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माह की कविताएँ - हम और हमारा स्वतंत्रता दिवस

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राजेश माहेश्वरी


हम और हमारा स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर
शहीदों की शहादत को
करें हम नमन और प्रणाम
सीमा पर देश की रक्षा के लिये
डटे सैनिकों को
हमारे हृदय की
अंतरात्मा से सलाम
इस वर्ष भी होगा
ध्वजारोहण, नेताओं के भाषण
मिष्ठान्न वितरण, फिल्मी
राष्ट्रीय गीतों का गायन
और हो जायेगा
स्वतंत्रता दिवस का समापन
आज भी भारत के कुछ भाग पर
पाकिस्तान और चीन काबिज है
भारत माता का वह अंग,
आज भी है पराधीन
स्वतंत्रता की प्रतीक्षा में
समय हो रहा है व्यतीत
सैनिकों को है
आदेश का इंतजार
परंतु हमारे नेता
शांतिवार्ताओं के नाम पर
गंवा रहे है समय बेकार
देश में भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद
एवं रिश्वतखोरी
निर्माण और विकास की योजनाओं
को पंगु बना रहे है
हमारे नेता इन्हें मिटाने के स्थान पर
केवल अपनी कुर्सी बचाने में
समय गंवा रहे है
चीन और पाकिस्तान, नक्सलवाद
और आतंकवाद फैला रहे हैं
हमारा देश इनसे निपटने में व्यस्त है
और वे यह देख देख कर मदमस्त है
संभलना होगा नई पीढी को
लेना होगा अपने कंधों पर
उन्हें अब देश का भार
देशभक्ति जनसेवा, को
वास्तविकता में
करना होगा स्वीकार और साकार
संकल्प ले वे अपनी
धरती को मुक्त कराने का
अन्याय और शोषण को मिटाने का
जिस दिन ऐसा हो जायेगा
उस दिन वास्तविक
स्वतंत्रता दिवस मनाया जायेगा
तब झलकेगा देश का स्वाभिमान,
पूरे विश्व में मिलेगा
हमारे देश को
यश, मान और सम्मान
तब हम गर्व से कह पायेंगे
हम है स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक
स्वतंत्रता दिवस अमर रहे के नारों से
गूंजेगा भारत महान।





सूर्य

हे सूर्य भगवान
आपके अहसानों और कृपा
के प्रति कृतज्ञ है इंसान
कृपया स्वीकार करें
उसका आदर सहित सादर प्रणाम
नियत समय पर सूर्योदय
निर्धारित समय पर हो सूर्यास्त
आपसे सीखें समय की पाबंदी इंसान
आपका प्रकाश सभी को
उपलब्ध है एक समान
धर्म, जाति, संप्रदाय, राष्ट्र की सीमाओं
से नहीं कोई भेदभाव
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय
सार्वभौमिक एकता की है
यह अद्भुत मिसाल
आप इतने शक्तिशाली और
प्रभावशाली होने पर भी है
विनम्र और धैर्यवान
आपके समान सद्भावना,
समर्पण और सहिष्णुता
मानव आत्मसात और
अंगीकार करता नहीं
वह अपने आप में ही
भ्रमित हेकर उलझा रहता है
वह जीवन जीने की कला
सीख ले आपसे तो कलयुग में भी
सतयुग का आभास हो जायेगा
मानव अपने दुखों के भूलकर
तृप्ति और संतुष्टि का जीवन पा जायेगा
अनंत में विलीन होने पर भी
अपने रचनात्मक, सकारात्मक
सृजन से अमर हो जायेगा।

                 
                 

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मंजुल भटनागर


"ये काली रातों से दिन "

काली रातों से दिन
चढ़ते हैं और डूब जाते हैं
रात्रि जगती है और सियार हूकता है
दिन बहरे हैं
गुबार उड़ रहा है चारों तरफ
दुःख बहुतेरे हैं

घर मौन ,चुप हैं भौन
गाँव शहर ,जंगल सरीखे
जंगल में आग लगी है
पटवारी चुप है
कोई फ़तवा नहीं कोई निष्कासित नहीं
प्रश्न बहुतेरे हैं .

सड़कों और गलियों में
आरक्षण का शोर
रोज इक नया बवाल
बिछ गयी है शतरंज
किस को दें  शय और किसको मात
हज़ारों हैँ सवाल
संशय बहुतेरे हैं

हर कोई चल रहा
छद्म चाल ,कब किसको पछाड़े नई है चाल
सबने उंडेल दिए  भ्रष्टाचारों के घड़े
उलझे राम रहीम भी ,उड़ रहे  विवाद बहुत
कैसे सुलझेंगे ,भ्रम बहुतेरे हैं

मासूम वल्लरियाँ सूख रही
फूलों की महक बदल रही
आसमां निहारता अशक्त
सूरज भी गठरी लें दुबक रहा
किससे मांगे न्याय यहाँ पर
कोहरों ने खोल दिए राज बहुतेरे हैं.........


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डॉ. रूपेश जैन 'राहत"


 
मैं क्या मेरी आरज़ू क्या
मैं क्या मिरी आरज़ू क्या लाखों टूट गए यहाँ
तू क्या तिरी जुस्तजू क्या लाखों छूट गए यहाँ
चश्म-ए-हैराँ देख हाल पूँछ लेते हैं लोग मिरा
क़रीबी मालूम थे हमें हम-नशीं लूट गए यहाँ
फूलों की बस्ती में काँटों से तो न डरते थे हम
सालों से हो रखे थे इकट्ठे ग़ुबार फूट गए यहाँ
वक़्त के साथ बदल जाने दो ये मज़हबी रिश्ते
बे-ख़लिश हो जियो जाने कितने रूठ गए यहाँ
क़ाबिल-ए-इम्तिहाँ जान सब्र परखते हैं मिरा
सख़्त मिज़ाज है 'राहत' वर्ना लाखों टूट गए यहाँ
--.

जब ज़िन्दा था
जब ज़िन्दा था तो काश तुम सीख लेती जीने का क़ायदा
शम-ए-तुर्बत१ की रौशनी में ग़मज़दा होने का क्या फ़ायदा
इख़्लास-ओ-मोहब्बत२ जुरूरी है मुख़्तसर३ सी ज़िंदगी में
अपना बनाने को शर्त-ए-मुरव्वत४ रखने का क्या फ़ायदा
सर-ए-दीवार५ रोती रह ज़ालिम मैं लौट के नहीं आने वाला
क़ब्रनशीं के साथ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत६ सजाने का क्या फ़ायदा
तह-ए-क़ब्र७ तो सुकून-बख़्श मुझे तिरी मौजूदगी खलती है
मक़्तूल-ए-शौक़८ हूँ अब मोहब्बत जताने का क्या फ़ायदा
पास-ओ-लिहाज़९ में बिता दी सारी उम्र फ़ना होने से पहले
ज़मींदोज हूँ 'राहत' ब-सद-इनायत१० दिखाने का क्या फ़ायदा


डॉ. रूपेश जैन 'राहत'
२१/०७/२०१८
शब्दार्थ:
१ शम-ए-तुर्बत -: क़ब्र पर दीपक
२ इख़्लास-ओ-मोहब्बत -: लगाव और प्रेम
३ मुख़्तसर -: थोड़ा, अल्प 
४ शर्त-ए-मुरव्वत -: प्रेम की शर्त
५ सर-ए-दीवार -: दीवार के नीचे
६ ख़्वाब-ए-क़ुर्बत - निकटता के सपने
७ तह-ए-क़ब्र -: समाधी के नीचे
८ मक़्तूल-ए-शौक़ -: प्रेम में मारा गया
९ पास-ओ-लिहाज़ -: सम्मान और ध्यान
१० ब-सद-इनायत -: सैकड़ों तरह की अच्छाई/दयालुता
--
'डॉ रूपेश जैन 'राहत'
ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद

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कवि -  कमल किशोर वर्मा कन्नौद 

 
              आ गई धूप      
आ गई धूप,  छा गई धूप 
       ठिठुरे तन का भा गई धूप 
सूरज निकला चीर  के बादल
        घना कोहरा खा गई धूप 
आ गई धूप,  छा गई धूप 
       ठिठुरे तन का भा गई धूप 
 
सूरज ने जब खोली आँखें
        पन्छी ने तब खोली पाँखें 
चिड़िया चींचीं तबही बोली
       थोड़ी सी जब पा गई धूप 
आ गई धूप,  छा गई धूप 
       ठिठुरे तन का भा गई धूप 
 
पेड़ों से छन आती धूप
        खेतों में  मुस्काती   धूप
शबनम के मोती चमकाती 
        रेशम जाल रचा गई धूप
आ गई धूप,  छा गई धूप 
       ठिठुरे तन का भा गई धूप 
 
रूप जवानी चढ़ती धूप
         उम्र हौसला बढ़ती धूप 
रूप जवानी उम्र ढले सब
      ढलकर रीत सिखा गई धूप
आ गई धूप,  छा गई धूप 
      ठिठुरे तन का भा गई धूप 
 

---

 
आओ बैठें बात करें,  प्रमुदित मन और गात करें 
आपस में कुछ कहते सुनते यादों की बारात करें 
बात करें हम उस बचपन की जो गलियों में खेला था  
मन तो मोती सा उज्जवल था केवल तन ही मैला था
अब तन को उज्जवल करने में मन को मैला कर बैठे
ओढ़ लबादा आडम्बर का , मन को कलुषित कर बैठे
 
वो लकड़ी का घोड़ा गाड़ी भागें आगे कभी पिछाड़ी 
वो पीपल की छाँव तले दौड़ भागकर फिर सुस्ताना 
लुका छिपी गुल्ली डण्डा का  खेल सुहाना मस्ताना 
दिनभर घर से बाहर रहना भूख लगे तब घर आना 
 
वो रिमझिम पानी में जाना वो कागज की नाव चलाना 
मलकर धूल किसी साथी को ,वो पेड़ों पर चढ़ जाना 
दौड़ के छूना दूजों को ,पर खुद का हाथ नहीं आना
अब तो बातें ही बाकी है कहाँ बचा अब खेल रचाना 
  
बचपन का आनन्द ढूँढने बचपन की ही बात करें 
आपस में कुछ कहते सुनते, यादों की बारात करें 
 

---
 
  चाह नहीं सुन्दर बाला के
चरणों में शोभा पाऊँ
चाह नहीं मैं गुण्डों के सर चढूँ
भाग्य पर इठलाऊँ
चाह नहीं नेताओं के गले में
हे हरि डाला जा़ऊँ
चाह नहीं अभिनेताओं के
मंच पर उछाला जाऊँ
मुझे उठा कर मेरे मालिक
उस नर पर देना तुम फैंक
जो कुर्सी का मालिक बनकर
भ्रष्टाचार करे अनेक

---
बुरी बला है मधुशाला 
सुबह हुई फिर पैसा लेकर   जा पहुँचेगा मधुशाला 
बच्चे चाय पियेंगे घर पर उसके घूँट में होगी हाला 
खाली बोतल बगल छिपाए ढूँढेगा वो खाली प्याला 
                         बुरी बला है मधुशाला 
 
शाम हुई दो मित्र मिले अब खनकेगा खाली प्याला 
सेंव कटोरे में भर कर, फिर भरता है अपना प्याला 
पानी बरफ डाल कर उस में  खूब मिलाएगा हाला 
                        बुरी बला है मधुशाला 
 
गहने सब बेचे बीबी के , बेच दिया घर का प्याला 
रिश्ते नाते सारे तज के ,  एक सगी है बस हाला 
थोड़ी पीकर गाली देता , गर्मी में भी ओढ़ दुशाला 
                        बुरी बला है मधुशाला
 
सभा मध्य वो शोभा पाता  अगर नहीं पीता हाला  
लहराता लंगड़ाता चलता   देखो पीकर मतवाला 
जनम मनुस का है लेकिन,  पशु बना देती हाला 
                       बुरी बला है मधुशाला
 
पहले नर पीता है हाला फिर नर को पीती हाला 
स्वयं डूबता उस प्याले में जो पहले भरता प्याला  
उससे बड़ा तमाशा देखो  कहते उसको मतवाला 
                                                                                        
बुरी बला है मधुशाला 
 
नशा अगर जरूरी है तो, राम नाम का कर लाला
तन मन धन का नाश करेगी,  ठण्डी अंगूरी हाला 
नेकी दया दान धर्म से, भर ले किस्मत का प्याला 
                       ये है असली मधुशाला 


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अभिषेक योगी


पहले की थी बात देखो,पानी से भरे थे खेत
अब की है बात देखो,खेतों में है सिर्फ रेत
किसान खड़ा है खेत में,बनके बिजूका सा
ताकता है बादलों को,बार-बार देख-देख

कभी सूखा- कभी अनावृष्टि,तू तो होते देख
कभी नष्ट होते गेहुँ,कभी ज्वार होती देख
देखो आज कर्ज में है,डूबता है ये किसान
मरता है ये तो तेरी,बारिश की बाट देख

वैसै तो होता किसान,संसार का अन्नदाता
तो तू पानी की एक,बूँद भी नहीं बरसाता
मैंने इन्हीं आँखों से,देखे है ऐसे किसान
गरीबी में जन्म लेता,गरीबी में मर जाता

भगवान का वक्तव्य-----------

पानी बहाओगे और वृक्ष ना लगाओगे
तो बोलो मेरे भईया अन्न कहाँ से पाओगे
वृक्ष लगाओगे तो मौज उडाओगे
वरना इसी धरा पे धरे रह जाओगे

                               -अभिषेक योगी
                                  भरतपुर(राजस्थान)
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डां नन्द लाल भारती


कविता : मोटी चमड़ी वाला आदमी

जी हां मोटी चमड़ी वाला आदमी
होता तो है वह भी ,
शरीफ आदमी की तरह
असल में होता है निर्दयी, मतलबी अहंकारी
पाषाण दिल बेमुरव्वत
जी बिल्कुल ऐसा ही होता है
मोटी चमड़ी वाला आदमी............
अपराध खुद करता है
बना देता है निरापद को अपराधी
चढा देता है यमराज का रथ
दीन के अरमानों की छाती पर
लहुलुहान कर देता है कश्ती
भर देता है गैरों की आंखों मे पानी
नहीं पसीजता बेरहम का दिल
क्योंकि मर चुका होता है
उसकी आंखों का पानी
ऐसा होता है
मोटी चमड़ी वाला आदमी.......
आदमी के यौवन में होता है
दरिन्दा,
उसके लिए परायी बहन बेटियां
कली जैसी होती हैं मसलने के लिए
अरमान शिकार खेलने के लिए
दूसरों की अमानत रौंदने के लिए
सफल हो जाता है जोड़ तोड़ कर
मोटी चमड़ी वाला आदमी.........
अपने कचरे को सोने का ढेर समझता है
दूसरे के सोने को कूड़ा कचरा
सुलगा देता है नफरत की आग
मसल देता है, चकनाचूर कर देता है
दीन के सपनों का साजो समान
बना देता है निरापद को अपराधी
खरीद लेता है झूठे गवाह
सच को झूठ साबित करने के लिए
बेदम हो जाता है निरापद
लाचार हो जाती है न्याय
जब जब जीतता है
मोटी चमड़ी वाला आदमी ।

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अविनाश ब्यौहार


सुर्खी उड़ी है
फेहरिस्त है घोटालों की।
है दुनिया ये नक्कालों की।।
कोई नहीं उत्तर देता है,
झड़ियाँ लगीं सवालों की।
उस खंडहर में पूछ परख है,
बस मकड़ी के जालों की।
दुनिया में  बस बदकारी है,
राजनीति है चालों की।
तलवारें जब म्यान से निकलीं,
सख्त जरूरत ढालों की।
होना जब मंगल उत्सव था,
खुली दुकान बवालों की।
चेहरे पर हैं रूज लगाते,
सुर्खी उड़ी है गालों की।
 
क्षणिकायें:=
1-पुलिस अपराधियों
को पकड़ते पकड़ते
खुद अपराधी
हो गई है।
'खादी' हो
गई  है।।


2- वे कहते हैं
उन दोनो की
मित्रता अटूट है।
इस आधुनिक
युग का
नौ-ब-नौ
यह सबसे बड़ा
झूठ है।।


3-ईमानदारी की
चर्चा से
कर्मचारी मंडल
भिनका!
चोर की दाढ़ी
में तिनका!!


4- वे तभी
होते हैं
राज़ी!
जब उनके
साथ होती है
अमला साजी!!


4-क्षेत्र को
चहुँमुखी विकास
की दरकार है!
लेकिन चुनाव
के बाद कुंभकर्णी
नींद सो गई
सरकार है!!
5-स्वार्थ की
संकरी है गली!
दुधारू गाय की
लात भी भली!!


5- सियासत में
कुर्सी का
झगड़ा देख
भौचक है अवाम
दो मुल्लों
में मुर्गी हराम !!


6- जो उत्कोचक
है वह
तरक्की याफ़्ता है !
दयानत लापता है !!

अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर
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- अभिषेक शुक्ला "सीतापुर"

प्राइमरी का मास्टर

हर एक काम निपुणता से करता हूँ,
फिर क्यूं सबकी आँखों को खलता हूँ,
गाँव -गाँव शिक्षा की अलख जगाता हूँ,
नित प्रति बच्चों को सबक सिखाता हूँ
गर्व मुझे कि मैं प्राइमरी का मास्टर कहलाता हूँ।।

सबको स्वाभिमान से रहना सिखलाता हूँ,
सबको हर एक अच्छी बात बताता हूँ
प्रतिदिन मेन्यू से एम.डी.एम बनवाता हूँ,
खुद चखकर तब बच्चों की थाल लगवाता हूँ
गर्व मुझे कि मैं प्राइमरी का मास्टर कहलाता हूँ ।।

सोमवार को ले थैला मैं बाज़ार जाता हूँ,
और मौसमी फल खरीद बच्चों को खिलवाता हूँ
बुधवार को शुद्ध दूध बच्चों हेतु मंगवाता हूँ,
फिर उन्हें दे गिलास पूरी मात्रा पिलवाता हूँ
गर्व मुझे कि मैं प्राइमरी का मास्टर
कहलाता हूं ।।

बच्चों की ड्रेस की माप भी खुद करता हूँ,
जल्दी टेलर से सिलाकर फिर उनका वितरण करता हूँ
प्राप्त पुस्तकें, जूते, मोजे एन.पी.आर.सी से खुद ढोकर लाते हैं,
कर वितरण उनका हम फूले नहीं समाते हैं।

सरकार हो निष्फल जिसमें वो काम भी हम करते हैं,
जाड़ों में हम बजट में स्वेटर वितरित करते हैं
चुनाव, जनगणना हम ही सब करते हैं,
आपदा बचाव हेतु हम सबसे आगे रहते हैं
मैं सबको सच्ची और अच्छी बात बतलाता हूँ,
गर्व मुझे कि मैं प्राइमरी का मास्टर कहलाता हूँ ।।


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अवधेश कुमार

अपलक-

"अपलक" एक प्रयास है सीता की खोज में तल्लीन श्रीराम के दृढनिश्चय को रेखांकित करने का जिसमे न वे कही के राजकुमार है और न कोई दिव्य अवतार यहां परिस्थितियां और रात्रि की भयावहता उनको डिगाने का प्रयास कर रही है वह किन्तु श्रीराम अपनी पत्नी सीता के प्रति प्रेम तथा उत्तरदायित्व के निर्वाहन के मार्ग में साक्षात मृत्यु से भी युद्ध करने को भी दृढ़निश्चयरत हैं,कृपया कविता का आनंद ले”

प्रतिध्वनि आज भी बाकी है,
पदचिन्हों के धुले निशान नहीं,
मैं लौटूँ बिना लिए तुमको उस जीवन की है आस नहीं,
था वचन मेरा मैं आऊंगा विपदा हो भले विशाल बड़ी।
                                                                         *************
ये निशा वृक्ष और निर्जनता एक चित्र बनाया करते हैं,
उस चित्र में दिखते रात्रिचर ये प्रश्न हमेशा करते हैं,
जो गया उधर न लौटा है ऐसा वीभत्स बसेरा है
किस लिए रात को जग जग के तू तीर तराशा करता है।
                                                                         *************
मुड़ देख वहाँ पर जीवन है साकेत वहां पर तेरा है,
इस ओर अगर तू जाएगा जीवित न वापस आएगा,
जो मिलता है खा जाते है इंसान निगल वो जाते है बसते हैं
ऐसे जीव जहाँ ऐसी वो भूल भुलैय्या है I
                                                                      *************
जीते न स्वयं देवेंद्र जिसे उस इंद्रजीत से बैर करे,
सुन मूढ़! वहां पर किसी जगह एक कुम्भकर्ण भी सोता है,
जगता है प्रलय बरसती है हर पत्ता पत्ता रोता है,
दस शीशों के बोझ तले तू चींटी सा पिस जाएगा,
वापस न लौट अयोध्या को तेरा बाल भी वापस पायेगा।
                                                                      *************
इन प्रश्नों का उत्तर क्या दूँ चित्रों का काम है करने दो ,
मैं नहीं देव् ,न मैं नरेश , न कहो मुझे अवतार कोई,
बस उसे पता और मुझे पता क्यों रात में आँखें भरते हैं,
जो हाथ थाम कर लिया वचन उसका ही उसे दिलासा है,
घनघोर घनी उस लंका में वो जगमग एक सितारा है I
                                                                      *************
ये वचन तभी अब टूटेगा जब सांस का बंधन रूठेगा ,
जब तक है मुझ में सांस कहीँ शर धनुष से मेरे छूटेगा,
जन्मों जन्मों वो मेरी है हूँ उसके बिना मैं पूर्ण नहीं,
उसके जैसी है कहीँ नहीं उसकी उपमा है कोई नहीं I
                                                                     *************
मुख मृत्यु का है तो यही सही न लौट सकूँ तो यही सही,
कोई भी कितना अमर सही मुझे न कोई दिखता है
ये विजय मरण का प्रश्न नहीं प्रेम की एक परीक्षा है....
भय कहाँ समाये इस मन में जब हूक सी मन में रहती है
कहीं दूर “अपलक” इस पल मेरी जीवन संगिनी बैठी है I     
अवधेश कुमार
कार्यक्षेत्र -शिक्षा (सिविल अभियंत्रण)
गृह नगर - शाहजहांपुर
प्रदेश-उत्तर प्रदेश

ईमेल -er.awd.civil@gmail.com

                
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रामविलास जांगिड़

किया ना करो


बूंद ओस की चाटके प्यास न बुझाया करो
मुड़ मुड़के मुस्कान से तीर न चलाया करो

कँटीले नयन मँझधार में डूबी प्यारी नाव
कर पलकों की ओट से इनमें डुबाया करो

अति सीधा व अति टेढ़ा यही प्यार का पंथ
ना चलूँ ना ठहर सकूँ राह न बताया करो

दौड़ भाग में बीत गई चौथ चाँदनी तीज
इस मीठी गणगौर पे महावर रचाया करो

बदरा बरसे सावन में अँखियन बरसे रोज
झड़ी लगा बरसात की आग न लगाया करो

ज्यों छवि निहारूँ तेरी त्यों नित नूतन होय
सपने में चुप न आओ पायल बजाया करो

नागिन काली रात ये चाँदनि जहर चढ़ावे
खिड़की टहले रोजही छतपे न आया करो

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प्रीति राठी

अब तो आजा पिया

ये धड़के मेरा,  यह नाजुक जिया 
आया सावन यह आया  ,आया मस्ती भरा ।
ओ रे पिया  ,आजा रे पिया , अब तो आ जा ,
आया सावन  यह आया  आया मस्ती भरा 
बादल सलोने से  छाने लगे हैं ,
छम छम के बूँदे ,बरसने लगे हैं ,
नगाड़े ये बिजली के ,दमकने लगे हैं
उपवन भी फिर से  महकने लगे हैं 
ओ रे पिया  ..आ जा रे पिया  ...
नदियाँ भी बलखाए,पूर्वा भी बौराए
कलियाँ भी  इठलाए ,पंछी भी है गाए
बनके दुल्हन  ,धरा भी शर्माऐ हैं 
ओ रे पिया  ...आजा रे पिया
हाथों में कंगना है  ,बालों में गजरा है 
माथे पे बिंदिया है  ,राहों में तेरे ये अखियाँ है  ,
ओठो में समाया ,तेरा ही अफसाना है 
ओ रे पिया  ...आ जा रे पिया  ...
दिल में जो अरमां हैं  ,तुझ पे ही मचलना है  ,
पलकों में बसाया ,तेरा ही सपना है  ।
रह न जाए अधूरा ,मन मेरा,
प्रेम पावस में है भीगा।
ओ रे पिया .... आ जा रे पिया  ..
आया सावन  .......मस्ती भरा  ।
    
*********************    
प्रीति राठी  ,बेरडी


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प्रमोद जैन

प्रेम का गीत ।
   प्रश्न

ना मैं जानूं , ना तुम जानो ,
धुंधली - धुंधली पहचान सी है ।
हे ! देव बता क्यों ? भ्रम जैसी ,
दुनिया तेरी अनजान सी है ।।

क्यों ? चमक - दमकते चेहरों पर
तिरछी नजरों के पहरे हैं
हर नवल धवल से दामन पर
क्यों ? दाग हवश के गहरे  हैं
क्यों ? फूले - फूले फूलों पर
फीकी - फीकी मुस्कान सी है ।।
हे ! देव बता .......................?


क्यों ? बंदों के संबंध सभी
गूंगे , बहरे हैं , अंधे हैं
क्यों ? लार बहे सबके मुख से
लम्पट लालच में गंदे हैं
किस ? माया का यह जाल पडा
मन में क्यों ? व्यथा , थकान सी है ।।
हे ! देव बता .........................?

क्यों ? प्रेम पगे इस मौसम में
उन्मुक्त हवा झुंझलाती है
क्यों ? आंखोंं में संदेह भरी
बदली सी धुंधला जाती है
क्यों ? प्रेम पडा प्रतिबंधों में
क्यों ? नफरत नाफरमान सी है ।।
हे ! देव बता ..........................?

--.
नव प्रातः भई
जो बीत गई सो बात गई ।
अंधियारी काली रात गई ।।
भीतर के मधुर तनावों में
हैं शेष अभी जज्बात कई ।।
सब लूट रहे मन की माया
कब - कब कोई खैरात दई ?
तू झांक जरा हर जेहन में
हर इक जन की औकात कई ।।
अब मन की गांठें खोल जरा
और कर ले कोई बात नई ।।
खगकुल का कलरव गूंज उठा
हैं ध्वनियों के संघात कई ।।
सब ओर उजाले की चादर
नव भोर भई , नव प्रातः भई ।।
--.
    सीखो
हंसते हुये गुजरना सीखो ।
झरनों से तुम झरना सीखो ।।
ढेर रास्ते बन जायेंगे ,बन
कर नीर विचरना सीखो ।।
पेडों जैसी घनी छांव सा
अपने आपको करना सीखो ।।
तुम पर भी भंवरे मंडरायें
फूल से रोज संवरना सीखो ।।
दुनियां में जीने की खातिर
किसी के ऊपर मरना सीखो ।।
जीवन के अंधियारे पल में
बन कर धूप पसरना सीखो ।।
सेहत भी होगी पोशीदा
हरी घास में चरना सीखो ।।
अपने मन की मादकता में
बन के रंग बिखरना सीखो ।।
देख दूसरों की पीरों को
आंख में आंसू भरना सीखो ।।
लोगों को भयभीत करो मत
अपने खुदा से डरना सीखो ।।
--.
    सखे
पत्ता - पत्ता , बूटा - बूटा लिक्खा है पैगाम सखे ।
मन के दर की नेम प्लेट पर लिख दो मेरा नाम सखे ।।
इसने देखा , उसने देखा , अब सारा जग जान गया
सबके आगे जग जाहिर है , प्रेम मेरा सरेआम सखे ।।
तेरे मन की तू जाने हम अपने मन की जान गये
अपने मन में मिसरी घुलती पकते मीठे आम सखे ।।
हम राही हैं प्रेम के पथ के साथ वफा के चलते हैं
मत मढना मेरे माथे पर नफरत के इल्जाम सखे ।।
ढाई आखर की बाखर में बीज प्रेम का बो देना
खूब फलेंगे काजू किसमिस पिस्ते औ बादाम सखे ।।
तेरा - मेरा एक गांव है , एक छांव है पीपल की
एक दीन है , एक धरम है , एक है अपना धाम सखे ।।
मंदिर की घंटी के स्वर में राम नाम का उच्चारण
मस्जिद में मोमिन बोलेगा सबको मेरा सलाम सखे ।।
पावस की पावन बेला में पपीहे प्यास बुझायेंगे
धारा बन राधा बरसेगी घिर आये घनश्याम सखे ।।

--.


गुरू वंदना

गुरू देव तुम्हारा पग वंदन , तुमको पल - पल , शत - शत प्रणाम ।

हम मंद बुद्बि , तुम बुद्बिमान
हम तारागण , तुम शशि समान
हम पथगामी , तुम पथदाता
तुम से है पथ - पग का नाता
हम ग्राही हैं , तुम दाता हो
तुम हर युग के निर्माता हो
हे भावी जग के स्रष्टा , तुमको निशदिन शत - शत प्रणाम ।

तुम सुविचारी , सादा जीवन
हम व्याकुल मन , तुम खिले सुमन
हम अंधकार , तुम परकाशा
हम आशय हैं , तुम हो आशा
हमको कुछ दे दो ज्ञान भीख
कुछ जीवन के आधार सीख
हे सरस्वती के पूत , तुमको पल - पल , शत - शत प्रणाम ।

हम अज्ञानी , तुम ज्ञानी हो
हम प्यासे हैं , तुम पानी हो
तुम पारिजात , हम तो फल हैं
तुम वर्तमान , हम तो कल हैं
हमको ज्ञानार्मत से सींचो
हम ओर क्रपा के द्रग खीचो
हे सरस्वती के स्वर्ण हंस , तुमको निशदिन शत - शत प्रणाम ।

तुम विष्णु शर्मा के अनुचर
तुम राधाकृष्णन के हो स्वर
तुम गुरू वशिष्ठ के अनुगामी
तुम तो हो गुरू अंतर्यामी
तुम पूजनीय , हम पूजक हैं
तुम पके हुये , हम अधपक हैं
हे द्रोण वंश के दीपक , तुमको पल - पल , शत - शत प्रणाम ।

गुरुओं का करता अभिनंदन
हो जग से दूर करुण क्रंदन
भारत का भाल रहे ऊंचा
जग मस्तक पर जैसे चंदन
पुनः तुमको बंदन करता हूं
सम्पूर्ण समर्पण करता हूं
हे सरस्वती के सूर , तुमको निशदिन शत - शत प्रणाम।

---.


दुविधा

झिलमिल सी मीनारें हैं , पर दीया तले अंधेरा है ।
दुविधाओं में रात कट गई , धुंध में बंद सवेरा है ।।

काठ का उल्लू बैठ आंख में
आठों पहर जागता है
मन का लल्लू सुख के पीछे
सारी डगर भागता है
प्रेम प्यासा रहा उमर भर , नफरत डाले डेरा है ।।
दुविधाओं में..............................

बिखराया बारूद गगन में
सूरज टपका खेत में
चंदा के चेहरे पर कालिख
तारे मिल गये रेत में
बांट लिया नीला आंगन भी , तेरा है ये मेरा है ।।
दुविधाओं में .............................

पेडों के परखच्चे उड गये
गंजे शीष पहाडों के
वसुधा बदरंगी सी लागे
तन पर उभरे हाडों से
सहमी - सहमी सी समीर है , धुंये का भूत बसेरा है ।।
दुविधाओं में .............................

सांसों में संदेह पला है
खंडित सा विश्वास है
अहसासों के कंठ हैं सूखे
आंख में भूखी प्यास है
सुधियों के लुट गये कारवां , मन का स्वार्थ लुटेरा है ।।

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बीरेंद्र सिंह अठवाल

आखिर कब तक जलेगी बेटी दहेज की आग में
कब तक रहेगा पतझड़,इन फूलों के बाग में
पत्थर पर गिरने से अक्सर, टूट जाते हैं खिलौने
पल भर में बिखर जाते हैं, बेटियों के सपने सलोने

क्यों समझते हो बेटियों को,कागज के फूल
पैरों की जूती ओर , मिट्टी की धूल
तुम्हारी बेटी भी है बहू किसी की
क्यों कीमत लगाते हो बेबसी की

आखिर कब उतर पाएगा लोगों से,ये दहेज का बुखार
मासूम चेहरों से खुशी का उड़ जाता है निखार
ये जुल्म हर दिन होता जा रहा है खूंखार
सज गया हर तरफ इन,सिलसिलों का बाजार

कहीं दहेज कही भ्रूण हत्या, बन गया है तमाशा
हजारों बेटियों के चेहरों पे,नजर आती है निराशा
दे देते हैं जालिम इनको झूठा दिलासा
चकना चुर हो जाती है,अपनी बहनों की आशा

आप के भरोसे छोड़ आती है, बाबुल के आंगन को
आप सौंप देते हैं उसको,आंसुओं के सावन को
दिन रात अश्कों से,भीगता है दामन
लालची दहेज के चक्कर में,उसका होता है जानम

क्या कोई बुझा पायेगा,दहेज की इस चिंगारी को
बेमतलब सताते हैं ,कुछ लोग नारी को
दुखों को सहकर भी,अच्छे रहते हैं विचार
फिर भी करते हैं लोग, बेटियों पे अत्याचार

जितने भी बेटियों के,गिरेंगे आंसू
पाप उतने ही सहने पड़ेंगे, पति ससुर हो या सासू
पाप के ही पौधे पैदा होते हैं आंगन में
लक्ष्मी का रूप होता है, सुहागन में

   
              बीरेंद्र सिंह अठवाल
            घसो खुर्द जिला जींद
                 हरियाणा

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गीता द्विवेदी


आंधियाँ.    (01)
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बिन बुलाए मेहमान सी आती हैं आंधियाँ ,
फिर जम के उत्पात , मचाती हैं आंधियाँ ।

दरख्तों से रार , और झोपड़ों से दुश्मनी ,
शिद्दत और सलीके से निभाती है आंधियाँ ।

उनकी नादानी का , अब हाल भी न पुछो,
कमजोर जान सबको ,सताती हैं आंधियाँ ।

गरज भी नहीं हों, रूबरु किसी के दर्द से ,
बस अपनी औकात दिखाती है आंधियाँ ।

दिखाई पड़ें  हमेशा , ये जरुरी भी नहीं ।
कभी -कभी मन में भी मंडराती है आंधियाँ ।

रिश्ते तहस - नहस ,तो खुशियाँ छिन -भिन्न ,
कब कहाँ सुखद  सौगात लाती है आंधियाँ ।

हाँ चल जाती है उनकी थोड़ी देर के लिये ,
मंजिल से दूर किसको , कर पाती है आंधियाँ ।

हौसले बुलंद है न टूटे थे न टूटेंगे कभी ,
तभी तो उल्टे पाँव लौट,  जाती है आंधियाँ ।


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मंद मंद शीतल बहती पुरवाई    (02)
ःःःःःःःःःःःःःःःःःःः

मंद - मंद शीतल बहती पुरवाई में ,
कोयल कोई कूक गई अमराई में ।
बंशी जैसे ही अधर सजी कन्हाई के,
हर कली खिली बसंत की तरुणाई में ।

          क्यों कहते  हो कि बेहद लाचार हो तुम ,
           स्वास्थ्य रहते हो ,दिखते बीमार हो तुम ।
           मिजाज सुस्त पायी हैं तो सीधे कहो न ,
           रोते क्यों हो कि जग में बेकार हो तुम ।

जिन्दगी में एक ऐसा भी यार होना चाहिए ,
बोली अंगूर सी तो दिल अनार होना चाहिए ।
भले उसके रुठने का सलीका बेहतर न हो ,
पर मनाने का हुनर शानदार होना चाहिए ।

          राम में दोष ढूंढना न कृष्ण में कमी खंगालना ,
           भारत के लाल हो तुम --भारतीयता सवाँरना ।
          चेत जाओ अब कि ये लत सर्वनाश ही करेगी,
          माता पिता का मान भी ,होगा कठिन सम्भालना ।

................ श्रीमती गीता द्विवेदी , (शिक्षिका)
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प्रथमिक शाला --- उधेनूपारा ग्राम --  करजी , जनपद -- राजपुर
जिला --- बलरामपुर  , (छत्तीसगढ़)
     Email ----  geetadwivedi1974@gmail.com


 

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शिशुपाल बलदेव यादव


लोकमान भगवान तिलक की स्मृति में

जन्मसिद्ध अधिकार हमारा है स्वराज्य, यह वाणी थी
तिलक देव  की काया मानो, मानवता कल्याण थी
तिलक एक तेजाब अलौकिक, महाराष्ट्र का पानी है
लोकमान्य भगवान तिलक की, अनुपम अमर कहानी है
#
डगमग डोल उठा सिंहासन, छल मय कर  फिरंगी का
उड़ने लगा रंग रह-रह  भय  से उस छल रंगी का
ललकारा था प्रखर वीर ने ,उसका कहो न सानी है
लोकमान्य भगवान तिलक की, अनुपम अमर कहानी है
#
वह बेवन टाइन शिरोटन का सह न सका भारी अपमान
मंडाले कारागृह में जा, रखा आत्म गौरव अभिमान
लिख 'गीता-रहस्य' ध्वनि फूकी, भारत ज्ञान निशानी है
लोकमान्य भगवान तिलक की, अनुपम अमर कहानी है
#
खोकर निज स्वार्थ शेष हित, रखा शीश कांटों का ताज
दिया हिंद को देन अलौकिक, स्वतंत्रता सुख-प्रद साज
युग युग दुनिया बोलेगी वह, मनुज नहीं वरदानी है
लोकमान्य भगवान तिलक की, अनुपम अमर कहानी है
#
था युगपुरुष प्रकट अवतारी, आजादी का दीवाना
देश प्रेम पर मर मिटना ही, जीवन भर जिसने जाना
यहां पुरुष के कर्म अमर है, यद्यपि दुनिया फानी है
लोकमान्य भगवान तिलक की, अनुपम अमर कहानी है
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२९.७.५६
स्व. श्री शिशुपाल बलदेव यादव मुकुंद दुर्ग
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- रवि सुमन

पात्र

मुख के ऊपर मुखौटों का पता नहीं दिया तुमने
मानव जन्मे थे तो मानवता की पहचान दिखा

हे मानव इक बात बता
पात्र तुम्हारा जब मानव का था

तो आया कहाँ से ख्याल तुम्हें
माँ ने छाती से लगाया या
जब बेटी को अंकवारा तुमने

दिनकर की धरती पर जाल बिछाया
हे मानव, ये कैसा पात्र निभाया तुमने

क्या दिनकर का कोई वंश नहीं था
या दिनकर का कोई यश नहीं था

हे लिक्खाड़ मानव
हे दिनकर के वंशज

तुम्हारे आँगन जब रौंदी गयी मानवता
खुद को मौन किया तुमने
हे मानव, ये कैसा पात्र निभाया तुमने
  
  

 


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नवनीता कुमारी


कुछ उसूल है दुनिया के जिसे मैं भी समझ जाऊं तो अच्छा है,
जिसे मैं भी बखूबी निभाऊं तो अच्छा है,
हैं दुनिया मतलबी, मैं भी मतलबी बन जाऊं  तो अच्छा है,
कुछ उसूल है दुनिया के जिसे मैं भी समझ जाऊं तो अच्छा है |
ना है अब इंसानियत की बातें, मैं भी संभल जाऊं तो अच्छा है,
कुछ है दुनिया के उसूल जिसे मैं भी समझ जाऊं तो अच्छा है |
बड़ी काँटों भरी हैं ये राहों, इन राहों पे ना लड़खड़ाऊं तो अच्छा है,
चाहे जितना भी गम क्यूँ ना, फिर भी मुस्कुराऊँ तो अच्छा है,
शरीफो की शराफत बड़ी सस्ती हैं ,
दुनिया की हर बुरी चीज अच्छी है,
यही है दुनिया के कुछ उसूल जिसे मैं भी समझ जाऊं तो अच्छा है |
धन -दौलत से ही इंसान की औकात बताई जाती हैं,
ये बात समझ जाऊं तो अच्छा है,
मैं भी दुनियादारी निभाऊं तो अच्छा है,
हर किसी को रूलाऊँ तो अच्छा है,
कुछ उसूल है दुनिया के जिसे मैं भी समझ जाऊं तो अच्छा है |
अपनी जमीर, अपने उसूलों से समझौता कर लूँ
तो अच्छा है |
कुछ उसूल है दुनिया के जिसे मैं भी बखूबी निभाऊं तो अच्छा है ||

--

हर रंजोगम को भूल मैं जाना चाहती हूँ,
कि इस कदर फिर से मुस्कराना मैं चाहती हूँ,
हर मुसीबत को हँसकर मिटाना चाहती हूँ,
कि फिर से इस तरह मुस्कराना चाहती हूँ,
जहाँ फैली हैं निराशा, वहाँ आशा की किरण बन जगमगाना चाहती हूँ,
कि इस कदर मुस्कराना मैं चाहती हूँ |
काश कोई ऐसा सुंदरवन हो खुशियों का संगम हो,
ना किस्मत का रोना हो, ना इंसान भाग्य के हाथों का खिलौना हो,
बेबसी ना किसी का गहना है, हर कोई खुश रहे
मेरा यही कहना है |
हर जख्म भर जाना चाहती हूँ कि मैं फिर से इस तरह मुस्कराना चाहती हूँ |
दो पल की जिंदगी में जी-भर खिलखिलाना चाहती हूँ,
कि इस कदर हर गुजरे बुरे पल को भूल जाना
चाहती हूँ,
कि फिर से मैं मुस्कराना चाहती हूँ,
हर कीमत चुकाना चाहती हूँ, पर मैं मुस्कराना चाहती हूँ |
   किसी के आँखों की नमी मिटाना चाहती हूँ,
हँसते हुए मंजिल पा जाना चाहती हूँ,
कि इस कदर फिर से मुस्कराना मैं चाहती हूँ ||

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----बख्त्यार अहमद खान

इच्छा
यदि मेरी दृष्टि स्वप्नों से आप्लावित न हुई होती,
भावनाएँ मधुर आभासों से आच्छादित न होतीं,
     आयाम जीवन के विहंसते पलों में आत्मसात न हुए होते,
तो जीवन अस्तित्व के बिखराव तले सिसक रहा होता,
वो क्षण जो तुम्हारी साँसों में संवर कर मेरे सीने में उतर गए,
वो स्पर्श जो मेरे रोम रोम में अंतर्निहित हो गए,
आभास के तुषार बिंदु जो मेरी नज़र पर ठहर गए,
ये सब आधार हैं मेरी अनाम अनुभूतियों के,
जो प्रतिदर्श स्वरूप तुम्हारी प्रेम की अनंतता से
मेरे सुलगते सवेरों में,
एक ठंडी शाम की तरह संवर गया है,
घोर काली  निशा के प्रतिमान बिखरे हैं,
तुम्हारे प्रेम और अर्पणमय सवेरों के आगमन से,
इच्छा है कि मेरा जीवन गुलाब हो
बाधाओं के अनगिनत काँटों पर,



                         ----बख्त्यार अहमद खान
                      74- रानी बाग ,शम्साबाद रोड,आगरा -282001
                                     
                                 Mail-ba5363@gmail.com
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कवि अनमोल तिवारी


पेड़ हमारा सबसे प्यारा ।
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पेड़ हमारा सबसे प्यारा
दुनिया में है सबसे न्यारा
खेल -कूद कर जब थक जाते
सीधे पेड़ कि ओर दौरे आते
  
               पेड़ के नीचे करते विश्राम ,
               पेड़ सा नहीं है कोई धाम।    
               बहुत भाग्य साली वो होते,
               जिनके घर के अगल बगल पेड़ पौधे होते।

चिड़िया पेड़ पर जब बैठ जाती ,
चूं-चूं कर वो हमें लुभाती ।
पेड़ हमें ऑक्सीजन दिलाता ,
धूप से है हमें बचाता।
        
           आओ मिलकर पेड़ लगाएं ,
            उसका फल सब मिलकर खाएं।
   कवि अनमोल तिवारी
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सुशील शर्मा

महाकवि नीरज
(दोहे )

नीरज की पाती मिली,मुझे आज अलभोर।
हंसते हुए वो चले,छोड़ जगत का शोर।


गीत बुलाती कल्पना,कविता के अंदाज।
अब जाने कब आएगी,नीरज की आवाज़।


शिल्प कला में निपुणता,भाषा शुद्ध सरोज।
शब्दों के विन्यास से,गीतों में है ओज।


शब्द शब्द मणि सरस हैं,भाव भक्ति से प्रोत।
गीत ग़ज़ल कविता बनी,विमल भाव की स्रोत।


जीवन दर्शन प्रेम पर,है आधारित गीत।
नीरज ने चुन चुन लिखीं,दर्द भरी वो प्रीत।


कविता उनकी प्रेमिका,कविता ही आराध्य।
कविता से सांसे शुरू,कविता जीवन साध्य।


नीरज को जिसने पढ़ा,चढ़ा न दूजा रंग।
उनके गीतों में मिली,प्रेम प्रीत की भंग।


यादों में नीरज बसे, गीत ग़ज़ल सी धूप।
जीवन के संघर्ष में,कविता के प्रतिरूप।


एक सितारा टूट कर,चला गया आकाश।
हम सब को वो दे गया,साहित्यिक विश्वास।
00000000000000

मुकेश कुमार


आज चाहत पे, नफरत भारी है,

मैं निकला था, मोहब्बत ढूंढने,
मोहब्बत तो, मिला नहीं,
पर तलाश, अब भी जारी है.

पूरब ढूंढा, पश्चिम ढूंढा,
धरती ढूंढा, अम्बर ढूंढा,
वो तो, मिला नहीं,
पर नफरत से, मोहब्बत करते,
देखी दुनिया सारी है.

पत्थऱ को जिन्दा करने,
अग्नि को ठंडा करने,
पैदल ही चला था,
करने  उनसे यारी है,

काँटों से बचाकर,
पलकों में बिठाकर,
उम्मीद जिनसे, ज्यादा करते थे,
उसने ही लगाईं, ये चिंगारी है,

आज चाहत पे, नफरत भारी है......

00000000000000

रीति केडिया


क्यों समझाना पड़ता है खुद को ही
क्यों नहीं समझता यह सारा जमाना
  क्या बेटियों की नहीं है कोई इच्छा
सिर्फ लड़की होने की वजह से पड़ता है खुद को ही समझाना

ऐसा ही होता है हर बार
  इसलिए पहले से ही मन को समझा दो
सपने देखने की आजादी नहीं है इसे
मन की इच्छा को मन में ही दबा दो

बाद में ना रोना ना बिलखना
यह तो आदत है जमाने की
जमाना कभी नहीं समझेगा हमारी इच्छाओं को

इसलिए जरूरत है खुद को ही समझाने की

00000000000


राजेन्द्र श्रीवास्तव

गजल,

    @@
    सफर में भरोसा दिलाना बहुत है
    कदम -दस कदम साथ आना बहुत है।

     उठाने उसे, राह में गिर गया जो-
      वहाँ हाथ अपना बढ़ाना बहुत है।

    जहाँ बंदिशें हों जुवाँ खोलने पर -
      किसी का वहाँ गुनगुनाना बहुत है।

    कभी मत बनो भीड़ का आप हिस्सा
     वहाँ आजकल बहशियाना बहुत है।

     रहा ढूंढता आज तक आशियाना
      उसे मिल गया एक ठिकाना बहुत है ।

     मिले चार कंधे यहाँ तक सभी को
       अकेले अभी दूर जाना बहुत है।

    समझने लगा चालबाजी ज़हाँ की
     लगे लोग कहने, सयाना बहुत है।
                   

00000000000000

चंतलिका शर्मा

  " मौन "

पाषाण से भी दृढ़
सूरज से भी तीक्ष्ण
सागर से है गहरा
मौन तू विलक्षण.... 

                  तेरा वजूद , ओहदा
                   जटिल नहीं परिपक्व है ।
                   तू घने साये की तरह
                    घटनाओं का समाधान है...

कई बार तुझे साधते
कंठ अवरुद्ध हो जाता है ।
एक नियम सा तुझे गढ़कर 
कई सांचे में ढाला जाता है .... 
                         
                         तू प्रतिश्रुति भी है
                         अवधारणा भी है
                         कभी तू अल्प विराम
                         तो कभी पूर्ण विराम है ....

हर कोई तुझे समझ ले
ऐसा तू कोई सवाल नहीं
चाहकर भी तुझे पढ़ न सके
तू ऐसा भी जवाब नहीं...

                        दिल , दिमाग , धारणा से परे
                         तू बस एक मुक्त आलिंगन है
                         अनंत काल से तेरी शरण में
                         समाधिस्थ , चिरनिद्रा में है ..
----
  
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शबनम शर्मा

श्रद्धांजलि
आज मेरा दिल उन वीरों को
श्रद्धांजलि देने के लिए,
अपने आप ही नतमस्तक है,
जिन्होंने अपने प्राणों की
बाज़ी लगाने में तनिक भी
संकोच नहीं किया,
पलटकर सूनी माँग,
सूनी कलाइयों को नहीं देखा,
सुबकते बच्चों, नम आँखों
को नहीं देखा,
माँ की ममता को, गले तले
उतार कर, बाप की लाठी को
उसके हाथों में ही थमाकर,
चल दिये भारत माँ की
रक्षा के लिए,
आज भारत माँ ही नहीं, समूचा
देश तुम्हारा, तुम्हारी जननी का ऋणी है
तुम्हें झुक-झुक कर असंख्य
बार प्रणाम करता है,
करता रहेगा।
तुम धन्य हो, वीर हो,
अमर हो, रहती दुनिया तक
तुम्हारी वीरता का ये
चर्चा चलता रहेगा।


शबनम शर्मा

अनमोल कुज, पुलिस चौकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.
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आदित्य मंथन

'मनुष्य हूं'
तुम्हारी प्रेरणा मेरी प्रेरणा से भिन्न है
  जो तुम्हारे लिए विष है ,
वह मेरे लिए अन्न है
तुम्हारी कविता मेरी कविता से भिन्न है
  तुम लिखते हो कुछ पाने की खातिर
  मैं लिखता हूं बस अंतरपट का  उद्गार -भार मिटाने को
  तुम लिखते हो किसी बड़े कवि के पिछलग्गू के भांति
  मैं तो हूं निर्बाध- - आबंध- छंद- युक्ति- रस मुक्त
  मुझे क्या पता है कवि और अकवि होना क्या है?
  ज्ञान क्या है? और यह आदमियत का भार ढोना क्या है?
  मैं तो बस एक मूढ़ मात्र ,
ज्ञान नहीं मुझको  लेशमात्र भी।
  मैं हूं पर जिद्दी पत्थर सा दिखता हूं खरूश बनकर अड़ियल सा।
तारीफों - शिकायतों से डरा नहीं
  चाह नहीं मुझको कुछ भी!
  पर मैं कोई नक्षत्र नहीं हूं, उस कबीर के भांति ;
काम क्रोध लोभ मोह सब में थोड़ा-थोड़ा फंसा अभी भी हूं
  पर खुश हूं बहुत,  इन के कारण नहीं बन पाया हूं
-कोई ब्रह्मवेत्ता या कोई कवि - आत्ममुग्ध ।
इनके कारण ही सही मैं मनुष्य अभी भी हूं!
आदित्य मंथन


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  डॉ वासिफ क़ाज़ी इंदौर

शीर्षक - " भाग्य "


बहाकर खूब पसीना अब,

   भाग्य ख़ुद लिखना होगा ।

अपने मज़बूत इरादों से ही,

     इस रण में टिकना होगा ।।


  चुपचाप बैठकर ऐसे ही,

     परिश्रम भी करना होगा ।

  अपने हाथों से खुद अपनी,

    तक़दीर को लिखना होगा।।


  भाग्य तेरा मोहताज नहीं ,

   हाथों की लकीरों का ।

इंसान तो मालिक है,

    ख़ुद अपनी तकदीरों का ।।


    डॉ वासिफ क़ाज़ी इंदौर

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आशुतोष मिश्र तीरथ

सामयिकी

चंदा मामा थे जो बचपन में
अब वह जानू प्रियतम हो गए।
किस्से वह बिक्रम बेताल के
व्यभिचारी डाल पर सो गए।।

सार्थकता वह पंचतंत्र की
फिल्मों में अब समा गई।
सुन्दर सुशील परियां अब
छली भयानक रूप दिखा गईं।।

अलाउद्दीन का चिरागी जिन्न
असभ्य पत्रिका से डर गया।
बीरबल उदास हुआ मीडिया ने
जब चुटकुलबाज उसे कह दिया।।

तेनालीराम बच्चों को भाए कैसे
भीम चुटकी का जो रंग चढा।
पढें पुस्तक क्यों बच्चे आखिर
मोबाइल का जो इतना प्रेम बढ़ा।।

गुल्ली डंडा छूटना था स्वभाविक
मोबाइल गेम हजारों जो हैं।
मां बाप समझते नीचापन अब
बच्चों का खेलना खो खो है।।

डोरेमान देखकर बच्चे अब
मेहनत से कतरियाते हैं।
स्कूलों में मैडम टैटुओं के
सहारे बच्चों को बहलाते हैं।।

दादी जी से भी दूरी हो गई
बच्चों को कहानी कौन सुनाए।
कह कभी-कभार भला बुरा
कौन बच्चों को नेक राह दिखाए।

आशुतोष मिश्र तीरथ
जनपद गोण्डा
कापीराइट एक्ट के अंतर्गत

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धर्मेन्द्र अरोड़ा

*वोटों का मौसम है आया*

वोटों का मौसम है आया
संग अपने नेता जी लाया
वादे करके मीठे - मीठे
भोली जनता को भरमाया
बस कुरसी की खातिर सबने
भाई  - भाई को लड़वाया
कौन है अपना कौन पराया
मन बेचारा जान न पाया
साम-दाम और दंड-भेद का
चहुंओर ही जाल बिछाया
जात-पात का भ्रम फैलाकर
आपस में सबको लड़वाया
प्रेम-भाव और नैतिकता को
खुद से कोसों दूर भगाया
वाह रे मेरे देश का मानव
समझ सका न इनकी माया


धर्मेन्द्र अरोड़ा
"मुसाफ़िर पानीपती"
*सर्वाधिकार सुरक्षित*©®
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मुकेश कुमार


थक सा गया हूँ
थक सा गया हूँ
तेरी इन झूठी वादों से
थक सा गया हूँ
तेरी रोज की ये फालतू विवादों से....


थक सा गया हूँ
तेरी इन झूठी  मुस्कानों  से
बदले में कर रहे
उन अहसानों से


थक सा गया हूँ
दिल को समझाते हुए
इतना दर्द  जो मिला  है
अपने को अपना बनाते हुए


थक सा गया हूँ
तेरी झूठी कातिल निगाहों से
घृणा सा होने लगी है
तेरी इन अदाओं से


थक सा गया हूँ
चंद खुशियों के  लिए  किसी  को
भूल जाने  वाली फितरत  से
सोचता हूं भूल  भी जाऊं ये सब
लेकिन अब याद आती हो बस नफ़रत से


थक सा गया हूँ
प्रकृति की इन वादियों से
अब नहीं रहना साथ
वो मतलबी बघियों से....

थक सा गया हूँ
तेरी इन जुल्मो कर्मों से
अब तो यकीन नहीं होता मुझे
अपने  खुदा के  रहमों पे

मैं जनता हूं कोई फर्क नहीं पड़ेगा
मेरी इन बातों से
मगर कुछ तो असर जरूर होगा
मेरी इन खयालातों से... !

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-राममचन्द्र दीक्षित 'अशोक'

मरने की कोई उमर नहीं होती
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मरने की कोई भी
उमर नहीं होती है
और जब एक
कामुक कायर व्यक्ति
क्रूर कठोर निष्ठुर होकर
इनका पर्याय बनकर
निर्लज्जता की हदें
पार कर जाए
मानव और मानवता
दानवता के सामने
दोनों ही कटघरे में
चुपचाप खड़े हो जाए
और यह व्यक्ति
इंसान व इंसानियत को
तार-तार करके
किसी मासूम की
मासूमियत को
कुचल देता है
तब मासूम की आत्मा
चीख कर रोती
और उसका बचपन
सिसक लेता है
और यह व्यक्ति
सदा-सदा के लिए
उसी क्षण मर लेता है
ऐसी स्थिति में यह
समाज कहां होता है?
जिसका निर्माण
सबके भले के लिए
किया गया होता है?
इस प्रकार से
कोई भी कहीं भी
कभी भी मर लेता है
किसी को भी
फर्क नहीं पड़ता है
आंखों से देखकर
दिमाग से निकाल देता है
न कोई बोलता है
न कोई आवाज देता है
लगता है कि
मृत्यु हर किसी की
एक जरूरत व दरकार है
आपसी सहमति है
इसीलिए तो
मौन स्वीकृति दे देता है
क्योंकि हर किसी को
ऐसे ही मरना है?
और उसे भी ऐसे ही
स्वीकृति लेना है?
प्रश्नवाचक चिन्ह कोई
क्यों नहीं बन लेता है
सामने इसके क्यों नहीं
कोई सीना तान देता है
अब गौर कीजिए
इस व्यक्ति की उमर
कितनी होगी?
यह कोई मरने की
उमर होती है?
यह उमर खुद के लिए
और समाज के लिए
कुछ करने की होती है
कुछ अलग कुछ नया
कुछ बेहतर कुछ अद्भुत
संजोने की होती है
मरने की कोई भी
उमर नहीं होती है
***

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रवि भुजंग


मौसम से अनजान
अधखिली कली की तरह है बच्चे

दुबककर माँ के
पत्तों से आँचल में छुप जाते है

टूटने से अनजान
बढ़ते रहते है अपनी धुन में

विश्वास है उस डाली पर
कि गिरने नहीं देगी

ये बच्चे भविष्य का फूल है
देवों के प्रिय

देवों के प्रिय को
डांटा, पीटा नहीं करते मानव
रवि भुजंग
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शिव कुमार

फूलों का दर्द


–––––––             
कलियां पौधों पर लगती है, जैसे हो त्रिशूल।
अवलोकित नहीं किया किसी ने, कली से बनते फूल।

गुप्त रुप से पाला पोसा, पौधा उसका नाम।
ऐसी माताओं को मेरा शत शत तुझे प्रणाम।

मन्द पवन के झोंकों के संग,  मस्ती से खेला करता।
अपने भाई और बहनों को, झूम झूम चूमा करता।

जब तूफान का झोंका आया, पडो़सियों ने साथ निभा्या है।
अपने आगोश में ले कर के,  गिरने से मुझे बचाया है।

प्यार हुआ पडो़सियों के संग, कभी न होगा इसका एन्ड,
चुना एक को उनमें से, और बना लिया अपना गर्लफ्रेन्ड।

एक दिन प्रातः के दृश्यों ने, अचम्भित और असहाय किया।
कुछ अनजाने से लोगों ने, साथियों का किडनैप किया।

पृथक किया भाई बहनों से, रहते थे माँ की गोद में,
लाज न आई तुझे जरा, जो लड़ न सका प्रतिरोध में।

सारी जीवन शैली दे दी, दिया ना हाथ, मुंह और पैर।
इसीलिये दिल में रखता प्रभु, तेरे प्रति मैं सदा ही बैर।

ये तीनों यदि पास में होते, 100 नम्बर पे डायल करता।
बुला पुलिस को और सभी किडनैपो को धरवाता।

घटित न हो फिर ऐसी घटना, बुला लिया एक एसेम्बली,
नियम पास हो गया बिन संसद के, सर्वसम्मत से सब ने मान ली।

फूल बाग की शोभा है, कृपया इन्हें मत तोड़िये,
अन्जाम बुरा होगा इसका, ये नियम जो तोडा़ जान लीजिये।

                        रचयिता
                       शिव कुमार
                  114/75 रामबाग
                  इलाहाबाद (उ. प्र.)
                  पिन कोड- 122003
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