उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी

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उपन्यास रात के ग्यारह बजे - राजेश माहेश्वरी भाग 1   ||  भाग 2 ||  भाग 3 || भाग 4 राकेश की मीटिंग कुछ जल्दी खत्म हो गई थी। वह कुछ पहले ही ...

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उपन्यास

रात के ग्यारह बजे

- राजेश माहेश्वरी

भाग 1  ||  भाग 2 ||  भाग 3 ||


भाग 4

राकेश की मीटिंग कुछ जल्दी खत्म हो गई थी। वह कुछ पहले ही वापिस आ गया था। आने पर मानसी ने उसे गौरव के विषय में बताया तो राकेश कमरे में उसे देखने पहुँचा। वह सो रहा था। राकेश ने उसे नहीं जगाया। वह फिर बाहर आकर मानसी के साथ ही बैठ गया। उसने मानसी से पूछा तो उसने बताया- मैं तो बाथरुम में नहा रही थी तभी मैंने जोर की कुर्सी गिरने की और गौरव की आवाज सुनी। मुझे लगा कि पता नहीं क्या हो गया। मैं जल्दी-जल्दी नहाकर बाहर आई। तब तक वेटर इन्हें कमरे में बिस्तर पर लिटा चुके थे। इनको बहुत दर्द था। इनकी हालत देखकर मैं जल्दी से तैयार हुई और इन्हें अस्पताल ले जाने के लिये बाहर निकली। मैंने वेटर को बुलाकर इनकी मदद करके इन्हें बाहर टैक्सी तक पहुँचाने को कहा। जब मैं कमरे के बाहर निकली तो मैंने वहां देखा जहां ये गिरे थे। वह कुर्सी अभी भी वहीं थी। उसकी एक टांग टूट चुकी थी। उसे उठाकर वेटर ने किनारे भर कर दिया था। वे वेटर जिस प्रकार मुस्करा रहे थे वह मुझे अजीब लग रहा था। अब मुझे उनकी मुस्कराहट का राज समझ में आया। गौरव मुझे नहाते हुए देखने की कोशिश में ही गिरा है। सब कुछ सुनकर राकेश को पहले तो गौरव की हरकत पर गुस्सा आया पर मानसी के चेहरे को देखकर वह मुस्करा उठा।

मानसी ने पूछा- आपकी मीटिंग कैसी रही?

अच्छी रही। सभी निर्णय एक मत से तय हो गए इसीलिये जल्दी आ गया।

आपने भोजन कर लिया है?

अभी नहीं किया।

तो फिर खाना बुलवा लूं?

क्या तुम्हें भूख लगी है?

नहीं ! नाश्ता कर लिया था। वह भी कुछ भारी ही था।

फिर गौरव को भी उठ जाने दो। एक साथ खाएंगे। मैंने भी वहां नाश्ता कर लिया था। वह भी भारी था। कल से तुम्हारे अतीत को जानने के बाद मेरा मन कुछ विचलित सा है। मैं सोचता रहा। मेरे मन में एक ही बात आती है कि जो बीत गया सो बीत गया किन्तु तुम्हारा भविष्य वैसा न रहे जैसा तुम्हारा भूतकाल रहा। तुम अपने बल पर समाज में सम्मान पूर्वक जियो यही मेरी कामना है। किन्तु यह इतना सहज भी नहीं है। इसके लिये जो भी करना है तुम्हीं को करना है और क्या करना है यह भी तुम्हीं को तय करना है। इतना जरुर है कि मैं हर कदम पर एक सच्चे हितैषी के रूप में तुम्हारे साथ हूँ।

मैं तुमसे एक बात और कहना चाहता हूँ कि तुमने जिस भोलेपन और निश्छलता के साथ सब कूछ मुझे बता दिया उस तरह से किसी और को मत बताना। यह दुनियां बड़ी अजीब है। इसकी तासीर बड़ी विचित्र है। यह औरों के कष्ट से सुखी होती है और औरों के सुख में दुखी हो जाती है। अपनी व्यथा को कथा मत बनाओ। इसे दुनियां को मत सुनाओ। कोई तुम्हारी पीड़ा को नहीं बांटेगा। स्वयं को मजबूर नहीं मजबूत बनाओ। अपनी आत्मशक्ति और आत्मविश्वास को संचित करो। फिर विचार करो, समय को पहचानो। परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता। परिश्रम करोगी तो ये दुख के पल भी बीत जाएंगे। तब सफलता अवश्य मिलेगी। तब दूसरे लोग भी तुमसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने लगेंगे।

जीवन में धन की उपयोगिता तभी है जब उसका दुरूपयोग न हो। गरीबी व अमीरी दोनों की प्रचुरता कष्टदायक हो सकती है। गरीबी देती है अभावों को जन्म और अत्यधिक अमीरी दुर्व्यसन पैदा करती है। इसीलिये हमारे धर्मग्रन्थ कहते हैं- सांईं इतना दीजिये जामें कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।

ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है और उसकी इस सृष्टि में उसकी सबसे सर्वश्रेष्ठ कृति मानव है। मानव में सृजन और विकास की अद्भुत क्षमता है। हममें दूरदृष्टि हो, हमारा इरादा पक्का हो, हममें साहस हो और ईमानदारी से काम करने का जज्बा हो तो सफलता हमारे कदम चूमती है। जहां धर्म और कर्म होते हैं सुख भी वहीं होता है। यह सही है कि सृजन के साथ ही विनाश भी रहता है। जहां लय और ताल होते हैं वहीं स्वरों में मधुरता होती है। जहां हरियाली होती है वहां सौन्दर्य होता है। राकेश भावुकता में बह रहा था। वह कहता जा रहा था और मानसी किसी मूर्ति के समान एक टक उसे देखते हुए सुन रही थी। वह कह रहा था- जहां झरने और पर्वत हैं वहां सौन्दर्य होता है। जहां जल होता है वहां जीवन होता है। जहां सच्ची चाहत होती है वहीं प्राप्ति भी निश्चित ही होती है। जहां ईश्वर साथ होता है वहां भाग्य भी साथ निभाता है। जहां परिश्रम और प्रयास होता है वहां ईश्वर की मदद भी होती है। आवश्यकता केवल ईमानदारी से और पूरे मनोयोग से परिश्रम करने की होती है।

यह एक कटु सत्य है कि असफलताओं का इतिहास नहीं होता और न ही इन्हें कोई याद करता है। ये विस्मृतियों के गर्त में समा जाती हैं। यदि हम विचार करें तो पाएंगे कि असफलता ही सफलता की जननी है। यही हमारी त्रुटियों को दिखाकर हमें सही राह की ओर मोड़ देती हैं। तभी हमें सफलता प्राप्त होकर हमारी आगे की पीढ़ियों को भी समृद्धता प्राप्त होती है।

मानसी से इस लय में और इस लहजे में आज से पहले किसी ने बात नहीं की थी। वह भाव-विभोर हो गई थी। उसकी आंखें सजल हो चुकीं थीं। राकेश उसके पास आ गया। उसने अपने रूमाल से उसकी आंखों से उसके गालों पर ढुलके हुए खारे पानी को पोंछते हुए कहा- हिम्मत रखो और साहस से काम लो। मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ। राकेश का स्पर्श मिलते ही मानसी जैसे तन्द्रा से जागी हो। उसने अपने हाथों से अपने आंसू पोंछने का प्रयास किया।

राकेश ने स्थितियों को सहज बनाने के मकसद से जानते हुए भी उससे पूछा- गौरव कैसे घायल हो गया। वह आखिर कर क्या रहा था।

उसने मुस्कराते हुए कहा- आप सब समझते हैं। फिर मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं। तभी कमरे से गौरव की आवाज आयी। वह मानसी को पुकार रहा था। उसकी आवाज सुनकर राकेश और मानसी दोनों भीतर गये। राकेश को देखते ही गौरव ने पूछा- तुम कब आ गए?

जब तुम सो रहे थे। अब दर्द कैसा है? पैर में ही है या आंखों के रास्ते दिल में समा गया है? गौरव झेंप गया। मानसी के होठों पर भी मुस्कराहट तैर गई। उसकी झेंप उसके भीतर के चोर की चुगली कर रही थी। राकेश ने मानसी से कहा- अब भोजन बुलवा लो? मानसी ने फोन का रिसीवर उठाकर भोजन का आर्डर दे दिया।

भोजन के बाद राकेश ने गौरव को आराम करने की हिदायत दी। उसने मानसी से कहा कि सुबह तुम छोटे महादेव के दर्शनों को नहीं जा पाईं थीं। चलो तुम्हें दर्शन करा लाऊं। तुम्हारे माध्यम से मुझे भी शिव के दर्शनों का सौभाग्य मिल जाएगा। वे कमरे से निकल पड़े।

टैक्सी बढ़ती जा रही थी। सागौन के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष पीछे छूटते जा रहे थे। सड़क के एक ओर ऊंची-ऊंची भूरी-भूरी पहाड़ियां थीं तो दूसरी ओर गहरी खाइयां। इनके बीच सर्प सी बलखाती सड़क पर चलती टैक्सी कभी दायें और कभी बायें मुड़ती हुई आगे बढ़ती जा रही थी। जब थोड़ा शोरगुल कानों में पड़ा और टैक्सी रूकी तो दोनों ही चौंके थे। दोनों ही विपरीत दरवाजों से टैक्सी से बाहर आ गए।

सूरज पश्चिम में अपने विश्राम सदन की ओर जा रहा था। प्रकाश कुछ-कुछ कम होने लगा था। गुफा के भीतर टपकती हुई बूंदों के बीच बैठे शिव ऐसे लग रहे थे जैसे कोई योगी अपनी तपस्या में लीन हो। दोनों ही इस दिव्य वातावरण में मंत्रमुग्ध से शिव के इस रुप के आगे नतमस्तक हो गए। उनका अंतरमन कामना विहीन हो गया। वे इस संसार और अपने अस्तित्व को कुछ क्षणों के लिये भूल बैठे। जब तन्द्रा भंग हुई तो वे प्रभु के चरणों में प्रणाम करते हुए गुफा से बाहर आ गए। अंधेरा घिरने लगा था। हवा में ठण्डक बढ़ती जा रही दोनों को ही होटल वापिस पहुँचने की जल्दी थी। वे टैक्सी में बैठे और रवाना हो गए। रास्ते में कुछ हल्की-फुल्की बातचीत चलती रही। होटल वापिस आकर उन्होंने देखा कि गौरव जाग उठा था और गर्म कपड़े पहनकर बरामदे में बैठा हुआ था।

तीनों कमरे के भीतर आ गए। राकेश ने होटल के वेटर को बुलाया और अपने लिये व्हिस्की का आर्डर दिया गौरव हमेशा ही बियर पीता था इसलिये उसके लिये बियर और मानसी के लिये साफ्ट ड्रिंक मंगवाई गई। राकेश और मानसी ने हाथ मुंह धोकर जब तक हल्के और गर्म कपड़े पहने तब तक सारा सामान आ चुका था।

गौरव लेटे-लेटे ही अखबार के पन्नों में खोया हुआ था। राकेश ने उससे पूछा- भाई जी आज क्या कोई खास खबर है ? बड़े मन लगाकर पेपर में डूबे हो ?

खास खबर क्या होगी ? वही बलात्कर, वही हत्या, वही अत्याचार और राजनीति की टांग खिच्चौअल। इसके अलावा अखबारों में रहता ही क्या है ? अखबारों में सिर्फ चमकदार शहरों की दागदार दास्तानें होतीं हैं। कहने को देश को आजाद हुए 64 साल हो गए। देश में प्रजातंत्र है, लेकिन अखबारों के पन्नों पर नेताओं, अफसरों, पुलिस, व्यापारी और अपराधियों का कब्जा है। गांव-देहात आज भी उपेक्षित हैं। वहां आज भी जंगल राज चल रहा है।

उत्तर प्रदेश में आगरा के पास एक गांव के पनघट पर एक गरीब महिला जो किसी पिछड़ी जाति की थी, प्यासी खड़ी थी। मैं उसे चुपचाप देख रहा था। उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह कुएं से पानी निकाल कर पी ले। उस गांव में गांव के जमींदार का राज्य चलता था। वह सवर्ण था और पिछड़ी जातियों को उस कुएं से पानी लेना वर्जित था।

एक बार उसने हिम्मत की थी। वह इस व्यवस्था से विद्रोह करके पुलिस के दरवाजे पर न्याय मांगने गई थी। वहां उसे अपनी अस्मत तक लुटानी पड़ी। दूसरे दिन उसकी अस्मत लूटने वाले वर्दीधारी जमींदार के यहां सम्मानित किए जा रहे थे।

इस घटना के बाद वह अपनों में भी तिरस्कृत हो गई थी। सभी ने उसे छोड़ दिया था। वह अब पतित कहलाती थी। पूरे समाज में कोई नहीं था जो उसे अपना ले और उसके जीवन को संवार दे।

देश में अनेक नेता आए और चले गए। वह महिला और उस जैसी न जाने कितनी महिलाएं आज भी जहां की तहां हैं। वे प्यासी थीं और प्यास ही उनकी जीवन की नियति है। ऐसे समाज और ऐसे अखबारों में तुम किन समाचारों की बात कर रहे हो?

राकेश भाई! हमने केवल भौतिक सुख-सुविधाओं में तरक्की की है, नैतिकता की दृष्टि से हम बहुत नीचे चले गए हैं। हमारी संवेदनाएं मरती जा रहीं हैं। हमारी सभ्यता दिखावटी हो चली है और हमारी संस्कृति अपना मूल स्वरुप खोकर विकृत और वीभत्स होती चली जा रही है।

कभी हमारे यहां शादी के बाद दुल्हन को डोली में बैठाकर विदा के समय कहार कन्धों पर लेकर जाते थे। उस समय हमारा यह तथाकथित विकास नहीं हुआ था। यातायात के साधनों का नितान्त अभाव था। रास्ते भी टेढ़े-मेढ़े, जंगलों और पहाड़ों के बीच से जाते थे। राह में अगर कोई चोर डाकू भी मिल जाए तो वह उस दुल्हन का सम्मान करता था, उसे उपहार देता था, अपनी शुभकामनाएं देता था और उसे अपनी सीमाओं के बाहर तक ससम्मान सुरक्षित विदा करता था। कभी भी किसी के साथ ऐसी वारदातें नहीं होतीं थीं जैसी आज रोज राह चलते हो रही हैं।

मैं एक ऐसी महिला को जानता हूँ जो विवाह के बाद दूसरी या तीसरी विदाई में दुल्हन के रुप में कार में विदा हो कर जा रही थी। रास्ते में उस कार के ड्राइवर ने कुछ अपराधियों के साथ मिलकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार का दुष्कर्म कर डाला। वह ससुराल पहुँचने के पहले ही पुलिस स्टेशन पहुँच गई। वहां थानेदार ने भी उससे ऐसे-ऐसे सवाल पूंछे जिनको दोहराना भी संभव नहीं है। उस थानेदार ने अपराधियों का पता लगाया और उनसे मिलकर तगड़ी रकम वसूली फिर मामले को रफादफा कर दिया।

जब वह ससुराल पहुँची तो उसके पति ने उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। दुर्भाग्यवश उसे अपने पिता के घर वापिस जाना पड़ा। वह एक साहसी और समझदार महिला थी। उसने परिश्रम करके गृहउद्योग के माध्यम से अपने आप को स्वाबलंबी बनाया। उसका काम अच्छा चल पड़ा। उसने अपने जैसी अनेक महिलाओं की मदद की और उन्हें भी उनके पैरों पर खड़ा करके आत्म निर्भर बना दिया।

राकेश को सिगरेट की तलब लगी। वह गौरव से कहता है- यार तुम कार लेकर बाजार से सिगरेट ले आओ। दिन भर से होटल में पड़े हो कुछ तफरीह हो जाएगी। गौरव जाने के लिये तैयार होकर जाने लगता है। उसी समय मानसी कहती है मुझे भी बाजार से थोड़ा सा सामान लेना है। आपकी इजाजत हो तो मैं भी इनके साथ चली जाऊं। राकेश सहमति दे देता है। वे दोनों होटल की टैक्सी पर बाजार के लिये निकल पड़ते हैं। बाजार होटल से लगभग एक किलोमीटर दूर था।

राकेश बैठा व्हिस्की की चुस्कियां ले रहा था तभी उसकी नजर एक डायरी पर पड़ती है। उत्सुकतावश वह उसे उठा लेता है। जब वह उसे खोलता है तो उसे समझ में आता है कि वह मानसी की डायरी थी जो भूल से बाहर ही छूट गई थी। वह उसे रखना भूल गई थी। राकेश उसके कुछ पन्ने पलटता है तो एक पन्ने पर उसे अपना नाम दिखलाई देता है। उस पन्ने पर उसे संबोधित करके लिखा गया था। वह उसे पढ़ने लगता है।

मेरा प्यार सागर सा गहरा और त्रिवेणी सा पवित्र है। क्या आप मेरे प्यार को स्वीकार करेंगे ? मैं आपके प्रेम की प्यासी हूँ। मैं जानती हूँ कि यह आसान नहीं है लेकिन यह असंभव भी तो नहीं है। मुझे लगता है कि यदि सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चला जाए। मन में धैर्य हो, सफलता की चाह हो, उत्साह हो और सही राह पर आगे बढ़ा जाए। विपत्तियों के ज्वार-भाटों में भी संघर्षरत रहा जाए तो विजय अवश्य मिलेगी। जीवन में सुख-समृद्धि और वैभव अवश्य आएगा। जीवन खुशियों से भर जाएगा। प्यार की खुशबू से हमारा आंगन महक उठेगा। हमारा प्यार भरा जीवन ऐसा ही होगा। .......... पढ़ते-पढ़ते राकेश व्हिस्की का एक गहरा घूंट लेता है और मुस्करा उठता है।

इधर टैक्सी होटल के बाहर निकली तो गौरव ने मानसी से कहा- राकेश आपको बहुत चाहता है।

हां! हो सकता है।

हो सकता है नहीं, वह वास्तव में चाहता है।

हाँ! कभी-कभी मुझे ऐसा लगता तो है किन्तु कहाँ मैं और कहाँ वो।

वैसे आनन्द भी आपको बहुत चाहता है। मैं तो दोनों का ही मित्र हूँ। दोनों को जानता हूँ। आनन्द आपके विषय में हमेशा बातें करता है। वह आपसे बात करना चाहता है।

मैं किसी से बात नहीं करना चाहती।

बात करने में क्या हर्ज है।

मुझे नहीं करना।

मेरी खातिर कर लीजिए।

गौरव मानसी के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही आनन्द को फोन लगा लेता है। वह उसे बताता है कि वे और मानसी बाजार जा रहे हैं। वह उसे मानसी से बात करने के लिये कहता है और फोन मानसी की ओर बढ़ा देता है। मानसी कहती है हलो!

कैसी हो?

अच्छी हूँ।

गौरव ने तुमसे मेरे बारे में कुछ कहा है ?

हाँ ! कहा तो है।

तुम मेरे विषय में क्या सोचती हो ?

मैं आपके विषय में कुछ भी नहीं सोचती।

पर मैं तो हर समय तुम्हारे ही विषय में सोचता रहता हूँ। मुझे तुम्हारे बिना अपना जीवन अधूरा लगता है। गौरव ने तो तुम्हें बताया ही होगा। तुम अगर मुझे स्वीकार कर लो तो मेरे जीवन में खुशियों की बरसात हो जाएगी। विश्वास रखो मैं तुम्हारे लिये कुछ भी करने को तैयार हूँ। मेरे रहते तुम्हारे जीवन में किसी भी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहेगा। तुम कल्पनाओं की रानी हो तो मैं वास्तविकता का राजा हूँ। तुम रुप की रानी हो तो मैं धन का महाराजा हूँ। तुम चांद की चांदनी हो तो मैं सूरज की धूप हूँ। जीवन में सब कुछ पाया लेकिन एक दिन यह काया मिट जाना है। शेष रह जाएंगी केवल स्मृतियां।

मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए। अच्छा हो कि आप अपने आप को पल्लवी तक ही सीमित रखें। मैं आपकी इस मामले में कोई मदद नहीं कर सकती। मैंने अपने जीवन का रास्ता निश्चित कर लिया है। मेरा और आपका रास्ता अलग-अलग है। यह कहते-कहते वह फोन बन्द कर देती है और गौरव की ओर बढ़ा देती है।

वह गौरव से कहती है ऐसे लोग सच्चाई को नहीं समझ सकते। अपनी विचित्र सोच और समझ के कारण इनकी कार्यशैली भी विचित्र होती है। जो इन्हें सही रास्ता दिखलाता है उसे ये अपना दुश्मन समझते हैं। ये खुद ही फरियादी होते हैं और खुद ही न्यायाधीश हो जाते हैं।

आनन्द का फोन फिर आता है लेकिन तब तक वे बाजार पहुँच चुके थे। गौरव उससे कहता है कि तुम स्वयं बात कर चुके हो और मुझे नहीं लगता कि अब बात करने को कुछ भी शेष रह गया है। जब वे सामान लेकर होटल पहुँचते हैं तो देखते हैं कि राकेश अभी भी हाथ में व्हिस्की का गिलास लिये बैठा है। उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी।

दूसरे दिन सुबह सभी देर से उठे थे। बादल घिरे हुए थे। रात को कुछ पानी भी गिर गया था। बरसात का प्रभाव होटल के बाहर हर ओर दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी पचमढ़ी को धोया गया हो। ठण्डक भी बढ़ी हुई थी। मानसी राकेश और गौरव के कमरे में आ गई थी। वहीं बैठकर वे चाय पी रहे थे। गौरव ने राकेश से पूछा- आज का क्या प्रोग्राम है ? राकेश कह उठा तुम्हारी क्या मन्शा है।

मेरे पैर में तो कुछ दर्द हो रहा है और कमरे में ही आराम करने का मन हो रहा है।

मैं भी थकी हुई हूँ और मेरा मन भी कहीं जाने का नहीं हो रहा है। राकेश पचमढ़ी का नैसर्गिक सौन्दर्य देखते हुए बोल पड़ा-

मेघाच्छादित आकाश

उमड़-घुमड़ कर बरस रहे बादल

गरज रही बिजली

वायु का एक तीब्र प्रवाह

छिन्न-भिन्न कर देती है बादलों को

शेष रह जाता है

विस्तृत नीला आकाश।

कौन है ऐसा

जिसके जीवन रुपी आकाश में

घिरे न हों

परेशानी के बादल

गरजी न हों मुसीबत की बिजलियाँ

वह जो सकारात्मक सृजनशीलता और

धर्म-निष्ठा के साथ

जूझता है

परेशानियों और मुसीबतों से

उसके संघर्ष की वायु का प्रवाह

निर्मल कर देता है

उसके जीवन के आकाश को।

लेकिन

जहाँ होती है नकारात्मकता

जहाँ होता है अधर्म

वहाँ होता है पलायन

वहाँ होती है पराजय

वहाँ होती है कुण्ठा और

वहाँ होता है अवसाद

वहाँ छाये रहते हैं बादल

और वहाँ कड़कती रहती हैं बिजलियाँ।

प्रत्येक का जीवन होता है

नीला निर्मल आकाश।

व्यक्ति की सोच

सच्चाई और सक्रियता

भर देती है उसे

बादल पानी और बिजली से

अथवा कर देती है उसे

नीला, निर्मल और प्रकाशवान

यही है जीवन का यथार्थ।

मानसी इसे सुनकर काफी प्रभावित हुई थी। उसने राकेश से कहा- मुझे नहीं पता था कि आप कविता भी रचते हैं। मैं आपकी और भी कविताएं सुनना चाहूँगी।

इसी बीच राकेश ने मानसी से कहा- मेरे प्रति तुम्हारे विचारों से मैं अभीभूत हूँ। इससे मुझे जीवन में हमेशा प्रेरणा मिलेगी और ये जीवन की राहों में मार्गदर्शन देंगी। एक अच्छा मित्र मिलना सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि होती है और मैं सोचता हूँ कि यह तुम्हारे रुप में मुझे प्राप्त हो रही है। प्रेम, एक पूजा या भक्ति के समान है। प्रेम दिल की अभिव्यक्ति व मन से निकली भावना को परिवर्तित करके अनुभूति बनती है। यह दिल की चाहत व उसके मन्थन से उत्पन्न विचारों की अन्तिम परिणिति है। मुझे इसका बहुत गम्भीर अनुभव हो चुका है। प्रेम का कोई स्वरुप नहीं होता, न ही इसका कोई विकल्प है। यह एक दिव्य ज्योति है जिसके प्रकाश का आभास हमारे दिल में होता है। यह एक कल्पना है जो वास्तविकता में परिवर्तित होकर जीवन का आधार बनती है। एक तपस्या है एवं भावनाओं का समर्पण है एक ऐसी भक्ति है जिसका न तो प्रारम्भ है और न ही कहीं अन्त है। प्रेम से सुख और शान्ति मिलती है और यह जीने की कला सिखाती है। जीवन में सच्चा प्रेम तन और मन को बल एवं आत्मा में चेतना जागृत करता है। जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां आ जाएं। प्रेम कभी समर्पण नहीं अर्पण ही करता है एवं संघर्ष की क्षमता प्रदान करता है। तुम्हारे अन्तरमन में मेरे प्रति जो प्रेममय भावना है उसका पता मुझे आज चला। मैं निश्चित रुप से बहुत भाग्यवान हूँ। मुझे आशा है कि तुम कठिन परिस्थितियों में सही मार्ग दिखाकर कृतार्थ करती रहोगी। जीवन में याद रखना विश्वसनीयता विश्वास की जननी है। इसके बिना जिन्दगी अधूरी रहती है यदि विश्वसनीयता संदिग्ध है तो विश्वास का अन्त हो जाता है इसकी पहचान हमारे स्वविवेक, आत्म मन्थन और अन्तरमन की भावनाओं से होता है। विश्वसनीयता और विश्वास के महत्व को हम तब समझ पाते हैं जब हमारे साथ विश्वासघात होता है। तब हम सोचते हैं कि हमने विश्वसनीयता को परखे बिना किसी पर विश्वास क्यों किया। मुझे आशा है कि तुम्हारे और मेरे बीच ऐसी परिस्थितियां कभी नहीं आएंगी और हमारे बीच विश्वास की यह पतली डोर हमेशा बंधी रहेगी।

उसने मानसी से पूछा- तुम मुझे सच-सच और स्पष्ट अभी बता दो कि तुम मुझसे क्या अपेक्षा रखती हो। मानसी ने भी बिना किसी औपचारिकता के तीन मांगे विनम्रता पूर्वक राकेश के सामने रखीं। पहली उसके दोनों बच्चे आरती और भारती को अच्छी शिक्षा दिलवा कर उन्हें आत्म निर्भर बना देवें ताकि उनका जीवन संवर सके। दूसरा आपको मेरी पारिवारिक परिस्थितियों के विषय में पूरा ज्ञान हो चुका है। मेरी कोई बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं है। मुझे कोई ऐसा व्यापार करवा देवें जिससे मेरा परिवार जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। मैं जानती हूँ कि आवश्यकताओं का कभी अन्त नहीं होता। किन्तु मैं सीमित साधनों में ही सुखी जीवन की कल्पना कर रही हूँ और तीसरी व अन्तिम अपेक्षा आपसे है कि मेरी बड़ी बेटी आरती जो चौदह साल की है वह हीनता बोध का शिकार हो रही है। उसे फिल्मों में न जाने कैसे हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया है। आपके मुम्बई में फिल्म इन्डस्ट्रीज में काफी पहचान है या तो आप उसका भूत उतार दीजिये या उसे फिल्म इन्डस्ट्रीज में कोई स्थान दिला दीजिये। इतना कहकर मानसी ने राकेश की ओर आशा और याचना भरी निगाहों से देखा। गौरव भी राकेश की ओर नजर गड़ाये था। राकेश ने अपना मोबाइल उठाया और आनन्द को फोन करके कहा- आरती और भारती का एडमीशन वह उसके स्कूल में कराना चाहता है। उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह फीस में किसी प्रकार का डिस्काउण्ट नहीं चाहता और इस पर होने वाला समस्त व्यय वह स्वयं करेगा। आनन्द ने भी इसे स्वीकार करते हुए बतलाया कि उसका एडमीशन हो जाएगा। अब राकेश ने अपने एक मित्र को फोन लगाकर दो टैक्सियां उठवा दीं जिनकी मार्जिन मनी राकेश ने अपने एकाउण्टेण्ट को कहकर भुगतान करवा दिया और बाकी की रकम फाइनेन्स कम्पनी से उपलब्ध हो गई। राकेश ने मानसी को कहा कि तुम्हारे दोनों काम मैंने करा दिये हैं, अब तुम मेहनत करो। श्रम व परिश्रम से धन कमाओ। अपनी किस्तों का भुगतान करो और सुखी जीवन का आनन्द उठाओ। रही तुम्हारी तीसरी बात तो यह तो मैं आरती से मिलकर ही उसका निर्णय कर सकूंगा। मानसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि राकेश इतनी शीघ्रता से उसकी सारी कठिनाइयों को दूर कर देगा। आज का सूरज उसके जीवन में एक नया प्रकाश लेकर आया था। वह समझ नहीं पा रही थी कि किन शब्दों में राकेश के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करे। उसकी आंखों में आंसू आ गए थे मानों ये आंसू ही उसके प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति कर रहे थे।

गौरव यह सब देख सुनकर बहुत सुन्दर किया, बहुत सुन्दर काम किया कह रहा था। यू आर ए ग्रेट मेन, देट इज व्हाई यू आर ए सक्सेसफुल परसन इन योर लाइफ। राकेश ने मानसी से कहा- मैं आज पचमढ़ी की हसीन वादियों में चिन्तन कर रहा था कि जीवन कैसा हो? मैं सोचता हूँ विसंगतियों एवं कुरीतियों का विध्वंस होकर व्यभिचार व अनीतियों की समाप्ति होना चाहिए हम अपने स्वविवेक एवं स्व चिन्तन से प्रतिदिन नूतन सृजन करें और सभी के प्रति स्नेह रखते हुए उनसे अपने प्रति प्यार की कामना रखें। जीवन में कड़ी मेहनत और कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। यह सोच हमारे दिल और आत्मा में होना चाहिए। तुम प्रभु के प्रति विश्वास और समर्पण रखना तभी सदाचार, सद्भावना और सद्बुद्धि, चिन्तन और मनन से जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर सकोगी और सुख समृद्धि वैभव व मान-सम्मान तुम्हें प्राप्त होगा। परपीड़ा को दूर करने के लिये हमेशा दोनों हाथ खुले रखना ऐसी भावना अपने मन में रखोगी तभी खुशियों के नये संसार का आगमन होगा। विपरीत परिस्थितियों का निर्गमन होकर कुरीतियां पराजित होंगी। एक नये सूर्य का उदय होगा और तुम्हारी सभी अभिलाषाएं पूरी होंगी। समय कितना भी विपरीत हो कभी मत डरना। साहस और भाग्य पर विश्वास रखना धैर्य एवं साहस से सफलता की प्रतीक्षा करना। यही तुम्हारी सफलता का आधार बनेगा। कठोर श्रम दूर दृष्टि और पक्का इरादा कठिनाइयों को समाप्त करेगा यही जीवन का क्रम होता है और यही जीवन का आधार।

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(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी
उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी
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