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कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - बटवारा - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी


बटवारा

नागपुर में सेठ करोड़ीमल नाम के एक बड़े उद्योगपति रहते थे। उनके पास खेती की काफी जमीन भी थी। पत्नी का देहान्त हो चुका था। अब परिवार में उनके अलावा उनके तीन पुत्र रमेश, महेश और उमेश व उनकी पत्नियां और बच्चे थे। उनका भरा-पूरा परिवार सुख से रह रहा था। सेठजी के एक मित्र थे राजीव। राजीव स्वयं बहुत बड़ी सम्पत्ति के मालिक एवं उद्योगपति भी थे। उन्होंने एक दिन सेठ जी को सलाह दी कि आपकी उम्र सत्तर के आसपास हो गई है, इसलिये आपको अपने सामने ही अपनी संपत्ति का बटवारा तीनों पुत्रों के बीच कर देना चाहिए। अभी सभी के बीच प्रेम है और यह काम आसानी से खुशी-खुशी निपट सकता है। सेठ जी को यह सुझाव अच्छा लगा। वे बोले- तुम ठीक कह रहे हो। मैं भी कुछ दिनों से यही सोच रहा था। मैं चाहता हूँ कि इस काम में तुम भी मेरा साथ दो ताकि यह कार्य बिना किसी व्यवधान के राजीखुशी से हो जाए।

मुझे सहयोग देने में कोई एतराज नहीं है लेकिन मैं मध्यस्थ के रुप में नहीं वरन एक सहयोगी और सलाहकार के रुप में ही सहयोग कर सकूंगा। किसी भी विवादास्पद स्थिति में मेरा यही प्रयास होगा कि उसे आपस में सलाह करके सुलझाया जाय।

बिलकुल ठीक है मैं भी यही चाहता हूँ। जीवन में जटिलताएं और व्यस्तताएं बढ़ती जा रही हैं। आज के वातावरण में संयुक्त परिवार का संचालन कठिन होता जा रहा है। जब समृद्धि आती है तो बटवारा जन्म लेता है। आपस में मतभेद होने के पहले ही बटवारे को कर देना चाहिए। ताकि आपस में मनभेद न हो पाये। पारिवारिक शान्ति और सद्भाव के लिये यह आवश्यक भी है।

आपस में समस्याएं हल नहीं होने पर बात न्यायालयों में जाती है जहां कीमती समय बर्बाद होता है। आपसी खटपट होने से पारिवारिक उद्योग और व्यापार भी प्रभावित होता है। यदि बटवारा सही समय पर कर दिया जाए तो पारिवारिक विवाद नहीं पनपता और पारिवारिक एकता कायम रहती है।

सेठ जी अपने तीनों पुत्रों और पुत्र वधुओं को बुलाकर बतलाया कि वे नहीं चाहते कि उनके न रहने पर उनके पुत्र आपस में लड़े-भिड़ें या दूर-दूर रहें। वे चाहते हैं कि उनमें सदैव वैसा ही प्रेम और एकता कायम रहे जैसी आज है। इसके लिये आवश्यक है कि मैं अपनी सम्पत्ति का बटवारा तुम तीनों के बीच कर दूं। इस काम में राजीव काका भी सहयोग कर रहे हैं। सभी लोग इस पर सहमत हो गये।

राजीव ने उन सब से कहा कि बटवारा मूल भूत तीन सिद्धांतों पर आधारित होता है। इसे ईमानदारी, नीतिसंगतता एवं सच्चाई पर आधारित होना चाहिए। ईश्वर को साक्षी मानकर ही चल-अचल संपत्ति बांटी जाए। किसी के भी मन में पीड़ा नहीं होना चाहिए। यदि आप लोग मेरी बातों से सहमत हों और इसे लिखित में दें तो मैं आगे आपके साथ सहयोग करके इसे करने का प्रयास करुं। वरना मेरा समय देना व्यर्थ है।

तीनों भाई अपनी सहमति लिखित रुप में दे देते हैं। जैसे ही यह बात मुनीमों और अन्य कर्मचारियों को पता होती है वैसे ही तीनों के हितैषी आपस में कानाफूसी प्रारम्भ कर देते हैं। राजीव सेठ जी से अनुरोध करता है कि आपके पास जो चल संपत्ति नगद एवं सोना, चांदी व हीरे जवाहरात आदि हों उनकी एक सूची बनाकर उसका बटवारा करके तीनों को उससे अवगत करा दें ताकि आपके बाद उसे वे आपस में उसी प्रकार बांट लें।

सेठ जी ने राजीव की बात से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि मैं अपनी सारी सम्पत्ति तो अभी बांट देना चाहता हूँ किन्तु सोना, चांदी आदि का बटवारा मैं सबसे अन्त में करुंगा। पहले बाकी अचल संपत्ति का बटवारा हो जाने दो। वे राजीव को अलग से समझाते हैं कि अभी मैं सोना-चांदी आदि का बटवारा इसलिये नहीं करना चाहता क्यों कि मैं चाहता हूँ कि वह मेरे पास ही रहे। मैं अपनी अचल सम्पत्ति बांट देना चाहता हूँ ताकि मेरे तीनों बच्चे अपने-अपने हिस्से को संभालें और अपना कामकाज स्वयं देखने लगें। सेठ जी का मुंह लगा मुनीम जो सदैव सेठ जी के साथ रहता था वह भी इन बातों को सुन रहा था।

परिवार में जो भवन आदि थे उनका विभाजन बिना किसी विवाद के हो गया और इसकी लिखा-पढ़ी भी कर ली गई। सेठ जी का सबसे छोटा बेटा उमेश काफी शान्त, सरल और संतोषी प्रवृत्ति का था। एक मुनीम था रघुनाथ जो बचपन से ही उसके प्रति बहुत स्नेह रखता था। रघुनाथ काफी समझदार, अनुभवी और दूरदर्शी था। उसने उमेश को समझाया कि आप अनावश्यक विवाद में न पड़ते हुए सारी खेती की जमीन और पांच करोड़ रूपया लेकर अलग हो जाइये। यद्यपि यह आपके हिस्से से बहुत कम है मगर इससे आप भविष्य में होने वाली बहुत सी परेशानियों और विवादों से बच जाएंगे।

उमेश को रघुनाथ पर बहुत विश्वास था। उसने उसके कहे अनुसार प्रस्ताव रख दिया। उसके प्रस्ताव को सुनकर बाकी दोनो भाई बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि अब उनके हिस्से में पहले से अधिक और महत्वपूर्ण संपत्ति रहेगी।

सेठ जी और उनके बाकी दोनों पुत्र इसे नहीं समझ सके। उस कूटनीतिज्ञ मुनीम ने बड़ी चतुराई से सारी नगद पूंजी अपने छोटे मालिक को दिलवा दी थी। इससे नगद संपत्ति तो पूरी छोटे के हिस्से में चली गई। अब शेष रह गया उद्योग, व्यापार और जेवरात तो जेवरात का बटवारा अभी सेठ जी कर नहीं रहे थे। केवल कारखानों का ही बटवारा करना बचा था। उनके दो कारखाने थे और दोनों के मूल्य में बहुत अन्तर था।

राजीव का सुझाव था कि जिसे कम मूल्य का कारखाना मिल रहा है उसे जेवरात के माध्यम से बराबर कर दिया जाए और उसके बाद जो जेवरात बचें उन्हें सेठजी अपने पास रखें। उनका बंटवारा सेठ जी के बाद हो जाएगा।

सेठ जी इसके लिये सहमत हो गए। अगले दिन बटवारे के लिये सेठ जी ने अपने सारे जेवरात आदि देखने के लिये अपनी तिजोरी खोली तो उनके होश उड़ गए। उनके सारे जेवरात उस तिजोरी से गायब थे। पूरे घर में कोहराम मच गया। सभी एक दूसरे पर अविश्वास और संदेह कर रहे थे। सेठ जी को बहुत गहरा सदमा लगा था। इस सदमे में उन्हें हृदयाघात हो गया। सभी ने बहुत प्रयास किया किन्तु उन्हें नहीं बचाया जा सका। कारखानों का बटवारा खटाई में पड़ गया।

इस स्थिति में दोनों ही भाइयों ने कारखानों की ओर ध्यान देना बन्द कर दिया। कारखानों के अधिकारियों और कर्मचारियों को देखने सुनने वाला कोई नहीं रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही महिनों में लाभ पर चलने वाले वे कारखाने घाटे की स्थिति में आ गये। इससे भी दोनों भाइयों की आंख नहीं खुली। वे कारखानों के बटवारे के विवाद में लगे रहे। धीरे-धीरे स्थिति यह बनी कि घर के आवश्यक खर्चों की पूर्ति भी कठिन होने लगी। ऐसी स्थिति में रघुनाथ ने उन दोनों भाइयों से संपर्क किया। उसने उन्हें सुझाव दिया कि आपका कारखाना घाटे में चल रहा है। आप उसे हमें बेच दीजिए और हमसे नगद रकम ले लीजिये।

रमेश और महेश उसके लिये सहमत हो गये। रघुनाथ इसके लिये उमेश से सहमति लेकर उनसे चर्चा करता है। उन कारखानों का तत्काल में कोई खरीददार भी नहीं था। परिणाम यह हुआ कि रघुनाथ कारखानों को लगभग आधी कीमत पर खरीदना तय कर लेता है। रमेश और महेश भी इसके लिये सहमत हो जाते हैं।

सब कुछ तय हो जाने पर रघुनाथ जब उमेश को इसके विषय में बतलाता है तो उमेश कहता है-

यह ठीक है कि इस समय मेरे दोनों भाई परिस्थिति से मजबूर होकर आधी कीमत पर कारखाने बेचने के लिये तैयार हो गये हैं किन्तु मैं उनकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहता। मैं चाहता हूँ कि कारखानों का जो उचित मूल्य है वह मैं अपने भाइयों को दूं।

इसके लिये वह अपने भाइयों से मिलता है और उनसे बात करता है। उन्हें अपनी इच्छा बतलाता है और कहता है कि इस समय वह दोनों कारखानों का पूरा मूल्य देने की स्थिति में नहीं है। वह उन्हें इस बात के लिये सहमत कर लेता है कि एक भाई को कारखाने के बदले नगद रकम देगा और दूसरे भाई को कारखाने के बदले खेती की जमीन देगा। उसके भाई भी इसके लिये सहमत हो जाते हैं। इस प्रकार यह बटवारा सम्पन्न हो जाता है।

सेठ जी के जो जेवर गायब हो गए थे वे उनके विश्वास पात्र मुनीम ने ही गायब किये थे। वह उन्हें एक साथ बाजार में नहीं बेच सकता था। वह उन्हें एक-एक कर धीरे-धीरे बाजार में बेचकर नगद रकम प्राप्त कर रहा था। उसने समाज को यह बताने के लिये कि धन कहां से आया है। शेयर मार्केट में पैसा लगाना प्रारम्भ कर दिया। वह अचानक धनलाभ बतलाने के चक्कर में जुआ भी खेलने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उसमें शराबखोरी व वेश्यावृत्ति की भी लत लग गई। इस सबने उसके पैसों को निगलना प्रारम्भ कर दिया।

इन प्रवृत्तियों के कारण उसके परिवार के अन्य सदस्यों में भी अनेक दुर्गुण आ गए। पूरा घर पैसों की बर्बादी में लग गया। कुछ ही समय में स्थिति यह बनी कि चोरी के सारे जेवर आदि तो चले ही गए उसने अपनी मेहनत से जो धन कमाया था वह भी चला गया। उसका पूरा परिवार बर्बाद हो गया।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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