आहतोपदेश // डॉ. आभा सिंह

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धार्मिक, धर्मभीरू, धर्मांध से निकलकर मेरा समाज आज 'धर्म-मानों' समाज में परिवर्तित हो गया है। इतना ही नहीं तो विज्ञान तथा तकनीकी केंद...

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धार्मिक, धर्मभीरू, धर्मांध से निकलकर मेरा समाज आज 'धर्म-मानों' समाज में परिवर्तित हो गया है। इतना ही नहीं तो विज्ञान तथा तकनीकी केंद्रित माने जाने वाले इस युग में यह सब कुछ ऐसा ही है जैसा किसी ज्योतिषी द्वारा यह सुझाव देना कि व्यापार तो राहुकाल में ही किया जाना चाहिए। यह ऐसा ही लगता है जैसा आप किसी मेडिकल साइन्स के विद्यार्थी को दुष्यंत और शकुंतला की कहानी सुनाओ कि कैसे उनका प्रेम परवान चढ़ा [इतना चढ़ा हुआ प्रेम की आज भी श्रृंगार रस के उदाहरणों पर इन्हीं का एकछत्र राज्य है] और फिर उसी कहानी में प्रवेश हुआ दुर्वासाजी का जिन्हें प्राथमिकता न दिए जाने के कारण उन्होंने शकुंतला को अत्यंत कठोर श्राप दिया जिसके प्रभाव से दुष्यंत शकुंतला को भूल गया और फिर बहुत मान मनुहार [ऋषि के] करने के उपरांत वही श्राप थोड़ा लचीला हुआ जिसके चलते दुष्यंत पुनःशकुंतला को पहचान गया। अब जैसे ही हम वास्तविकता पर लौटेंगे तो जिसे हम कहानी सुना रहे हैं उसका यह कहना स्वाभाविक है कि यह श्राप का नहीं ‘शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस’का केस लगता है,परंतु हमारी समस्या यह है कि यह स्वाभाविकता अत्यंत भयानक है।

कल्पना कीजिए की यदि सारी ही कथाओं को इस प्रकार का अंत मिलने लगे तो मनुष्य अपनी सुविधा को कैसे संभालेगा क्योंकि एक लंबे समय से ऐसी अनेक लौकिक-अलौकिक कथाएं पाप-पुण्य की सहायता से मानव जीवन को ऐसे ही लुभाती आई है जैसे गोरा होने की क्रीम का दावा करने वाली कंपनी गोरा न हो पाने वालों को लुभाती है। अंग्रेज़ों ने भारत पर, भारतीय संस्कृति पर इतने वर्षों तक राज किया पर फिर भी हम भारतीय गोरे रंग का मोह नहीं छोड़ पाए फिर लगता है कि कही यह भी सुविधा का ही तो अंश नहीं।

सुविधा-असुविधा वैसे बड़ी भाग्यवान शब्दावली है क्योंकि यह उन शब्दों में से है जिनका अर्थ ही उनका औचित्य है। किसी भी विषय को समझने के लिए सबसे सुविधाजनक होते है उदाहरण तो उदाहरण के लिए मेरी एक सहकर्मी है वे इतनी सुविधाजनक पद्धति से अपनी सुविधा चुनती है कि सुविधा को कितनी ही असुविधा क्यों न हो रही हो उसे भेस सुविधा का ही लेना पड़ता है ठीक पुरूषों की ही भांति जिन्हें पराक्रम ही दिखाना [कृपया इसे दिखावा पढ़े] पड़ता है। मेरी सहकर्मीजी आहत भी अपनी सुविधानुसार होती हैं और दुख को उससे पूरी तरह से अलग रखती हैं। उनकी आहतता देखकर मुझे बिहारीजी याद आते हैं जब वे कहते है कि

बढ़त-बढ़त संपत्ति सलिलु, मन सरोज खिली जाय,

घटत घटत पुनि न घटे, भले समूल कुम्हिलाए।

मेरी सहकर्मीजी का दुख क्योंकि घटत घटत फिरी ना घटे की श्रेणी में आता है इसलिए वे इसे कुछ इस अंदाज में कहती है कि-‘मैं बहुत संवेदनशील हूं किसी भी [जो केवल उनसे संबंधित हो] बात से या घटना से मैं केवल दुखी नहीं होती हूं, आहत होती हूं। उनकी बात से मुझे समझा कि संवेदनशील होना [सही अनुपात में] आपको आहत बनाता है। मैं सोचने लगी कि बदलती परिस्थितियों में संवेदनशील लोगों की परंपरा में जो मुनाफा..........क्षमा करिए इजाफा हुआ है वह ठीक वैसा ही है जैसे ‘बेमौसम बरसात’जो ना तो फसल के लिए उपयोगी है और न ही नसल के लिए।

मेरी आहतमयी सहकर्मी अपना पक्ष रखते हुए कहती है कि मैं बहुत परिपक्व हूं और जैसे जैसे आप परिपक्व होते है वैसे वैसे आप आहत होते हैं दुखी नहीं, दुखी होना तो बहुत छोटी और साधारण बात है। उनका कहना वैसे उतना गलत भी नहीं था जितना आम तौर पर होता है क्योंकि जब बड़े बड़े मुद्दों पर आहत होने से काम चल जाता है तो बेवजह दुख को क्यों अहमियत दी जाए।

मैंने उन्हें समझाने का असफल प्रयास वैसे तो कई बार किया लेकिन उनका बेनतीजा हो जाना ठीक वैसे ही तय था जैसे किसी नेता का [अभिनेतानुमा] यह कहना कि उसे तो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई दी है, या उसका यह कहना कि उसका उठाया गया कदम जनहित के लिए है। हृदय परिवर्तन जैसी कपोल-कल्पना आदि-आदि ।

मैंने उनसे कहा भी कि आप भला इतनी जल्दी निराश क्यों हो जाते हो, आधे भरे और आधे खाली ग्लास में से आप हमेशा खाली ग्लास को ही क्यों देखते हो? [मुझे ऐसा लगा मानो आशावादी होने का सबसे उम्दा उदाहरण मैंने दिया है परंतु मेरे इस उम्दा उदाहरण को उन्होंने ना केवल बदरंग किया बल्कि बदहवास भी कर दिया] मेरे इस सवाल पर पहले तो उन्होंने एक गंभीर मुद्रा बनाई [गंभीर मुद्रा कहते या सुनते ही मुझे हमेशा ही यह महसूस होता है कि वर्तमान में जो देशभक्ति की नई-नई स्कीम आ रही है उसके अंतर्गत गिरती हुई मुद्रा [रुपया] के आधार पर गंभीर मुद्रा [भाव] को भला राष्ट्रभक्ति का दर्जा क्यों ना दिया जाए] और उस गंभीर मुद्रा में कहा कि जहां तुमने आधा भरा ग्लास रखा है वहीं तो आधा खाली भी है, मैं भला उसे कैसे ना देखूं?

मुझे लगा ऐसे ज्यादा नहीं तो एक दो जिज्ञासु और मिल जाए तो मानसशास्त्र को आस शास्त्र में तब्दील होने में समय नहीं लगेगा। खैर, सवाल के बदले में आए सवाल ने मेरी सोच को और दृढ़ किया कि शब्दों की जंग में जीत तो किसी गूंगे की ही होगी। मैं अपने इस विचार को शांत कर ही रही थी कि उनका अपना एक विचार अशांत होने के कारण प्रतीक्षा नहीं कर पाया और प्रकट हो गया। वे मुझसे बोलीं- देखो मैंने इस कार्यक्षेत्र में एक लंबा समय बिताया है, मैं बहुत वरिष्ठ हूं और अपनी वरिष्ठता के आधार पर मुझे आहत होना शोभा देता है ना कि दुखी होना।

उनके इस विश्लेषण ने मेरे शब्द ज्ञान को वर्तमान के विकास .............................. पुनः क्षमा करें- तथाकथित विकास] की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया जो भगवान की ही तरह हर किसी पर प्रसन्न नहीं होता और जिस पर प्रसन्न होता है वह ना केवल फला-फूला सा बल्कि फूला-फूला सा हो जाने के कारण नजर आने लगता है ठीक नज़र न आने वाले विकास की भांति। मैं इससे संबंधित उनसे कुछ बोल पाती उससे पहले ही उनका अगला वाक्य ठीक वैसे ही आया जैसे सरकार की लुभावनी योजनाओं के आगे गरीब आ जाता है। वे अपनी ही रौ में बोलीं- क्योंकि मैं बहुत अनुभवी हूं इसलिए मेरा आहत होना ही ठीक है, इससे मैं संवेदनशील भी लगती हूं।

मुझे लगा ऐसा ही वह पल होगा जिसमें सीता ने धरती की गोद में शरण ली होगी क्योंकि मुझे वैसे तो सिखाया तो बहुत कुछ गया था पर यह किसी ने नहीं सिखाया था कि संवेदनशील व्यक्ति ही समझदार माना जाता है (होता है या नहीं पता नहीं) और इस हिसाब से आहतता याने बिना स्वर्गवासी हुए स्वर्ग की अनुभूति करना ।

देखा जाए तो इस समाजरूपी जमघट में वे अकेले नहीं है जो इस प्रकार की गुण विशेषता लिए हुए है, एक ‘सज्जन’ और भी है जो अपने ‘सज्ज’ न रहने के ‘अलंकार’ के कारण ही सज्जन की श्रेणी में आते हैं । ये सज्जन अपना आहत होने का कोई मौका नहीं छोड़ते । आहत होने के लिए इनकी निष्ठा इतनी अटल है कि उनसे पूछे गए सवालों के जवाब भी एक निष्ठ ही होते हैं जैसे, मान लो कि वे टी॰ वी॰ की ओर ध्यानस्थ अवस्था में बैठे है तो समझ जाइए कि वे आहतता की ही खुराक लेना चाहते हैं और ऐसे समय में धारावाहिक या विज्ञापन नहीं बल्कि समाचार चैनल ही हैं जो उनके आहत होने का मनोबल बनाए रखते हैं और ऐसे आहतातुर व्यक्ति से आपने यदि पूछ लिया – क्या देख रहे हो ?

तो वे कहेंगे – समाचार

अगला प्रश्न – समाचार में क्या ?

जवाब होगा – खबरें ।

उनका यह स्तब्ध कर देने वाला चौकन्नापन देखकर मैंने उनसे कई बार कहा कि – एक ही खबर को अनेक बार ‘गौर से देखिए, देखते रहिए के निर्देश (इसे आदेश भी कह सकते हैं) पर देखते रहने से कुछ हासिल भी होता है ? जितना आक्रोश से भरा यह प्रश्न था उतना ही शांत इसका उत्तर आया कि – हासिल क्यों नहीं होता इन्हें देख सुन कर तो मैं थोड़ी देर के लिए भावुक हो जाता हूँ ।

समाचार से भावुकता मेरे लिए ठीक वैसा ही अनुभव था जैसा कड़ी निंदा करने को लोग कडा निर्णय लेना समझ लेते हैं ।

मैंने उनसे जब यह पूछा कि समाचार से भला भावुक कैसे हुआ जाता है तो उनका जवाब कुछ यूं था कि – आजकल की खबरें बड़ी नियोजित (केवल प्रायोजित नहीं ) होती है ये ‘ताज’ में किसी तरह का आश्चर्य नहीं ढूंढती बल्कि धर्म ढूंढ लेती है और ताज धर्म के सर माथे होता है । इतना ही नहीं तो यहीं से पता चलता है कि नैतिक आचरण राजा महाराजाओं का भी हुआ करता था, सीमाएं तो तब पार होती हैं जब इस नैतिक विश्लेषण के मध्य अचानक से खबर आती है कि पशु विशेष की रक्षा के लिए पशुता की हद तक जाना भी मान्य है । जानकारी यहीं आकार नहीं रुकती तो यह भी पता चलता है कि असमय होने वाली मौत के अनेक कारणों में सांस (O2) का समावेश भी हो गया है । पलक झपकते ही करोड़ों की योजनाएं चमकने लगती हैं योजनाओं का प्रसारण होने लगता है जिसमें जीता जागता मनुष्य उस करोड़ों की राशि का आखिरी शून्य होता है जिसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं ।

जब वे रुके (हालांकि व रुकेंगे ऐसे लगा नहीं था) तो मुझे आश्चर्य इस बात का हुआ कि भावुक इंसान बोलता भी है क्योंकि मैंने भावुक लोगों को अब तक केवल रोते ही देखा था । वैसे वे रुके नहीं थे थोड़ी देर के लिए ठहर गए थे सो पुनः बोले – मैं समाचार देखकर भावुक नहीं होता हूँ बल्कि समाचारों की नीयत मुझे भावुक कर देती है । (मुझे थोड़े – थोड़े बिहारीजी फिर याद आने लगे) मैंने इन सज्जन से कहा – आप शायद आहत हो गए हैं ।

मेरे शब्द ज्ञान में तो यही एक शब्द था जो दुःख से बड़े दुःख के लिए उपयोग में आता था परंतु समस्या मेरे ही साथ थी क्योंकि मेरा शब्दज्ञान विकासशील था और उनका विकसित । वे बोले – भला आहत होने से क्या होगा ? क्या मैं स्थितियाँ बादल दूंगा ? मैं तो आहत होने तक समाचार की खबर रखता हूँ फिर चैनल चेंज ।

मेरे मस्तिष्क के चैनल (कड़ियों) ने दोनों व्यक्ति विशेष का संदेश दिया कि आहत तो हित देखकर हुआ जाता है । जहां सब कुछ इतनी तेजी से बादल रहा है (स्मार्ट हो रहा है) वहां भला भावनाएं क्यों एक ही ढर्रे पर चले वह क्यों न बदले । मुझे लगा शायद यही है वह भगवानरूपी विकास जो मनुष्य की बुद्धि पर सवार हो गया है, मन से मस्तिष्क की दौड़ हो रही है मानवता की हार निश्चित है ।

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सहायक आचार्य एवं विभाग प्रमुख

(हिन्दी विभाग)

वी.एम.वी. कॉमर्स, जे.एम.टी. आर्ट्स एवं

जे.जे.पी. साइन्स कॉलेजवर्धमान अगर, नागपुर

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: आहतोपदेश // डॉ. आभा सिंह
आहतोपदेश // डॉ. आभा सिंह
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