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मारवाड़ी एकांकी : “सांचौ धरम” लिखारै रमेश जोशी उर्फ़ “छोटक बाबू”

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अेकांकी “सांचौ धरम”              

   लिखारै रमेश जोशी उर्फ़ “छोटक बाबू”

   किरदारां री ओळखांण

पुरुसोतमसा – दिल्ली स्हेर रा निवासी, अहिल्या बाई – पुरुसोतमसा री लुगाई, संभाजी – छत्रपति शिवाजी रा बेटा, दिलावर खां – बादसा औरंगजेब री पलटन रौ खुफिया सरदार, रहमान बेग – दिलावर खां रै हेटै कांम करण्यौ ओहदेदार।

पैलौ मंज़र

ठौड़ – दिल्ली स्हेर में पुरसोतमसा रौ मकांन, बख़त – दिण रै करीब इग्यारह बजिया रौ बख़त।

[मंच माथै च्यानणौ हुवै, पुरसोतमसा रौ मकांन साम्ही आवै। इण मकांन रौ अेक माळियौ दीसै। इण माळिया री भींता साफ़-सुथरी पुत्योड़ी दीसै। इण माळिया री सगळी बारियां गळी कनी खुल्योड़ी दीसै। अेक दरुज़ा कनै अेक नाळ हेटै उतरती दीसै, जिकी ठेठ गळी रै मायं खुल्या करै। इण माळिया री छत माथै अेक कांच रौ झूमर लटकतौ दीस रियौ है। आधा आंगणा माथै बिछायत करियोड़ी दीसै। पुरोसतमसा हमार इण कमरा में टहल रिया है, अै करीब साठ सालां रा बूढ़ा मिनख़ है। अै सांवला रंग रा मंझला कद रा आकर्सक छवि रा ब्राह्मण पंडितजी महाराज है। इणां रा ज़्यादातर माथा रा बाल, धवळा हुयग्या है। अै बाल, मराठी कट सूं कटियोड़ा दीसै। इयांरा मुण्डो घणी मुंछ्या हूवण रै कारण रौबिलौ दीस रियौ है। खांधा माथै लाल ऊपरणो धरियोड़ो है। इयां रा ज़ब्हा माथै, धवळा चन्दन रौ तिलक काड्योड़ो है। पुरूसोतमसा री पत्नि अहिल्या बाई है, जिका करीब ५५ सालां आ बुजुरग विदुसी मोट्यार लुगाई है। हमार इण बख़त अै मराठी चारखाना वाळी साड़ी पैरयोड़ा है, इण साथै इणीज़ रंग री चोली पैरयोड़ी है। सोना रा गैणा-गांठा पैरियां पछै तौ, अै घणा ई फुठरा दीस रिया है। हमार इण बख़त, अै आपरा घरधणी पुरसोतमसा सूं बातां कर रिया है।]

अहिल्या बाई – हमार भी हमार भी, वै इज़ हाल है आपरा ? की फ़ैसलौ ल्यौ कोनी कांई ?

पुरासोतमसा – [ऊबा रैय नै, कैवै] – भागवान औ कांई साधारण सुवाल कोनी है, जिकौ इन्नौ फटाक सूं हल काड सकां।

अहिल्या बाई – थाणै जैड़ा सतवादी सारुं औ सुवाल असाधारण नहीं हूवणौ चाहिजै सा। आप आखी ज़िंदगी सच्चाई रै मार्ग माथै रैया हौ, आप सारुं अैड़ा असाधारण सुवाला रौ निराकरण कोई बड़ी बात कोनी है। अेक आ बात भी सोच लौ सा, क जिकौ मिनख़ झूठ रौ सहारौ ल्या करै...वीनै साम्ही केई सुवाल पैदा हुय जाया करै।

पुरासोतमसा – [हेटै बैठ नै, कैवै] – कांई फरमाया, भागवान ? कांई सा, मैं कांई झूठ रौ सहारौ ल्या करूं ?  

अहिल्या बाई – पछै आप कर कांई रिया हौ, भगवन ? छत्रपति शिवाजी ख़ुद आपरा छोरा संभाजी नै, आप कनै छोड़’र गिया कै नहीं ? कांई आ बात सांच है, कै नहीं ? अबै औ जिकौ छोरो थाणै सरंक्षण में अठै है, वौ संभाजी है अर आप कीकर बोल रिया हौ क औ आपरौ भाणजौ है ? औ आपरौ इण तरै बोलणौ सांच कीकर हुय सकै, भगवन ?

पुरूसोतमसा – भागवान, आप म्हारी बात नै सावल समझी कोनी हौ। अेक आ बात थाणै कैय दूं, समझाय नै। क, शिवाजी महाराज आपरा छोरा नै संभाजी री हैसियत सूं अठै कोनी छोड्यो...वै इन्नै म्हारै भाणजा री हैसियत सूं, इनै अठै छोड़’र गिया है। आ जग री रीत है, के मामौ वौ रिस्तौ हुया करै...जिकौ, आपरा भाणजा री रुखाली जी-जान लगा नै किया करै। अबै म्हारौ औ कैवणौ, साधारण सांच सूं बड़ौ सांच है।

अहिल्या बाई – थाणी आ सांच बोलण री आदत, अबै दिल्ली रै रैवासिया बिचै घणी चावी हुयग्यी है। इण वास्तै अै यवन भी भळै, आपरौ घणौ आदर करिया करै सा। आपांणा ब्याव नै व्या नै बीतग्या है, करीब चालीस साल। पण म्हैं अजै तांई आपरै मुंडा सूं कोई झूठी बात तौ कांई, झूठा सबद बोलता भी कोनी सुण्या। अबै आप इत्ता बड़ा झूठ नै, साधारण सांच सूं बड़ौ सांच कीकर कैय रिया हौ सा ?

पुरूसोतमसा – भागवान, आपांणा सास्त्रां मअें सांच अर झूठ जी व्याख्या बौत बारीकी सूं कीधी है। कई वळा, सांच री ठौड़ झूठ नै ऊचौ इस्थान मिळ्यौ है। ज़िंदगी में धरम सूं बड़ी कोई चीज़ नहीं है, अगर धरम री रुखाली झूठ सूं हूवती हुवै सा...तौ वौ बोल्योड़ो झूठ, सांच सूं बड़ौ हुय जाया करै।

अहिल्या बाई – [इचरच करतां कैवै] – धरम री रुखाली..? हमै तौ भगवन, आप और बड़ी बात कैय दीवी। संभाजी नै थे थाणौ भाणजौ दीखावतां, धरम री रुखाली कर सकोला कांई ? औ खोजबलियो दिलावर कैय नै गियौ है क ‘जद आप दोणू नै वौ गधेड़ो, अेक ई थाळी जीमतौ वौ नहीं दैख लेवेला, औ आपरौ मामू-भाणजा रौ इण रिस्ता नै सांच मानेला कोनी। पण ज्यूं ई आप, इण रिस्ता रौ प्रमाण दे देवोला...ज़रै वौ ख़ुद मान जावेला, क आप उण रा मामा हौ अर वौ छोरो आपरौ भाणजौ है..अबै, समझिया सा ?’ अबै आप बामण हुय नै, थे कीकर अेक ई थाळी मअें उण परायी न्यात रा छोरा साथै बैठ नै भोजन अरोगोला ?

पुरुसोतमसा – [आंती आय नै, कैवै] – सेवठ थे कैवणी कांई चावौ, भागवान ?

अहिल्या बाई – [ठीमर सुर मअें, कैवता जावै] – बात आ है सा, क औ छोरो बामण कोनी है। औ है सा, छत्री। इन्नै आपरै साथै भेळा बैठां नै आप भोजन अरोगोला, तौ थाणौ धरम भिष्ठ हुय जावेला। ई तरै, आप कीकर धरम री रुखाली कर सकोला ?

पुरूसोतमसा – [ऊठ नै पाछौ कमरा में घूमणौ चालू करै, अर साथै-साथै बोलता जावै] – भागवान, औ इज़ सुवाल म्हनै कद कौ परेस्यान कर राख्यौ है सा। ज़िंदगी-भर जिण धरम नै म्हैं पालतौ आयौ हूं सा, विनै थोऊं बत्तौ कुण जाण सकै..अरे नहीं, नहीं। औ म्हारौ भगवान तौ थोऊं बत्तौ समझै सा।

[पुरूसोतमसा पाछा बिराज जावै, अर पछै अहिल्या बाई नै कैवता जावै क..]

पुरूसोतमसा – [हेटै बैठता थकां, कैवै] – दैखौ भागवान, म्हैं त्रिकाल संध्या, हवन, तरपण आद सगळा बामणा रा नित करम करतौ आ रियौ हूं। सौच-असौच रौ पूरौ विवेक राख्यौ हूं, भक्ष्या-भक्ष्य री तरफ़ घणौ ध्यान राख्यौ हूं। अबै इण चौथापण में, किणी अबामण रै साथै अेक ई थाळी मअें बैठ नै कीकर भोजन अरोगूंला ..? अबै औ सुवाल म्हनै घणौ परेस्यान कर राख्यौ है सा, अबै म्हूं करूं कांई ?

[पाछौ घूमता-घूमता कैवता जावै, क..]

पुरूसोतमसा – [पाछौ घूमता-घूमता कैवता जावै, क..] – है भगवान, थूं अबै इण म्हारा चौथापण में म्हाऊं किसौ इमतिहान लेवणी चावै ? अबै थूं म्हनै किणी अबामण रै साथै अेक ई थाळी मअें भोजन अरोगा नै, कांई दैखणी चावै ? थूं क्यूं म्हारौ धरम भिष्ठ करवा रियौ है, म्हारा बाप ?

अहिल्या बाई – [हिदायत देवता, बोलै क..] – अबै सावळ बैठ नै सोच लिजौ सा क अगर थे इण छोरा रै साथै अेक ई थाळी मअें भेळौ बैठ नै भोजन अरोगल्यौ तौ सांच कैवूं, क ‘अै थाणा न्यात रा पञ्च थाणै अेकला नै ई न्यात सूं बारै नहीं काडेला, अै माता रा दीना पूरा कुटुंब नै न्यात बारै कर देवेला।’

पुरूसोतमसा – [फिक़र करतां, बोलै] – पछै, भागवान..?

अहिल्या बाई – [गुस्सा करतां, बोलै] – म्हारी मां रौ माथौ। [पाछी संभळ नै] अरे नहीं सा, थाणी मां रौ माथौ...म्हूं औ कांई कैयद्यौ सा ? [खांधा माथै ढळक नै, आयोड़ा पल्लू सूं पाछौ माथौ ढकै अर पछै औ कैवै] म्हूं औ कैय रयी हूं सा क थाणी छोरियां ब्याव-जोग हुयग्यी है, इण छोरियां रौ ब्याव बामणा रै कुलीन कुटुंब में हुवेला कोनी। इण साथै थाणै पोतरा री जुनाई भळै अै न्यात रा पञ्च घालण देवेला कोनी, अर पोतरा री सगाई किणी बामणा रै कुलीन कुटुंब करण री बात तौ आप सोचौ ई मत।

[पुरूसोतमसा अहिल्या बाई रै कनी खिसकै, अर पछै गोडा सूं गोडो अड़ा नै बैठता थकां कैवता जावै।]

पुरूसोतमसा - [पुरूसोतमसा अहिल्या बाई रै, गोडा सूं गोडो अड़ा नै बैठता थकां कैवै] – ज़रै भली आदमण, आप बोलौ क अबै म्हूं कांई करूं ? 

अहिल्या बाई – म्हारौ तौ औ कैवणौ है, क ‘जिण सांच रौ आसरौ ल्यां अजै तांई आ पूरी उमर काड दी हौ...वीनौ अबै छेह्ली पांण साथ छोड़णौ, चोखौ कोनी।’ आप जाणौ सा, के ‘औरंगजेब जैड़ा बादसा रै राज़ में रैवता, वो भी अेक हिन्दू बामण हूवता...बस, आप अेक सांच रै इज़ आसरा आपरौ औ छेह्लौ जीवन सावळ बिताय सकौ सा। इण बात रौ आपनै घणौ तुज़ुरबौ हुय चुकौ सा। हमै आप धरम री टेडी-मेडी व्याख्या में फंस नै, आप अर आपरौ कुटुंब रौ अहित मती करौ सा।

पुरूसोतमसा – ज़रै मैं औ कैय दूं क ‘औ छोरो शिवाजी रौ बेटौ सम्भाजी है, अर औ म्हारौ भाणजौ कोनी है। मिठाई री टोकरी में छिप नै जावती वळा शिवाजी, आपरा इण छोरा संभाजी नै..म्हारी सुपरदगी में, म्हनै संभळा नै गिया हा।’

अहिल्या बाई – सच्ची बात है सा, आपनै सच्ची बात कैवतां पेसो-पेस में पड़नी कांई ज़रूत ?

पुरूसोतमसा – आप जाणौ हौ, इनै आगै कंइ हुवेला ?

अहिल्या बाई – अरे सा, की भी हुवौ सा..इण बारै में आपनै ज़ादा सोचण री कांई ज़रूत ? इण पैला आप आ बात नहीं कैवता क ‘मिनख़ नै सांच बोलतां पांण औ नहीं सोचणौ चाहिजै सा, क आगै कांई हुवेला ?’ आपनै तौ निडर हुय नै सांच बोलणौ चाहिजै सा, भगवन।

[पुरूसोतमसा नै नीची नाड़ घाल नै बैठ जावै, थोड़ी ताळ सायंती बणी रैवै। अर पछै मुंडौ ऊचौ कर नै कैवता जावै।]

पुरूसोतमसा – [मुंडौ ऊचौ कर नै, बोलै] – नहीं, नहीं। औ कदेई कोनी हुय सकै क ‘मैं थाणै कैयां ज्यूं, बोलतौ जाऊं ?’ औ छत्रपति शिवाजी रै साथै, विस्वासघात हुवेला। अैड़ौ घोर पाप हूवण रौ, अबै नांम ई मती लेवौ सा। अैड़ौ दुस्करम, अबै नहीं हुय सकै।

अहिल्या बाई – पण दूजी तरफ़ आप औ दैखौ सा, के आप सांच रौ साथ छोड़ता जा रिया हौ सा। अबामण रै साथै जीमतां ई आपरौ धरम भिष्ठ हुय जावेला, अर थाणा न्यात रा पञ्च थाणै अर थाणा कुटुंब नै न्यात सूं बारै काड देई। पूरौ कुटुंब नस्ट हुय जावेला, खाली थाणा करमां सूं।

[गली रै नुक्कड़ माथै बाल गुपाल रौ मिन्दर है, उठै भगत बैठा-बैठा भजन गा रिया है ‘माखन भोग लगाओ, म्हारा स्याम..!’ आ अवाज़ पुरूसोतमसा रै कांना में बड़े, औ भजन सुणतां-सुणतां वै कमरा री दीवाल माथै आपरी मीट न्हाखै...उठै, वै कांई दैखै ? क, उठै बाल गुपाल रौ चितराम उकेरियोड़ो है। उण मांय भगवान श्री कृष्ण बालक रूप में ग्वाल-बालकां रै साथै बैठ नै माखन अरोग रिया है। औ चितराम दैखतां ई पुरूसोतमसा रै दिमाग़ में औ विचार कौंध जावै, क जठै खुद भगवान श्री कृष्ण बाल रूप मअें, माखन ग्वाल बालकां रै साथै अरोगता जा रिया है..पछै आपां क्यूं संभाजी जैड़ा बालक रै साथै, छूआ-छूत रौ बरताव कर रिया हां ?  जिण श्रीकृष्ण नै आपां भगवान मान’र पूजता आ रिया हां, अर पछै आपां उणां रा उसूलां रौ बहिस्कार क्यूं कर रिया हां ? बालक तौ हुया करै, भगवान रौ रूप..पछै संभाजी जैड़ा बालक रै साथै औ ग़लत बौवार क्यूं करां ? कांई व्यारौ औ बौवार, धरम रै खिलाफ़ नहीं है ? ई तरै आपां संभाजी साथै भेळै बैठ नै जीम लां तौ वौ कांम, धरम रै खिलाफ़ नहीं हुय नै औ करम धरम रौ कांम मानीजेला। अै न्यात रा पञ्च भळै आपरै सवारथ खातर, अैड़ा दोवड़ा बौवार अपनावता मानव-प्रेम रौ गळौ घोंटता जा रिया है..पण अबै म्हूं उणां रै आगै नहीं झुक नै धरम रा मार्ग माथै चालतौ कोनी डिगूंला। ई तरै झूठ बोलिया सूं, किणी इंसान री जान बचती हुवै...वौ करम धरम रौ इज़ हुया करै, किणी हालत मे औ करम अधरम रौ कांम नहीं है। अबै आपांणौ औ इज़ फ़रज़ है क ‘आपां झट बालक रूप संभाजी नै हेलौ पाड़ नै, झट राज-भोग री तयारी कर लां।’ मनड़ा में विचारा रौ मंथन कर नै, पुरूसोतमसा अहिल्या बाई नै कैवण ढूका..]

पुरूसोतमसा – दैखौ सा। अै संभाजी है, बालक रूप। औ बलाकां रौ रूप, साक्षात् श्री कृष्ण रौ रूप है। आपांणा अहोभाग्य है, भगवान श्रीकृष्ण संभाजी ख़ुद संभाजी जस्या बालक रूप में आपाणै घरै अतिथि बण नै पधारिया है। पधारो भागवान, चालो रसोड़ा मांय...औरुं करौ तयारी, राज भोग री।

[थोड़ी ताळ में, मंच माथै अन्धारौ फैल जावै।]

दूसरौ मंज़र

ठौड़ – दिल्ली री अेक गळी

बख़त – दिन रै दो बजिया रौ बख़त

[गळी रौ मंज़र पैली वाळौ इज़ है, आ वा इज़ सांकड़ी गळी है। केई मकांन दीसता जा रिया है, गळी रै नुक्कड़ माथै दो यवन बातां करता जा रिया है। इण दोणू में अेक रौ नांम है दिलावर खां, अर दूजोड़ा रौ नांम है रहमान बेग। अै दोणू जणा सांवला रंग रा अधबूढ़ा मिनख़ है, उम्र में अै करीब ४०-४५ रै बीच रा अधेड़ है। इण बख़त दिलावर खां अर रहमान बेग, सैनिक वेस-भूसा में है। दिलावर खां रै चेहरा माथै घणी दाढ़ी है, पण रहमान बेग ना तौ राखै दाढ़ी अर नहीं राखै मूंछा। अबै दिलावर खां फ़िकर करतां, रहमान बेग नै कैवतौ जा रियौ है..]

दिलावर खां – दैख भाई, रहमान बेग। अै पंडित पुरूसोतमसा झूठ बोल ई नहीं सकै, म्हनै पूरौ भरोसौ है।

रहमान बेग – [नाक में आंगळी घाल नै, खाज खिणतौ बोलै] – हुकूम, आपरी बात सांच हुय सकै। दिल्ली रा सगळा रैवासी, पंडितजी रै सत्य वचन माथै भरोसौ करिया करै सा।

दिलावर खां – पण बात आ है, औ पंडितजी रौ भाणजौ म्हनै दक्खनी विरेहमन लागै कोनी। सेवठ, औ है कुण ?

रहमान बेग – [आंगळी माथै आयोड़ौ मैल, आपरै घाबा सूं पोंछतौ बोलै] – औ मालुम करणौ बौत मुस्किल है सा, के कुण विरेहमन है अर कुण विरहन कोनी है। आ बात सूरत दैख्या सूं मालुम कोनी पड़ै, कुण कांई है ?

दिलावर खां – [दाढ़ी माथै हाथ फ़ेरतौ, कैवतौ जावै] – अैड़ी कोई बड़ी बात कोनी है रे, अबार मालुम पड़ जाई। नाई नै कैवां, क ‘बाल कित्ता बढ़िया ?’ वौ जवाब देवै क ‘साम्ही पड़ै ज़रै आप गिण लिजौ, भाया।’

[रहमान बेग, अबै कांई कैवै ? ज़रै वौ बिचारौ, दिलावर खां रा चेहरा माथै आवता-जावता भावा नै पढ़तौ जावै। थोड़ी वळा पछै, वौ कैवण लागै क..]

रहमान बेग – अरे मालिक, कठेई आप पंडितजी री बात माथै भरोसौ कर नै मामला नै अधरझूल में तौ नहीं छोड़द्यौ ? आप पैली व्यानै बड़ौ सबूत पेस करण रौ कैयौ हौ, कांई आ बात आप भूलग्या...कांई ? आप तौ इण बात माथै अड़योड़ा रैवौ सा क ‘अगर अै अेक ई थाळी मअें इण छोरा रै साथै भेळौ बैठ नै भोजन अरोग लेवै, तौ औ छोरौ इयांरौ भाणजौ मानीजेला।’ नहीं तौ भोड़ा नै पकड़ नै, हाज़िर कर दीजौ सा बादसा रै कनै।’

दिलावर खां – हां भाई, रहमान बेग। बात तौ थारी तगड़ी है। अै लोग धरम रै मामला में अैड़ा कट्टर है, के इयांरौ माथौ काट दौ सा..पण अै कदेई परायी न्यात वाळां रै साथै भेळा बैठ नै, धरम ख़राब करेला कोनी।

रहमान बेग – [कांन में आंगळी घालतौ, बोलै] – आ बात आपरी, सौ फीसदी सांच है सा।

दिलावर खां – [आभा में दैखतां बोलै] – लौ दैखौ सा, दोपारा हुयग्यी। अबै पंडितजी रै भोजन करण रौ, बखत हुयग्यौ है। अबै वै पूजा-पाठ सूं, निवड़ग्या हुवेला ? चालो व्यारै घरै, भोजन री तयारी कर ली हुवेला ?

रहमान बेग – हां चालौ सा, अबै जैज़ नहीं करणी।

[दोणू जणा जावता दीसै, मंच माथै अन्धारौ फैल जावै।]

तीसरौ मंज़र

ठौड़ – पुरूसोतमसा रै घर रौ माळीयौ

बख़त – दोपारा भोजन करण रौ बख़त

[औ मन्ज़र पैली जेड़ौ इज़ है, पुरूसोतमसा अर अहिल्या बाई बिछायत माथै बिराज्या है। हमार अहिल्या बाई रौ मुखारबिंद खिल्योड़ो है। पण पुरूसोतमसा फ़िकर करता, नीची नाड़ घाल नै बैठा है। अबै अहिल्या बाई ऊपर दैखइया है, भगवान नै धनवाद देवतां थकां वै आगै कैवता जा रिया है।]

अहिल्या बाई – [ऊपर री तरफ़ दैखतां थकां, कैवता जावै] – है म्हारा बिट्ठल देव। आपनै घणौ  -घणौ धनवाद। अप छेह्ली पांण, सांच री जीत करवा दीवी। [पुरूसोतमसा नै, कैवता थकां] सुबै रौ भूलौ-भटकौ मिनख़ सिंझ्या तांई घरै पूग जावै तौ वौ मिनख़ भूलौ कोनी मानीजै। पेसो-पेस में पड़ नै आप इक वळा झूठ बोलग्या, पण अजै तांई जैज़ हुई कोनी..अजै तांई बख़त है। भगवन, कांई करां अबै ? औ खोजबलियौ दिलावर, आवणवळौ है...

पुरूसोतमसा – वौ आवणवळौ है, तौ मैं कांई करूं ?

अहिल्या बाई – वीनै आवतां ई, वीनै साम्ही सारी सांची बात आप धर दीजौ सा। इण सूं आप, झूठ बोलण रा पाप सूं मुगत हू जावोला। जीवन-भर जिण सांच रै आसरा रैया हौ आप, अबै जीवण रौ छेह्लौ पहुड़ीयौ चढ़तां औ झूठ बोलणौ चोखौ कोनी।

[पुरूसोतमसा इयांरी बात रौ कोई जवाब नहीं देवै। अबै थोड़ी ताळ सरणाटौ छायोड़ो दीसै। पछै, अहिल्या बाई पुरूसोतमसा रौ मुंडौ भाळतां कैवण लागै ..]

अहिल्या बाई – [पुरूसोतमसा नै भाळतां, कैवै] – दैख लौ सा, इक वळा आप झूठ बोल्या हा..उण सूं, कैड़ी आफ़त आयी ? झूठ तौ हरमेस झूठ इज़ रैया करै सा, भलै वीनै सांच बणावण में कित्ता ई झूठ बोलणा पड़ै। कित्ती पांण, वीनै सांच प्रमाणित करण सारुं झूठी बातां करणी पड़ै । आप जैड़ा सतवादी पुरुस नै, प्रमाण देवण री कांई ज़रूत ? पण अठै तौ आपनै महाभयंकर प्रमाण देवणौ पड़ रियौ है सा ? आपरै सारुं अबामण रै साथै भेलौ बैठ नै भोजन करणौ, कांई संभव है?

[पुरूसोतमसा तौ पछै भी की बोलता नज़र नहीं आवै, वै तौ अहिल्या बाई रौ मुंडौ दैखता रैय जावै। वठी नै, अहिल्या बाई भी उणा रौ मुंडौ दैखता रैवै। थोड़ी ताळ तांई सायंती छायोड़ी रैवै, अर पछै अहिल्या बाई आपी ख़ुद ई बोलण लाग जावै।]

अहिल्या बाई – आप सांच बोलण सारुं तयार नहीं हूवता, तौ जीवन-भर कीधोड़ा पूजा-अरचन आपौ-आप ख़तम हू जावता सा। जीवन-भर रा नियम-व्रत भंग हू जावता। आप कांई जाणौ, भागवान ? नहीं जाणै, कित्ता जळ्मां रा पुण्य अरजित कीधोड़ा हा, ज़रै आपनै इण कुलीन बामण कुल में जळ्म मिळ्यौ ? इण कुल में जळ्म लिया पछै आप कदेई संध्या, तरपण, हवन आद बामण रा करम छोड़ीया कोनी।

[इत्तौ कैयां पछै, अहिल्या बाई लम्बी-लम्बी सांसा खावण लागग्या। सांसा सामान्य हुया पछै, आप कैवण लागा।]

अहिल्या बाई – भगवन, आप कदेई किन्नी अबामण रौ छूयोड़ो पांणी सेवन कीधौ कोनी। ना कदेई आप ख़ुद भिस्ठ हुया, अर ना थाणा परिवार नै भिस्ठ हूवण दीधौ। नीतर कुल री छोरियां कुंवारी रैय जावती, अर आपांणी संतान अबामण हू जावती। [थोड़ी ताळ पछै, आगै कैवता जावै] अगर यूं हू जावतौ तौ...यूं कीकर हू जावतौ सा, कुण हूवण देवता ?

[अहिल्या बाई समझावता-समझावता, कैन्ना काया हुवै ? वै तौ कमरा मांय घूमता-घूमता, कैवता जावै...]

अहिल्या बाई – [कमरा मांय घूमता-घूमता, कैवता जावै] – पछै औ झूठ बोलणौ आपांणै सारुं नहीं, बल्कि पराया मिनख़ां सारुं आप झूठ बोलोला ?

[पुरूसोतमसा ऊबा हुय नै, अहिल्या बाई रौ मुंडौ दैखण लागग्या। अहिल्या बाई भी ऊबी जावै, अर पछै व्यारै कनै ऊब नै आपी बोलण ढूकै।]

अहिल्या बाई – हां सा। इन्नौ, कांई मुतळब ? संभाजी अर शिवाजी आपांणै कांई लागै सा, इयांऊ आपांनै कांई मुतळब ? आपांणी न्यात रा नहीं, अर न अै आपांणी इण दिल्ली रा रैवासी है...पछै क्यूं बण रिया हौ आप, म्हूं लाडा री भुवा ? क्यूं इण लोगां सारुं औ लोक बिगाड़ रिया हौ आप, अर साथै बिगाड़ रिया हौ आप..आपरौ परलोक।

[थोड़ा ढब नै, वै आगै कैवता जावै क...]

अहिल्या बाई – [थोड़ा ढब नै, आगै कैवता जावै] – आप आ बात सोचौ सा, अगर इण पापी औरंगजेब नै ठाह पड़गी तौ आपनै केई मुसीबतां दैखणी पड़ेला। वडेरा, कांई कैया करै सा ? जिन्नी खावणी बाजरी, उण सासक री बजावणी हाज़री..औ इज़, जग रौ उसूल है। दूजी आ बात भी आप दैखौ, भगवन..

पुरूसोतमसा – भागवान, अबै कांई दैखणो बाकी रैयग्यौ सा ?

अहिल्या बाई – अगर औ औरंगजेब आपां माथै तुष्टमान हुय जावै, तौ औ थाणै ज़रूर किन्नी सूबे रौ सूबेदार बणा देवेला कै बणा देवेला ऊचौ ओहदेदार। अगर थानै औ मंज़ूर नहीं हुवै, तौ औ पद थाणा छोरा नै परो मिळी। आपरौ कुटुंब खुसहाल हुय जावेला, औरुं इन्नै अलावा आपनै कांई चाहिजै सा ?

पुरूसोतमसा – औरुं कांई बोलणौ, आपनै ?

अहिल्या बाई – आ बात समझा रयी हूं सा, क आप इण छोरा रै भेळा बैठग्या तौ औ धरम तौ भिस्ठ हुवेला इज़...अर बाद में औ झूठ पकड़ में आइग्यौ, तौ औ अत्याचारी औरंगजेब थाणी अर थाणै कुटुंब री कांई दुरदसा कर देवेला ? उण री कल्पना भी, आप नहीं कर सकोला।

[पुरूसोतमसा की नहीं बोलता कमरा मांय पाछौ घूमणौ चालू कर देवै, अहिल्या बाई भी व्यारै साथै साथै चालता रैवै । थोड़ी ताळ तांई सायंती बणी रैवै, पछै अहिल्या बाई नै बिना बोल्या असरीजै कोनी। झट बोलण रौ भोम्पू चालू कर देवै, अर पुरूसोतमसा नै कैवण लाग जावै।]

अहिल्या बाई – [थोडा ढब नै, कैवता जावै] – ठीक...ठीक, सही बख़त भगवान थानै सुबुद्धि दे दे भगवान, तौ म्हैं गंगा-मथुरा न्हायी। अबै सांच कैवण रै अलावा, थाणै कनै कोई दूजौ फैसलौ है कांई ? म्हारौ कैयौ मान लौ सा, आपरौ परलोक परो सुधर जाई। इण संभाजी मराठा रै भेळा बैठ्या सूं जिकौ आपरौ धरम भिस्ठ हूवतौ हौ, वीनू थे बच जाओला। औ लोक बच जावेला, अर राज रौ भय भी रैवेला कोनी। फेरूं आपनै कैय दूं, सम्भाजी नै पावतां ई औ औरंगजेब राज़ी हुय नै आपने मनसबदारी दे देवेला।

[पण अबै अहिल्या बाई री बातां, पुरूसोतमसा नै कीकर चोखी लागै ? वै ख़ारी-ख़ारी नज़रा सूं व्यानै दैखता, आगै-आगै चालता ई जा रिया है। अठै अहिल्या बाई नै उणांरी मन री दसा जाण नै, अबै कांई करणौ ? वै तौ, आपरी भागवत बांचणी छोड़े ई कोनी। वै तौ, लगा-लग बोलता ई जा रिया है।]

अहिल्या बाई – दैख लौ सा, अगर थे मनसबदारी मंजूर नहीं करी तौ आ मनसबडारी थाणा छोरा नै मिळ जाई, अर पछै आपरी छोरियां रा रिस्ता ऊचा-ऊचा ख़ानदान सू आवेला। बादसा री किरपा आप माथै हुयग्यी, तौ आपरै सारुं कोई चीज़ दुरलभ रैवेला कोनी। [थोडा ढब नै, आगै कैवता जावै] औ सब, पछै आप किन्नै सारुं करोला ? उणीज़ सांच सारुं, जिन्नै थे आजतांई निभावता आया हौ सा।

[नेपथ्य में ज़ोर-ज़ोर सू हेला पाड़वा री अवाज़ सुणीजै, घर रै बारै कोई मिनख़ ‘पंडितजी, पंडितजी’ हाका पाड़तौ जा रियौ है।]

अहिल्या बाई – [जल्दी-जल्दी, बोलै] – लौ सा। पधाराग्या सा, दिलावर खां साब। हमै आप उणां नै सगळी बात साच-सांच बता दीजौ सा। ताकि...

[बारी सूं मुंडौ बारै काड नै, हेटै ऊबा मिनख़ नै ज़ोर सूं हेलो पाड़ नै कैवता जावै, क..]

पुरूसोतमसा – [बारी सूं मुंडौ बारै काड नै हेलो पाड़तां, कैवै] – अरे खां साब, पधारग्या कांई ? नाळ चढ़ नै, आवोरा ऊपर।

[दिलावर खां अर रहमान बेग नाळ चढ़ नै ऊपर आवै, दरुज़ा कनै जूत्ता उतार नै अन्दर बड़ता दीसै। अन्दर आया पछै, वै दोणू जणा बिछायत माथै बैठै। कमरा रौ दूजौ भी दरुजौ है, उण सूं बारै निकल नै अहिल्या बाई रसोड़ा में पूग जावै।]

दिलावर खां – [बिछायत माथै बैठता, कैवै] – पंडितजी सा। पधारो, म्हारै कनै इज़ बिराज जावौ सा।

पंडितजी – पूजा करिया पछै म्हारौ औ नियम है, क मैं भोजन करिया पैली अबोट वस्त्र आद छोड़ नै किनेई चीज़ नै इस्पर्स किया नहीं करूं। अबै मैं आपनै इण झंझट सूं झट मुगत कर दूं, जिण कांम सारुं आप अठै पधारिया हौ..!

दिलावर खां – [सरमा मरीजता, कैवै] – आप जैड़ा सतवादी महापुरस सूं इण तरै प्रमाण मांगणौ तौ म्हनै नहीं चाहिजै सा, पण करां कांई...मज़बूरी है, म्हारी। क्यूं क औ है, सियासती मामलौ।

पुरूसोतमसा – इण में, कैन्नी संका करणी ? औ मामलौ निपटावणौ, आपरौ धरम है। इण में आपरी कोई ग़लती कोनी। मैं हमार, आपनै संतुस्ट कर देवूंला। वेहम री कोई बात नहीं रैवेला।

[अहिल्या बाई जिण दरुज़ा सूं बारै निकळ्या हा, उणी दरुज़ा सूं पुरूसोतमसा कमरा सूं बारै निकळै..!]

रहमान बेग – [नाक अें आंगळी घाल नै, घूंगा काडतौ बोलै] - हुज़ूर, अबै भी कोई सक री गुंजाइस बाकी है ?

दिलावर खां – अरे यार, थन्नै कांई कैवूं ? इण लौंडा नै, पंडितजी रै भेळा तौ जीमण दे। पछै थूं, थारी पिपाड़ी बजावतौ जाइजै।

रहमान बेग – खायां पछै, कइ करौ मालक ?

दिलावर खां – खायां पछै तौ, सक करण री कोई गुंजाइस बाकी रैवेला ई कोनी।

[अबै इण दोणू जणां सारुं बाट नाळणौ बौत मुस्किल हुयग्यौ है, अबै अै दोणू जणा दरुज़ा माथै नज़र जमाय नै बैठग्या है। के, करै वै पंडितजी नै इण छोरा संभाजी रै साथै भेळो बैठ नै खाणा खावतौ दैख ले ? थोड़ी देर पछै, हाथ में भोजन पुरस्योड़ी थाळी अर पांणी भरियोड़ो लोटो ल्योड़ा पुरुसोतमसा नज़र आवै। थाळी में चावल, दाळ, सब्जी अर रोटियां पुरस्योड़ी है। पंडितजी रै लारै-लारै संभाजी आवता दीसै। बिना बिछायत री ठौड़ माथै, थाळी अर लोटो धर नै पुरुसोतमसा अर संभाजी थाळी रै आह्ड़ै-पाह्ड़ै बिराज़ जावै। हमै पुरूसोतमसा गऊ-ग्रास काडै, अर पछै थाळी रै च्यारुओर पांणी री लैण फेर नै हाथ जोड़ै...नै पछै आंख्यां मींच’र, भोग लगावै। पछै आचमन करती पांण, पांणी रौ छिड़काव कर नै भोजन रौ मन्त्र बोलै..]

पुरुसोतामसा – [पांणी रौ छिड़काव करता, मन्त्र बोलै] – ‘सत्यांवारितेन परिशिचामि, [आचमन करता, थकां]  ‘अमृतोपस्तरणमसि।’

[अबै संभाजी अर पुरूसोतमसा, भोजन अरोगणौ चालू करै]

पुरूसोतमसा – [भोजन करतां, बोलता जावै] –अबै बोलौ खां साब, हमै आपनै भरोसौ हुयग्यौ कै नहीं ? के, औ विनायक म्हारौ भाणजौ है ?

[हमे लचका पड़तौ दिलार खां, नीची नाड़ घाल नै बैठ जावै। अर अठी नै औ रहमान बैग बांगो व्योड़ौ करेई तौ वौ पुरुसोतमसा रौ मुंडौ दैखै करेई मुंडौ दैखतौ जावै दिलावर खां रौ।

[थोड़ी ताळ पछै, मंच माथै अन्धारौ छा जावै।]

म्हारी अरज - :

जै स्याम री सा।

इण अेकांकी में मैं इण बात माथै ज़ोर दियौ हूं क ‘सांचौ धरम, किन्नै कैया करै ?’ इण री तरक-संगत व्याख्या, म्हैं इण अेकांकी ‘सांचौ धरम” में प्रस्तुत करी हूं। असल में अेक बामण रौ कांई धरम हुया करै ? सांसारिक कांम करतां, कई वळा वौ भंवर-जाळ में फंस जावै..उण बख़त वीनै मानस में जुद्ध मच जावै, क ‘वीनै सांच बोलणौ, कै मानवता री नज़रां में वीनै कर्तव्य रौ पालन करणौ चाहिजै ?’ उण बख़त वीनी दसा डावांडोल हुय जावै, के ‘कांई फैसलौ, लेवणौ ?’ उण बख़त री तरक-संगत व्याख्या, आप इण अेकांकी में पाओला। आप इण अेकांकी नै पढ़ नै आपरा विचार म्हारै कनै भेजजौ, अर बताइजौ क आ अेकांकी आपनै कैड़ी लागी ?

रमेश जोशी उर्फ़ ‘छोटक बाबू’

खागल, फुल्लेराव की घाटी, वीर-मुहल्ला, जोधपुर

                                      [राजस्थांन]

नाटक 1779607965151781856

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