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डॉ. चित्रलेखा अंशु की कविताएँ

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डॉ. चित्रलेखा अंशु प्राध्यापक महिला अध्ययन केंद्र ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, बिहार साहित्यिक परिचय: डॉ. चित्रलेखा अंशु जेंडर, मानवा...

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डॉ. चित्रलेखा अंशु
प्राध्यापक महिला अध्ययन केंद्र
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, बिहार

साहित्यिक परिचय: डॉ. चित्रलेखा अंशु जेंडर, मानवाधिकार तथा नारीवादी साहित्य की विषय विशेषज्ञ होने की योग्यता रखती हैं। इनके कई आलेख तथा शोध आलेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय जर्नल तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। दो पुस्तकों में अध्यायों का लेखन भी किया है। ऑल इंडिया रेडियो में महिला विषय पर इनका वक्तव्य कई बार ब्राडकास्ट किया जा चुका है। सामाजिक कार्य तथा साहित्य से विशेष लगाव होने के कारण डॉ अंशु लगातार लेखन के द्वारा अपनी अभिव्यक्ति परिलक्षित करती रहती हैं। सम्प्रति मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा, बिहार के महिला अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक के पद पर आसीन हैं।

कविताएं:-

रेडिकल संतानें

रेडिकल होना जूझना है वस्तुस्थिति के विपरीत
पेंडुलम होना भी है आधुनिकता और परम्परा के बीच।
न तो पूर्णतः सम्मानित और न ही नकारने योग्य
हम रेडिकल संतानें दुनियां से लड़ते-लड़ते
खुद ही हो जाते हैं संक्रमित क्योंकि हमारे वाद को
न कोई पचा पाता है न ही ठुकरा पाता है।

हमारे तर्कपूर्ण विचार सामने वाले को करता है निरुत्तर
तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर से मर्दवादी गंध आती है।
हमें काट नहीं सकते तर्को से तो धकेलते हैं हाशिए पर
हमें उपमाओं, व्यंजनाओं से करते हैं सुशोभित कि
शुलामिथ फायरस्टोन की संतानें वंशवाद विरोधी हैं।
संस्कृति और परम्परा के नाम पर धब्बा हैं।

ये रेडिकल संतानें परिवार नामक संस्था को
निगलने के लिए हुईं हैं पैदा और
विवाह नामक शोषण कारी संस्था के समानांतर
गढ़ती हैं नए लोकतान्त्रिक प्रेम की परिभाषा।
करती हैं वैवाहिक बलात्कार का विरोध और
लूटती हैं पुरुषवाद की अस्मत दिन-दहाड़े।

नहीं समझे! पुरुष एकाधिकार को चुनौती देना
उनके मर्दवाद की अस्मत लूटना ही तो है!
ये रेडिकल संताने बड़े-बूढ़ों का करती हैं अपमान क्योंकि
नहीं पैदा करतीं हैं बच्चे, नहीं बनना चाहती हैं मशीनें।
सहस्त्रावतार की भक्त भी नहीं ये मानवतावाद की पुजारन
स्त्री के सहस्त्र शोषणकारी रूप की समझती हैं राजनीति।
जानती हैं कि उनकी परीक्षा हो गई है और भी कठिन।

लोगों के अंदर पैदा हो चुका है भय उनकी मुक्त अभिव्यक्ति से।
कोई अपना नहीं रहा इनकी स्वतंत्र चाहत को।
इनका हो रहा है विरोध क्योंकि किसी को पसंद नहीं
इन रेडिकल संतानों का मुक्त आकाश में विचरण करना।


यूक्लिप्टस


बचपन में पहली बार देखा था उसे|
एकदम सीधा, सफ़ेद और लंबा|
पास जाकर उसकी मुलायम खाल छूने पर
भीनी-भीनी उसके पत्तों की महक थी|
तभी से मैं यूक्लिप्टस को पसंद करती हूँ|

मेरी पसंदिदा वस्तुएं आत्मस्वीकृत होती हैं|
नितांत हृदय से लिया गया निर्णय|
इसीलिए तो बिना सोचे-समझे मुझे
यूक्लिप्टस, बांस और कुमुदिनी पसंद हैं|
एक दूसरे से वैषम्य हैं तीनों|

प्राकृतिक विज्ञान कहता है कि यूक्लिप्टस
अपने आस-पास की जमीन को बंजर करती है|
मगर इसमें यूक्लिप्टस की क्या गलती!
ये इसलिए बुरा तो नहीं क्योंकि यह मेरी पसंद है?
कोई बात नहीं मुझे लीक से अलग चलने की आदत है|

गर्मी की छुट्टियों में गाँव के दिन,
खेत-खलिहान और हरियाली|
वहाँ बांस की झुरमुट देखी,
फिर मुझे झुरमुट अच्छा लगा||
बाबा उसे बांस की बिट्टी कहते थे|

फेंग शुई कहती है कि बांस को बोने पर
उसकी देखभाल अतिआवश्यक है अन्यथा
इधर बांस ख़तम उधर बोने वाले का जीवन|
किन्तु इसमें बांस की क्या गलती है?
वह तो अपने खाद-पानी के भरोसे ही जीवित है|

गुजरती ट्रेन की खुली खिड़की से
छोटे-छोटे पोखरों की सफ़ेद कुमुदिनी
बिना किसी लाग-लपेट के बढ़ जाती है|
बेवजह उखाड़ फेंक दी जाती है,
जलसिंघार और मखाना बोने वाले किसानों द्वारा|

इन प्राकृतिक पेड़ और फूलों की कोई आवाज नहीं|
ये न तो व्यक्त कर पाते हैं अभिव्यक्ति और न प्रतिरोध|
इसके अलावा एक ख़ास बात और भी है कि
ये सब मेरी पसंदिदा वस्तुएं भी तो हैं|
अत: हमारे गुण और धर्म भी मिलते-जुलते हैं|

प्रकृति सदैव मनुष्य को क्षमा करती है|
आगाह करती है बार-बार कि
न छेड़ा न सताया जाय इन निर्जीवों को|
किन्तु जिद्दी प्राणी करता है गलती बार-बार|
फिर प्रकृति धारण करती है विकराल रूप|

उत्तराखंड और कश्मीर की तरह प्रलय लाती है|
फिर मनुष्य करता है पश्चाताप कि
हमें मूक प्रकृति को अकारण सताना नहीं चाहिए|
और ऐसे मनुष्यों को भी जो बार-बार बोलने में नहीं बल्कि
प्रकृति की तरह आगाह करने फिर प्रलय लाने में विश्वास करते हैं|
                             


कितना आसान है।


कितना आसान है न तुम्हारे लिए
मुझे एक चरित्रहीन साबित करना।
हो भी क्यों न!
मैं तो समाज का एक शोषित तबका हूँ।
सिमोन द्वारा लिखी गई द सेकेंड सेक्स हूँ।
तुम एक बीज और मैं सिर्फ खेत हूँ।
तुम परमेश्वर और मैं तुम्हारी गुलाम हूँ
यही सब बातें सोचता है न तुम्हारा समाज!
ओह! तुम कहना चाहते हो कि
तुमने ये सब नहीं कहा, न सोचा।
तो फिर मेरा आगे बढ़ना तुम्हें क्यों अखरता है?
किसी पुरुष से बात करना तुम्हें क्यों खटकता है?
मेरी हर आकांक्षा तुम्हें महत्वाकांक्षा क्यों लगती है?
बोलो, जवाब दो!
याद है वो दिन जब मैंने पुरस्कार पाया था,
तुमने कहा था कि वो किसी की दया है।
उस दिन को भी जरूर याद करना,
जब मुझे नौकरी मिली थी।
तुमने कहा था कि वो एक समझौता है।
हर बार तुमने मेरी पहचान मेरे शरीर से की है।
हर बार मेरे दिमाग की जगह चेहरे की तारीफ की है । 
ओह! तुम कहना चाहते हो कि तुम्हें गलतफहमी हो गई थी।
और तुम मुझे प्रेम करते हो इसलिए मेरे बारे में अच्छा सोचते हो।
क्या कह रहे हो कि खुद को तुम्हारी जगह रखकर देखूँ!
हंसी आती है मुझे तुम्हारी सोच पर।
मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकती,
और एक संवेदनहीन पुरुष नहीं बन सकती।
                                                       
  

तुम्हारे जाने के बाद


न!
कुछ भी तो नहीं होता,
क्या होगा भला?
तुम्हारे जाने के बाद।
 
भीषण बिजली कड़केंगी क्या?
फटके बादल बरसेंगी क्या?
वो उत्तरी दिशा वाला नीला पहाड़,
पिघल जायेगा क्या?
वो कल-कल करता झरना,
सूख जाएगा क्या?

देखो न सूरज ने क्या उगना बंद कर दिया?
तारों ने चमकना खत्म कर दिया?
रोज कोलाहल करते हजारों-हजार लोग,
कहीं घरों में कैद तो नहीं हो गए?
गोधुली बेला में अब मवेशियों ने भी
जाना और घर लौटना बंद तो नहीं कर दिया?

न!
ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ!

नहीं बदलते लोग न ही प्रकृति,
ये दुनियां भी चलायमान है
निर्बाध चलती रहती है।
अगर कुछ बदलता है तो वह मैं हूँ।
मेरी दुनियां एकदम बदल जाती है
तुम्हारे जाने के बाद।


 

सुकूत इंतजार


चांदनी उतर आती है आँखों में,
देखकर जश्न ए बहार गैरों के अंजुमन में.
यही सोचकर भर जाता है मेरा दिल भी कि,
जहान में कोई तो है खुशहाल और मुस्तफ़ीद.
सबकुछ मुकम्मल हो हमेंशा यह जरुरी तो नहीं,
कभी अधूरेपन में भी आस छुपी होती है.
पूरा हो जाने पर तवील ए इंतजार खत्म हो जाता है.
न मिलने में इज़तराब बना रहता है.
जबतक मुबहम रखा था तुम्हें भीतर,
तबतक कायनात कदमों तले लगता था.
तुम्हें जब से कर दिया है जाहिर सरेआम,
दिनें ख़ाली और रातें हिज्र की बन गईं हैं.
दिल है कि भटकता नहीं दीद है कि बंटता नहीं.
गुस्ताख़ कोशिशें नाकाम हो गईं क्योंकि
तुम्हारा बजूद तुम्हारी ख्वाहिशों सा विशाल है.
मायूसियों को हटाते हैं ढलते शामों की तरह कि
गर्दिशें दौराँ खत्म होगा एक दिन,
उफ़क़ पर पहली शुआओं से होंगे हमतुम ख्वाबे सहर की तरह।

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. कविताओं में संवेदना उच्च स्तर पर है । सभी कविता अपने आप में पूर्ण है । पुरूषवादी सोच पर अच्छी कविता । मनुष्य के बदलते स्वभाव पर भी अच्छी कविता । शुभकामनाएं ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पुरुषोत्तम नवीन9:01 am

    प्रेम,स्त्री विमर्श,प्रकृति के आसपास स्पंदित होती भावनाओं ने पठनीय-मननीय-आकर्षक कविताओं की रचना की है.अनूठे रचना कर्म और प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएं!!

    उत्तर देंहटाएं

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रचनाकार: डॉ. चित्रलेखा अंशु की कविताएँ
डॉ. चित्रलेखा अंशु की कविताएँ
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