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रास्ते की तलाश - विजयदान देथा बिज्जी - एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश

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रास्ते की तलाश - विजयदान देथा बिज्जी एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश दृश्य: 1 सूत्रधार:- धरती का जो रिश्ता हरियाली से है, फूल का जो रिश...

रास्ते की तलाश - विजयदान देथा बिज्जी

एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश


दृश्य: 1

सूत्रधार:- धरती का जो रिश्ता हरियाली से है, फूल का जो रिश्ता खुशबू से है, पेड़ का जो रिश्ता फलों से है, पहाड़ का जो रिश्ता झरनों से है और चाँद का जो रिश्ता चांदनी से है, उज्जैन का वैसा रिश्ता राजा भोज से है, जिसका दरबार एक से एक आला पंडितों का बेजोड़ अखाड़ा था, हमेशा मुंह अंधेरे दरबार जमता और ज्ञान की निगूढ़ चर्चा होती।

दृश्यः 2

स्थान - राजा भोज का दरबार

राजा भोज:- ज्ञान का खास स्थान कहां है?

माघ पंडित:- राजमहल को छोड़कर ज्ञान का खास स्थान कहां हो सकता है? ज्ञान की सबसे उंची पीठ राजदरबार, फिर किले परकोटे, फिर गढ़ कंगूरे और फिर हवेलियां। जहां सत्ता और धन, वहां ज्ञान और कला। जिस प्रकार पानी और धूप के बिना हरियाली संभव नहीं, उसी प्रकार दृष्टि व ज्ञान के बिना धन और सत्ता का सपना भी संभव नहीं, गरीबों में बुद्धि और ज्ञान का टोटा है, इसलिए उनके पास धन और सत्ता का भी टोटा है।

वनमाली:- अन्नदाता----।

राजा भोज:- फिर वही बात! तुम लोगों को कितनी बार समझाया कि अन्नदाता मैं नहीं तुम हो, मैं तो मुफ्त का माल चरने वाला हूं।

वनमाली:- आज पहली बार किसी राजा ने अपने मुंह से सच बात प्रकट तो की! पर फिलहाल मेरे और आपके अलावा यह सच किसी के गले उतरेगा नहीं, इसलिए इस सच्चाई को यहीं रोकना उचित होगा। इतनी देर तक ज्ञान की स्थानों की चर्चा सुनते सुनते मैं तो दंग रह गया। किसी खास स्थान पर ज्ञान का बगीचा न तो मैंने कहीं देखा, न सुना, फिर मगजमारी करना बेकार है, कुदरत और मेहनत का नजारा देखना चाहें तो मेरे बगीचे तक चलने की तकलीफ फरमाएं, मैं इसलिए दरबार में हाजिर हुआ हूं।

राजा भोज:- तुम बहुत अच्छे मौके पर आए, ज्ञान की नीरस चर्चा सुनते सुनते मुझे मितली सी आने लगी थी, दरबार के उबाउ तामझाम से खिसकने की इच्छा हुई कि तुमने मुझे उबार लिया, चलो जल्दी चलो, खुली हवा में जी भर कर थोड़ा सांस तो ले लूं, खुशामद की सड़ांध से मेरा मन छटपटा रहा है।

दृश्य: 3

वनमाली के पीछे पीछे राजा भोज और माघ पंडित जा रहे हैं। राजा भोज सुग्गा, तितली, कौआ देखने में मग्न है।

वनमाली:- इस तरह टहलते टहलते पहुंचने में सांझ हो जाएगी, बगीचा तीन कोस दूर है।

माघ पंडित:- आपकी आज्ञा हो तो तीन घोड़े मंगवा लूं।

राजा भोज:- क्यूं? यदि घोड़ों को भी बगीचा दिखलाना हो तो मँगवा लो, पैदल चलने में जो आनंद है, वह सवारी पर कहां? चलो वनमाली कौन जल्दी पहुंचता है?

राजा भोज जल्दी जल्दी चलने लगे, वनमाली भी जल्दी जल्दी चलने लगा और राजा से आगे निकल गया।

वनमाली:- राज काज के मसलों में राजा तेज हो सकता है, पर पैदल चलने में कुदरत का बेटा पीछे क्यों रहे? धरती उसके पांवों का परस खूब पहचानती है।

राजा भोज:- किसी भी तरह वह माली से आगे निकल जाए, कोई दातार पंछी थोड़ी देर के लिए अपनी पाँखें उधार दे दे, तो वह जीवन भर एहसान मानेगा, यदि वह पैदल चलने की होड़ में किसी से आगे न जा सके तो फिर काहे का राजा है! फासला निरंतर बढ़ रहा है, पर लाख चाहने पर भी मेरी चाल नहीं बढ़ सकी, दुनिया में ऐसा भी कोई मनुष्य है, जिसके पाँव राजा से आगे बढ़ने की गुस्ताखी करे? राजा से बढ़कर कोई आदमी हो नहीं सकता, तो वनमाली के पाँव आदमी के अलावा किसी और के हैं? तेज चलने से मेरे पाँवों में छाले, छालों के टीस में भी चुभता चुभता सा एक आनंद है, कोई पीड़ा सुखद होती है क्या? राजमुकुट की छत्रछाया में उसे पीड़ा की अनुभूति कहाँ हुई थी? प्रजा तो पीढ़ियों से पैदल ही चलती रही है, फिर प्रजा का पिता होने के नाते इत्ती पीड़ा तो सहनी ही पड़ेगी, ----- पर वास्तव में यह पीड़ा है कहाँ? यह तो एक नया ही स्वाद है जो कुदरत की छत्रछाया में रहकर प्राप्त किया जा सकता है, सिंहासन तो कुदरत की छटा से कोसों दूर रहता है। तिस पर इसे हथियाने के लिए कितना खून बहाना पड़ता है।

[राजा को आगे निकले वनमाली दिख रहा है और न पीछे छूटे माघ पंडित]

राजा भोज:- अनुभव आगे निकल गया और ज्ञान पीछे छूट गया।

दृश्य: 4

बगीचा के सामने माली मुस्कुराते हुए राजा के अगवानी में खड़ा है। राजा भोज आते हैं।

वनमाली:- उज्जैन के राजा ने आज पहली बार छालों के आनंद का अनुभव किया होगा?

राजा भोज:- पर इस आनंद का तो स्वाद ही अनोखा है, जिसे चखने के खातिर बार बार मन ललचाता रहेगा। और यही राजा का अहोभाग्य है।

वनमाली:- बेचारे राजमद का क्या बूता जो उस पीड़ा के सामने टिक सके, जरा बगीचे के बीच चलिए, छालों की दरद की बात तो दूर, आप सिर कटने की पीड़ा भी बिसर जाएँगे, अपना खून पसीना सींचकर मैंने एक एक फूल को रंगा है।

राजा भोज:- ऐसा अचीता वरदान तो बांटने से ज्यादा बढ़ता है, फिर माघ पंडित को क्यूँ दूर रखें, वे भी आ जाएँ।

वनमाली:- जैसी आपकी मर्जी, पर मेरे ख्याल से वे पास आकर भी दूर रहेंगे, फूलों को निरखने के लिए ललाट के आँखों से पार नहीं पड़ता, पाँवों पर भी आंखें उघड़नी चाहिए।

राजा भोज:- जैसे आज मेरे पांवों में उघड़ी है।

वनमाली:- हां, कुछ कुछ ऐसी ही।

माघ पंडित लँगड़ाते हुए आते हैं।

राजा भोज:- आखिर अनुभव की होड़ में सत्ता पीछे छूट गई और बेचारा ज्ञान लंगड़ा गया।

वनमाली:- माफ कीजिए, ज्ञान के बगैर अनुभव निपट अंधा है और अनुभव के बगैर ज्ञान नितांत बहरा, और धन और सत्ता का मोल तो मेरी नजर में कानी कौड़ी भी नहीं है।

राजा भोज:- क्योंकि तुम एक ऐसे साम्राज्य के मालिक हो जिसे बादशाह भी नहीं जीत सकता, चाहे

उसके पास कितनी ही बड़ी फौज क्यों न हो!

राजा भोज तीन चार बार वनमाली का हुलिया परखा।

राजा भोज:- [मन ही मन -] आज पहली बार मनुष्य देह धारे वनमाली को देखा, जो भीतर से भी मनुष्य है, दो पांवों पर टिकी यह काया सचमुच अपने पांवों के भरोसे ही सीधी सतर खड़ी है, जो किसी के सामने झुकना भी नहीं जानती, घुटनों तक लंबी भुजाएं अपनी मेहनत के अलावा शायद भगवान के भी मोहताज नहीं, हाथ पसारकर माँगने की जगह कटना श्रेयस्कर समझने वाली ये हथेलियाँ चाहे तो सारी धरती पर फूल ही फूल महका दे, दोनों आंखों से अब भी शैशव का भोलापन झांक रहा है, इस तीखी नासिका ने अब तक खुशबू के सिवा जैसे किसी बदबू का नाम ही न सूंघा हो, इन कानों ने सच्चाई के अलावा झूठ का कोई बोल न सुना हो, इन निर्मल अधरों ने सांच के अतिरिक्त झूठ का एक आखर भी उच्चारित न किया हो। हरियाली के सत और फूलों के सौरभ से जन्में इस विलक्षण पौरूष की तुलना में मैं कितना अकिंचन हूं। दरबारी चाटुकार बाकी कुछ भी हों, बस मनुष्य नहीं होते।

वनमाली:- इतने बड़े पंडित होकर भी आप छालों के मामूली दरद को बिसार नहीं सके?

माघ पंडित:- तुम्हारी तरह मेरी बुद्धि पांवों में नहीं है।

वनमाली:- तो फिर मेरे हिसाब में चुक हो गई, मैंने सोचा कि आप राज पंडित हैं, राजा भोज की तरह आपकी बुद्धि थोड़ी पांवों मंे भी होगी।

[माघ पंडित फूल को तोड़ना चाहता है।]

वनमाली:- अरे! आप यह क्या नादानी--- नहीं नहीं, यह क्या अपराध कर रहे हैं?

माघ पंडित:- पर मैं--- मैं तो अन्नदाता के लिए फूल तोड़ रहा था।

वनमाली:- माफ कीजिए, फूलों का कोई अन्नदाता नहीं होता, ये हमेशा पौधे पर ही खिलते हैं, किसी अन्नदाता के हथेली पर नहीं।

माघ पंडित:- और पौधों पर ही मुरझा कर झड़ जाते हैं।

वनमाली:- ताकि नई कलियाँ खिल सके, मैं भी अमर नहीं हूँ, तो क्या आज ही मुझे मार डालेंगे?

राजा भोज:- कहाँ फूल और कहाँ मनुष्य? यह भेद तो तुम्हें भी समझना होगा वनमाली।

वनमाली:- वनमाली हूँ, तभी तो यह भेद मेरी समझ में नहीं आता, आखिर किस अधिकार से मनुष्य अपने आप को फूलों से बढ़कर समझता है?

माघ पंडित:- तब फूलों की पैरवी फूलों को करने दो, तुम बीच में टांग न अड़ाओ तो अच्छा है।

वनमाली:- आप केवल अपनी ही बोली समझते हैं, फूलों की वाणी नहीं जानते, मैंने तो उन्हीं की बात आपको दोहराई थी, खैर छोड़िए इस झीने पचड़े को, जिस काम के लिए पधारे हैं, वही कीजिए।

राजा भोज:-[ मन ही मन -] बगीचे की अनुपम नजारे अपने अंतस में उतार लूं, मेरे रग रग में एक बगीचा लहलहा उठे और सचमुच एक चमन लहलहा उठा, फूल ही फूल महक उठे, और बाहर की बगिया के पत्ते पत्ते में मेरी दीठ पवित्र हो गई, मटमैली धरती में कैसे कैसे रंग भरे पड़े हैं, कितनी तरह की हरियाली, कितनी तरह के फूल, कितनी तरह के फल, कितनी तरह के कांटे, कितनी तरह के जड़ें और कितनी तरह के खुशबू इसकी उर्वर कोख में समाई हुई है, जिसका कोई अंत, न कोई पार, यह पोथी है पारायण करने की, पर इसे बारहखड़ी ही कहाँ सीखी? वैसा गुरु भी तो नहीं मिला।

माघ पंडित:- मन ही मन - छालों के जलन से मुझे फूल अच्छे लग रहे हैं, न हरियाली, माटी में जैसा बीज पड़ेगा, वैसा पौधा तो बाहर निकलेगा ही, हरे भरे पौधे पर फूल तो आते ही हैं, इसमें माली की क्या खासियत! यदि अलग अलग बीजों के एक से पौधे, एक से फूल और एक से फल लगे तो माली का चमत्कार है। पत्थरों से खुशबू महकाए तो माली का जादू है, यह बेकार ही राजा को भरमा रहा है, पहले तो पंडितों के अलावा किसी के बहकावे में नहीं आते थे। आजकल तो बच्चों के भोलेपन में भी कुछ न कुछ मरम खोज लेते हैं, शास्त्रों के गहरे ज्ञान की बातें सुनकर न जाने क्यों नाक भौं सिकोड़ने लगे हैं।

राजा भोज:-[गदगद होकर] - देखो, एक ही पौधे पर कितने रंग बिरंगे फूल हैं, अच्छी तरह ध्यान से देखो।

माघ पंडित:- हाँ ध्यान से ही देख रहा हूँ, बीज में जैसी संभावना थी, वैसे फूल तो दिखेंगे ही हजूर, इसमें माली का क्या हुनर?

राजा भोज:- वनमाली, देखो यह सूरज भी ललचाई आँखों से तुम्हारे फूलों को देख रहा है।

वनमाली:- पता नहीं, कौन किसको देख रहा है? फूल सूरज को या सूरज फूलों को?

माघ पंडित:- पर तुम तो फूलों की वाणी खूब समझते हो, जरा पूछकर हमें बताओ।

वनमाली:- राज पंडित का दबदबा कोई मामूली नहीं होता, आपके आते ही वे चुप हो गए, पूछने पर कुछ जवाब नहीं देते।

राजा भोज:- क्या राज पंडित का दबदबा राजा से भी बड़ा होता है?

वनमाली:- जानते हुए भी मैं इसका उत्तर देना नहीं चाहता।

राजा भोज:- तो जाने दो, तुम्हारी इच्छा ही सबसे बढ़कर है।

माघ पंडित:- आप से भी?

राजा भोज:- हाँ मुझसे भी, आज पहली बार मुझे इस सच्चाई का बोध हुआ कि राजा होने से ही किसी पर उसकी इच्छा थोपी नहीं जा सकती, यदि ठेठ बचपन से ही मुझे इस वनमाली के सत्संग का सौभाग्य मिल जाता।

माघ पंडित:- [मन ही मन ]- हरामी ने राजा पर कैसा मंतर फूंका कि वे भी उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे, यह तो शेर की माँद से भी ज्यादा खतरनाक है, जितनी जल्दी पीछा छूटे उतना ही बेहतर है। प्रकट - चलिए अन्नदाता, काफी देर हो गई है, पहुंचते पहुंचते सांझ घिर आएगी।

[राजा भोज आज किसी पर भी अपनी इच्छा नहीं लादना चाहता था बल्कि अपनी इच्छा के दमन में राजा को एक नये ही आनंद की अनुभूति हुई। माली दोनों हाथों में एक बड़ा सा मतीरा लेकर आया। लाकर उसे कोहनी से फोड़ दिया, माघ पंडित के मुँह में पानी आ गया।]

माघ पंडित:- पहले ही यह अमृत चखा देते तो मैं भी बगीचे का आनंद लेता।

वनमाली:- तो फिर यहीं रातवासा कीजिए, बीस तरह की खुशबू और मिठास वाले मतीरे है, राजा का सारा खजाना लुटाकर भी आप यह चीज कहीं हासिल नहीं कर सकते, आपकी तृप्ति से मेरी मेहनत भी सफल हो जायेगी, राजा भोज के साथ माघ पंडित का संजोग मेरे जीवन में फिर न जाने कब जुड़ेगा?

राजा भोज:- क्या पता किसका संजोग किसके लिए कल्याणकारी है? काश! तुम्हें मेरे मन की हलचल का कुछ भी अंदाज होता।

वनमाली:- यह तो आपका बड़प्पन है, कोई भी राजा इस तरह नहीं सोचता, उन्हें पोसाए तब न? सिंहासन का खतरा वे सपने में भी झेल नहीं सकते, आपकी ठौर कोई दूसरा राजा होता तो क्या मैं ऐसी हिम्मत कर सकता था? मुझे ज्यादा मनुहार करनी नहीं आती, काम ही नहीं पड़ा पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि इस बगीचे के साथ बिताई के रात आप कभी भूल नहीं सकेंगे।

माघ पंडित:- खुशी का दिखावा करते हुए -आज नहीं फिर कभी, यह बगीचा तो जितनी बार देखेंगे, उतनी बार नया लगेगा, मेहनत के फूल खिलते ही हैं।

राजा भोज:- इच्छा तो ऐसी हो रही है कि तुम्हें उज्जैन का राज सौंपकर, इस बगीचे की शरण में आ जाउँ।

वनमाली:- मैंने ऐसा क्या अपराध किया, जिसकी मुझे यह सजा भुगतनी पड़ेगी।

राजा भोज:- हां अपराध तो मैंने ही किया है जो जीवनपर्यंत राज्य की यह सजा होनी है।

[राजा भोज की आँखें वनमाली के पांवों पर टिक गई, माघ पंडित की उपस्थिति का लिहाज नहीं होता तो उन पांवों पर अपना सिर झुका लेता। मन में सोचता है- प्रजा की फरियाद सुनने के लिए तो राजा है, पर राजा अपनी फरियाद किसे सुनाए। दुनिया के किसी राजा की ऐसी दयनीय दशा नहीं हुई होगी, इच्छा न होते हुए भी राजमहल की उसी खूनी मांद में जाना होगा। राजा के पांव बड़ी मुश्किल से उधर मुड़े, मानों सदेह जिंदा जलने मसान की ओर बढ़ रहा हो।]

वनमाली:- मैं भी आपके साथ चलूँ?

राजा भोज:- नहीं, अब मैं तुम्हें तकलीफ नहीं दूँगा, सीधा रास्ता है।

वनमाली:- कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता, यदि राह में कहीं भटक जाएँ तो बेधड़क किसी से पूछ लीजिएगा, गांव के लोग रास्ता बताने में बड़े माहिर होते हैं।

माघ पंडित:-[ मन ही मन कोसा]- जंगली, उजड्ड और मुंहफट है, ढोर से भी गया गुजरा, राजा की शह नहीं होती तो अब तक सौ बार सीधा कर दिया होता, वह अपने मिथ्या दर्प की जैसी-तैसी कसौटी पर ही हर बात को आँकता है।

राजा भोज के कान में वनमाली के बोल दहाड़ रहे थे- कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता------- कोई भी रास्ता सीधा नहीं होता------।

दृश्य: 5

[राजा भोज और माघ पंडित वापस आ रहे हैं। राजा भोज पीछे मुड़ मुड़ कर देख रहा है, उसका देखा देखी माघ पंडित पीछे मुड़ मुड़ कर देख रहा है।]

राजा भोज:- जब कुछ घड़ियों के नजारे से मेरी यह दशा हो गयी, तब यह माली तो मरकर भी इसी बगीचे का भौंरा बनेगा, काश! मैं अपने हाथों से यह बगीचा लगा पाता।

माघ पंडित:- हजूर राज्य के सारे बगीचे आप ही के तो हैं।

राजा भोज:- तुम नहीं समझोगे माघ पंडित--- मेरी मजबूरी तुम नहीं समझोगे।

माघ पंडित:- मन ही मन- राजा तो अपनी जागती आँखों से कोई मार्मिक सपना देख रहे हैं, क्या उन्हें सपने से जगाना उचित रहेगा?

राजा भोज:- तुमने एक बात पर गौर किया?

माघ पंडित:- किस बात पर हजूर?

राजा भोज:- तुमने मुझसे कुछ पूछा?

माघ पंडित:- नहीं हजूर, आप ही ने मुझसे पूछा कि मैंने किसी बात पर गौर किया कि नहीं?

राजा भोज:- ओह--- शायद तुमने भी गौर किया होगा, जरूर किया होगा, मैं तो तभी से उस बात को याद करके हैरान हूँ- क्या वाकई मैंने अपनी आँखों से वह नजारा देखा था या मुझे सपना आया था? क्यूँ मेरे खयाल से उज्जैन छोड़ने के बाद अपन सोये भी तो नहीं हैं?

माघ पंडित:- नहीं हजूर, सोने का तो सवाल ही कहाँ? थकावट के कारण आपकी आंखें जरूर भारी हो रही होंगी, कितने पैदल चले हैं।

राजा भोज:- पैदल! मैं तो चाहता हूँ कि कहीं भी रूके बिना मैं रोज इसी तरह पैदल ही चलता रहूँ, पैदल चलने पर आज हमने जो कुछ भी पाया है, वह हाथी घोड़ों पर सवारी करके नहीं पा सकते, तुम्हारे पांवों में तो छाले तक पड़ गए, शायद तुम काफी थक गए हो?

माघ पंडित:- नहीं हजूर, इतनी पैदल कभी चला नहीं था, छाले तो जरूर पड़े, पर मैं थका बिलकुल भी नहीं हूँ, उज्जैन तक बड़े मजे से चल सकता हूँ।

राजा भोज:- पर रास्ते का पता चले तब न! मुझे तो लगता है कि अपन रास्ता भूल गए हैं।

माघ पंडित:- नहीं हजूर, वही रास्ता है, मैं एक बार चलने पर कभी रास्ता नहीं भूलता।

राजा भोज:- मैं तो अकसर भूल जाता हूँ, दोबारा उसी रास्ते पर चलने की न जाने क्यूँ इच्छा नहीं होती, देखो यदि तुमने भी गौर किया हो तो मुझे सच सच बताना कि जब वनमाली अपने साथ थोड़ी दूर तक रास्ता बताने की मंशा से चला तो उसके साथ-साथ बगीचा भी चल रहा था और उसके लौटने पर वापस उसके साथ हो लिया, जैसे वह उसकी छाया हो, हां मैंने खुद अपनी आँखों से यह नजारा देखा, फिर भी भरोसा नहीं हो सकता, भला कौन इस अनहोनी बात पर भरोसा करना चाहेगा? राजा के कहने पर हामी भर लें। क्या राजा के सामने वनमाली के उनमान सच बोलने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता? तब मैं बेकार राजा हुआ, राजा लाख जतन करे उसे सच्चाई का पता नहीं चल सकता, वह झूठ के बीच ही पलता है और झूठ के बीच ही मरता है, मेहरबानी करके तुम तो मेरे सामने झूठ मत बोलना, क्या तुमने भी यह नजारा देखा था?

माघ पंडित:- नहीं हजूर, सचमुच मैंने वैसा कुछ भी नहीं देखा, यदि उस समय आप मुझे कहते तो मैं भी बगीचे को चलता देखकर अपने को धन्य समझता।

राजा भोज:- सच कह रहे हो?

माघ पंडित:- नहीं तो क्या हजूर से झूठ बोलूँगा।

राजा भोज:- मेरे सामने तो सभी झूठ बोलते हैं, क्या तुम इस बात को नहीं जानते? वनमाली की बातें सुनकर मुझे ऐसा लगा कि मैं अब तक झूठ ही झूठ सुनता आ रहा हूँ, झूठ के अलावा कुछ भी नहीं, निखालिस झूठ--- फिर तुम्हीं क्यू ंसच बोलोगे? खैर छोड़ो भी, यह सच-झूठ का मसला बहुत ही पेचीदा है, क्या पता मेरे कहने पर भी वह नजारा तुम्हें दिखता भी या नहीं?

माघ पंडित:- जब आपने खुद अपनी आंखों से देखा है तो फिर मुझे क्यूं नहीं दिखता?

राजा भोज:- अपनी अपनी आंखों की तासीर है, देखने का अपना अपना ढंग है, हो सकता है, वह मेरा भ्रम ही हो, पर उस शुभ घड़ी में तो मुझे ऐसा ही दिखा था, तुम मानोगे इस बात को?

माघ पंडित:- क्यूं नहीं मानूंगा, जरूर मानूंगा हजूर।

राजा भोज:- पर तुम्हारी आंखें तो ऐसा नहीं कहतीं, होठों के बोल और आंखों की वाणी में बड़ा फर्क होता है, यदि आज वनमाली से मुलाकात नहीं होती तो मैं कभी इस बात नहीं समझ पाता, नहीं समझ पाता, क्यूं अपन वापस उज्जैन ही चल रहे हैं न?

माघ पंडित:- और कहां जाएंगे हजूर, अब तो सीधे वहीं पहुंचना है।

राजा भोज:- दूसरी ठौर भी तो नहीं जानते, चलो, फिर वहीं चलें, कैसी विडम्बना है?

माघ पंडित:-[ मन ही मन -] मेरे लिए विडम्बना नहीं है, मुझे निश्चित रूप से उज्जैन ही पहुँचना है, उससे बढ़िया आवास और क्या हो सकता है? भगवान जाने यह बगीचा क्या क्या गुल खिलायेगा? आज दिन तक कोई बगीचा किसी के साथ भी चला है? यह निरा पागलपन नहीं तो और क्या है? पर राजा को यह सच्ची बात कौन बताये? लोग इसीलिए तो उनके सामने झूठ बोलते हैं कि वे सच्चाई को बर्दाश्त नहीं कर सकते, फिर क्यों कोई सच कहकर अपनी जान जोखिम में डाले? इनका राजवैद्य से इलाज करवाना हैै, अब तो एक घड़ी की ढील भी नहीं खट सकती, कहीं ऐसा न हो कि उज्जैन पहुंचने के पहले ही ये पूरे पागल हो जाएं, लक्षण तो ऐसे ही नजर आते हैं, रानी जी को विस्तार से सारी बातें समझानी होंगी।

[वे रास्ता भूल गए, सचमुच राजा को उज्जैन के सही रास्ते का पता करना है या अपने आपको खोजना है? वनमाली के बगीचे ने उसके भीतर फूल ही फूल, खुशबू ही खुशबू, हरियाली ही हरियाली और कांटे ही कांटे भर दिये। माघ पंडित को एक बुढ़िया नजर आई]

माघ पंडित:- [मन ही मन]-सांप्रत ईश्वर की झांकी से भी मुझे इतनी खुशी नहीं होती, ईश्वर किसी भी राजा महाराजा का दास तो है नहीं, जो हाथ पकड़कर उन्हें अपने ठिकाने पहुंचा दे, सही रास्ते का इशारा मिलने के बाद तो वह देर सबेर अपने मुकाम पर पहुंच ही जाएगा, जहां उसकी जीवन की सारी आकांक्षाएं दीवारों के घेरे में सिमटी उसकी प्रतीक्षा कर रही है, दुनिया का कोई भी सत्य अपने घर परिवार से बड़ा नहीं होता, और अपने बच्चे, अपनी पत्नी, अपनी रसोई, अपनी भूख प्यास, अपना आंगन, अपनी सेज, अपनी नींद और अपने सपनों के अलावा दूसरा सत्य है भी क्या?

राजा भोज:- [मन ही मन ]- मैं जिन पांवों में चल रहा हूँ, वह मेरे पांव है कि नहीं या दूसरे के हैं, कहां ले जायेंगे? जहां वह जाना चाहता है या जहां वे ले जाना चाहते हैं, लगता है बुढ़िया तक तो पहुंचा ही देंगे, उसके बाद? आगे का रास्ता बुढ़िया बता देगी, न बता पायी तो--?

[बुढ़िया के पास दोनों आए, राजा तो काठ के पुतले की तरह निर्जीव सा खड़ा था, पर माघ पंडित पूरे होश में था। बुढ़िया बाजरे की रखवाली कर रही थी या फिर उन्हें चुगने की न्यौता दी है। माघ पंडित पत्थर उठाकर चिड़ियों को मारकर भगाना चाहता था।]

बुढ़िया:- खबरदार!

माघ पंडित:- मैं--- मैं तो खेत में बिगाड़ करती चिड़ियों को उड़ा रहा था।

बुढ़िया:- बिगाड़! --- बिगाड़ फिर कैसा? ये खेत में दाना नहीं चुगेगी तो क्या किसी बनिये की हाट पर खरीदने जाएंगी? यदि तुम्हारे पत्थर से मेरी कोई चिड़कल बिटिया मर जाती तो---।

माघ पंडित:- बस, मर जाती--- इसमें इतना सोच करे जैसी क्या बात?

बुढ़िया:-[ माघ पंडित के उपर से नीचे जाँचते हुए- ]बड़े अजीब मानुस हो! अपने हाथ से एक चम-जूँ तो गढ़ नहीं सकते और खुशी में फुदकती मेरी लाडली बेटी को खामखां अपनी मौज में मार डालते! अरे चिड़िया की बात तो दूर, हम निरमम मानुस तो अपनी जात बिरादरी पर भी दया नहीं विचारते, लोभ में आकर बाप, भाई और बेटे को मार डालते हैं, समझ नहीं पड़ता कि जमाने के साथ साथ आदमी की अकल बढ़ रही है या घट रही है? यदि मारने की जगह किसी को जिलाने में अपनी अकल लड़ाए तो दुनिया का नजारा ही बदल जाए।

[राजा नील गगन को एकटक निहारने लगा। बुढ़िया अपनी पीठ में बांघे शंख को मुंह से लगाया और झुर्रियां पड़े गाल फुलाकर जोर से फूंक मारी, निर्जीव शंख में प्राण भर आए। बगीचे की फूलों की तरह राजा भोज के रोम रोम खिल उठा, माघ पंडित दोनों को देखकर सहम गया।]

माघ पंडित:- मां राम राम!

बुढ़िया:- आसीस देने का गुमान क्या करूँ, फिर भी मामूली सी बात बताना चाहूँगी, जब मनुष्य की देह मिली है तो मनुष्य की तरह जीना सीखो, चाहे एक दिन और एक रात के लिए जीओ, वरना सौ बरस की उम्र भी अकारथ है-- मिसाल के तौर पर किसी चिड़िया ने तुम्हें मारने के लिए पत्थर नहीं उठाया तो तुमने जमीन पर पड़े पत्थर का क्यूं सहारा लिया? जिससे पत्थर के साथ जमीन की भी मर्यादा घटी और तुम्हारी भी।

माघ पंडित:- मनुष्य की मर्यादा के अनुरूप जीने के अलग अलग ढब और अलग अलग पथ हैं, पर लाख समझाने पर भी ये गहरी बातें तुम्हारी समझ नहीं आएंगी, इसलिए समझाना बेकार है। जानती हो तो फक्त इतना ही बता दो यह रास्ता कहां जाएगा? बड़ी मेहरबानी होगी, इससे अधिक हमें कुछ भी जानने की जरूरत नहीं है।

बुढ़िया:- बाँयें हाथ की तर्जनी हिलाते हुए:- कोई भी रास्ता कहीं नहीं जाता, आते-जाते तो बस बटोही हैं और अपने-अपने रास्तों पर चलते-चलते एक दिन सभी बिला जाते हैं, तुम अपनी आंखों में देख ही रहे हो कि मैं रास्ते के छोर तक पहुंच चुकी हूँ, तुम भी पहुंच जाओगे, इसे भूल गए तो बहुत भटकना पड़ेगा।

[राजा को बुढ़िया धरती लग रही है।]

राजा भोज:-[ मन ही मन ]- क्या आंखों के नन्ही पुतलियों से इस बुढ़िया का हुलिया परखा जा सकता है? पांवों के नीचे फैली इस असीम धरती से कम उम्र तो इसकी क्या होगी? पंडित के सवाल का जवाब किसने दिया? इस बुढ़िया ने या इस धरती ने? क्या धरती की तरह इस बुढ़िया के अंतस में भी हरियाली के अमिट बीज दबे पड़े हैं? पर धरती को मनुष्य की भांति बोलते पहली बार ही सुना, जिसके आखर आखर में बगीचे के फूलों का रूप छिटक रहा है।

बुढ़िया:- रास्ते का पता करने से पहले यह तो बताओ कि तुम हो कौन?

राजा भोज:- मां, हम तो बटोही हैं।

बुढ़िया:- ना बटोही तो दो दूसरे ही, भला तुम्हारी ऐसी बिसात कहाँ?

राजा भोज:- मां, वे कौन हैं?

बुढ़िया:- एक सूरज और दूसरा चाँद, तमाम दुनिया में हरदम उजास और प्राण बांटते रहते हैं, न बिसाई, न आराम, न थकान, न उजास का अक्षय खजाना कभी खुटे और न प्राणों का अटूट भंडार रीते, जिसे उजास की जरूरत हो उसके लिए उजास हाजिर, जिसे प्राणों की दरकार हो उसके लिए प्राण हाजिर, कोई कहीं भी बसे, मना करना जानता ही नहीं, फिर भी क्या मजाल कि यह छोड़ इधर-उधर जाएं या मुंह लुकाते फिरें, बटोही तो ये कहलाते हैं, पर तुम--?

माघ पंडित:- मां, हम तो मेहमान हैं।

बुढ़िया:- ना मेहमान तो दो दूसरे ही, एक तो लिछमी और दूसरा प्राण, बिन बुलाये आ धमकते हैं और बिन बताये विदा हो जाते हैं, हर किसी को उनके आने से बेहद खुशी होती है और इनकी जुदाई में भयंकर संताप, इच्छा हो तो जितने रूक जाएं और इच्छा न हो तो देखते देखते छोड़ जाएं, न जात बिरादरी का लिहाज रखें और न नाते रिश्तेदारी का भेदभाव, न राजा की माने, न रंक की गरज करवाएं, जिनका नाम मेहमान, परमात्मा ने जैसी सुहानी सूरत दी है तुम्हें, वैसा दिमाग भी दिया होगा, जरा विचार कर जवाब दो।

राजा भोज:- मां, हम तो परदेसी हैं।

बुढ़िया:- अरे तुम्हारी चटपटी बातों में अपनी चिड़कल बेटियों का मुझे कुछ खयाल ही नहीं रहा।

[बुढ़िया शंख फूँका, चिड़ियाँ आकर दाना चुगने लगी।]

कूख के जागे जन्मों में भी कहीं अधिक पंछी जानवर मेरा मान रखते हैं, एक भी दाने या एक भी तिनके का फालतू बिगाड़ नहीं करते, बस पेट भरा और संतोष, मैं भी अपने पेट से पहले इनका जतन रखती हूँ, तुमने क्या कहा, मैं तो भूल ही गई, फिर से बताना।

राजा भोज:- मां, हम तो परदेसी हैं।

बुढ़िया:- ना रे ना, परदेसी तो दूसरे ही, एक बादल और दूसरा सपना, जाने कब अपना ठिकाना छोड़कर परदेश चले जाएं, पता ही न चले, बादल तो राह चलते हुए भी प्रीत, सुख और संपदा लुटाते चलते हैं, जो घर से लेकर चले थे, उन्हें देखते ही सूखे अंतस में बहार छा जाती है, बच्चे किलकारियाँ भरने लगते हैं, फक्त घड़ी भर के लिए मेहर-मया हो जाए तो धरती के कण-कण में उमंग लहराने लगती है, फटे तालाब टर्र टर्र कर मीठा राग सुनाने लगते हैं, परदेशी प्रीतम को रिझाने के लिए धरती सोलह सिंगार सजती है, न आए तो उसके बिछोह में आहें भरती है, और बंद आंखों से दिखने वाले परदेशी सपने की नजाकत ही निराली है, पलकें मूंदते ही हाजिर, आंखें खुलते ही ओझल, नजर की मार से भी सह नहीं सकता, कोसों दूर होते हुए भी यह परदेशी पलकों में छिपा रहता है, न आने का संदेश और न जाने की खबर, तुम न तो देसी हो न परदेसी, राम जाने क्या हो?

राजा भोज:- मां, हम तो छैल भंवर हैं।

[बुढ़िया मुस्कुराती है।]

राजा भोज:- मन ही मन - इस मुस्कान से तो सूरज का अंधेरा भी मिट सकता है, मगर आदमी के मन का अंधेरा विलुप्त होना ही तो सबसे अधिक दुश्वार है, पंछी जानवरों के भीतर शायद ही ऐसा अंधियारा हो, मेरे भीतर का अंधकार कुछ कुछ छंटने लगा है, जब बादलों को बरसने के लिए, हवा को बहने के लिए, झरनों को फूटने के लिए और फूलों को खिलने के लिए किसी से याचना नहीं करनी पड़ती, तब धरती का प्रतिरूप बुढ़िया इन अकिंचन बातों के लिए किसका मुंह जोहेगी। एक बार बुढ़िया लाजवाब हो जाए तो आज की पराजय का पछतावा थोड़ी देर के लिए मिट जाए।

बुढ़िया:- [मुस्कुराते हुए-] ना छैल भंवर तो दो दूसरे ही, एक अन्न और दूसरा पानी, इन दोनों के गले उतरने पर ही सब की छैलाई कूद-फांद करती है, एक दिन भी नसीब न हो तो सारी मर्दानगी उड़नछू हो जाए! फिर तुम छैल भंवर कैसे हुए? अपने आप को कुछ तो पहचानो।

माघ पंडित:- मां, हम तो गरीब हैं।

बुढ़िया:- ना गरीब तो दो दूसरे ही, एक तो गउ का जाया और दूसरी कुंवारी कन्या, बैल को जहां बेचो, वही हल खींचता है, गाड़ी का भार ढोता है और मरने के बाद भी मनुष्य के पांवों को कांटों से बचाता है और बेटी को घरवाले जहां कहीं भी ब्याहते हैं, चुपचाप विदा हो जाती है, पराये घर को अपना समझती है, ससुराल के घर में पांवों चलकर आती है और लेटी लेटी दूसरों के कंधें पर मसान के शरण में चली जाती है, जो दूसरों के इच्छा पर चलते हैं, गरीब तो वे कहलाते हैं, समझे?

राजा भोज:-[ मन ही मन]- बुढ़िया के अलावा और कोई क्या समझेगा? हमें तो सुनना ही सुनना है, सुनने

से ही शायद कुछ समझ आये, किसी भी राज्य के खजाने में ऐसे बेशकीमती नगीने कहां? और न इनकी रखवाली के लिए संगीनों का पहरा ही जरूरी है, धूप और हवा की तरह सुगम होने पर भी इनकी ओर हाथ बढ़ाने की हिम्मत किसमें है? पर आज तो वह अपने दिवालिया हाथ उधर बढ़ाकर ही मानेगा। [प्रकट में मां, हम तो शूरवीर हैं।

बुढ़िया:- शूरवीर, ----[-खाँसती है-] ना शूरवीर तो दो दूसरे ही, एक अबूझ बालक और दूसरा पागल, बालक तो राजा का भी परवाह नहीं करता, और न उसे मौत का ही डर लगता है, पागल आदमी भगवान को भी नहीं मानता वैसे भी, शूरवीर को अपने से बड़ी ताकत का डर रहता ही है, अपने से बांका यमराज के समान, जो न किसी से दबे, न किसी स डरे, वह शूरवीर है, मजाक करने के लिए मैं ही मिली तुम्हें? सच सच बताओ, तुम हो कौन?

राजा भोज:- मां, हम तो ठग हैं।

बुढ़िया:- ना ठग तो दो दूसरे ही, एक तो ठाकुर और दूसरा साहूकार, किसान खून पसीना बहाकर मोती पैदा करता है और ठाकुर धौंस जताकर उन्हें झपट लेता है, जिस पर बैठ बेगार की करारी मार, बनिया एक के इक्कीस टीपता है, झूठे बहिखाते लिखता है, फिर भी साहूकार कहलाता है, दुनिया में इनसे बड़ा ठग और कौन? ठगाई करने पर भी बड़े कहलाएँ, वे ही तो असली ठग हैं, इत्ता भी नहीं जानते?

माघ पंडित:-[ मन ही मन ]- राजा के तहत न जाने कितने ठिकाने और कितने ठाकुर? तब तो राजा ठाकुरों में भी बड़ा ठग है, बड़े से बड़ा शत्रु भी राजा के सामने इस कदर मुंहजोर नहीं हो सकता, इस मरियल बुढ़िया की अक्ल तो नहीं मारी गयी?

गुस्से के मारे पंडित का मुंह तमतमा गया, राजा ने उसे चुप रहने का संकेत किया।

राजा भोज:- मां, हम तो असल में चोर हैं।

बुढ़िया:- ना, तुम्हारी ऐसी तकदीर कहाँ, चोर तो दो दूसरे ही, एक गुरु और दूसरा वैद्य, गुरु अज्ञान की चोरी करता है और वैद्य देह की मांदगी गायब कर देता है, असली चोर तो ये हैं, चोरी करने पर भी सुहाते हैं, धन और वित्त पर हाथ साफ करने वाले चोर थोड़े ही हैं, यह तो अपना धन बचाने के लिए समझदार धनवानों की बात है, क्यूं बेकार परेशान हो रहे हो, बताओ तुम हो कौन?

राजा भोज:- मां, हम तो हठी हैं।

बुढ़िया:- ना, हठी तो दो दूसरे ही हैं, एक नाखून और दूसरे केश! नाखून बार बार काटो तब भी बढ़ते हैं, और केश सफाचट मूंड़ने पर भी वापस आ जाते हैं, काटने वाला हार मान ले पर ये कभी हार मानने वाले नहीं, ऐसा हठ निभानेवाले हठी कहलाते हैं, तुम्हारा क्या बीतता कि ऐसा हठ निभा सको।

माघ पंडित:- हमसे भूल हो गई, सबसे पहले अपना सही परिचय बता देना चाहिए था, मां, हम तो ज्ञानी हैं।

बुढ़िया:- तुम लोगों का तो पूरा जीवन ही एक बड़ी भूल है, देखूं जरा, तुम ज्ञानियों का दमकता चेहरा, ज्ञान तो सौ सौ कोस तक भी तुम्हारे पास होकर नहीं फटका, पर इसके लिए तुम्हें दोष नहीं दूंगी, ज्ञानी तो लाखों करोड़ों में एक भी बड़ी मुश्किल से पैदा होता है, अधिक जानने का नाम ज्ञान नहीं है, मनुष्य फक्त एक ही बात जाने और उसे कर दिखाए, वह ज्ञानी है, यदि खुद सूरज भी तलाश करने लगे तो ऐसा ज्ञानी मिलना दूभर है, पर मनुष्यों के अलावा भी दुनिया लम्बी चौड़ी है, जिसमें ज्ञानी फक्त दो ही है, एक मोमाखी और दूसरा पपीहा, फल, फूल, गुड़ व गिरी के सत का ही रस ग्रहण करती है यह चंचल मोमाखी! इसका छत्ता ज्ञान के शहद से भरा रहता है, भला ज्ञान से मीठा और क्या होगा? अनगिन लालसाओं को अनदेखा करके फक्त मन की खोज, ज्ञान की गुनगुनाहट, और मुट्ठी में समाए जित्ता यह नन्हा पपीहा भी इस सत की खोज में जीता है, हरदम उसी के नाम की रट में खोया रहता है, चाहे जैसी प्यास हो, किसी और पानी के लिए उसकी चोंच ही नहीं खुलती, हजार-बीसी मानसरोवर भी उसके लिए सूखे हैं, बरसते बादल भी उसके लिए रीते हैं, क्या मोमाखी और पपीहे की तरह ज्ञान के लिए ऐसी खोज कर सकते हो? कामनाओं के कीचड़ का मोह छोड़ सकते हो बोलो?

राजा भोज:- मां, हम तो झूठे हैं, अब तो खुश?

बुढ़िया:- मुझे खुश करना तुम्हारे बस की बात नहीं है, तुम्हारी खुशियाँ तो धन की बढ़त घटत से जुड़ी है, तुम्हारे कबूल करने पर भी मैं तुम्हें झूठे नहीं मानती, झूठे तो दो दूसरे ही, एक संत और दूसरा नास्तिक, संत भगवान का भेद जानने की डींग हांकता है, और नास्तिक गला फाड़कर चिल्लाता है कि भगवान है ही नहीं, मेरे सवाल से तो इनसे बड़ा झूठा कोई नहीं, झूठे सच्चे कहलाएं, वे ही तो असली झूठे हैं, तुम न तो सच को जानते हो और न झूठ, मुझसे मसखरी करना जानते हो, सो कसर मत रखना, बड़भागियों, अब तो बताओ कि तुम कौन हो?

माघ पंडित:- मां, हम तो मसखरे हैं।

बुढ़िया:- ना, मसखरे तो दो दूसरे ही, एक रूप और दूसरा जोवन, दोनों ही मसखरी करके बुढ़ापे में चंपत हो जाते हैं, सलवटों से बुनी सूरत, अदंत मुंह, झुकी हुई कमर, रुई के समान धवल केश और बच्चों के घोंसलों की नाई लटकते हाँचल! वह कोई कम मसखरी है! जोवन के जोश में मनुष्य आसमान को छेदने का हौसला रखता है, पर बुढ़ापे में मुंह में मक्खी भी नहीं उड़ती, मेरा हुलिया देखकर तुम सोच रहे होगे कि इन मसखरों ने मेरे साथ कैसी बितायी? पर मैं इनकी परवाह करूं तब न, बुढ़ापे का यह अखूट अनुभव मेरे लिए जवानी से भी बढ़कर है, मौत की कोख से मैं फिर नया जनम लूँगी।

राजा भोज:- [मन ही मन-] राज दरबार के पंडित ज्ञान का खास स्थान कहां बता रहे थे और कहां मिला, प्रकट में - मां, हम तो सहनशील हैं।

बुढ़िया:- ना, सहनशील तो दो दूसरे ही, एक धरती और दूसरा बिरछ, धरती पापी का बोझ उठाती है, राजा, ठाकुर, साहूकार, महात्मा व पंडित का भी भार ढोती है, उसकी छाती कुरेदकर बीज डालो, तब भी बीजों का विनाश नहीं करती, शरीर पर हल चलाने के लिए भी धान के भंडार भरती है, एक दाना लेकर हजार लौटाती है, कण का मण उपजाती है, कलेजे पर गहरा घाव करने पर भी मीठा पानी सौंपती है, हीरे-मोती और सोना भेंट करती है, बिरछ को पत्थर मारो तो वह रसीले फल देता है, काटकर जलाने पर उजाला देता है, तरह तरह के भोजन पकाता है, कुल्हाड़ी चलाने वाले को भी ठंडी छांह देता है और खुद कड़ाके की धूप, सरदी, आंधी और पाला अपने उपर झेलता है, एक ही ठौर गड़े रहकर गाछ बिरछ न जाने क्या क्या सहते हैं, सहनशील नाम इनका, मनुष्य तो पांवों में कांटे की चुभन भी नहीं सह सकता, चिट्ट अंगुली का जरा सा कच्चा नाखून भी कट जाए, तो उनके सुख चैन में आग लग जाती है।

[माघ पंडित के मन में खटका हुआ।]

माघ पंडित:-[ मन ही मन] - एक बार नाई मेरा नाखून काट रहा था, मक्खी के परस से चौंककर मैंने हाथ खींचना चाहा, नाई से कुछ चुक हुई और मेरा उंगली कुछ कट गई, मेरा पूजा पाठ में मन नहीं लगा, पर नाई के चीख से मेरा पीड़ा थोड़ा बहुत भूल गया, मेरे पूजा करने तक नाई को कोड़े से पीटा जा रहा था, पर आज चुपचाप इस बुढ़िया के जहरीले तीर झेल रहा है। मामूली तैश भी प्रकट नहीं कर सका। [प्रकट]- मां, हम तो शीतल हैं।

बुढ़िया:- ना शीतल तो दो दूसरे ही, एक आग और दूसरी धूप। अरे! बावलों, यूँ छोटी छोटी बातों पर अचरज करने से पार नहीं पड़ेगा, अभी हम जानते ही क्या हैं? बहुत कुछ समझना बाकी है, हाँ तो मैं कह रही थी कि दुनिया में शीतल चीज एक तो आग और दूसरी धूप, आग संसार के सभी मनुष्यों के पेट की आग बुझाती है, नस नस की जलन मिटाती है, और धूप बेशुमार फसल और घास पैदा करके दीन दुनिया का कलेजा ठंडा करती है, इसीलिए तो ये शीतल हैं, सच्ची बात बताए बगैर तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूंगी, बताओ, तुम हो कौन?

राजा भोज:-[ मन ही मन ]- आज दिन तक किसी ने भी यह जानना नहीं चाहा कि वे कौन हैं? राज्य की प्रजा तो उनके बारे में उनसे ज्यादा जानती है, किसी को कुछ भी बताने की जरूरत ही अब तक नहीं पड़ी, हम खुद यह भी मानकर चलते थे कि धरती का कण कण, हरियाली का पत्ता पत्ता और देश के सारे पशु पक्षी हमें अच्छी तरह चीन्हते हैं, पर आज इस सवाल का क्या जवाब दें कि वे कौन हैं? कहां तो राज दरबार की बासी सभाएं और कहां यह अधमरी अकेली बुढ़िया! अनुभवों की आंच में तपी अखंड लौ के समान, दिप दिप हिलती हुई! जिसके चमत्कार से इस पृथ्वी पर यह प्रकाश फैला है, कभी सूने आकाश में यह सूरज का रूप भरकर दमकती है, तो कभी तारों जड़े नील गगन में चांद की तरह चमकती है, और कभी-कभार धरती पर बालों की रुपहली किरणें छितराए---- झुकी कमर से संसार का अंधियारा हरती है, काश मैं इसकी कोख से जन्म लेता तो राजा की गलीज जिन्दगी से पीछा छूट जाता! पर अगले ही क्षण उसे बुढ़िया के प्रश्न का बोध हुआ, साधु के अलावा ऐसी फटकार कौन सहे। [ प्रकट]-मां, हम तो साधु हैं।

बुढ़िया:- ना साधु तो दो दूसरे ही, एक संतोषी और दूसरा अज्ञानी, जिसे किसी बात का लोभ न हो, न धन का, न यश का, न भगवान का और न ज्ञान का वह साधु है, या तो कोई औघड़ अलबेला ऐसा संतोषी हो सकता है या निपट अज्ञानी, मेरे विचार से तो ये दो ही साधु कहलाने के अधिकारी है, मेरी ओर टुकुर टुकुर देखने की जगह अपने भीतर झांककर देखो कि तुम्हारे लोभ का क्या हाल है?

राजा भोज:- [मन ही मन ]- यह किसका इशारा है? अपनी मंजिल से भी आगे निकली इस बुढ़िया का या दिन भर की दुर्गम यात्रा से थके हारे सूरज का? बुढ़िया ने एक भी परिचय कबूल नहीं किया। प्रकट में- मां, हम तो बहुरूपिये है।

बुढ़िया:- बौरा तो नहीं गए? ऐसा बेतुका अभिमान तुम्हें शोभा नहीं देता, बहुरूपिये तो फक्त दो ही हैं, एक भगवान और दूसरी कुदरत, भगवान के हजार रूप होते हुए भी वह निराकार है, सब जगह दिखता हुआ भी अगोचर है, सरब गुण सम्पन्न होते हुए भी कहीं मौजूद नहीं है, ऐसा बहुरूपिया भला और कौन हो सकता है? और यह अखंड सुहागवती कुदरत तो हर छिन अपना सिंगार बदलती है, धरती के तमाम पत्तों की गिनती हो! पल पल रूप बदले बिना कुदरत का जी नहीं भरता, सांझ होने आई और अपने बारे में कुछ भी नहीं बता सके! किसी बच्चे को साथ ले आते तो वह पहली बार में ही अपनी सही पहचान बता देता।

राजा भोज:- जरूर बता देता! पर हम नहीं बता सकेंगे, तुम्हें ही बताना पड़ेगा, माँ तुम्हारी बुद्धि का हम मुकाबला नहीं कर सकते।

बुढ़िया:- बुद्धि का मुकाबला- बुद्धि का मुकाबला, यही तो तुम्हारा भरम है, कोई दूसरी गाली नहीं सूझी? बुद्धि के नाम की तो मैं जूतियाँ भी नहीं पहनूँ, बेचारी बुद्धि चमड़ी का क्या मुकाबला करेगी? चमड़ी का महातम बुद्धि से बड़ा है, चमड़ी का यह ढाल न हो तो बुद्धि अपने बूते पर जिंदा नहीं रह सकती, इत्ता भी नहीं जानते? कैसे मूरख हो?

राजा भोज:- दुनिया में मूरख फक्त दो ही हैं, एक राजा और दूसरा राज पंडित, बिना किसी खासियत के राजा अपने आप को ईश्वर समझता है और राजा के इस सफेद झूठ को राजपंडित पोथियों के थोथे हवाले देकर सत्य सिद्ध करने की निरर्थक चेष्टा करते हैं, मूरखों के यही तो खास लच्छन हैं कि गुण नहीं होने पर भी खुद को बड़ा मानना और जिन्दगी भर इस मुगालते में जीना और अपने स्वार्थ के लिए इस मुगालते को मूरख राजपंडितों के द्वारा सत्य घोषित करना। राजाओं का यशोगान करना, उनके बड़प्पन का ढोल पीटना, खजाने का माल उड़ाकर हमने इतने बरस फालतू गंवाए, पर हाड़-पसीने की कमाई खाने वालों को कतई नहीं पोसाता, यह मूढ़ता तो मुफ्त का माल चरने वालों को शोभा देती है---मैं हूँ राजा भोज और ये हैं माघ पंडित।

बुढ़िया:- पर मैं तो समझती हूँ कि अभी तुम्हारा जन्म ही नहीं हुआ, फिर कैसा राजा और कैसा पंडित?

राजा भोज:- क्या कहा, अभी हमारा जन्म ही नहीं हुआ?

बुढ़िया:- हाँ।

राजा भोज:- तो फिर मैं तुम्हारी कोख से जन्म लेना चाहूँगा।

बुढ़िया:- पर अपनी इच्छा से कोई किसी की कोख का वरण नहीं कर सकता, तुम्हें अपने ही कोख से जन्म लेना होगा, यही तो सच्चा जन्म है, मां की कोख से तो फक्त सांस लेने वाला लोंदा पैदा होता है,

राजा भोज:- [मन ही मन ] अपने भीतर गोता लगाना समंदर के ठेठ तल तक पहुंचने से भी कहीं ज्यादा कठिन है।

[माघ पंडित को अपने विवेक पर ही सबसे अधिक भरोसा था, अपढ़ जीभ से फालतू ज्ञान का यह गुमानी बघार सुनते ही उसका क्रोध कुचले नाग की तरह फुफकारें मारने लगा।]

माघ पंडित:- [मन ही मन ]- यदि अब अपनी समझ काम में नहीं ली तो उज्जैन का सर्वनाश अवश्यंभावी है, उसे टालने की भरसक चेष्टा करना उसका परम कत्र्तव्य है, काफी समय से राजा की मति बिगड़ती जा रही है, स्वामी की चूक तो वह सपने में भी बता सकता नहीं, मगर इस खूसट बुढ़िया को तो सबक सिखाना ही पड़ेगा, माली के साथ पैदल रवाना होना ही सबसे बड़ी भूल थी, राज की निगरानी बड़ी है या बगीचे की रौनक, तिस पर रास्ता बताने के लिए साथ आते माली को भी न जाने किस सै में मना कर दिया, खैर हुआ सो हुआ, पर अब तो इस कुबड़ी बला से छुटकारा पाना निहायत जरूरी है।

[माघ पंडित उससे सलटने को आतुर दिखा ही था कि राजा ने टोक दिया।]

राजा भोज:- मां की बातें बिलकुल सही है, सच्चाई पर बौखलाना बेकार है, उल्टे हमारा ही नुकसान होगा, जिसकी पूर्ति राज्य के खजाने से भी नहीं होगी।

बुढ़िया:- बेचारा बित्ते भर का यह नटखट मानुस इस अथाह कुदरत को जानकर भी कित्ता जान सकेगा, हां अलबत्ता जानने का भरम भले ही कर ले, तट पर बिखरी एक सीप को पाने से समंदर का पाना नहीं होता, और अपनी यह विशाल दुनिया बिरमांड की तुलना में सीप के बराबर नहीं है, न जाने कितनी लाखों लाख दुनिया इस बिरमांड में बिखरी पड़ी है, जो हमें दिखाई नहीं देती, मैंने अपने अंतस की अदीठ जोत से यह सब नजारा देखा है, मेरी आंखें तो कमर झुकने के बाद उघड़ी है, तब से मैं उपर ही उपर देखने लगी हूं।

माघ पंडित:- कमर झुकने के बाद जब तुम उपर ही उपर देखने लगी हो, तो बताओ, आकाश में उंची चीज क्या है?

बुढ़िया:-[ हंसते हुए] - खोदा डूगर और निकला उंदर। आखिर मगज लड़ाते लड़ाते वह ना कुछ सवाल पूछा, जिसका जवाब देना चाहूँ, तो मेरे चाँदी जैसे उजले केश काले नहीं पड़ जाएंगे? अपनी पोती को आवाज देती हूँ , ऐसी पहेलियाँ उससे पूछ।-------- पोती ओ पोती।

[पोती आती है।]

बुढ़िया:- मैं तो इत्ती देर में तेरा सवाल भूल गई, मेरी लाडो चिड़कल को फिर से तो पूछ।

माघ पंडित:- बता बिटिया, आकाश से उंचा क्या है?

पोती:- आकाश से उंचा तो यह माथा है, आकाश तो मुझे साफ दिखता है, पर यह माथा नहीं दिखता,

इसलिए यह आकाश से उंचा हुआ कि नहीं?

माघ पंडित:- पाताल से गहरी चीज का नाम बताओ बिटिया?

पोती:- पाताल से गहरा तो पेट है। दोनों टैम भरने पर भी खाली का खाली, शाम भरा और सुबह खाली, बहुत बड़ा होने पर भी पाताल की गहराई का तो पता लगाया जा सकता है, पर पेट की गहराई का पता नहीं लगाया जा सकता, अब आप ही बताएं कि पेट पाताल से गहरा है कि नहीं।

राजा भोज:- हां है बिटिया, पेट पाताल से बहुत ज्यादा गहरा है।

माघ पंडित:- गुड़ से मीठी चीज क्या है, बता सकती हो?

पोती:- बोली, जिसकी मिठास से शेर और भालू तक वश में हो जाते है।

माघ पंडित:- पानी से पतली चीज क्या है, जरा सोच कर बताओ?

पोती:- नजर! भला इसमें विचार करें जैसी क्या बात! जिसे पूछो बता देगा, कोई पत्थर भी मेरी दादी की सीख माने, तो उसमें भी अकल आ जाए।

[माघ पंडित और सवाल करना चाहता था, राजा भोज ने उसे टोक दिया।]

राजा भोज:- बस काफी है, अधिक मूढ़ता उजागर करने में कोई सार नहीं। आज हम उज्जैन का मार्ग नहीं भूलते तो नये रास्तों का पता नहीं चलता।

माघ पंडित:- [मन ही मन ]- वह अपनी बुद्धि और विवेक के बावजूद भीतर से पिघलता जा रहा है, जिसका बोध मुझे बड़ी मुश्किल से हुआ, वह अपनी इच्छा से रंच मात्र भी पिघलना नहीं चाहता है, पिघलने से पत्थर की मारक शक्ति कम हो जाती है। किन्तु उसे पिघलने का भी एक नया आनंद था, नया ओज था, फिर भी जितनी जल्दी हो, इस जादूगरनी के चंगुल से भाग छूटने में भलाई है, जो जंगली है, वही जंगल में रहने को मजबूर है, गोबर का कीड़ा गोबर में मगन और रसिक भौंरा तो फूलों के आसपास ही गुनगुनाता रहता है, लाख लच्छेदार बातें बनाये, इस बुढ़िया के लिए तो उज्जैन नगरी का सपना भी नामुमकिन है माटी के उनमान यह अपने खेतों से ही चिपकी रहेगी, मगर उन्हें तो उज्जैन पहुंचने वाले मारग की ही एकमात्र तलाश है, जहां तमाम सांसारिक सुख उनकी अविकल प्रतीक्षा कर रहे हैं।-प्रकट में -मां अब तो हमें उज्जैन का मार्ग बता दे।

बुढ़िया:- दुनिया में मारग फकत दो ही हैं, एक सत्य का, दूसरा प्रेम का, ये मारग नहीं भूले तो कहीं अटकने की जरूरत नहीं।

राजा भोज:- [मन ही मन ]- क्या इतना विराट है इसका अंतस? तब तो बुढ़िया के अंतस का न्यूनतम कोना ही समस्त ब्रह्मांड के लिए पर्याप्त होगा, इतने बरस अपनी इस सामथ्र्य की उसे कल्पना नहीं थी, चिरवरेण्य है इस बुढ़िया का चरण।

[राजा भोज बुढ़िया की चरण का परस करना चाहा, तो बुढ़िया सहमकर पीछे हट गयी।]

बुढ़िया:- अरे! तुम्हें यह क्या औंधी सूझी? मेरे लिए क्यूं नरक का सरंजाम कर रहे हो?

राजा भोज:- नरक के ऐसे भाग्य कहाँ! तुम्हारी छाया पड़ते ही वह स्वर्ग बन जाएगा और तुम्हारे अभाव में स्वर्ग भी नरक बन जाएगा, क्या मैं तुम्हारे पांव छूने योग्य भी नहीं हूं?

बुढ़िया:- यदि कोई देवता भी पांव छूने से खुश हो तो उसे शैतान से कम मत समझो और दूसरी तरफ अयोग्य आदमी के द्वारा पांव छूने से बढ़कर घिनौनी बात कोई नहीं है, जिसमें धरती जैसी अकूत क्षमता हो, फक्त वही पांव छूने का अधिकारी है, प्रत्येक प्राणी को जीवन बांटने वाली धरती के अलावा कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता, जो भी साधु या महात्मा अपने भक्तों के श्रद्धा पाने के मोह में अपने पांव आगे करते हैं, उनके लिए मेरे मुंह में तो शाप भी नहीं निकलेगा, पात्र कुपात्र भी देखना पड़ता है। और भी पूछना हो तो पूछ, मां से कैसा दुराव?

राजा भोज:- पहले वचन दो।

बुढ़िया:- वचन? न किसी से वचन लेती हूँ, न किसी को वचन देती हूं, जब बिना वचन दिये मां की कोख से जनम ले लिया तो अब मरने के मुहाने पहुंचकर तुम्हें क्या वचन दूं? ----- मेरे एक बेटे ने भी वचन देना चाहा था कि आइंदा वैसी गलती नहीं करेगा, पर मैंने उससे भी वचन नहीं लिया, मैं आज दिन भी नहीं समझ पायी कि उसने वह अकरम किया तो किया ही कैसे? मेरे दूध की वैसी तासीर तो नहीं जानी थी। बस एक पखवाड़ा पहले की बात है कि एक भोले भाले चूहे ने बगीचे की मतीर की एक बेल कुतर डाली तो मेरा बेटा अपने क्रोध पर काबू नहीं पा सका, आवेश में आकर एक तीखा पत्थर दे मारा उस चूहे पर, बेचारे की पूँछ कट गई।--------- तुम मेरी वाणी समझो न समझो, पर बाजरी का पत्ता पत्ता व उसका दाना दाना चारों ओर के पेड़, चिड़कल बेटियाँ, चारों ओर छितरी धूप, रेत के कण कण और हवा के रेशा रेशा , अच्छी तरह से मेरी वाणी समझते हैं और मैं इनकी वाणी समझती हूँ, सुन रहे हो--? जनम देने वाले मां के सामने उसने सफाई दी कि चूहा बेल की जगह मतीरा कुतर डालता तो उसे गुस्सा नहीं आता, अपनी गलती ढांपने के लिए मेरे ही सामने उसने ऐसा बेहूदा बहाना बनाया, कुछ भी कहा सुनी न करके मैं चुपचाप यहां चली आई, एक बार खयाल आया कि उज्जैन पहुंचकर अपने बेटे की तुम्हें शिकायत करूं, पर जो राजा शिकार के शौक में न जाने कितने पशु पाखी मार चुका है, वह एक चूहे की अधकटी पूंछ का दरद क्या समझेगा? उलटे मुझ पर ही हंसेगा, बाद में तो मेरे बेटे ने भी पछतावा कम नहीं किया। सात दिन तक भूखा रहा, पर उसके भूखे रहने से चूहे की कटी पूंछ तो वापस जुड़ने से रही। गणेश बेटा गणेश।

[एक चूहा आकर बुढ़िया के शरीर में चढ़ने लगी। राजा भी पूँछकटा चूहा को देखा।]

राजा भोज:- पिछली गलतियों के लिए फक्त माफी मांगना तो और भी बड़ा अपराध होगा, पर आज अभी इसी पल से मेरा एक संकल्प है कि छोटे बड़े किसी प्राणी को अपने प्राणों से बढ़कर समझूंगा, उनकी हत्या करना मेरी ही आत्महत्या होगी।

बुढ़िया:- मेरे बेटे ने भी पिरासचित के रूप में यही मंशा दरसाई थी कि तुमसे शिकार करना छुड़वा देगा।

राजा भोज:- फिर भी उसे माफ नहीं कर सकोगी?

बुढ़िया:- पूंछ तो चूहे की कटी थी, मैं माफ करने वाली कौन होती हूँ?

राजा भोज:- पर आधी पूंछ के बदले तुम्हारे बेटे ने कितने पशु-पक्षियों के प्राण बचा लिये, जरा हिसाब तो लगाकर देखो।

बुढ़िया:- यही हिसाब तो मेरी समझ में नहीं आता, चाहे बेटा समझाए, चाहे देश का राजा समझाए, मेरे गणेश की कटी पूँछ से इसका क्या सरोकार? लगता है यही हिसाब धीरे धीरे सारी दुनिया को ले डूबेगा।

[चूहा को सिर से उतारकर हथेली में लिया तो फुदककर नीचे उतर गया, दो बाज उड़कर चूहे के पास आए, उसके पांखों में चूहा चढ़ने उतरने लगा।]

बुढ़िया:- तुम्हारा वनमाली घुटनों के बल चलना सीख रहा था, तब की बात है, एक हिरण अचानक सहमा हांपता मेरे पास आ खड़ा हुआ, जैसे बादलों से टपक पड़ा हो, मैं उसे अच्छी तरह देख नहीं पायी थी कि दहाड़ते हुए एक शेर पर मेरी नजर पड़ी, एक बार तो मैं डर के मारे सूखे काठ सी हो गयी, पर दूसरे ही छिन न जाने कहां से मुझमें सौ शेरों का बल उतर आया, बेटे के मुंह में हांचल थमाकर शेर की तरफ आगे बढ़ी, उससे आंखें मिलाती हुई ऐन उसके सामने खड़े होकर बोली- यदि तू ऐसा ही भूखा है तो हिरण की जगह मुझे खा ले, पर जीते जी इस हिरण को नहीं खाने दूंगी--याद नहीं पड़ता कि यह बात मैंने उसे कही थी या मन में सोची थी, पर उस समय तो ऐसा भरम हुआ कि शेर के सामने मानो कई बरसों से मेरी बातचीत चल रही हो, वह एक ऐसी वाणी थी, जिसे चींटी भी जानती है, हाथी भी जानता है, चूहा भी जानता है, बाज भी जानता है, हिरण भी जानता है और शेर भी जानता है, पता नहीं क्यूं मनुष्य यह वाणी बिसरता जा रहा है? --- फिर न तो शेर अपनी जगह से हिला, न गरजा, मैं एक कदम और उसकी तरफ बढ़ी, तो वह पीछे खिसक गया, पूंछ हिलाने लगा, अपने बच्चे को दो तीन बार पीठ पर बिठाया, तो हिरण उसे सींगों से मारने का तमाशा करता तो शेर मेरे पास फरियाद करने आता, उन दिनों मां की जगह बेटेे का मन उनसे ज्यादा बहलता था।

[राजा भोज सुनने के साथ साथ मानों सारा परिदृश्य खुली आँखों से देख भी रहा हो, आश्चर्य परम आश्चर्य कि बुढ़िया की जगह उसे एक अनिंद्य सुंदर महिला क्यों कर नजर आई, जिसके पास खड़ा एक पालतू शेर रह रहकर अपनी पूंछ हिला रहा है और वह अपने दूध पीते बच्चे को उसकी पीठ पर बिठाने का साहस कर रही है, एक हिरण तीखे सींगों से शेर की गर्दन खुजला रहा है। आँखे मलकर देखा तो बुढ़िया के देह के भीतर उसे बीसियों रूप एक साथ दृष्टिगोचर हुए, जैसे बीती हुई उम्र के सभी महत्वपूर्ण पड़ाव उसके भीतर हूबहू मौजूद हों, और अनागत भविष्य भी, शायद मौत भी इस देह के भीतर जीवित रहेगी, हर व्यक्ति के उनमान उसकी देह एक बार भी उसका मसान नहीं बनी। मौन के वे अपूर्व क्षण राजा को न जाने कितना कुछ सुना गये, जो अकिंचन ज्ञानेंद्रियों के द्वारा कभी संभव नहीं होता।]

पोती:- दादी मां, ऐसी मजेदार बात तुमने अब तक मुझसे क्यों छिपायी?

बुढ़िया:- तुम्हें सुनाने जैसी बात होती तो जरूर सुनाती, बिटिया, पर तुम्हें अनमोल बातें सुनायी, इन्हें थोड़े ही सुनाउँगी, इन्हीं को सुनाने लायक जो मामूली किस्सा था सुना दिया। तुम्हें मेरी बातों पर भरोसा थोड़े ही हुआ होगा, राज पंडित हो न--?

माघ पंडित:- राज पंडित होउं या राख पंडित, फिर भी शेर और बाज जैसा क्रूर नहीं हूँ, जब तुम्हारे प्रभाव से इनका स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य के नाते मेरा स्वभाव नहीं बदल सकता? पर मां की लताड़ का सौभाग्य भी हर बेटे को नहीं मिलता, मानों या न मानों अब मैं किसी भी बात पर भरोसा करने को तैयार हूँ, तुम चाहो तो एक मुट्ठी में चांद और दूसरी मुट्ठी में सूरज को बंद कर सकती हो।

बुढ़िया:- फिर वही नासमझी की बात!

राजा भोज:- हमारे पास समझदारी की बातें होतीं तो रोना ही किस बात का था? पांव छूने के लिए मना कर दिया, पर सिर काटकर पांवों में धरने की तो मनाही नहीं है।

बुढ़िया:- तुम्हारा सिर है जो चाहो सो करो, भला मैं क्यों मना करूंगी? लेकिन इतना भर याद करो कि तुम जीना जानते हो, न मरना, किसी शस्त्र के काटने से सिर नहीं कटता, अपना सिर बेकार गंवाओगे।

राजा भोज:- अब मुझे न मुकुट की चाह है और न सिर की, मेरी यह बात नहीं मानी तो ऐसा ही करके दिखाउंगा, अब जंगल का राज छोड़कर उज्जैन का उजड़ा हुआ राज संभालो मां, सारे देश का कल्याण हो जायेगा।

बुढ़िया:- ना रे बाबा ना! आदमी को समझना और समझाना तो खुद भगवान के बस की बात नहीं! फिर मेरी क्या बिसात? अपना ही कल्याण कर लूं तो काफी है, दूसरों का कल्याण करने का भरम मुझे नहीं है, पत्थर भले ही समझ जाए, पर मनुष्य कभी नहीं समझेगा, उसे अपनी बुद्धि का गुमान जो है, और न मैंने सपने में भी ऐसा पाप किया, जिसकी मुझे यह सजा मिले, उज्जैन का राज --- ना रे बाबा ना।

राजा भोज:- तुम्हारे बेटे ने भी ठीक ऐसी ही बात कही थी।

बुढ़िया:- हां, वह कह सकता है, अब तक उसे आ जाना चाहिए था, घड़ी भर भी मां से न मिले तो उसकी सांस चढ़ने लगती है।

राजा भोज:- तो किसी तरह समझा बुझाकर उसे ही मेरे साथ भेज दो।

बुढ़िया:- पर उसे समझाने जैसी यह बात है नहीं --- तुम्हीं उज्जैन के राजा हो और तुम्हें ही अपना राज संभालना है।

राजा भोज:- क्योंकि मैंने ही जन्म जन्म ऐसे पाप किये हैं, राज चलाने का सींग पूंछ भी जानता नहीं और राजा बना बैठा हूं, पिछले पापों का ही फल है।

बुढ़िया:- और उस फल की जड़ का हम कभी पता नहीं लगा पाएंगे, पाप पुण्य की यह गुत्थी बहुत ही उलझी हुई है, समझाना चाहूं, तब भी तुम समझ नहीं सकोगे, मेरे लिए जो पाप है, वही तुम्हारे लिए पुण्य है, जिस तरह हर मानुस की सूरत अलग है, उसी तरह उसकी प्रकृति अलग है, जिसके अंतस में जो बीज है, वही पनपना चाहिए, बेटा राज चलाने जैसा आसान काम तो दूसरा है ही नहीं, फक्त दो ही मामूली गुर है, मेरी चिड़कल बेटियों की तरह सारी प्रजा को अपनी संतान मानो, खुद भूखे रह जाओ पर किसी जीव जिनावर को भूखा मत रहने दो, दूसरा गुर तो और भी सीधा है कि पंडितों के सास्तरों पर ज्यादा भरोसा मत करो, तुम्हें पता ही नहीं चलेगा और सास्तरों की दुहाई देते देते तुम पुजारी और कसाई से भी अधिक निर्मम हो जाओगे, बस ममता खूटी और समता छूटी, झरने की तरह सास्तरों के सबद भी बहते रहे तो वे सड़ने से बच जाते हैं, ये दो गुर गांठ बांध लो, फिर मेरे पास आने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

राजा भोज:- क्या मैं ऐसा अछूत हूँ कि अपने दर्शन के सौभाग्य से भी दूर रखना चाहती हो?

बुढ़िया:- अब तुम्हें कैसे समझाउँ कि दुनिया में कोई भी मानुस इत्ता बड़ा नहीं है, जिसके दरसन की किसी को जरूरत पड़े और न कोई मानुस इत्ता छोटा है कि वह किसी के दरसन करे, यह सब गड़बड़झाला तुम्हारे पंडितों का ही किया कराया है, सूखा तिनका या एक छोटा सा कण किसी भी राजा, महात्मा, पंडित या मुझ जैसी बुढ़िया से बड़ा है, कुदरत की वाणी के अलावा किसी और की सीख सुनने में उलझन ही उलझन है, सत की जगह झूठ अधिक है, इसलिए मेरी बातों पर भरोसा न करके कुदरत और अपने अनुभव का ही भरोसा करना।

एक बात पचा नहीं सकोगे, बेटे को तो अपना दूध पिलाया था, आसीस देने की जरूरत ही नहीं पड़ी, पहली बार तुम्हें ही आसीस दे रही हूँ कि पानी से पहले अगन पिओ और अपना सिर काटकर जिओ-- पिओ और अपना सिर काटकर जिओ--- लो, तुम्हारा वनमाली भी आ गया, वह देखो, अब तो उसका अलगोजा सुनकर ही जाना, बाकी बातें अपने आप समझ आ जाएंगी।

माघ पंडित:- फिर जाना हो सकेगा? सुना कि एक बार एक भेड़िया मुंह में भेड़ दबाए भाग रहा था कि उसके कानों में अलगोजे की एक अजीब टेर सुनाई पड़ी कि उसी क्षण उसके दांतों से भेड़ नीचे छिटक गया और बड़े अचरज की बात कि वह अपनी खूनी जीभ से भेड़ के रिसते घावों को चाटने लगा, ----- नहीं नहीं अब उज्जैन पहुंचना संभव नहीं है, किसी भी सूरत में संभव नहीं है, तो --- तुम्हारा बेटा ही वह अलगोजा बजाने वाला था?

राजा भोज:- पर तुम्हें किस बात की चिन्ता है? न तुम भेड़िए हो और न तुम्हारे मुंह में मेमना ही है, फिर क्यूं घबरा रहे हो? जाना नहीं होगा तो न सही, रास्ता भूलने का ऐसा परम सौभाग्य किसके भाग्य में बदा है।

एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश

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रचनाकार: रास्ते की तलाश - विजयदान देथा बिज्जी - एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश
रास्ते की तलाश - विजयदान देथा बिज्जी - एकांकी रूपांतरण - सीताराम पटेल सीतेश
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