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लघुकथा // शादी का लिफाफा // दीपक दीक्षित

अजय की बेटी की शादी में जाने के लिए जब सब तैयार हो रहे थे तो मैंने इस काम के लिए ले जाने वाले एक लिफाफे को निकला और सोचा इसमें कितनी रकम डालूं। आम तौर पर मेरी पत्नी इस जिम्मेदारी को निभाती थी और इस काम के लिए वह एक डायरी में लिख कर रखती थी कि हमारे यहाँ की शादी में कौन क्या क्या देकर गया। पर यहाँ बात दूसरी थी। अजय जो मेरे बचपन का दोस्त था जो कई साल पहले बिहार चला गया था और वहां पर एक राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में काफी काम किया था जिसके बारे मं हम सब अख़बार में पढ़ते थे और खुश होते थे। पिछले साल ही वह एक मंत्री के रूप में हमारे शहर में वापस आया था । शायद उसकी पार्टी ने उसे उसके काम का इनाम दिया था।

आम तौरपर हम लोग इस लिफाफे में एक या दो हजार रूपये डालते थे पर अजय हर तरह से एक ख़ास आदमी था । एक तो वह मेरा बचपन का लंगोटिया यार था और फिर अब इतना बड़ा आदमी बन गया था। ये सब सोच कर मैंने पांच हजार रुपये उसमें डाल दिए और साथ में पत्नी से पूछा ,'' शादी के कार्ड में तो साफ़ साफ़ लिखा है कि कोई उपहार/लिफाफा नहीं लाना है?" इस पर वह बोली ,"अरे इन बड़े लोगों कि बड़ी बातें , हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। यही तो मौका होता है इस लोगों के पास अपने जानने वाले, कर्मचारियों, चमचों और अपना काम कराने की जुगाड़ में लगे लोगों की जेब से मोटी रकम निकलने का। इस तरह के किस्से कितने ही सुनने को मिलते हैं। "

वहां पहुंचकर अजय बड़ी आत्मीयता से मुझसे गले मिला और मेहमानों से अपना विशेष मित्र कह कर परिचय कराया। मैं कुछ असहज हो रहा था क्योंकि अधिकतर मेहमानों को मैंने टी वी या अखबार में ही देखा था और उम्मीद न थी कि उनसे इतना नजदीकी सामना होगा।

पूरा आयोजन एक तरफ सादगी से रचा हुआ तो दूसरी तरफ गरिमापूर्ण था। कहीं भी मुझे वह स्टाल /टेबल नहीं दिखी जो अक्सर लोगों के लाये हुए उपहार को रखने के लिए शादियों में लगाया जाता है। न ही आने वाले किसी भी व्यक्ति के हाथों में कोई उपहार दिखाई दे रहा था।

खाने के बाद लोगों के जाने का सिलसिला शुरू हुआ। कुछ लोगों ने चलते समय जेब से लिफाफा निकल कर देने की कोशिश की पर अजय ने बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। ये सब देख कर मुझमें हिम्मत नहीं हुई कि जाते समय मैं भी अपनी जेब से लिफाफा निकालूं और अजय कि झिड़की सुनूं। मैंने कनखियों से अपनी पत्नी की तरफ देखा जिसकी आशंकाएं गलत साबित हो रही थी । उसके चेहरे पर भी मूक सहमति का भाव था ।

बाहर आकर मैं सोच रहा था कि इस देश में अजय जैसे और कुछ नेता हो जाएं तो इसका कल्याण हो जाय ।

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परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की ) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो, योगी बनो' नामक पुस्तक प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल अवं एनवीरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान से जुड़े हुए है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्टार के के कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

आजकल सिकंदराबाद (तेलंगाना) मैं निवास करते हैं।

संपर्क​

coldeepakdixit@gmail.com

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6 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गाँव से शहर को फैलते नक्सली - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" शनिवार 01 सितम्बर 2018 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत अच्छी कहानी

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