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हर दिन हिंदी दिवस है // डा .हरीश शर्मा

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सितम्बर का महीना और महीने की चौदह तारीख। स्कूल ,कालेज ,अखबार ,सेमिनार एक दिन के लिए हिंदी हिंदी खेलेंगे। कोई हिंदी की कम होती लोकप्रियता का काल्पनिक रोदन रचेगा तो कोई हिंदी के पुराने ज़माने ,पुराने लेखन पुरानी शब्दावली को लेकर चिंता जाहिर करेगा। कविता ,भाषण और चुटकुले आदि सुनाकर छात्र अध्यापक अपनी फोटो खिचवायेंगे और बुद्धिजीवी सोशल नेटवर्क पर अपडेट करेंगे। इस प्रकार हिंदी दिवस का सफलतापूर्वक कार्यक्रम सम्पन्न हो जायेगा।

मैं पंजाब में रहता हूँ ,अहिन्दी भाषी क्षेत्र है। घर में सब पंजाबी ही बोलते हैं पर घर में सुबह रेडियो पर हिंदी भजन और टीवी पर हिंदी समाचार सुनकर शुरू होती है। घर में अखबार भी लम्बे समय से हिंदी का ही आ रहा है। हमारे मोहल्ले में भी लगभग पचास प्रतिशत हिंदी अखबार पढ़ने वाले घर हैं। कारण ये कि पढ़ने के लिए घर के सभी लोगों को अपनी अपनी पसंद का मैटर मिल जाता है। बच्चों को कहानियां ,बीवी को पाक कला और महिलाओं की पसंद के विषय ,पिता जी को ताजा राष्ट्रीय और लोकल खबरें ,सबको अपने अपने हिसाब का पढ़ने के लिए।

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टीवी का भी यही हाल है। सब हिंदी ख़बरें ,नाटक ,फ़िल्में और कार्टून इसी भाषा में देखते हैं। मुझे नेशनल जियोग्राफिक और हिस्ट्र्री चैनल देखने की आदत है। इन चैनलों का नाम चाहे अंग्रेजी है और प्रोग्राम मूल रूप से अंग्रेजी में हैं पर हमारे लिए सब हिंदी में उपलब्ध है। टीवी कम्पनियों ने टीवी में भाषा सेटिंग दी है वरना टीवी कौन खरीदे। उन्हें भी हिंदी के बाजार के बारे में पता है इसीलिए हिंदी की तौहीन नहीं करते। लगभग हर घर में यहीं भाषा सेटिंग चालू है। कार्टून नेटवर्क के सभी चैनल बच्चे हिंदी में ही देखते है। अब कहने को चाहे वे कान्वेंट स्कूल के विद्यार्थी हो पर स्कूल से बाहर लोकल भाषा और हिंदी ही छाई हुई है।

रोजगार के मामले में भी हिंदी पीछे नहीं है। पत्रकारिता हो ,अध्यापन हो या फिर लेखन ,विज्ञापन। अखबारों में आप को अध्यापन और पत्रकार की मांग के रोजगार विज्ञापन गाहे बगाहे देखने को मिल जायेंगे। सब ओर हिंदी की अपनी उपयोगिता है। टीवी पर संवाददाता या एक्टर बनने की ललक हिंदी के रास्ते से होकर पूरी होती है।

कौन कहता है कि हिंदी के पास पाठक नहीं हैं। समाचार पत्रों की बिक्री के आंकड़े ,पुस्तकों के छपने के आंकडे ,प्रकाशन संस्थानों के हर साल बढ़ने के आंकड़े इन सब बातों को सिरे से नकार रहे हैं। समाचार पत्र हर साल हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों के बेस्ट सेलर की सूची जाहिर कर रहे है। हिंदी के नए लेखन में आ रहे युवक विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्रों से आ रहे है। खूब बिक रहे हैं ,लिख रहे हैं और हिंदी के नए रूप को पोपुलर बना रहे है। उन्होंने हिंदी को आम लोगों और युवाओं की भाषा से जोड़ा है ,उनके संवाद को अपने लेखन में जगह दी है ,पुरानी भाषागत परम्पराओं को तोड़कर हिंदी को प्रेमचंद की तरह आम लोगों तक पहुँचाया है। पुराण कथाओं को पांडित्यपूर्ण शैली से आजाद करवा सरल कहानियों के रूप में पठनीय बना दिया है।

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ये युवा ही हैं जिन्होंने पहले मोबाइल में अपने हिंदी मैसेज को इंग्लिश में टाइप किया और फिर hindi का फॉण्ट खोजकर हिंदी को यूनिकोड जैसी सरल टाइपिंग मुहैया करवाई। अब जिसे देखिये बड़े आराम से मोबाइल और लैपटॉप पर अपनी पसंदीदा हिंदी में टाइप कर रहा है। अब तो टेक्स्ट टू स्पीच वाला साधन भी मोबाइल में उपलब्ध हो गया है। आप मोबाइल का माइक आन कर के बोलिए और स्क्रीन पर अपने आप टाइप होने लगता है। हिंदी ने सूचना क्रांति को और सूचना क्रांति ने हिंदी को अपना लिया है| बाजार को हिंदी की जरूरत बहुत ज्यादा है ,इसके बिना उसका गुजारा नहीं है। और शायद hindi को भी अपने आप को बाजार के रंग में रंगना होगा। इसमें बुराई भी क्या है ? समय की यही मांग है। जो समय के साथ नहीं बदला समय उसे निगल गया फिर चाहे वह धरती पर रहने वाली प्रजातियाँ ही क्यों न हो। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डार्विन ने भी लुप्त हुई प्रजातियों के अवशेष देखकर बताया था कि उनके लुप्त होने का एक बड़ा कारण समय के साथ अपने आप को न बदल पाना था| हिंदी तो संस्कृत ,पाली ,प्राकृत ,अपभ्रंश ,खड़ी बोली से बदलती हुई नयी चाल में ढलती बढ़ती कितने ही शब्दों को अपने में समाती अब नयी वाली हिंदी के युग तक पहुँच गयी है। यही कारण है की इसकी पहचान अमिट हो गयी।

हिंदी हमारे दिल की सच्ची आवाज है ,जब तक हम हैं तब तक ये हिंदी का वर्चस्व ऐसे ही फैलता रहेगा।

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