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पुस्तक समीक्षा -- चलती ज़िंदा लाशें

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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम-- चलती ज़िंदा लाशें।

रचयिता- आ0 कवि कैलाश मण्डलोई कदम्ब

पता- खरगोन जिला, मध्यप्रदेश से।

समीक्षक- आशीष पाण्डेय ज़िद्दी।

रीवा मध्यप्रदेश से।

★★★★★★★★★★★★★★★

चलती जिंदा लाशें जैसा कि शीर्षक ही किसी कविता, किताब, कार्यक्रम, की जान होती है , यह किताब अपने इस शीर्षक के कारण जनसामान्य /पाठकों में जिज्ञासा का कारण बनी हुई है। आखिर है क्या इसके भीतर? कहीं वास्तव में इसमें भूत -प्रेत की कहानियाँ तो नहीं? ऐसे कई अनगिनत विचार पाठकों के मन में किताब का नाम सुनकर उमड़ पड़ते हैं। पाठक इस पुस्तक को पढ़ने के लिए लालायित हो उठते हैं । यह पुस्तक अपने शीर्षक के कारण ही एक दिन भारतवर्ष की श्रेष्ठ पुस्तकों में गिनी जाएगी और इस देश के कोने-कोने में पढ़ी जाएगी ये मेरी शुभकामनाएं और इस किताब के लिए दुआ है।

तो आइए चलते हैं *चलती ज़िंदा लाशें* पुस्तक के रचयिता ग्राम रायबिड़पुरा जिला खरगोन (म.प्र.) निवासी कवि आ0 कैलाश मण्डलोई कदम्ब जी की जो कि एक शिक्षक के साथ ही समाजसुधारक, कवि, प्रकृतिप्रेमी भी हैं उनकी कृति के पहले पृष्ठ को खोलते हैं। किताब खोलते ही हमने सबसे पहले इस किताब के लिए आ0 राजवीर सिंह मन्त्र जी अध्यक्ष साहित्य संगम संस्थान के शुभकामना संदेश को पढा तथा इसी शुभकामना संदेश के क्रम में आ0 डॉ मीना भट्ट जी पूर्व न्यायाधीश जबलपुर मध्यप्रदेश का शुभकामना संदेश, एवम साहित्य संगम संस्थान के प्रकाशक आ0 आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार जी आर्यसमाज इंदौर संरक्षक के शुभकामना संदेश पढ़े। अब सोचिए जिनकी कृति को इतने महान लोगों का शुभकामना संदेश मिला वो शख्शियत कैसी होगी और उनकी कृति कितनी महान होगी।

आगे के क्रम में रचनाकार के विचार इस कृति के संदर्भ में अति उत्तम रहे। जो किताब के अंदर की विशेषताओं को परिलक्षित कर रहे हैं।

पहली रचना के रूप में शारदा माँ की वंदना करते हुए दूसरी रचना में माता को ममता की मूरत बताते हुए माता की विशेषता का वर्णन किया गया है। तीसरी रचना में माता पिता की पूजा करने का आह्वान करते हुए कवि ने अपने मनोभावों को रचना में शब्दरूप में पिरो डाला है। चौथी रचना शब्दशक्ति पर, पांचवी रचना शब्द पर, लिखते हुए कवि ने छठवीं रचना के रूप में ऐसी पीड़ा का उल्लेख किया जिसका शीर्षक ‘भूख राग’ रखा। कवि ने भूख की ज्वाला, पेट की आग आदि मर्मस्पर्शी पंक्तियों से इस रचना को पाठकों के हृदय तक उतार दिया। सातवीं रचना में कवि ने अपनी किताब के शीर्षक *चलती जिंदा लाशें* नामक सुंदर रचना समाहित की। कवि के मन के भाव वहाँ तक पहुंचते हैं जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुंच सकता। कवि ने इस शीर्षक अंतर्गत मनुष्यों के विचारों को उनकी क्रियाशीलता को, मृतप्राय भावों को, संवेदना से हीन व्यक्तियों को, मजबूर, लाचार , आदि रूप में चलती जिंदा लाशें की उपमा देकर इस सृजन को अमर कर दिया। क्रमशः आगे की कड़ी में, खोखला सा आदमी, जिंदा होने के सबूत, आस्था, श्रम सीकर से लतपथ चेहरे, चिथड़ों में मिली जिंदगी, ये सारी रचनाएँ समाज की विविध पीड़ाओं का वर्णन करती हुई एक आईना दिखा रहीं हैं। आधुनिक युग का लाल, पर्यावरण, मेहनत, लेखनी ललकारती है भूख पढ़ती पेट की भाषा, सौदा आत्मा का बहुत ही प्रभावी और उत्कृष्ट रचनाएँ हैं। सौदा आत्मा का रचना मानवता को झकझोर देने वाली कृति है। इसमें भाव बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। एक माँ अपने बच्चे की भूख के लिए!.... अगले क्रम में प्यासी कोयल कुहुके, मुक्त होना चाहता हूँ, सत्ता के पुजारी, कहाँ चल पड़ा इंसान, एक दांव और सही, फटी कमीज जैसी रचनाएँ अपने भीतर गागर में सागर भरे हुए , जिस भाँति सागर के तली में अनन्त रत्न छुपे होते हैं उसी प्रकार आ0 कैलाश जी की इन रचनाओं में भावों की अनमोल निधि समाहित है।

पच्चीसवीं रचना मौत से लड़ते लोग, बहुत ही स्पष्ट समाज के लिए एक आईना दिखाता हुआ सृजन। अगली रचनाएँ क्रमशः जीवन एक प्रश्न, कीचड़ खाकर पलते लोग, वह सब जाने, शिकन को भी शिकन आई, , इसीलिए नाराज है बेटी, बेकारी, दुखियों में भगवान नहीं क्या, वह पलाश के पेड़, मैं आवाज लगाऊंगा, एवम अंत में और प्रभात हो गयी, जैसी अनमोल रचनाओं से भरी पड़ी यह कृति चलती जिंदा लाशें वास्तव में अपने अंदर न जाने कितने भाव समेटे हुए है जिंदा लाश की तरह चल रही है। इस कृति में समाज की विभिन्न पीड़ाओं का, कुरीतियों का भाव भी समाहित है। इस कृति में करुण रस प्रधान है। आज, श्रृंगार, वात्सल्य भी यथास्थान समाहित हैं। इस कृति में वीभत्स रस की झलक भी देखने को मिली। पूर्णतः उत्तम शब्दावली, भाव, रस, विभिन्न छंदों, मुक्त, गीत, गीतिका, आदि पर आधारित एक उत्तम कृति के निर्माण हेतु मैं आशीष पाण्डेय ज़िद्दी इस कृति के जनक आ0 कवि कैलाश मण्डलोई कदम्ब जी को बधाई और शुभकामनाएँ देते हुए उन्हें नमन करता हूँ।

यह कृति समाज को एक अनुपम भेंट है।

आशीष पाण्डेय ज़िद्दी

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत बहुत धन्यवाद आ0 कैलाश मण्डलोई कदम्ब जी। आपकी यह कृति अपने शीर्षक के कारण प्रसिद्धि के सभी सोपान चढ़ेगी

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