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कहानी // मेरी मम्मी एक हाउस वाईफ है // गीता दुबे

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ऑफिस से घर लौटकर पापा ने जैसे ही अपना लैपटॉप बैग टेबल पर रखा, उनकी नजर टेबल पर रखी बिजली के बिल पर पड़ी और वे मम्मी पर बरस पड़े– “ये क्या नीरू, आज भी तुमने बिल जमा नहीं किया .. आज चार दिन हो गए मुझे कहे हुए लेकिन ये बिल टेबल पर उसी तरह जस का तस पड़ा हुआ है.. तुम्हें घर के किसी काम की सुध ही नहीं रहती.. आखिर सारा दिन घर पर पड़ी रहती हो लेकिन एक छोटा सा काम तुमसे नहीं हो पाता..

पापा ठीक ही तो कह रहे थे मम्मी सारा दिन घर पर पड़ी रहतीं हैं लेकिन एक छोटा सा काम पापा को कहे चार दिन हो गए और उनसे न हो पाया, खामखाँ पापा का मूड ऑफ कर दिया मम्मी ने. पापा को ऑफिस के कितने काम होते है, घर पर भी कभी कभी लैपटॉप पर घंटो काम किया करते हैं , एक मल्टीनेशनल के अकाउंटेंट की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है. अब घर के ये छोटे मोटे काम के लिए उनके पास वक्त ही कहाँ है, मम्मी को काम ही क्या है, कई बार मैंने मम्मी से कहा कि पे टी एम करना सिखा देता हूँ, इससे काम आसान हो जाता है लेकिन मम्मी है कि सीखना ही नहीं चाहती , कहती हैं ये सब तुम लोगों के लिए है मैं तो जैसी हूँ वैसी ही ठीक हूँ. मैं भी चाहता हूँ कि मेरी मम्मी जमाने के साथ चले, उनका फेसबुक अकाउंट बना दिया लेकिन मम्मी ने आज तक कभी लॉग इन नहीं किया. मम्मी को काम ही क्या रहता है ..न हमारी तरह उन्हें सुबह उठकर स्कूल जाना होता है, न ही टूशन , न क्विज की तैयारी करनी है, न ही क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए समय से पहुँचने की टेंशन ..जरा सी भी देर हो गई तो बैटिंग नहीं मिलनेवाली , न ही किसी परीक्षा की टेंशन, न तो पापा की तरह उन्हें सुबह भाग कर ऑफिस जाने का टेंशन होता है , न तो पापा की तरह बॉस की धौंस सहनी पड़ती है, पापा तो इतना व्यस्त होते हुए भी कितना कुछ करते हैं हमलोगों के लिए, अभी पिछले महीने ही उन्होंने मेरे लिए एक लैपटॉप खरीदा.

मम्मी तो हाऊस वाईफ है, दिन भर घर में पड़े रहना है.. समय का कोई टेंशन नहीं ..जब नहाएँ, जब खाएँ, जब चाहें कमर सीधी कर लें, न कोई रोकने वाला, न कोई टोकने वाला .. अपनी मर्जी की मालिक है. मम्मी की एक बात मेरी समझ में बिलकुल नहीं आती जब भी मुझे देर तक लैपटॉप पर देख लेतीं हैं तो किसी न किसी बहाने मेरे कमरे में चली आतीं है और कंप्यूटर स्क्रीन पर एक नजर डाल लेतीं हैं कि मैं लैपटॉप पर क्या कर रहा हूँ. अरे यदि मुझे कुछ ऐसी वैसी चीजें देखनी होगी तो मम्मी मुझे रोक देंगी क्या? उन्हें कैसे समझाऊँ कि मैं लैपटॉप सिर्फ अपनी पढ़ाई और कभी कभी गेम्स के लिए ही इस्तेमाल करता हूँ. अगले महीने मेरी दसवीं की बोर्ड परीक्षा है, मुझे स्कूल से स्टडी लीव मिली है. अब मुझे सुबह उठने की चिंता नहीं रहती लेकिन मम्मी के रहते कोई देर तक बिस्तर पे पड़ा रह सकता है भला? पता नहीं मम्मी को नींद आती भी है या नहीं , रात में जब सभी सोने चले जाते हैं तब भी वे पता नहीं किचन में न जाने क्या करती रहती हैं और घर भर में सबसे पहले उठ जातीं हैं. पूजा घर से आ रही घंटी की आवाज और अगरबत्ती की खुशबु हमसे यह कहती है कि सवेरा हो चुका है, अब बिस्तर त्याग दो.

मेरे उठते ही मम्मी झट मेरे लिए होर्लिक्स बना कर मुझे देती हैं और पापा और दादी के लिए चाय बना उनके कमरे में दे आती हैं फिर छोटू को उठाती हैं, उसे तैयार कर उसे स्कूल छोड़ने चली जाती हैं . लौटने पर हम सब के लिए नाश्ता तैयार करती हैं . पापा के ऑफिस चले जाने के बाद दादी जी को नहलाती हैं, कंघी करती है फिर दादी जी के साथ नाश्ता करने बैठ जाती है, और दादी जी से न जाने क्या क्या बातें करती है कि दादी जी खूब हंसतीं हैं, मुझे यह दृश्य देखकर बड़ा अच्छा लगता है. मैंने कहा न कि मम्मी को कोई काम तो है नहीं जब मन आया गप्पें मार लिए, अपनी मर्जी की मालिक हैं. मम्मी ने छत पर कुछ गमले लगा रखे हैं, गमलों में टमाटर, बैगन , पुदीना न जाने कितनी सब्जियां लगा रखी है, खुद ही गमलों की देख रेख भी किया करतीं हैं. दादी को नाश्ता कराकर छत पर चली जाती हैं, एक डेढ़ घंटे बाद लौटती हैं, कभी हाथ में पुदीने का पत्ता लेकर तो कभी टमाटर लेकर फिर सीधे किचन में घुस जाती हैं, दोपहर का खाना तैयार कर छोटू को लेने स्कूल चली जाती हैं. उनका दुलारा छोटू सबसे पहले मम्मी से पूछता है कि मम्मी आपने मेरे लिए चाउमीन बनाया है न? और मम्मी कभी उसे निराश नहीं करती. शाम के समय मम्मी मुझे और छोटू को टूशन क्लास छोड़कर खुद कभी रिलायंस फ्रेश या कभी बिग बाजार चली जाती है उन्हें कुछ न कुछ घरेलू सामान लेनी ही होती है यदि कुछ नहीं तो कभी दादी जी की दवा, छोटू के प्रोजेक्ट के सामान, न जाने क्या क्या. अच्छा है उनके लिए एक आउटिंग भी हो जाती है और उनका मन भी लग जाता है, सारा दिन घर में पड़े रहना किसे अच्छा लगता है.

मम्मी को मैंने आज तक फोन पर फिजूल की बातें करते नहीं सुना पापा की तरह. पापा तो अपने पुराने फ्रेंड्स से या चाचा जी से कितनी कितनी देर तक बातें करते हैं उन्हें होश ही नहीं रहता लेकिन मम्मी कभी नहीं. बस काम से ही वे किसी को फोन करतीं हैं ऐसा नहीं कि मम्मी की फ्रेंड्स सर्किल नहीं है, उनके भी कुछ गिने चुने फ्रेंड्स हैं. कहती है कि मेरे पास समय ही नहीं होता कि तुम्हारे पापा की तरह फोन से चिपकी रहूँ. मम्मी को काम ही क्या होता है , हमारा परिवार भी तो उतना बड़ा नहीं है, परिवार में मैं, छोटू, दादी जी, मम्मी और पापा बस. यह बात और है कि दादी जी ज्यादातर बिस्तर पर ही रहतीं हैं, उन्हें खिलाना ,पिलाना , नहलाना, बाथरूम ले जाना सबकुछ मम्मी को ही करना पड़ता है. पापा तो चाह कर भी यह सब नहीं कर सकते, उन्हें फुर्सत कहाँ है. ऑफिस में इतना काम संभालते हैं , थके- हारे घर लौटते हैं.. घर आकर आराम तो करेंगे ही और फिर घर की सारी जिम्मेदारियां पापा की ही तो है.

मम्मी की मदद के लिए एक कामवाली बाई तो है ही. मेरी मम्मी को फैब्रिक पेंटिंग का बड़ा शौक है,कभी कभी देखता हूँ रात में जब घर के सभी लोग रात का खाना खा लिए होते हैं मम्मी किसी चादर या कुशन कवर पर पेंटिंग कर रही होती हैं. हमारे घर में जितने भी बेड शीट हैं सब पर मम्मी ने ही पेंटिंग की हैं. शाम के समय टूशन से लौटने के बाद मम्मी छोटू को होमवर्क कराती हैं. पापा ,छोटू और मेरे जूते पौलिश करती हैं, छोटू के स्कूल यूनिफार्म आयरन करती हैं. पापा के मना करने पर कि सुबह यह सब कर लेना, कहती हैं कि सुबह वक्त नहीं होता. मुझे मम्मी की बहुत चिंता रहती है मैं चाहता हूँ कि मम्मी भी कुछ काम करे ताकि उनका समय कट जाए.

मैं अब बड़ा हो रहा हूँ, दुनिया देख रहा हूँ, बहुत कुछ समझने लगा हूँ. मैंने सोच रखा है कि बड़े होकर मैं किसी कामकाजी महिला से ही विवाह करूँगा ताकि वह भी व्यस्त रहे कुछ काम करे ..हाऊस वाईफ तो सारी जिन्दगी घर में बैठ मस्ती मारा करतीं हैं.

गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखण्ड

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