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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - महेंद्रभटनागर : समग्र (एक ख़ाका) - नेहपाल सिंह वर्मा

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

महेंद्रभटनागर : समग्र (एक ख़ाका)

-नेहपाल सिंह वर्मा

26 जून 1926 ई. को जन्मे कवि महेंद्रभटनागर अब 79 के हो जाएंगे। पराधीन भारत में जन्मे महेंद्रभटनागर स्वतंत्र भारत के नव-निर्माण हेतु अपनी लेखनी के साथ आज भी संघर्ष कर रहे हैं। उनका स्नेह ही है कि वे मुझ से महीने में दो-एक बार टेलीफ़ोन पर बात कर लेते हैं। पत्र लिखने में उन्हें कोई पीछे नहीं छोड़ सकता। निरन्तर पोस्टकार्ड पर अपनी बात पहुँचाते रहते हैं। पोस्टकार्ड पर उन्होंने ‘डा. महेंद्रभटनागर, शोध-निर्देशक (हिन्दी भाषा और साहित्य) मुद्रित करवाया है, यदि वे अपनी बहुमुखी प्रतिभा की विशेषताएँ दर्शाते तो पोस्टकार्ड को अपने लघु होने का अहसास होता। पिछले महीने उन्होंने फ़ोन पर सूचित किया था कि विशाखापट्णम के हिन्दी-कवि एवं समीक्षक प्रो. पी. आदेश्वर राव ने भी उनकी कविताओं का अंग्रेजी-काव्यानुवाद पूर्ण कर लिया है। इसके पूर्व, विशाखापट्णम की ही श्रीमती पारनन्दि निर्मला ने, जो कविताएँ, गीत, कहानियाँ लिखती हैं; आकाशवाणी-केन्द्र विशाखापट्णम से प्रसारित होती रही हैं, पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं और जिन्होंने ‘कानपुर विश्वविद्यालय’ और ‘आन्ध्र विश्वविद्यालय’ से हिन्दी में एम.ए. किया है, उनकी कविताओं का तेलुगु में अनुवाद किया है और यह संग्रह ‘दीपान्नि वेलिगिन्चु’ शीर्षक से सन् 2003 ई. में प्रकाशित भी हो चुका है। इस अनूदित काव्य-संग्रह की मूल कविताओं एवं अनुवाद-पक्ष पर डा.एस. शेषारत्नम, डा. पी. आदेश्वर राव, डा. बालशौरि रेड्डी, एल.आर. स्वामी और चित्रकवि आत्रेया ने विचार व्यक्त करते हुए इसे स्तरीय ठहराया। इस महीने फ़ोन पर महेंद्रभटनागर जी से पता चला कि ‘केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद’ के रीडर (हिन्दी-विभाग) डा. रविरंजन द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘डा. महेंद्रभटनागर का कवि-व्यक्तित्व’ प्रकाशित हो गयी है; जिसे ‘मिलिन्द प्रकाशन, हैदराबाद’ ने प्रकाशित किया है। मेरे लिए यह समाचार अत्यन्त हर्षवर्धक था। मैंने उन्हें बधाई दी और सोचने लगा कि महेंद्रभटनागर के काव्य-संसार का क्षेत्र कितना विस्तृत होता जा रहा है।

महेंद्रभटनागर के काव्य-संसार के बारे में जब सोचता हूँ तो एक लम्बी सूची मेरे सम्मुख आ जाती है। पहला कविता-संग्रह ‘तारों के गीत’ सन् 1949 में प्रकाशित हुआ; जिसमें तारों पर रचित गीत थे। इसके पश्चात ‘टूटती शृंखलाएँ’ (1949), ‘बदलता युग’ (1953), ‘अभियान’ (1954), ‘अन्तराल’ (1954), ‘विहान’ (1956), ‘नयी चेतना’ (1956), ‘मधुरिमा’ (1959), ‘जिजीविषा’ (1962), ‘संतरण’ (1963), ‘संवर्त’ (1972), ‘संकल्प’ (1977), ‘जूझते हुए’ (1984), ‘जीने के लिए’ (1990), ‘आहत युग’ (1997), ‘अनुभूत क्षण’ (2001), ‘मृत्यु-बोध : जीवन-बोध’ (2002), राग-संवेदन (2005) कुल अठारह संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनके अतिरिक्त ‘चयनिका’ (1966), बूँद नेह की : दीप हृदय का’ (1967 / द्वितीय संस्करण ‘हर सुबह सुहानी हो’ 1984 / तृतीय संस्करण ‘महेंद्र भटनागर के गीत’ 2001), ‘कविश्री : महेंद्रभटनागर’ (संवत् 2027), ‘महेंद्रभटनागर की कविताएँ’ भाग - 1 / 1981) आदि संकलन भी प्रकाशित हुए। आलोचना-कर्म में ‘आधुनिक साहित्य और कला’ (1956), ‘दिव्या : एक अध्ययन / विचार और कला’ (1956 /1972), समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ (1957 / चतुर्थ संस्करण 1982), ‘विजय-पर्व : एक अध्ययन’ (1957), ‘नाटककार हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ और ‘संवत्-प्रवर्त्तन’ (1961), ‘पुण्य-पर्व आलोक’ (1962), ‘हिन्दी कथा-साहित्य : विविध आयाम’ (1988), ‘नाट्य-सिद्धान्त और हिन्दी नाटक’ (1962), उनके द्वारा लिखित लघुकथा एवं रेखाचित्र - ‘लड़खड़ाते क़दम’ (1952), ‘विकृतियाँ’ (1958) और दोनों संयुक्त ‘विकृत रेखाएँ : धुँधले चित्र’ (1966) भी प्रकाशित हुए हैं। एकांकी और रेडियो-फ़ीचर क्षेत्र में उनकी पुस्तक ‘अजेय-आलोक’ (1962 / 1974) उपलब्ध है। उनके द्वारा लिखित बाल-किशोर साहित्य - ‘हँस-हँस गाने गाएँ हम!’ (1957), ‘बच्चों के रूपक’ (1958) / ‘स्वार्थी दैत्य एवं अन्य रूपक’ (1958), ‘देश-देश की बातें’ (1967) / ‘देश-देश की कहानी’ (1982), ‘जय-यात्रा’ (1971), ‘दादी की कहानियाँ’ (1974) प्रकाशित हुयी हैं। इन पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य कोश’ (‘ज्ञानमंडल’, वाराणसी) के भाग - 1 (संस्करण द्वितीय) में सह-लेखन की भूमिका का भी निर्वाह किया है।

‘आकाशवाणी’ से उनकी रचनाएँ प्रसारित होती रही हैं। अखिल भारतीय स्तर के परिसंवादों में प्रतिभागी रहे हैं। बिहार, उत्तर-प्रदेश, राजस्थान, गुजरात की साहित्यिक संस्थाओं की पुरस्कार-योजनाओं के निर्णायक रहे। मध्य-प्रदेश सरकार की ‘कला-परिषद्’ ने सन् 1952 में और ‘मध्य-प्रदेश शासन साहित्य परिषद’ ने सन् 1958, 1960, 1985 में पुरस्कृत किया। इसके अतिरिक्त समय-समय पर उनका अभिनन्दन, सम्मान होता रहा है; जिसकी एक लम्बी सूची है; जबकि महेंद्रभटनागर पुरस्कारों एवं सम्मानों के पीछे कभी भागे नहीं। एक मज़ेदार घटना हुई; जिसका संबंध संयुक्त-राज्य-अमेरीका से है। वहाँ की एक संस्था ‘ए.बी.आई.’(अमेरीकन बायोग्राफिकल इन्सटीट्यूट) ने उन्हें चौदह बार अलग-अलग नामों से सम्मानित होने की सूचना दी, पर इन्होंने न तो मेडल के लिए, न डिप्लोमा के लिए, न डिग्री के लिए और न डायरेक्टरी ख़रीदने के लिए धनराशि भेजी। फलस्वरूप उन्हें आज-तक कोई प्रमाण-पत्र प्राप्त नहीं हुआ! अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलाये जाने वाले इस फ्रॉड से महेंद्रभटनागर बच कर निकल गये।

पत्रकारिता के क्षेत्र में सन् 1948-49 में उज्जैन से प्रकाशित ‘सन्ध्या’ (मासिक) एवं सन् 1958 में उज्जैन से ही प्रकाशित ‘प्रतिकल्पा’ (त्रैमासिक) नामक साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्पादन किया। इस काम में उन्हें प्रभाकर माचवे, पं. सूर्यनारायण व्यास, शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, मन्मथनाथ गुप्त, ‘अंचल’, त्रिलोचन शास्त्री, रामविलास शर्मा, रांगेय राघव आदि का रचनात्मक एवं राहुल सांकृत्यायन, सेठ गोविन्ददास, ‘अज्ञेय’, उदयशंकर भट्ट, रघुवंश, विनयमोहन शर्मा आदि का उत्साहवर्द्धक समर्थन प्राप्त हुआ। ग्वालियर के दैनिक पत्र ‘नवभारत’ के साहित्य परिशिष्ट से भी जुड़े रहे। उनके द्वारा लिखित एवं सम्पादित कई पुस्तकें पाठ्य-क्रमों का भाग रहीं।

महेंद्रभटनागर को इस बात का सम्मान मिला है कि उनकी कविताओं का अनुवाद देश-विदेश की भाषाओं में हुआ है और हो रहा है। चेकोस्लोवेकिया के हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रोफे़सर डा. ओडोलन स्मेकल ने उनकी कविताओं के अनुवाद चेक भाषा में किये; जो चेक-पत्रिका ‘नोवे ओरिएण्ट’ में छपे। 24 जनवरी 1957 को चेक-रेडियो से उनकी एक कविता ‘काटो धान’ प्रसारित हुई। यह महेंद्रभटनागर की कविता का प्रथम विदेशी भाषा में प्रसारण था। उसके बाद अंग्रेज़ी में तमाम कविताओं के अनुवाद हुए / हो रहे हैं; जो ग्यारह ज़िल्दों में उपलब्ध हैं। श्री. अमीर मोहम्मद खाँ, प्रो. लक्ष्मीशंकर शर्मा, डा. रविनन्दन सिन्हा (यशस्वी अंग्रेज़ी-कवि, ‘द क्वेस्ट’ साहित्यिक पत्रिका (राँची) के सम्पादक, अंग्रेज़ी-प्रोफे़सर) , डा. हरिश्चंद्र गुप्ता, डा. डी.सी. चम्बियाल (यशस्वी अंग्रेज़ी-कवि, ‘पोइटक्रिट’ साहित्यिक पत्रिका (हिमाचल-प्रदेश) के सम्पादक, अंग्रेज़ी-प्रोफे़सर), श्री. केदारनाथ शर्मा, डा. पी. आदेश्वर राव आदि अंग्रेज़ी के अनुवादक रहे। डा. नगेन्द्र, डा. रामविलास शर्मा, प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त, डा. आनन्दप्रकाश दीक्षित, प्रो. रामदेव आचार्य, डा. विद्यानिवास मिश्र आदि ने इन अनुवादों की प्रशंसा की। फ्रेंच-भाषा में श्रीमती पूर्णिमा राय (बर्दवान, पश्चिम बंगाल) ने 108 कविताओं के अनुवाद किये; जो पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। तमिल में जमदग्नि, एस. रामचन्द्रन, डा. पी. जयरामन ने काव्यानुवाद किये हैं। मळयालम में सी. कृष्णन नायर, डा. एन. चंद्रशेखरन नायर आदि ने काव्यानुवाद किये हैं। कन्नड़ में अनुवादक हैं - नारायण राव, श्रीमती शशिकला देवी (मैसूर)। तेलुगु में डा. भीमसेन ‘निर्मल’, श्रीमती पारनन्दि निर्मला, के.वी.एस. रघुपति राव के नाम उल्लेखनीय हैं। मराठी में डा. नरहरि चिंतामणि जोगळेकर, डा. प्रतिभा मुदलियार, श्रीमती मृणालिनी घुले अनुवादक हैं। गुजराती अनुवादक हैं डा. आर. एच वणकर, श्रीमती वीणा अंधारिया, सुलभ धंधुकिया। ओड़िया भाषा में डा. ज्ञानप्रकाश महापात्र, डा. रजतकुमार षड़ंगी ने अनुवाद किये हैं। मणिपुरी में डा. मेघचंद्र सिंह ने और बाँगला में डा. विमुक्ता प्रसाद और श्रीमती पूर्णिमा रे ने। डा. एन. पी. कुट्टन पिल्लै ने ‘प्रगति चेतना के कवि महेंद्रभटनागर और ओ. एन. वी. कुरुप’ (तेलुगु-कवि) तथा डा. ज्ञानप्रकाश महापात्र ने ‘मानव-मुक्ति के सिपाही सच्चिदानंद राउतराय (ओड़िया-कवि) और महेंद्रभटनागर’ नामक तुलनात्मक आलेख लिखे।

डा. महेंद्रभटनागर का सम्पूर्ण साहित्य-‘डा. महेंद्रभटनागर-समग्र’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है; जिसके छह खंड हैं। खंड 1, 2, 3 कविता, खंड 4, 5 आलेचना और खंड 6 विविध पर आधारित है।

महेंद्रभटनागर के साहित्य पर पर्याप्त शोध-कार्य हुआ है / हो रहा है। सर्व-प्रथम डा. माधुरी शुक्ला ने ‘प्रगतिवादी कवि डा. महेंद्रभटनागर : अनुभूति और अभिव्यक्ति’ (प्रकाशित) पर, डा. लक्ष्मीनारायण दुबे के निर्देशन में, शोध-प्रबन्ध लिखा। ‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ से सन 1985 में पी-एच. डी. की उपाधि प्रदान की गयी। ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ से श्रीमती विनीता मानेकर को ‘महेंद्रभटनागर और उनकी सर्जनशीलता’ (प्रकाशित) पर, डा. म. म. कडू के निर्देशन में, सन 1990 में एवं ‘सम्बलपुर विश्वविद्यालय’ (उड़ीसा) से डा. रजत षड़ंगी को ‘डा. महेंद्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल’ पर, डा. सुधांशु कमार नायक के निर्देशन में, सन 2003 में डॉक्टोरेट प्रदान की गयी। अनेक विश्वविद्यालयों में अनेक शोधार्थी पंजीकृत हैं; शोध-कार्य में रत हैं। इनके अतिरिक्त अनेक एम. फिल. और स्नातकोत्तर लघु-शोध-प्रबन्ध भी लिखे जा चुके हैं।

हिन्दी साहित्य में हज़ारों पृष्ठों की अभिवृद्धि करने वाले डा. महेंद्रभटनागर सारी रात जग कर नहीं लिखते। वह रात में 11.00 बजे के क़रीब सो जाते हैं और प्रातः 5.00 बजे उठते हैं। प्रातःकाल घूमने नहीं जाते, पर रोगों से मुक्त रहने हेतु योगासन करते हैं। भोजन सीधा-सादा करते हैं। मांस-अंडे से नफ़रत है। जीवन में आज-तक एक बूँद शराब की नहीं चखी। कवि-सम्मेलनों में, अब कविता नहीं पढ़ते, तम्बाकू से मित्रता नहीं की। इस कारण बीड़ी, सिगरेट के छल्लेदार धुँए के आनन्द से वंचित रहे। 79 वर्ष की आयु में पूर्ण स्वस्थ हैं और प्रयास करते हैं कि युवा पीढ़ी के साथ सम्पर्क बना रहे। उन्हे दुःख है कि उनके कई मित्र स्वर्ग सिधार गये। उन जाने वालों में सभी अग्रज व समान आयु के ही नहीं थे, अपितु कुछ अनुज भी हैं।

महेंद्रभटनागर की एक और विशेषता यह है कि वे यात्रा नहीं करते। घर में रहना पसंद करते हैं। उनकी सरल आदतें भी आज के युग में विचित्र लगती हैं। अब इसी को लीजिए उनके प्रकाशित चित्र को देख कर आप कह उठेंगे कि यह किसी राजपूत योद्धा का चित्र है या फिर चंबल के किसी ख़तरनाक डाकू का। ऐसा कहने का कारण उनके चेहरे पर उग आयी दाढ़ी है। उनकी दाढ़ी को देखकर लगता है कि किसी ने मुट्ठी भर श्वेत बादल लेकर उनके चेहरे पर चिपका दिया है। इस दाढ़ी की लम्बाई कम है वरना वह सरदार या योगी दिखाई दे सकते थे। महेंद्रभटनागर अपनी इस फैली हुई दाढ़ी के बारे में बताते हैं कि उन्हें ऐसी एलर्जी हो गयी है जिसके कारण कोई साबुन उनकी दाढ़ी पर नहीं लगाया जा सकता। जब बाल कटवाते हैं तब दाढ़ी छोटी करवा लेते हैं। इसलिए दाढ़ी लम्बी होने के स्थान पर फैल गयी है। उनके नाम ‘महेंद्रभटनागर’ की भी एक कहानी है। यह नाम, स्वीडन के किसी लेखक के नाम के ध्वनि-साम्य पर रख लिया गया था। वे कहते हैं, ”मेरा नाम वास्तव में ‘महेंद्र’ है या फिर ‘महेंद्रभटनागर’। मात्र ‘भटनागर जी’ उचित नहीं।’’ इस शब्द से उन्हें चिढ़ है। आलेख ‘मेरे कवि-जीवन के पन्द्रह-वर्ष’ में उन्होंने लिखा है कि ‘भटनागर’ कार्यस्थों (‘कायस्थ’ शुद्ध नहीं) में भी होते हैं।

महेंद्रभटनागर का जन्म 26 जून, सन् 1926 को प्रातः 6.00 बजे झाँसी में उनके ननसार में किराये के मकान में हुआ। पिता श्री रघुनन्दलाल ग्वालियर-रियासत में प्रारम्भ में 18 रुपये मासिक पर अध्यापक का कार्य करते थे। उनके पिता का 17 जुलाई 1959 को 56 वर्ष की आयु में, ग्वालियर में, निधन हुआ। उन्होंने अपने पिताश्री के निधन पर लिखा :

हे दुर्भाग्य, पिता को छीन लिया तुमने

पर, मेरा जीवन-विश्वास न छीनो तुम,

चारों ओर दिया भर शीतल गहरा तम

पर, अरुण अनागत की आस न छीनो तुम!

(‘जिजीविषा’)

उनकी माता श्रीमती गोपाल देवी धार्मिक मनोवृत्ति की महिला थीं। हिन्दी, उर्दू जानती थीं। 14 जुलाई, 1977 को 77 वर्ष की आयु में, उज्जैन में, निधन हुआ। उनके नाना मुंशी हरस्वरूप के सुपुत्र वंशीधर थे। बुलंदशहर (उ.प्र.) गाँव रसूलपुरा में गढ़ी बनाकर रहते थे। सिकन्दराबाद के मूल निवासी थे। अंग्रेज़-कलेक्टर के पेशकार चीफ़-रीडर थे। महेंद्रभटनागर का बचपन झाँसी में बीता। उनके मामाओं को पतंगबाज़ी का शौक़ था; उन्होंने उनसे माँजा सूतना सीखा। बचपन में उनके सौन्दर्य-बोध के कारण एक बार घर में आग भी लग गयी। हुआ यूँ कि घर की छत पर दीवार से टिकी, गर्मियों में दरवाज़े-खिड़कियों पर लगानेवाली काँटों की टट्टियाँ रखीं थीं। महेंद्रभटनागर ने छत की सफ़ाई की। एक टट्टी में अख़बार के कागज़ का एक टुकड़ा फँसा हुआ था; जो उनके सौन्दर्य-बोध में बाधक था। बहुत प्रयास करने के पश्चात भी जब वह कागज़ नहीं निकला तो उन्होंने सोचा क्यों न आग लगाकर इसे जला दिया जाय और कागज़ की राख को फूँक मारकर उड़ा दिया जाय। लेकिन कागज़ के टुकड़े में आग लगते ही, काँटों की टट्टियों ने भी आग पकड़ ली और वे धू-धू कर जलने लगीं। बड़ी मुश्किल से आग पर काबू पाया जा सका। गणेश-चतुर्थी के डोलों पर और ताज़ियों के जुलूसों में शामिल होते थे। एक बार, अपनी एक और मूर्खता के कारण जमनाशियम के सिंगिल-बार से गिर गये और कुहनी की हड्डी टूट गयी। जूनियर ओलम्पिक में हाई-जम्प में भाग लिया और चार-फुट से अधिक ऊँची कूद लगायी और रजत-पदक प्राप्त किया। चाचाजी ने कहा, ‘‘तुम तो बहुत बड़े उचक्के निकले’’-तो आहत होकर मेडल बहन को दे दिया।

कॉलेज में शतरंज-प्रतियोगिता में भाग लिया। अपने शतरंज खेलने पर बहुत अभिमान हो गया था। लगातार दो बाज़ी हार जाने के बाद, तीसरी बाज़ी भी हार जाने की जब भूमिका बन गयी, तो प्रतिद्वन्द्वी पर इल्ज़ाम लगाकर मोहरे फेंक दिये; जिसका आज भी दुख है। उन दिनों छात्र-यूनियन के अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपेयी थे। ख़ाकी नेकर और बंद गले की कमीज़ पहनते थे। ओजपूर्ण भाषण देते थे। उस समय द्वितीय महायुद्ध और स्वतंत्रता-आन्दोलन चल रहे थे; जिनका प्रभाव इनकी कविताओं पर भी पड़ा। शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ ने भी इन्हें पढ़ाया था। ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ की परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण कीं। तब कन्हैयालाल मुंशी सम्मेलन के अध्यक्ष थे। सर्वप्रथम ‘आदर्श विद्यालय, उज्जैन’ में अध्यापन-कार्य किया; इस विद्यालय में उनके ठीक-पूर्व गजानन माधव मुक्तिबोध अध्यापन कर चुके थे। सन 1948 में ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ से हिन्दी में एम. ए. किया। प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष डा. विनयमोहन शर्मा से परिचय हुआ; जो शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में सहायक हुए। मध्य-प्रदेश में उज्जैन, धार, दतिया, इंदौर, ग्वालियर, महू, मंदसौर में हाई-स्कूल से स्नातकोत्तर कॉलेज तक, टीचर से प्रोफ़ेसर और आचार्य तक के पदों पर, पहुँचने में सफलता प्राप्त की।

डा. विनयमोहन शर्मा के निर्देशन में ‘प्रेमचंद के उपन्यास’ पर शोध-प्रबन्ध लिख कर पी-एच. डी. की उपाधि सन् 1957 में प्राप्त की। प्रबन्ध ‘हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी’ द्वारा ‘समस्यालूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ शीर्षक से सन् 1957 में ही प्रकाशित हुआ। महेंद्रभटनागर की सेवानिवृत्ति के बाद प्राध्यापकों की सेवानिवृत्ति-आयु 60 वर्ष कर दी गयी और वह ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के नये वेतनमान एवं पेंशन-लाभ से वंचित रह गये। उन्हें मात्र 930/- रुपये मासिक पेंशन हुई।

महेंद्रभटनागर का विवाह 12 मई 1952 को श्रीमती कमलेश कुमारी से हुआ, इन्होंने अपनी पत्नी का नाम बदलकर सुधारानी रख दिया। बड़े पुत्र अजय बी.एस-सी.एम.बी., बी. एस. का विवाह ममता से हुआ जो गायन में एम. ए. हैं। उनके दो पुत्र विराज और स्वराज हैं। दूसरे पुत्र आलोक एम. एस-सी. (प्राणी-विज्ञान) का विवाह अर्चना (अंग्रेज़ी में एम.ए.) से हुआ। दो सुपुत्रियाँ इरा और ईशा और एक पुत्र रजत है। तीसरे पुत्र कुमार आदित्य विक्रम एम.ए. संगीत (गायन) यशस्वी सुगम-संगीत-गायक का विवाह सीमा (इतिहास में एम.ए.) से हुआ। असीम विक्रम और सुसीम विक्रम दो पुत्र हैं।

डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ की अभिशंसा पर, हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर-पद पर दो-वर्ष की प्रतिनियुक्ति पर ताशकंद (रूस) जाने का अवसर आया। इनका नाम देखकर उस समय के विदेशी-मंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें दिल्ली बुलाया था। हरी झंडी दिखा दी थी; परन्तु बाद में रूस-सरकार की नीति के अनुसार वहाँ के छात्र और अध्यापक ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ आकर हिन्दी पढ़ने लगे और इनका ताशकंद जाना सम्भव न हो सका।

महेंद्रभटनागर की प्रथम कविता ‘हुँकार’, ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) जैसे लब्ध-प्रतिष्ठ मासिक पत्र में मोहनसिंह सेंगर ने प्रकाशित की। वह कविता थी :

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ!

मैं क्रांति की हुँकार हूँ!

मैं न्याय की तलवार हूँ!

शक्ति जीवन जागरण का

मैं सबल संसार हूँ!

लोक में नव-द्रोह का

मैं तीव्रगामी ज्वार हूँ!

फिर नये उल्लास का,

मैं शांति का अवतार हूँ!

(‘टूटती शृंखलाएँ’)

उनकी प्रारम्भिक कविताएँ माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘महेंद्र’ नाम से ‘कर्मवीर’ में प्रकाशित की थीं। जगन्नाथप्रसाद ‘मिलिन्द’ ने ‘जीवन’ में उनकी रचनाएँ प्रकाशित कीं जब वह बी.ए. के छात्र थे। सन् 1946-47 से ‘हंस’ में नियमित प्रकाशन से उन्हें ख्याति मिली और उनकी गणना प्रगतिशील-कविता-धारा के प्रमुख कवियों में होने लगी।

महेंद्रभटनागर-विरचित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ अद्यतन विशिष्ट कविताएँ :

(1) लमहा

एक लमहा

सिर्फ़ एक लमहा

एकाएक छीन लेता है

ज़िन्दगी!

हाँ, फ़क़त एक लमहा।

हर लमहा

अपना गूढ़ अर्थ रखता है,

अपना एक मुकम्मिल इतिहास

सिरजता है,

बार - बार बजता है।

इसलिए ज़रूरी है -

हर लमहे को भरपूर जियो,

जब-तक

कर दे न तुम्हारी सत्ता को

चूर - चूर वह।

हर लमहा

ख़ामोश फिसलता है

एक-सी नपी रफ़्तार से

अनगिनत हादसों को

अंकित करता हुआ,

अपने महत्त्व को

घोषित करता हुआ!

(2) नहीं

लाखों लोगों के बीच

अपरिचित अजनबी

भला,

कोई कैसे रहे!

उमड़ती भीड़ में

अकेलेपन का दंश

भला,

कोई कैसे सहे!

असंख्य आवाज़ों के

शोर में

किसी से अपनी बात

भला,

कोई कैसे कहे!

(3) यथार्थ

राह का

नहीं है अंत

चलते रहेंगे हम!

दूर तक फैला अँधेरा

नहीं होगा ज़रा भी कम!

टिमटिमाते दीप-से

अहर्निश

जलते रहेंगे हम!

साँसें मिली हैं

मात्र गिनती की

अचानक एक दिन

धड़कन हृदय की जायगी थम!

समझते-बूझते सब

मृत्यु को छलते रहेंगे हम!

हर चरण पर

मंज़िलें होती कहाँ हैं?

ज़िन्दगी में

कंकड़ों के ढेर हैं

मोती कहाँ हैं?

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कवि परिचय - डॉ. महेंद्रभटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

26 जून, 1926 को प्रातः 6 बजे झाँसी (उ. प्र.) में, ननसार में, जन्म ।

प्रारम्भिक शिक्षा झाँसी, मुरार (ग्वालियर), सबलगढ़ (मुरैना) में। शासकीय विद्यालय, मुरार (ग्वालियर) से मैट्रिक (सन् 1941), विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर (सत्र 41-42) और माधव महाविद्यालय, उज्जैन (सत्र 42-43) से इंटरमीडिएट (सन् 1943), विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से बी.ए. (सन् 1945), नागपुर विश्वविद्यालय से सन् 1948 में एम.ए. (हिन्दी) और सन् 1957 में ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ विषय पर पी-एच.डी.

जुलाई, 1945 से अध्यापन-कार्य - उज्जैन, देवास, धार, दतिया, इंदौर, ग्वालियर, महू, मंदसौर में।

‘कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ग्वालियर’ (जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर) से 1 जुलाई 1984 को प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।

कार्यक्षेत्र - चम्बल-अंचल, मालवा, बुंदेलखंड।

सम्प्रति - शोध-निर्देशक - हिन्दी भाषा एवं साहित्य।

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अधिकांश साहित्य ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ के छह-खंडों में एवं काव्य-सृष्टि ‘महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा’ के तीन खंडों में प्रकाशित।

महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा

खंड - 1

1.तारों के गीत 2. विहान 3. अन्तराल 4. अभियान. 5 बदलता युग

6. टूटती श्रृंखलाएँ

खंड - 2

7. नयी चेतना 8. मधुरिमा 9. जिजीविषा 10.संतरण 11.संवर्त

खंड - 3

12. संकल्प 13. जूझते हुए 14. जीने के लिए 15. आहत युग, 16. अनुभूत-क्षण 17. मृत्यु-बोध - जीवन-बोध 18. राग-संवेदन, 19 प्रबोध, 20 विराम

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काव्येतर कृतियाँ

1 समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद

2 प्रेमचंद के कथा-पात्र

3 सामयिक परिदृष्य और कथा-स्रष्टा प्रेमचंद

(विचारक, उन्यासकार, कहानीकार)

4 साहित्य : विमर्ष और निष्कर्ष (आलोचना : खंड-1)

5 साहित्य : विमर्ष और निष्कर्ष (आलोचना : खंड-2)

6 जीवन का सच (लघुकथा / रेखाचित्रादि)

7 प्रकाश-स्तम्भ (एकांकी / रेडियो फ़ीचर)

8 वार्तालाप जिज्ञासुओं से (साक्षात्कार - भाग- 1)

9 वार्तालाप जिज्ञासुओं से (साक्षात्कार - भाग- 2)

10 साहित्यकाराें से आत्मीय संबंध (पत्रावली - संस्मरणिका)

11 साहित्य : बालकों के लिए

(1) हँस-हँस गाने गाएँ हम!

(2) बच्चों के रूपक

(3) देश-देश के निवासी

(4) दादी की कहानियाँ

12 साहित्य - किशोरों के लिए

(जय-यात्रा एवं विविध)

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प्रतिनिधि काव्य-संकलन

1 आवाज़ आएगी (कविता-संचयन)

2 कविता-पथ - सर्जक महेन्द्रभटनागर (सं. उमाशंकर सिंह परमार)

3 सृजन-यात्रा (कविता-संचयन)

4 कविताएँ - मानव-गरिमा के लिए (हिंदी-अंग्रेज़ी)

5 सरोकार और सृजन (कविता-संचयन)

6 जनकवि महेंद्रभटनागर (सं. डॉ. हरदयाल)

7 जनवादी कवि महेन्द्रभटनागर (सं. डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव)

8 प्रगतिशील कवि महेंद्रभटनागर (सं. डॉ. संतोषकुमार तिवारी)

8 जीवन जैसा जो है (हिंदी-अंग्रेज़ी)

10 जीवन-राग (कविता-संचयन)

11 चाँद, मेरे प्यार! (हिंदी-अंग्रेज़ी)

12 इंद्रधनुष (प्रकृति-चित्रण)

13 गौरैया एवं अन्य कविताएँ (हिंदी-अंग्रेज़ी / प्रकृति-चित्रणे)

14 मृत्यु और जीवन (हिंदी-अंग्रेज़ी)

15 जीवन गीत बन जाए! (गेय गीत /प्रस्तुति : आदित्य कुमार)

16 महेंद्रभटनागर के नवगीत (सं. देवेन्द्रनाथ शर्मा ‘इंद्र’)

17 कविश्री : महेंद्रभटनागर / संयोजक : शिवमंगलसिंह ‘सुमन’

18 चयनिका

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महेंद्रभटनागर-समग्र

खंड - 1 कविता

तारों के गीत, विहान, अन्तराल, अभियान, बदलता युग। परिशिष्ट : आत्म-कथ्य - जीवन और कृतित्व, अध्ययन-सामग्री एवं अन्य संदर्भ।

खंड - 2 कविता

टूटती श्रृंखलाएँ, नयी चेतना, मधुरिमा, जिजीविषा, संतरण।

खंड - 3 कविता

संवर्त, संकल्प, जूझते हुए, जीने के लिए, आहत युग, अनुभूत क्षण। परिशिष्ट : काव्य-कृतियों की भूमिकाएँ।

खंड - 4 आलोचना

हिन्दी कथा-साहित्य, हिन्दी-नाटक। परिशिष्ट : साक्षात्कार।

खंड - 5 आलोचना

साहित्य-रूपों का सैद्धान्तिक विवेचन एवं उनका ऐतिहासिक क्रम-विकास, आधुनिक काव्य। / परिशिष्ट - साक्षात्कार, आदि।

खंड - 6 विविध

साक्षात्कार / रेखाचित्र / लघुकथाएँ / एकांकी / रेडियो-फीचर /गद्य-काव्य / वार्ताएँ/ आलेख /बाल / किशोर साहित्य / संस्मरणिका / पत्रावली। परिशिष्ट - चित्रावली।

खंड - 7 शोध / प्रेमचंद-समग्र

सामयिक परिदृष्य और कथा-स्रष्टा प्रेमचंद (समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचन्द)

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मूल्यांकन / आलोचनात्मक कृतियाँ

(1) कविता-पथ / सर्जक महेन्द्रभटनागर

- उमाशंकर सिंह परमार

(2) महेंद्रभटनागर का काव्य-लोक

- वंशीधर सिंह

(3) महेंद्रभटनागर की काव्य-संवेदना : अन्तः अनुशासनीय आकलन

- डा. वीरेंद्र सिंह

(4) कवि महेंद्रभटनागर का रचना-कर्म

- डा. किरणशंकर प्रसाद

(5) डा. महेंद्रभटनागर की काव्य-साधना

- ममता मिश्रा

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सम्पादित

(1) कवि महेन्द्रभटनागर-विरचित काव्य-कृतियाँ /

मूल्यांकन और मूल्यांकन (भाग 1 और 2)

- सं. डॉ. अनिला मिश्रा

(2) संवेदना का शब्द-शिल्पी

- सं. बृजेश नीरज

(3) महेंद्रभटनागर की कविता : अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति

- सं. डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

(4) कवि महेंद्रभटनागर की रचनाधर्मिता

- सं. डॉ. कौशल नाथ उपाध्याय

(5) महेंद्रभटनागर की काव्य-यात्रा

- सं. डॉ. रामसजन पाण्डेय

(6) डॉ. महेंद्रभटनागर का कवि-व्यक्तित्व

- सं. डॉ. रवि रंजन

(7) सामाजिक चेतना के शिल्पी : कवि महेंद्रभटनागर

- सं. डॉ. हरिचरण शर्मा

(8) कवि महेंद्रभटनागर का रचना-संसार

- सं. डॉ. विनयमोहन शर्मा

(9) कवि महेंद्रभटनागर : सृजन और मूल्यांकन

- सं. डॉ. दुर्गाप्रसाद झाला

(10) मृत्यु और जीवन

(महेंद्रभटनागर की 50 कविताएँ) आलोचनात्मक आलेख

(11) ‘राग-संवेदन’ : दृष्टि और सृष्टि

(महेंद्रभटनागर की 50 कविताएँ) आलोचनात्मक आलेख

(12)‘ अनुभूत-क्षण’ : दृष्टि और सृष्टि

(महेंद्रभटनागर की 55 कविताएँ) आलोचनात्मक आलेख

(13) महेंद्रभटनागर के नवगीत

(महेंद्रभटनागर के 50 नवगीत) आलोचनात्मक आलेख

(13) जीवन गीत बन जाए!

(महेंद्रभटनागर के गेय गीत) आलोचनात्मक आलेख

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प्रकाशित शोध-प्रबन्ध

(1) महेंद्रभटनागर की सर्जनशीलता

- डा. विनीता मानेकर

(2) प्रगतिवादी कवि महेंद्रभटनागर : अनुभूति और अभिव्यक्ति

- डा. माधुरी शुक्ला

(3) महेंद्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मकः धरातल

- डा. रजत कुमार षड़ंगी

(4) कवि महेन्द्रभटनागर

- डा० गिरिराज कुमार बिरादर

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अन्य स्वीकृत शोध-प्रबन्ध (अप्रकाशित)

(5) महेंद्रभटनागर के काव्य में संवेदना के विविध आयाम

- डा. प्रमोद कुमार

(6) डा. महेंद्रभटनागर : व्यक्तित्व एवं कृतित्व

- डा. मंगलोर अब्दुलरज़़ाक बाबुसाब

(7) डा. महेंद्रभटनागर के काव्य का नव-स्वछंदतावादी मूल्यांकन

- डा. कविता शर्मा

(8) डा. महेंद्रभटनागर के काव्य में सांस्कृतिक चेतना

- डा. अलका रानी सिंह

(9) महेंद्रभटनागर का काव्य : कथ्य और शिल्प

- डा. मीना गामी

(10) डॉ. महेंद्रभटनागर के काव्य में समसामयिकता

- डा. विपुल रणछोड़भाई जोधाणी

(11) डॉ. महेंद्रभटनागर की गीति--रचना : संवेदना और शिल्प

- डा. रजनीकान्त सिंह

(12) महेंद्रभटनागर की कविता : एक मूल्यांकन

- डा. रोशनी बी० एस०

(13) हिन्दी की प्रगतिवादी काव्य-परम्परा में महेन्द्रभटनागर का योगदान

- डॉ. निरंजन बेहेरा

(14) डॉ. महेन्द्रभटनागर की कविता

- डॉ. निशा बी. माकड़िया, राजकोट (गुजरात)

(15) डॉ. महेन्द्रभटनागर के काव्य में जीवन-संघर्ष की चेतना

- डॉ मालती यादव

(16) महेन्द्रभटनागर के काव्य की अन्तर्वस्तु : एक आलोचना

- डॉ अमित राठौर

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सह-लेखन

(1) हिन्दी साहित्य कोष

(भाग - 1 / द्वितीय संस्करण / ज्ञानमंडल, वाराणसी),

(2) तुलनात्मक साहित्य विश्वकोष : सिद्धान्त और अनुप्रयोग

(खंड - 1 / महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा)

सम्पादन

‘सन्ध्या’ (मासिक / उज्जैन 1948-49),

‘प्रतिकल्पा’ (त्रैमासिक / उज्जैन 1958)

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सम्मान / पुरस्कार

(1) ‘कला-परिषद्’ मध्य-भारत सरकार ने, 1952 में।

(2) ‘मध्य-प्रदेश शासन साहित्य परिषद्’, भोपाल ने /1958 और 1960 में।

(3) ‘मध्य-भारत हिन्दी साहित्य सभा’, ग्वालियर ने, 1979 में।

(4) ‘मध्य-प्रदेश साहित्य परिषद्’, भोपाल ने, 1985 में।

(5) ‘ग्वालियर साहित्य अकादमी’ द्वारा अलंकरण-सम्मान, 2004

(6) ‘मध्य-प्रदेश लेखक संघ’, भोपाल ने, 2006 में।

(7) हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (जगन्नाथपुरी अधिवेशन) 2010 में।

सर्वोच्च सम्मान ‘साहित्यवाचस्पति’

(8) जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर द्वारा ‘हिंदी-दिवस 2012’ पर।

‘हिंदी-सेवी’ सम्मान।

(9) कवि मानबहादुर सिंह ‘लहक’ सम्मान। ( कोलकाता) 2018

(10)‘जनवादी लेखक संघ’ एवं ‘प्रगतिशील लेखक संघ’, ग्वालियर द्वारा सम्मान - 26 जून 2018

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निदेशक,

डॉ. महेन्द्रभटनागर साहित्य शोध संस्थान,

सर्जना भवन (अर्जुन नगर मोड़)

110, बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर-474 002 (म. प्र.)


ई-मेल - drmahendra02@gmail-com

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