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बचा लेना होगा खुद को मरने से // डॉ. आरती कुमारी

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1.खामोशी

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रिक्तता से भरा ये जीवन
पुलकित हो उठा था
तुम्हारे आने की
आहट मात्र से ही
ख्वाहिशें.. धड़कनों के हिंडोले पर
मारने लगी थी पेंग
उमंगें ...
मचलने लगी थी
ले लेकर अंगड़ाइयाँ
और
सपनों के रोशनदान से झांकती
तुम्हारे प्यार के उष्मा की नरम किरणें
जगाने लगी थी
सोये हुए अरमानों को मेरे

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पर
बढ़ती उम्र ने
लगा दिए है सांकल
दिल के दरवाजे पर
और ठिठका दिया है
तुम्हारी यादों को
कहीं दूर
बंद कर दिये है तजुर्बे ने
चाहत की वो सारी खिड़कियाँ
जिससे तैरकर
उतरने लगी थी मेरे भीतर
तुम्हारी खुशबू
और समझदारी ने
कर दिया है
उदासी और घुटन के
घुप्प अंधेरे में जीने के लिए विवश
एक लंबी खामोशी के साथ.
@डॉ आरती कुमारी

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2.बचा लेना होगा खुद को मरने से
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आज नहीं मर रहा है केवल एक इंसान
न ही मर रहे हैं सिर्फ बूढ़े लाचार शरीर
पर आज..
मर रही हैं उम्मीद के झिलमिलाते दीप लिये
चौखट पे जमी मां की आंखें
जो अपने बेटे के इंतेज़ार में पथरा सी गईं हैं
आज मर रही है माँ की ममता
मर रही है उसकी थपकी देतीं लोरियां,
सूख रहा है उसके आँचल का दूध
जब उसके बच्चे दूर परदेस जाकर
उसकी आवाज़ तक को सुनने से
कर देते हैं इनकार
और झटक देते हैं एक सिरे से
उसके कंपकंपाते हाथों को

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जो तलाशते रहते हैं
अपने बच्चों में अपने बुढ़ापे की लाठियां..
आज मर रहा है एक पिता का धैर्य
और उसका त्याग
मर रहा है उसका आत्मविश्वास
जब उसके ही पुत्र लगा देते हैं
उसके पूरे वजूद पर एक सवालिया निशान
और देते हैं एक करारा तमाचा
उसके द्वारा दी गई परवरिश को...
आज का युवा कर रहा है प्रतिनिधित्व
उस पाश्चात्य संस्कृति का
जिसमें हमारे घर में बुजुर्गों के लिए
कोई एक कोना भी मयस्सर नहीं है
जिस महानगरीय व्यवस्था और
मशीनी ज़िन्दगी में बोझ समझ
छोड़ दिया जाता है बेबस मां बाप को
ओल्ड ऐज होम में
घुट घुट के अंतिम सांसे लेने को
आज मानवीय संवेदनाओं को मार
चमकता खनखनाता कलयुगी सिक्का
कर रहा है
उन सारे मूल्यों और संस्कारों पर राज
जो हमारे भरत वंश की परंपरा रही है
जिस संस्कृति में
ययाति, श्रवण और राम सरीखे पुत्र हुए
जिस संस्कृति में
बुजुर्गों की सेवा करना
हमारा सिर्फ कर्तव्य ही नहीं
बल्कि जिनके चरण
देवी देवताओं के चारों धाम तुल्य माने गए
आज मर रही है ..बेमौत.. वही संस्कृति
आज अपनी ही लाश ढो रही है हमारी सभ्यता
अब भी वक़्त है ..बचा लेना होगा हमें
इन मरती आत्माओं को
इन लहूलुहान होते पारिवारिक संबंधों को
बचा लेना होगा इन टूटते मानवीय रिश्तों को
बचा लेना होगा अपनी खत्म होती भारतीय संस्कृति को
और बचा लेना होगा गर्त में जाते अपने खुद के भविष्य को.. !!
@डॉ आरती कुमारी
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जीवन परिचय

1- रचनाकार पूरा नाम- डॉ आरती कुमारी
2- पिता का नाम- श्री अलख निरंजन प्रसाद सिन्हा
3- माता का नाम- स्वर्गीय श्रीमती रीता सिन्हा
4- पति  का नाम- श्री माधवेन्द्र प्रसाद
5- वर्तमान/स्थायी पता-  मुज़फ़्फ़रपुर बिहार-842001

ई-मेल- artikumari707@gmail.com
7- जन्म / जन्म स्थान- 25/03/1977,  गया
8- शिक्षा - M.A(english),Ph.D(english), M.Ed., doing              Ph.D in education
9. सम्प्रति- राजकीय उच्च विद्यालय ब्रह्मपुरा , मुज़फ़्फ़रपुर में सहायक शिक्षिका और प्राथमिक शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय, पोखरैरा में अतिथि व्याख्याता के पद पर कार्यरत
10. प्रकाशन- कैसे कह दूं सब ठीक है(काव्य संग्रह)
11.पंजाबी , नेपाली एवं गुजराती में रचनाएँ अनुदित
12.देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में कविताएँ और ग़ज़लें प्रकाशित
13.मेघला साहित्यिक पत्रिका में सह संपादन का कार्य
14.समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल ऐप में ग़ज़लें संग्रहित
15.आकाशवाणी, दूरदर्शन से कविताओं और ग़ज़लों का प्रसारण  विभिन्न सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों में मंच संचालन
16. सम्मान- बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा " उर्मिला कौल साहित्य साधना सम्मान'2018, हिंदी - सेवी सम्मान 2018, निराला स्मृति संस्थान, डलमऊ द्वारा ' सरोज स्मृति सम्मान 2018 ,  एवं अन्य सम्मान

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