा हुआ था। उसके दोनों बेटे दुबई में अपना स्वतंत्र व्यापार करते थे। उसकी पत्नी का अधिकतम समय उसके वृद्ध माता पिता की देखभाल में बैंकॉक में बीतता था क्योंकि उसके पत्नी के साथ संबंध मधुर नहीं थे। वह अपने परिवार को बहुत चाहता था परंतु परिवार से दूर होने के कारण अपने को अकेला महसूस करता था।

एक दिन बातों ही बातों में उसने अपने अकेलेपन की चर्चा की और किसी सुंदर एवं संभ्रांत महिला से मित्रता करने की इच्छा व्यक्त की। वह इस बारे में काफी गंभीर था और अपनी बातचीत में हमेशा इस विषय के बारे जिक्र करता था। एक दिन हम लोग रेस्त्रां में बैठकर आपस में बातचीत कर रहे थे तभी अचानक मानसी वहाँ पर आ गई और मुझे देखकर बोली कि आपको देखकर औपचारिकतावश मिलने आ गई। मैंने उसको भी बैठने के लिये कहा और उसका परिचय आनंद और गौरव से करवाया। आनंद उसकी खूबसूरती और सरल व्यवहार को देखकर दंग रह गया। आनंद ने पुनः सबके सामने अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया कि मैं बहुत अकेला हूँ और अपार धन दौलत के बाद भी सुखी जीवन से वंचित हूँ। उसकी बात सुनकर मानसी बोली कि सच में आप बहुत दुखी जीवन जी रहे हैं और आपको एक सहारे की बहुत आवश्यकता है। मानसी से आनंद से पूछा कि आपके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है आपसे तो कई महिलाएँ मित्रता की इच्छुक होंगी। यह सुनकर आनंद ने कहा कि दौलत की चाह रखने वाली महिलाओं की कोई कमी नहीं है परंतु मुझे ऐसी महिला की आवश्यकता है जिसके मन में मेरे प्रति प्रेम और समर्पण हो, जो मेरी भावनाओं को समझकर मेरा सहारा बनकर मुझे संतुष्टि दे सके।

मानसी राकेश की ओर मुस्कुराकर देखती हुयी आनंद से बोली कि आप इनकी मदद क्यों नहीं लेते हैं ये चाहे तो आपकी इस समस्या को चुटकी में सुलझा सकते हैं। यह सुनकर राकेश बोला कि मैं इस समस्या कि निदान हेतु प्रयासरत हूँ। इस बीच वेटर बिल लेकर आता है गौरव अपना क्रेडिट कार्ड निकालकर वेटर को देते हुये मानसी से बोला आई ऐम ए इंटरनेशनल आर्टिस्ट एंड आई हेव विजिटेड सेवरल कंट्रीज इसलिये मैं हमेशा इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड अपने साथ रखता हूँ इसके बिना मेरा काम ही नहीं चलता है। थोड़ी देर बाद वेटर वापस आकर कहता है कि सर यह कार्ड छः माह पूर्व समाप्त हो चुका है। यह सुनकर गौरव झेंप जाता है। यह देखकर राकेश नकद भुगतान कर देता है। होटल से निकलते समय आनंद मानसी पूछता है कि आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा अब आपसे कब मुलाकात हो पायेगी ? मानसी मुस्कुरा बोली आप कभी भी राकेश जी के साथ मेरे घर आ सकते हैं। इसके बाद मानसी राकेश के साथ चली जाती है।

एक दिन आनंद राकेश के साथ मानसी के घर जाता है वह उसके घर को बहुत ही व्यवस्थित सुंदर और सुसज्जित पाता है। यह देखकर वह मानसी से पूछता है कि क्या यह आपका फ्लैट है। यह सुनकर मानसी कहती है कि नहीं मैं यहाँ किराये से रहती हूँ। यह फ्लैट जहाँ में काम करती हूँ उस कंपनी का है। मेरा घर तो पचमढ़ी के पास है, वह बहुत ही खूबसूरत जगह है। आप जब भी पचमढी आए मेरे घर जरूर आइयेगा। यह सुनकर राकेश कहता है कि नेक काम में देर क्यों की जाए। अगले सप्ताह ही तीन चार दिन मेरे ऑफिस की छुट्टी रहेगी, क्यों ना उस समय पचमढी घूमने चला जाए। यह सुनकर आनंद और मानसी भी अपनी सहमति प्रदान कर देते हैं।

अगले सप्ताह पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राकेश और आनंद गौरव को साथ लेकर पचमढी जाने के लिये प्रस्थान करते है और रास्ते में मानसी के घर रूकते हैं। वहाँ पर उसकी माँ, बहन पल्लवी से मुलाकात होती है। पल्लवी बहुत सुंदर और बातचीत में बहुत निपुण थी। आनंद पल्लवी को लगातार एकटक देख रहा था। वह उसके सौंदर्य एवं बातचीत की निपुणता पर मुग्ध था। मानसी इस बात को भांप गयी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी। राकेश ने मानसी और पल्लवी से निवेदन किया कि आप दोनो हमारे साथ पचमढी चलिये। आप यहाँ के निवासी हैं एवं चप्पे चप्पे से वाकिफ है। आपके जाने से हमें पर्यटन में सुविधा के साथ साथ आपका साथ भी मिल जायेगा। मानसी और पल्लवी अपनी माँ से अनुमति लेकर उनके साथ पचमढी चली जाती हैं।

पचमढी पहुँचते पहुँचते शाम हो चुकी थी। सभी एक होटल में रूक कर स्नान के पश्चात लॉन में बैठकर बातचीत कर रहे थे। बातचीत के दौरान आनंद ने राकेश से पूछा की तुम्हारी और मानसी की मुलाकात कैसे हुयी जो इतनी गहरी मित्रता में बदल गयी। राकेश ने कहा- पचमढ़ी की रमणीक वादियों में वर्षा की बूँदों से नम हुई जमीन से निकलने वाली खुशबू मेरे कवि हृदय को काव्य साधना हेतु प्रेरित कर रही थी। मैं लगभग चार वर्ष पूर्व किसी बैठक में शामिल होने आया था, जिसमें प्रदेश के विभिन्नों शहरों के प्रतिनिधि आये हुये थे। मैं दोपहर के समय होटल में बैठा हुआ भोजन ले रहा था, मेरी सामने के टेबिल पर एक सुंदर व सभ्य दिखने वाली एक महिला बैठी हुयी थी। उसे देखकर मेरे मन में विचार आया कि यदि मैं कवि होता तो एक अच्छी कविता बनाकर उन्हें भेंट कर देता। बैठक के दौरान मेरा उनसे परिचय हुआ मैंने बातों ही बातों में उसको यह बात बताईं उसने मुस्कुरा कर कहा कि आप प्रयास कीजिये शायद सफल हो जाये उसकी बात सुनकर मैंने कविता लिखने का निर्णय लिया और कागज, कलम लेकर बैठ गया। मैंने माँ के ऊपर कुछ पंक्तियाँ लिखी। शाम को भेजन के दौरान मुलाकात होने पर उसके आग्रह करने पर मैंने उसे वो पंक्तियाँ सुनाई। उन्हें सुनकर वह बोली कि इतनी मार्मिक कविता आप नहीं लिख सकते यह किसी और की लिखी हुई हैं। आप भोजन के उपरांत मेरे सामने किसी भी विषय पर लिखकर बतायें। उसके बाद मैंने उससे पूछा कि आप मुझे विषय दीजिये मैं कोशिश करता हूँ। तब उसने मुझे प्रेम पर कविता बनाने का आग्रह किया। वह कविता जो मैंने उसके सामने लिखी थी वह मुझे आज भी अक्षरशः याद है। राकेश मानसी ओर मुस्कुराकर देखता हुआ कविता सुनाने लगा-

प्रेम है श्रद्धा

प्रेम है पूजा

प्रेम है जीवन का आधार

प्रेमी रहें प्रसन्न

प्रेममय हो उनका संसार

दिलों को जीतो प्रेम से

प्रकृति भी देगी साथ

प्रेम बनेगा जगत की

सुख-शांति का आधार

प्रेम की ज्योति करेगी

सपनों को साकार

प्रेम से जीना

प्रेम से मरना

सबसे करना प्यार

विश्व शांति का स्वप्न

तब ही होगा साकार।

कविता सुनाने के बाद राकेश बोला वह महिला मानसी ही थी इस प्रकार हम लोगों का परिचय हुआ और धीरे धीरे मित्रता प्रगाढ होती गयी। कविता सुनने के बाद सभी राकेश की तारीफ करने लगे। गौरव ने कहा कि अभी तक तो हम तुम्हें उद्योगपति के रूप में जानते थे पर तुम्हारे भीतर कवि हृदय भी है यह आज पता चला। तभी आनंद पल्लवी से पूछता है कि तुम अपने बारे कुछ बताओ। यह सुनकर मानसी बोलती है पल्लवी मेरी छेटी बहन है और यही माँ के साथ रहती है हमारे पिताजी का देहांत हो चुका है। पल्लवी ग्रेजुएट है और किसी अच्छी नौकरी की तलाश में हैं।

इस प्रकार बातचीत करते हुये काफी समय बीत जाता है। इसी वार्तालाप के दौरान आनंद राकेश से कहता है कि मुझे पल्लवी बहुत पसंद है। राकेश मुस्कुरा कर शुभ रात्रि कहकर सोने चला जाता हैं। दूसरे दिन प्रातः नाश्ते के उपरांत पचमढी घूमने का कार्यक्रम बनता है। राकेश जानबूझकर पल्लवी को आनंद के साथ भेज देता है और स्वयं मानसी के साथ होटल में ही रूक जाता है। गौरव अपने किसी मित्र से मिलने के लिये चला जाता है। राकेश इस अवसर का लाभ उठाकर मानसी को अपने कमरे में ले जाकर उसे प्यार भरी नजरो से देखते हुये अपनी बांहों में जकड़ लेता है। मानसी भी मन ही मन यही चाहती थी परंतु अपने आप को छुडाने की कोशिश करते हुये राकेश से कहती है कि अच्छा अब मेरी समझ में आया कि तुमने आनंद और पल्लवी को बड़ी चतुराई से पचमढी घूमने के बहाने दूर कर दिया परंतु गौरव आ गया तो क्या करोगे ? राकेश उसे और मजबूती से आलिंगनबद्ध करते हुये बोला वह आ भी गया तो अपने कमरे में आराम करेगा। इतना कहकर राकेश ने उसे बेतहाशा चूमते हुये बिस्तर पर लिटा दिया और दुनिया जहान को भूलते हुये दोनो एक दूसरे में समा गये।

आनंद पल्ल्वी के साथ पचमढी दर्शनीय स्थल देखते हुये एक उद्यान में पहुँचता है यहाँ पर आनंद अपने विषय में बताते हुये पल्लवी को कहता है कि ईश्वर की कृपा से मेरे पास बहुत धन दौलत है मैं तुमसे बहुत प्रभावित हूँ और तुमसे प्यार करने लगा हूँ मैं तुम्हारा जीवन बना दूँगा। तुम्हें जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगा। इसके बाद आनंद ने पल्लवी का हाथ पकडकर कहा क्या तुम्हें मेरा प्यार स्वीकार है ? पल्लवी ने आनंद से कहा कि क्या तुम मेरा अतीत नहीं जानना चाहोगे ? आनंद ने कहा कि नहीं मैं वर्तमान में विश्वास रखता हूँ और भविष्य के बारे में सोचता हूँ मुझे तुम्हारे अतीत से कोई लेना देना नहीं है। यह सुनकर पल्लवी बहुत प्रभावित हुयी और उसकी मौन मुस्कुराहट ही उसकी मानो उसकी स्वीकृति थी। उन्हें घूमते घूमते अब शाम हो चुकी थी और थकान होने के कारण वे होटल वापस आ जाते हैं।

वातावरण में हल्की थंडक थी और अंधेरा होने के साथ ही वातावरण में अजीब सी मादकता छा रही थी। वे सभी आग जलाकर लॉन में बैठे हुये थे। राकेश ने अपनी स्कॉच की बॉटल खोलकर पूछा कि कौन कौन मेरा साथ देगा ? उसने मानसी की ओर देखा वह बोली मैं रेड वाइन ले सकती हूँ। पल्लवी ने कहा कि यदि आनंद लेंगें तो मैं भी ले लूँगी। गौरव और आनंद दोनो ने बियर पीने की इच्छा व्यक्त की। सबकी इच्छानुसार डिं्रक्स मंगवा लिये गये। इस बीच बातचीत के दौरान राकेश ने आनंद से पूछा क्यों भाई दिन कैसा बीता ? दिन अगर अच्छा बीता होगा तो रात भी सुहानी बीतेगी। पल्लवी को क्या क्या दिखाया ? इसे तुम्हारे साथ घूमने में मजा आया कि नहीं ? आनंद ने पल्लवी की ओर मुस्कुराकर देखते हुये कहा कि इसका जवाब तुम्ही दो। वह बोली बहुत मजा आया ईश्वर करे इसी तरह दिन बीतते रहे। गौरव बोला आप लोग तो अपने में मस्त हैं मैं यहाँ अकेला बोर होता हूँ इसलिये मैं वापस जाना चाहता हूँ। मानसी और पल्लवी गौरव से रूकने के लिये आग्रह करते हैं। उनके लगातार अनुरोध पर गौरव उनकी बात मानकर रूक जाता है। पल्लवी ने गौरव से पूछा कि क्या आपकी कोई महिला मित्र नहीं हैं। गौरव ने कहा कि नहीं मैं बहुत व्यस्त व्यक्ति हूँ और अंतरराष्ट्रीय स्तर का चित्रकार हूँ मेरी पेंटिंग की प्रदर्शनी कई देशों में हो चुकी है और मुझे कई पुरूस्कारों से नवाजा गया हैं। मेरे पास इन सारे फालतू कामों के लिये समय नहीं है। राकेश ने कहा कि हाँ यह सही बात है ये बहुत बडे चित्रकार है इनके पास फालतू खर्च करने के लिये समय और पैसा दोनो नहीं है। यह सुनकर गौरव चिढ़कर कुछ अंग्रेजी में कुछ बडबडाता है। पल्लवी पूछती है कि आप क्या कह रहें हैं। यह सुनकर राकेश हँसते हुये कहता है कि ये एक बियर और माँग रहे हैं। यह सुनकर सारे लोग हँसने लगे।

राकेश ने बताया कि गौरव का जीवन संघर्ष, कठिन परिश्रम से गुजरा है तब वह आज इस मुकाम खड़ा हुआ है। मैंने गौरव से संघर्षमय जीवन को ध्यान में रखकर एक कविता का सृजन किया है जिसे मैं उसे समर्पित करते हुये आप सब को सुना रहा हूँ।

प्रतिभा, प्रतीक्षा, अपेक्षा और उपेक्षा में

छुपा है जीवन का रहस्य।

सीमित है हमारी प्रतिभा

पर अपेक्षाएँ हैं असीमित।

यदि हम अपनी प्रतिभा को जानें

फिर वैसी ही करें अपेक्षा

तो बचे रहेंगे उपेक्षा से।

प्रतिभावान व्यक्ति सफलता की करता है प्रतीक्षा

वह पलायन नहीं करता

वह करता है संघर्ष

एक दिन वह होता है विजयी

डसे मिलता है सम्मान

दुनिया चलती है उसके पीछे

और लेती है उससे

सफलता और विकास का ज्ञान।

यही है जीवन का चरमोत्कर्ष।

पर कोई भी प्रतिभा

नहीं रहती सदा सर्वदा।

कल कोई और प्रतिभावान

करेगा संघर्ष

और पहुँचेगा उससे भी आगे।

यही है प्रगति की वास्तविकता

कल भी थी

आज भी है

और कल भी रहेगी।

आपस में बातचीत करते करते काफी समय बीत जाता है और राकेश मानसी को लेकर अपने कमरे में सोने चला जाता है। कुछ समय पश्चात गौरव भी अपने कमरे में जाकर सो जाता है। पल्लवी भी जाने के लिये उठ जाती है परंतु आनंद उसे रोक लेता है। कुछ देर आपस में बातचीत करने के बाद आनंद उससे पूछता है कि मैंने तुमसे सुबह कुछ पूछा था परंतु तुमने अभी स्पष्ट जवाब नहीं दिया। मैं तुम्हें बहुत चाहने लगा हूँ। दिन भर मेरे साथ घूमने के बाद तुम मेरे स्वभाव से भी परिचित हो गयी होगी। पल्लवी ने मंद मंद मुस्काते हुये कहा कि इसका जवाब आपको जल्दी ही मिल जाएगा इतने बेचैन क्यों हो रहे हैं। यह कहकर पल्लवी चुपचाप चली जाती हैं। आनंद मन ही मन सोच रहा था कि मैं इसकी मौन मुस्कुराहट को क्या समझूँ ? इसी उधेडबुन में सोचता हुआ आनंद कुछ देर बाद अपने कमरे में जाता है। वह कमरे में पहुँचकर लाइट ऑन करता है और सामने बिस्तर के पास गुलदस्ता देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। वह पास में जाकर उस पर लगे हुये कार्ड को पढ़ता है जिस पर आई लव यू लिखा हुआ था। जैसे ही वह पीछे की ओर घूमता है सामने उसे पल्लवी बैठी हुई मिलती है। वह खिलखिलाकर हँसते हुये कहती है कि अब तो आपको प्रश्न का उत्तर मिल गया ना। आनंद आनंदविभोर होकर पल्लवी को अपनी बाँहों में भर लेता है। पल्लवी अपने आप को छुडाने की कोशिश करती है यह देखकर आनंद उसे अपनी ओर खींचकर उसके होंठो पर अपने होंठ देता है। पल्लवी अपने आप को आनंद की बाहों से छुडाने का प्रयास करते हुये कहती है कि आप यह क्या कर रहे हैं। आनंद ने कहा कि प्यार कर रहा हूँ, और क्या करूँगा। प्यार तो बातों से भी हो सकता है। बातों से तो प्यार का इजहार होता है प्यार तो आंखों से भी नजर आ जाता है। मुझे दार्शनिक बनने में कोई रूचि नहीं है यह कहकर आनंद उसे और नजदीक खींच लेता है। पल्लवी बोली मैं आज बहुत थकी हुयी हूँ अभी छोडो ना कल प्यार कर लेना, देखो एक कहावत है कि कल कभी नहीं आता इसलिये कल के भरोसे क्यों रहूँ। दीदी को पता होगा तो क्या सोचेगी। राकेश के साथ दीदी अंदर बेडरूम में जाकर कोई गप्प थोडी ना मार रही होगी वे दोनों प्यार के आनंद में खो चुके होंगे। ऐसा करना पाप नहीं है क्या। बिल्कुल नहीं।

काम, वासना नहीं है

कामुकता वासना हो सकती है।

काम है प्यार के पौधे के लिये

उर्वरा मृदा।

काम है सृष्टि में

सृजन का आधार।

इससे हमें प्राप्त होता है

हमारे अस्तित्व का आधार।

काम के प्रति समर्पित रहो

यह भौतिक सुख और

जीवन का सत्य है।

कमुकता से दूर रहो,

यह बनता है विध्वंस का आधार

और व्यक्तित्व को करता है दिग्भ्रमित।

यह सुनकर पल्लवी भी धीरे धीरे अपने आप को आनंद को समर्पित करती चली जाती है। वे दोनों एक दूसरे में खोकर आलिंगनबद्ध होकर दो जिस्म एक जान हो जाते हैं।

(क्रमशः अगले भाग में जारी)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: उपन्यास - रात 11 बजे के बाद - भाग 2 - राजेश माहेश्वरी
उपन्यास - रात 11 बजे के बाद - भाग 2 - राजेश माहेश्वरी
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