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उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 2 - राजेश माहेश्वरी

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उपन्यास

रात के ग्यारह बजे

- राजेश माहेश्वरी

भाग 1


भाग 2

सुबह हो चुकी थी। चारों ओर प्रकाश था। ट्रेन ग्वालियर और मथुरा के बीच अपनी गति से चली जा रही थी। राकेश की आंख खुली तो उसने स्वयं को अनीता की बांहों में देखा। उसने धीरे से अपने को अलग करके उठने का प्रयास किया तो अनीता की भी आंख खुल गई। उसके होठों पर मुस्कराहट तैर गई। वह अपने को अलग करके उठ बैठी। राकेश भी मुस्करा रहा था। दोनों के चेहरे पर संतुष्टि की आभा थी। चाय आई और दोनों चाय की चुस्कियां लेने लगे।

उनके बीच धीरे-धीरे काम की बात होने लगी। अनीता चाहती थी कि मकान में जो साज-सज्जा के सामान लगना हैं, वे खरीदकर रवाना कर दिये जायें ताकि जब वे वापिस पहुँचे तो उन्हें मिल जायें और काम की प्रगति में रूकावट न आये। इसके बाद उसने बताया कि वह तीन-चार अच्छे आर्कीटेक्ट्स और बिल्डर्स से परिचित है जिनके साथ विचार विमर्श करके काम की रूपरेखा तैयार कर ली जाए। राकेश भी इससे सहमत था। इस संबंध में उनकी चर्चा होती रही और दिल्ली आ गई।

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उस दिन होटल से तैयार होकर वे होटल की टैक्सी में ही निकले और अनीता के मन-माफिक सामान की खरीददारी करके उसे रवाना कर दिया गया। अनीता आज बहुत प्रसन्न थी क्योंकि उसकी हर बात को राकेश ने सम्मान दिया था और उसकी प्रत्येक सलाह को स्वीकार किया था। आज पूरा दिन इसी काम में लग गया। शाम को वे एक रेस्टारेण्ट में भोजन के लिये गये। रेस्टारेण्ट में खाने के बीच अनीता राकेश को बताती है कि उसका एक महत्वपूर्ण कार्य निकट भविष्य में होने की संभावना है। वह चाहती थी कि राकेश उसके उस काम की पूर्णता के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे। वह बताती है कि यदि यह काम हो जाता है तो उसका जीवन संवर जाएगा। राकेश के प्रयास करने पर भी वह यह नहीं बताती कि वह क्या काम था। वह राकेश से कहती है कि जीवन में भाग्य एवं समय पर हमारा भविष्य निर्भर करता है। वक्त की मार अमीर-गरीब जाति-धर्म और संप्रदाय में भेदभाव नहीं करती। यह ईश्वर द्वारा निर्धारित है और इसमें उसी की मर्जी चलती है। उसे तुम्हारी सल्तनत से कोई मतलब नहीं है। हम समय को समझ नहीं पाते हैं इसीलिये वह हमारे साथ शह और मात का खेल खेलता रहता है। हमें उसके प्रति हृदय में सम्मान रखते हुए नत मस्तक होकर उसे स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमत्ता इसी में है। यही हमें जीवन में मंजिल तक पहुँचा सकता है। राकेश! वक्त की मेहरबानी उन्हीं को प्राप्त होती है जो मुकद्दर के सिकन्दर होते हैं। समय को समझो तो जीना है समय को न समझो तो भी जीना है एक जीवन का जीना है और दूसरा जीवन है सिर्फ इसलिये जीना है।

राकेश उसकी बातों से अचंभित था। डिनर लिया जा चुका था। वे दिन भर के थके हुए भी थे और सफर की भी थकान थी। इसलिये लौटकर होटल आ गए।

कमरे में राकेश ने उसे अपनी बांहों में भर लिया। उसकी सुन्दरता और उसकी कोमलता में खोया हुआ वह उससे कह रहा था- तुम्हारी आंखें बहुत हसीन हैं। तुम्हारी नजरों ने मुझे प्यार का नजराना दे दिया है। यह एहसास ही कितना हसीन महसूस होता है। ऐसी तकदीर सभी को नसीब नहीं होती। जिसे जीवन में यह प्राप्त होती है वह खिले हुए गुलशन की तरह महक जाता है। तुम जीवन को कल्पनाओं में जीती हो। मैं उन कल्पनाओं को हकीकत में बदलना चाहता हूँ। तुम्हारे ये कोमल और गुलाबी होंठ किसी के भी जीवन में बहार ला सकते हैं। तुम अपने में जीती हो मैं जीवन को जीता हूँ। तुम मयखाने में जाम की तरह हो जिसका मैं दीवाना हूँ। हम दोनों का मिलन एक मधुर गीत है, एक मधुर संगीत है। हम इस गीत के भावों में और इस संगीत की तानों में खो जाएं, एक दूसरे के हो जाएं। यह सुनकर अनीता ने बड़े प्यार से इतना ही कहा अच्छा! और दोनों एक दूसरे की बांहों में समा गए।

दूसरे दिन सुबह वे आराम से उठे और तैयार होकर निकल पड़े। दिन भर वे भवन निर्माताओं और आर्कीटेक्ट के साथ व्यस्त रहे। शाम को वापिस आकर उन्होंने दिन भर के काम पर विचार किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इस पर अंतिम निर्णय सभी के कोटेशन और एस्टीमेट आने के बाद ही लेना चाहिए। उस रात वे वहीं रहे और सुबह की उड़ान से अपनी मीठी यादों को साथ लिये लौट आए।

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अगले दिन सुबह अनीता का फोन आया। वह बहुत ही आल्हादित थी। उसके स्वर में उल्लास झलक रहा था। उसने राकेश को बताया कि तुम्हारी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली। राकेश ने पूछा कि कौन सी प्रार्थना ? तो उसने कहा कि आज सुबह तुम नाश्ता मेरे साथ ही लो। यहीं मैं तुम्हें अपने सामने बैठाकर यह खुशखबरी सुनाउंगी। राकेश के मन में जिज्ञासा का तूफान उमड़ रहा था। वह शीघ्र ही तैयार होकर उसके घर पहुँच गया। अनीता की प्रसन्नता देखते ही बन रही थी। उसने एक पत्र राकेश के हाथों में दिया जिसमें फ्रांस के पेरिस नगर में एक अंतर्राष्ट्रीय कंस्ट्रक्शन कम्पनी में उसे उच्च पद पर सेवाएं प्राप्त हो गईं थी। उसे तत्काल ही वहां जाकर ज्वाइन करना था। राकेश उसे देखकर हत्प्रभ रह गया। उसने दबी जुबान में अनीता को बधाई दी।

राकेश का वह पूरा दिन उदासी और मायूसी में गुजरा। दिन भर अनीता और अनीता के साथ गुजारे गए पल उसकी आंखों में झूलते रहे। रात भर वह बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। वह रात भर सो नहीं पाया। उसका सबसे विश्वसनीय सहयोगी मझधार में ही उसे छोड़कर जा रहा था।

अनीता अपनी सफलता पर बिस्तर पर लेटे-लेटे ही सोच रही थी। वह ईश्वर की इस कृपा के प्रति नतमस्तक होकर इसका श्रेय उसके द्वारा सम्पन्न सद्कार्यों को ही दे रही थी। वह परमात्मा से अपने व परिवार के सुखद भविष्य की कामना करते हुए यहां की खट्टी-मीठी यादें जो उसके दिल में बसी हुईं थीं उन्हें सदा अपने साथ ले जाने की कल्पना में खोई हुई थी। वह अन्धकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की दिशा अनुभव कर रही थी। उसके जीवन का नया अध्याय प्रारम्भ होने जा रहा था। चांद की दूधिया चांदनी सी सफलता की अनुभूति के रुप में उसके मन-मस्तिष्क पर दस्तक दे रही थी। यह सोचते-सोचते ही वह गहरी नींद में सो गई।

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सुबह हुई तो अनीता अपने साथ एक और युवक को लेकर राकेश के घर आयी। उसने उस युवक का परिचय एक इनर डेकोरेटर के रूप में कराया। उसने बताया कि उसे सारी बातें समझा दी हैं। वह निर्धारित समय में ही सारा काम पूरा कर देगा और उसके काम से राकेश को कोई शिकायत नहीं होगी। राकेश को इससे बहुत राहत मिली और उसके दिल में अनीता के प्रति प्रेम और भी अधिक बढ़ गया।

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अनीता ने मुम्बई के लिये अगले दिन की फ्लाइट बुक करा ली थी। राकेश उसे निर्धारित समय पर एयरपोर्ट पर छोड़ने गया। उस समय उसका पति सामान आदि की बुकिंग में व्यस्त था। राकेश और अनीता प्रतीक्षालय में अकेले थे। वहां उसने उसे एक उपहार और शुभकामनाएं दीं और भावावेश में उसे गले लगा लिया। दोनों की आंखें गीली थीं राकेश ने उसके कान के पास जाकर कहा- मुझे सदैव तुम्हारी प्रतीक्षा रहेगी। उपहार के साथ राकेश ने उसे एक पत्र भी दिया था जिसमें लिखा था-

हमारे स्मृति पटल पर

देंगी दस्तक

तुम्हारे साथ बीते हुए

लम्हों की मधुर यादें

ये रहेंगी हमेशा धरोहर के समान

मेरे अंतरमन में देंगी

कभी खुशी कभी गम का अहसास

जो बनेगा इतिहास

यही बनेंगी

मेरा सम्बल

और दिखाएंगी सही राहें

मेरे मीत मेरी प्रीत भी

रहेगी हमेशा तेरे साथ

तेरे हर सृजन में

बनकर मेरा अंश

यही रहेगी तेरी-मेरी

सफलता का आधार

जीवन में करेगी मार्ग दर्शन

एवं देगी दिशा का ज्ञान

ये न कभी खत्म हुई है

न ही कभी खत्म होगी

आजीवन देती रहेगी तेरा साथ

सागर से भी गहरी है तेरी गंभीरता

एवं आकाश से भी ऊंची हों तेरी सफलताएं

तुम वहां मैं यहां

बस तेरी यादों का ही है अब सहारा

कर रहा हूँ अलविदा

खुदा हाफिज, नमस्कार।

अनीता वहां से राकेश को फोन करती रहती थी। राकेश भी उसे फोन करता था। दोनों एक दूसरे का दर्द एक-दूसरे को बताकर हल्का होने का प्रयास करते थे। उन्हें क्या पता था कि जितना वे हल्का होने का प्रयास करते हैं उतना ही वे भारी हो जाते हैं। समय अपनी गति से उड़ता चला जा रहा था। समय को कौन रोक पाया है ? कुछ माह बाद अनीता ने अपने परिवार को भी वहीं बुला लिया। धीरे-धीरे वे इस संसार के मायाजाल में फंसते चले गये और उनके बीच की रेशम की डोरी टूटती चली गई।

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(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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