अमिताभ कुमार "अकेला" की 5 लघुकथाएँ

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1) अनाथ ‌गायत्री देवी के परिवार को यदि काफी बड़ा न कहा जाये तो उसे काफी छोटा भी नहीं कहा जा सकता। कुल मिलाकर दो पुत्र और एक पुत्री हैं। दोनों...

amitaabh kumaar akelaa kee 4 laghukathaaeN

1) अनाथ

‌गायत्री देवी के परिवार को यदि काफी बड़ा न कहा जाये तो उसे काफी छोटा भी नहीं कहा जा सकता। कुल मिलाकर दो पुत्र और एक पुत्री हैं। दोनों बड़े पुत्र सरकारी सेवा में हैं और घर से काफी दूर रहते हैं। सबसे छोटी पुत्री भी विवाह के पश्चात अपने पति के घर चली गयी जो सरकारी महकमे में पदाधिकारी हैं। दोनों पुत्रों का घर भी सही समय पर बसाकर गायत्री देवी ने बहुत जल्दी स्वयं को अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त कर लिया था। ये बात अलग है कि वे अभी भी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त न हो सकी थीं - फिर भी बच्चों के सुखद भविष्य और उनकी आर्थिक जरूरतों को लेकर वे पूरी तरह आश्वश्त थीं। वैसे इस संसार में इतनी भाग-दौड़ है कि व्यक्ति मृत्यु के पश्चात ही सांसारिकता से पूरी तरह मुक्त हो सकता है।


‌खुद गायत्री देवी और उनके पति भी शिक्षा विभाग में कार्यरत थे और एक प्रकार से यह एक अच्छी बात थी। दिनभर विद्यालय में बच्चों और काम के बीच समय अच्छे से कट जाता, अन्यथा घर के सूनेपन में तो समय काटना और भी कठिन था। दोनों पुत्रों का परिवार भी उन्हीं के साथ रहता था और अपनी-अपनी मजबूरियों और कार्य की व्यस्तताओं के कारण वे यदा-कदा ही घर आ पाते थे।
‌दोनों पति-पत्नी सेवा से अवकाश ग्रहण कर चुके थे। पति महोदय को तो समाज सेवा से फुर्सत ही नहीं थी। एक तरह ये ठीक भी था। उनका समय आसानी से कट जाता था। परंतु गायत्री देवी क्या करतीं........? बच्चों के बिना सूना-सूना घर काटने को दौड़ता। मन बहलाने और समय बिताने के उद्देश्य से दोनों पति-पत्नी अक्सर अपने बच्चों के पास आते-जाते रहते थे और कुछ दिनों के लिये ही सही-पोते पोतियों के सान्निध्य में भरपूर जीवन जीते थे। किन्तु घर वापिस आने के बाद फिर से वही सूनापन। घर भी उन्होंने काफी बड़ा बना रखा था और कभी-कभी इतना बड़ा घर काटने को दौड़ता। छोटे-छोटे बच्चों की कमी उन्हें काफी खलती रहती। कई बार तो अपने पति से उन्होंने कोई बच्चा गोद लेने के बारे में चर्चा भी करी - किन्तु इस कार्य को अब तक मूर्त रूप नहीं दे पाये थे। बड़ा लड़का इंदौर में बैंक नौकरी करता था और इस बार दशहरे की छुट्टियों में उन लोगों ने इंदौर जाने का प्रोग्राम तय कर रखा था।


‌नियत समय पर वे पटना से इंदौर जाने वाली ट्रेन में पूर्व से आरक्षित बर्थ पर जाकर सवार हो गये। जब हम अपने किसी से मिलने जाते हैं तो हमें रेल की सवारी काफी सुखद प्रतीत होती है। अपने प्रियजनों से मिलने की कल्पना हमें काफी रोमांचित करती है। खिड़की के पास बैठी गायत्री देवी भी इस रोमांच को महसूस कर पा रही थी। दूर तक फैले खेत और उसमें लहलहाती फसलें एक अजीब तरह की अनुभूति पैदा कर रहे थे।


‌रात्रि के करीब नौ बज रहे थे। गाड़ी लखनऊ स्टेशन पर खड़ी थी। बड़ा जंक्शन होने के नाते गाड़ी यहाँ आधे घंटे रुकती थी। इसी मध्य दोनों पति - पत्नी ने रात का भोजन खत्म किया। गायत्री देवी खिड़की के पास बैठी थीं। प्लेटफार्म पर लोग ईधर - उधर आ-जा रहे थे। इसी बीच गायत्री देवी ने देखा - लगभग तीन - चार साल का एक बच्चा वहीं प्लेटफॉर्म पर नंगे मैले-कुचैले कपड़ों में नंगे फर्श पर दुनियाँ से बेखबर सो रहा है। इस आधे घंटे में गायत्री देवी ने किसी भी व्यक्ति को उस बच्चे के आस पास आते जाते नहीं देखा। बच्चा काफी सुंदर था और उसके चेहरे पर फैली मासूमियत ने गायत्री देवी को भीतर तक करूणा से भर दिया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी अच्छे घर का बच्चा हो। उसने एक चाय वाले को पास बुलाकर इस बाबत पूछा तो उसने बताया कि पता नहीं कौन इसे यहाँ छोड़ गया है.........? शाम से ही यहाँ पड़ा है - लगता है "अनाथ" है।


‌चायवाले की बातें सुनकर गायत्री देवी अंदर तक पीड़ा से भर गयीं। उनका मन बेचैन हो उठा और वे उस बच्चे को ममतामयी नजरों से देखने लगीं। एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा जैसे वह बच्चा उनका अपना पौत्र सौम्य हो। वे भावुक हो उठीं और उनके नेत्र सजल हो आये।
‌ट्रेन ने चलने की सीटी दे दी। गायत्री देवी ने अंतिम बार बच्चे को देखा। वह अब तक सो रहा था। मन ही मन वे कुछ निर्णय कर चुकी थीं। पति महोदय जो अब तक मौन बैठे थे- सब कुछ समझ चुके थे और सहमति की मुद्रा में उन्होंने भी अपना सिर हिला दिया। एक ही झटके में गायत्री देवी उठीं और ट्रेन से बाहर आ गयीं। बच्चे के पास गयीं, उसे उठाया, सीने से लगाया और वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गयी। अब तक बच्चे की नींद भी खुल गयी थी और वह गायत्री देवी के आँचल को पकड़कर ऐसे खेल रहा था - मानो अपनी माँ की गोद में हो। गायत्री देवी की आंखों से लगातार अश्रुधारायें बह रही थीं - फिर भी चेहरे पर एक अजीब तरह की शान्ति थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था - मानो स्वयं से कह रही हो कि यह बच्चा अब अनाथ नहीं है। इसे मैंने गोद ले लिया है- आज से मैं इसकी माँ हूँ और यह मेरा बेटा। आज से मैं इसकी परवरिश करूँगी.….......


2)पाकेटमार


अभी-अभी सिनेमा घर से मैं और गौतम निकल रहे थे। सड़क पार करके हम घर जाने के लिये धीमे कदमों से सीधी सड़क पर आगे बढ़ने लगे। आपस में फिल्म की चर्चा भी कर रहे थे। शाम का धुंधलका छाने लगा था और मौसम में ठंडक घुलने लगी थी। अपने हाथ हमने कोट की जेब में डाल रखे थे।
सहसा तेजी से चलता एक व्यक्ति हमारे बगल से गौतम को धक्का देता निकल गया। गौतम ने अपनी पैंट की जेब पर हाथ डाली। उसे समझते देर नहीं लगी कि उसका पर्स गायब हो चुका है। वह लड़का अभी तक हमारी नजरों से ओझल नहीं हुआ था। गौतम ने उसके पीछे सरपट दौड़ लगा दी।
लड़का आगे-आगे और गौतम उसके पीछे-पीछे......... गिरफ्त में आने के डर से लड़का सड़क के दूसरी तरफ दौड़ा। सामने से तेज रफ्तार से आती ट्रक को देखकर मैं जब तक संभलो-संभलो चिल्लाता - तब तक लड़का ट्रक की चपेट में आ चुका था। उसे रौंदता हुआ ट्रक तेजी से भागता चला गया।
हम दौड़ते हुये उसके पास पहुंचे। उस लड़के का शरीर बिल्कुल शान्त पड़ चुका था और आसपास काफी खून फैला पड़ा था। गौतम ने झुककर उसका पाकेट टटोला और अपना पर्स उसकी जेब से निकाल लिया। फिर वह बगैर मेरी ओर देखे घर के लिये सीधे रास्ते पर बढ़ता चला गया।
तबतक आसपास काफी लोग जमा हो चुके थे। मैं संज्ञाशून्य-सा कभी उस लड़के की लाश को तो कभी गौतम को जाते हुये देख रहा था। फिर मैं विचार करने लगा - सही अर्थों में पाकेटमार कौन है - वह मृत लड़का या मेरा मित्र गौतम.........


3) थैंक्यू पापा


पत्नी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी। आनन-फानन में उसे अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। बड़ी बेचैनी में बड़ी पुत्री जो यही कोई तीन-चार साल की होगी - को गोद में लिये वह अस्पताल की लॉबी में चहलकदमी कर रहा था। दूसरी बार उसे पिता बनने का सुख जो मिलने वाला था।

ईष्ट - मित्रों ने कई बार गर्भ का लिंग परीक्षण कराने की सलाह दी ताकि समय रहते पुत्र प्राप्ति की लालसा सुनिश्चित की जा सके । कई बार निर्णय के करीब पहुँचकर भी वह इस घृणित कार्य की हिम्मत नहीं जुटा सका।
नवजात बच्चे की किलकारी से उसकी तंद्रा भंग हुयी । नर्स ने आकर पुत्री होने की सूचना दी और देखने के लिये अंदर बुलाया । काफी देर तक नवजात बच्ची का हाथ अपने हाथ में लिये वह उसे निहारता रहा । बच्ची ने उसकी एक अंगुली को कसकर पकड़ रखा था । इस दौरान उसकी नन्ही हथेली और कोमल अंगुलियों के पोर के स्पर्श से न जाने कितने अनगिनत भाव व अनकहे संप्रेषण उसके शरीर के अंदर समाते चले गये। उसे एक असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी।

इसी मध्य नवजात ने अपने नेत्र खोले - उसके चेहरे की तरफ देखा - और एक हल्की सी मुस्कान बिखेर दी । बच्ची एकटक उसे ही निहार रही थी - मानो कह रही हो - मुझे इस दुनियाँ में लाने के लिये-
         "थैंक्यू पापा"........
उसने महसूस किया  -  आँखों से कुछ गीला-गीला सा बह रहा है...........


4) पोस्टमार्टम


आठ दिनों तक आई सी यू में रखने के बाद शहर के सबसे बड़े नर्सिंग होम ने आज रचना को सरकारी अस्पताल में ले जाने के लिये छुट्टी दे दी। उसकी हालत में कोई सुधार नहीं था और अब तक वह कोमा में थी। बड़े बुझे मन से रोहित पत्नी रचना को लेकर सरकारी अस्पताल पहुंचा।

आनन-फानन में उसे इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया गया- जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। शाम तक पोस्टमार्टम की रिपोर्ट भी आ गयी। डॉक्टरों ने चार दिन पूर्व ही रचना के मौत की पुष्टि कर दी।
रोहित पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अचानक ही उसके दिमाग में बिजली कौंधी - तो क्या पिछले चार दिनों से प्राइवेट नर्सिंग होम वालों ने रचना के मृत शरीर का ईलाज.............और ईलाज के नाम पर लाखों रुपए.........

एकबारगी ऐसा लगा जैसे उसके दिमाग की नसें फटी जा रही हैं........


5) सबसे बड़ी गलती
आज घर आने में उसे काफी देर हो गयी। एक सहेली के घर बातें करते काफी वक्त निकल गया और शाम का अँधेरा घिरने लगा था। अकेली वह शहर के सुनसान रास्तों से होकर गुजर रही थी। थोड़ी ही देर में उसने महसूस किया - चार-पांच जोड़े पाँव धीमे-धीमे उसके पीछे चल रहे हैं। उसे समझते देर न लगी कि कुछ गुंडे उसका पीछा कर रहे हैं। किसी अनहोनी की आशंका के भय से वह सर पर पाँव रखकर भागीI  गुंडों ने भी उसके पीछे लम्बी दौड़ लगा दी।

भागते-भागते उसे एक पुलिस चौकी दिखी। गुंडे ठिठक कर वापिस लौट गये और वह सुरछा के लिये थाने में घुसती चली गयी।

खून से सने कपड़ों के बीच अगले दिन एक एक प्राइवेट नर्सिंग होम में उसे पानी चढ़ाया जा रहा था। परिवार जनों के साथ-साथ कुछ पत्रकार भी उसे घेरकर बैठे थे। एक पत्रकार के पूछने पर उसने बताया – कल शाम कुछ गुंडों से बचने के लिये वह पुलिस चौकी में चली गयी थी। यही उसकी “सबसे बड़ी गलती” थी।


अमिताभ कुमार "अकेला"

जलालपुर,  समस्तीपुर

नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: अमिताभ कुमार "अकेला" की 5 लघुकथाएँ
अमिताभ कुमार "अकेला" की 5 लघुकथाएँ
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