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लघुकथा // ग्रहण // अनूपा हरबोला

लगभग दस बजे घर का काम निपटाकर अनु नाश्ता करने बैठी ही थी कि घंटी बजी,तो देखा सामने रज्जो(प्रेस वाले की बहन) थी।

"आज तू,श्याम नहीं आया?"

"नहीं !दादा आज अपने ससुराल गए हैं ।"

"अच्छा , मैं नाश्ता कर लूँ फिर देती हूँ कपड़े।"

"ठीक है दीदी", वो वहीं ज़मीन पर बैठ जाती है।

सामने दीवार पर लगी फोटो देखकर...

"आपके दो बच्चे हैं दीदी।"

"हाँ",तेरे कितने बच्चे हैं?"

"तीन हैं , दो साल पहले उनके पापा शांत हो गए,तब से प्रेस का काम करके बच्चों की रोटी ,लत्ते की जुगत करती हूँ।"

"स्कूल जाते हैं बच्चे ?"

'दो जाते हैं, लड़का तीन में और लड़की आठ में है और बड़ी की शादी हो गई है।"

"शादी हो गई है,तू तो लगती ही नहीं है कि सास बन गई है। "

"ही ही ..".वो हँसने लगती है।

"कब की शादी?"

"अभी दो महीना हुआ है।"

"आती -जाती होगी बेटी?"

"नहीं !दीदी ,उसने समाज से बाहर शादी की है ना। "

"अच्छा! लव मैरिज,  आज कल तो ये आम बात है, बुलाया कर बेटी को घर, बहुत सहारा मिलता है माँ से, नई नई गृहस्थी में।"

वो थोड़ी रुआँसी हो जाती है...

"१६ साल की है ,स्कूल जाने का बोल,भाग गई वो।"

"अरे !वो तो नाबालिग है,उसकी शादी मान्य नहीं है,लड़के के खिलाफ शिकायत कर।"

"क्या करना शिकायत करके , जैसी उसकी किस्मत होगी वैसा होगा उसके साथ।"

"माँ होकर कैसी बात करती है?"

"क्या करूँ दीदी घर लाकर,समाज में कौन रहने देगा उसे?हमें भी निकाल देंगे बस्ती से।"

"क्यों नहीं रहने देगा कोई...?"

"अरे ! दीदी समझा करो,अब खराब हो गई है वो...."

अनूपा हरबोला

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