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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डा. कमलकिशोर गोयनका से बातचीत

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

प्रेमचंद-विरचित कहानी ‘कफ़न’

प्रश्न : डा. कमलकिशोर गोयनका

उत्तर : डा. महेन्द्रभटनागर

आपने ‘कफ़न’ कहानी को सबसे पहले कब पढ़ा था? क्या उसके पश्चात उसे पुनः बार-बार पढ़ने का अवसर मिला और क्या आपने पाया कि कहानी आपको बार-बार सोचने के लिए विवश करती है?

‘कफ़न’ कहानी को सर्वप्रथम कब पढ़ा; ठीक से स्मरण नहीं। विभिन्न पाठ्य-क्रमों में निर्धारित होने के कारण अनेक बार पढ़ने-पढ़ाने का अवसर मिला। निःसंदेह, प्रस्तुत कहानी पाठक को सोचने के लिए बड़ी तीव्रता से विवश करती है- हर बार पढ़ने के बाद ही नहीं; मात्र जब-तब उसका ज़िक्र चलने पर ही या उसकी गूँंज-अनुगूँज ताजी़ होने पर ही। ‘उसने कहा था’ की तरह।

क्या आप इससे सहमत हैं कि ‘कफ़न’ प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानी है ? जब आपने उसे सबसे पहले पढ़ा था तब क्या आप इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे जो आपके मन में इस कहानी को लेकर है ?

करुण-रस की कहानियों में ‘कफ़न’ प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानी है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष सर्वाधिक सशक्त है। शिल्प की दृष्टि से भी यह उनकी श्रेष्ठ कहानियों में से है। प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियाँ अनेक हैं। उनमेंं से किसी एक कहानी को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना प्रभाववादी बात ठहरती है। इससे कोई सार्थक निष्कर्ष भी नहीं निकल सकता।

यदि यह मान लिया जाय कि ‘कफ़न’ कहानी प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानी है तब क्या आप यह चाहेंगे कि इस एक कहानी के आधार पर प्रेमचंद की कहानी-कला का मूल्यांकन किया जाय और उनकी शेष 289 कहानियों को अलग हटा कर रख दिया जाय ?

प्रेमचंद के कहानीकार का अध्ययन करने के लिए उनकी समस्त प्रतिनिधि कहानियों को लक्ष्य बनाना होगा; क्योंकि प्रेमचंद का कहानी-जगत बड़ा विविध और व्यापक है-उद्देश्य, विषय और शिल्प की दृष्टि से।

क्या आपके विचार में प्रेमचंद की अन्य कहानियों की तुलना मे ‘कफ़न’ पूर्णतः भिन्न कहानी है ? क्या वह आपको इतनी भिन्न प्रतीत होती है कि प्रेमचंद की नहीं बल्कि एक नये प्रेमचंद की रचना प्रतीत होती है ?

‘कफ़न’ की रचना-पद्धति, अभिव्यक्ति-प्रणाली, कथन-भंगिमा व भाषिक-चेतना प्रेमचंद की अन्य कहानियों से इतनी भिन्न नहीं। प्रेमचंद की कहानी-कला के चरम विकास का बोध ‘कफ़न’ पढ़ते समय होता है, किसी नये प्रेमचंद का नहीं।

इस कहानी की प्रेरणा के संबंध में आपको क्या कहना है ? क्या आप कह सकते हैं कि कफ़न के पैसों से शराब पीने वाले घीसू-माधव प्रेमचंद ने अवश्य ही समाज में देखे होंगे या उनकी कल्पना ने इन पात्रों की सृष्टि की है ? कृपया यह भी बताएँ कि क्या आपने स्वयं भी ऐसे पात्रों को समाज में देखा है-जैसे प्रेमचंद के अन्य पात्र होरी, दातादीन, हलखू आदि देखने को मिल जाते हैं ?

लगता है, इस कहानी की मूल प्रेरणा देशी शराब की किसी कलाली से प्रेमचंद को मिली होगी। अक्सर जब किसी ऐसे रास्ते से गुज़रना पड़ जाता है, जहाँ कलाली होती है, वहाँ घीसू-माधव जैसे पात्र ख़ूब दृष्टिगोचर होते हैं। मात्र उनकी ज़िन्दगियों में झाँकने की ज़रूरत है। यह ‘कफ़न’ कहानी का केवल सूत्र ही माना जा सकता है। यथार्थ में, निर्धन-वर्ग के शराबियों को और भी अधिक अमानवीय और क्रूर अर्थात् बुद्धिहीन आचरण करते देखा जाता है; जिसके फलस्वरूप उनका दैनंदिन जीवन और दूभर होता जाता है।

कुछ विद्वानों की राय है कि ‘कफ़न’ से एक नयी यथार्थवादी चेतना आरम्भ होती है। क्या आप इससे सहमत है ? सहमति की स्थिति में कृपया यह बताएँ कि यह नयी यथार्थवादी चेतना कौन-सी है जो इससे पूर्व उनकी कहानियाें में उपलब्ध नहीं है ?

‘यथार्थवादी चेतना’ प्रेमचंद की परवर्ती अधिकांश रचनाओं में है। इस चेतना का उनमें क्रमशः विकास हुआ है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है रचना का परिप्रेक्ष्य, उसका संदेश और उसका प्रस्तुतीकरण; जो किसी साहित्य-स्रष्टा को महान बनाता है। ‘कफ़न’ जैसी एक लघु-विस्तारी रचना के माध्यम से प्रेमचंद ने दूषित सामाजिक-व्यवस्था के शरीर में पनपे कैंसर की जिस कौशल से पहचान और शल्यक्रिया की है; वह अद्वितीय है।

हिन्दी में ‘कफ़न’ पहली बार ‘चाँद’ के अप्रैल, 1936 के अंक में छपी थी। इससे पश्चात प्रेमचंद की सात कहानियाँ छपीं - दो बहनें’, ‘रहस्य’, ‘कश्मीरी सेव’, ‘तथ्य’, ‘जुरमाना’, ‘यह भी नशा वह भी नशा’, ‘क्रिकेट मैच’। ये कहानियाँ हंस’, ‘माधुरी’, ‘ज़माना’ नामक पत्रिकाओं में अगस्त 36 से जुलाई, 37 तक छपी हैं। इनमें अधिकांश कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें लेखक की पूर्ववर्ती आदर्शवादी, नैतिकतावादी, मूल्यवादी जीवन-दृष्टि प्रमुख है। कृपया बतलाएँ कि ‘कफ़न’ वाली नयी यथार्थवादी चेतना ‘कफ़न’ तक ही क्यों सीमित रह गयी और उसके बाद लिखी गयी कहानियों में ‘कफ़न’- पूर्व प्रेमचंद क्यों अवतरित हो गये? इस तथ्य से क्या प्रेमचंद की विकासशील यथार्थवादी चेतना पर प्रश्न-चिन्ह नहीं लग जाता?

‘कफ़न’ वाली तथाकथित नयी यथार्थवादी चेतना प्रेमचंद के परवर्ती अधिकांश साहित्य में द्रव्टव्य है। ‘कफ़न’ लेखन के उपरान्त वह इतनी पुरज़ोर क्यों नहीं, इसे उनकी सीमा माना जाना चाहिए। उस युग के साहित्यकार से इससे अधिक की अपेक्षा रखना युक्ति-युक्त व न्यायोचित नहीं। दूसरे, यह भी सही है कि परवर्त्ती रचनाओं में प्रेमचंद बदलते दिखाई देते ज़रूर हैं किन्तु लौट-फिर कर वे पुनः अपने मौलिक स्वरूप पर आ जाते हैं, जो वस्तुतः मानवतावादी है। अव्यावहारिक आदर्शवादी, जड़ नैतिकतावादी तथा थोथी मूल्यवादी जीवन-दृष्टि से उनका कभी कोई सरोकार नहीं रहा।

(दृव्टव्य : सन् 1957 में प्रकाशित मेरे शोध-प्रबन्ध ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ के ‘प्रेमचंद की साहित्य संबधी मान्यताएँ; ‘आदर्शवाद और यथार्थवाद’, ‘प्रेमचंद : जीवन दर्शन’ तथा ‘मानवतावादी प्रेमचंद’ नामक अध्याय /चतुर्थ संस्करण : प्र. नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-2)।

‘कफ़न कहानी में आपको सबसे अधिक कौन-सी चीज़ प्रभावित करती है ? घीसू और माधव की निष्क्रियता, पिता-पुत्र-बहू के परस्पर संबंधों में अमानवीयता एवं संवेदनहीनता, घीसू-माधव को निकम्मा, आलसी, अमानवीय बनाने वाली सामाजिक-व्यवस्था, पिता-पुत्र का कफ़न के रुपयों से शराब पीना अथवा कहानी की दार्शनिक शब्दावली-धर्म, पाप, पुण्य, वैकुण्ठ, दान, मायाजाल और अंत में कबीर का दोहा आदि।

‘कफ़न’ कहानी से सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात अमानवीय बनाने वाली सामाजिक-व्यवस्था है। तथाकथित धर्म और दर्शन से सम्बद्ध शब्दावली तो व्यंग्य प्रतीत होती है; जो लौकिक-जीवन की वेदना और करुणा को और गहराती है। अंत में कबीर की काव्य-पंक्ति व्यंग्य को मूर्त्त कर देती है - सटीक बना देती है। इससे घीसू-माधव के प्रति हामरी संवेदना घनीभूत हो जाती है। उनके निरीह दयनीय जीवन की वास्तविकाता देख कर पाठक अश्रु-विगलित हो तीव्र व्याकुलता महसूस करते हैं।

कुछ समीक्षकों ने ‘कफ़न’ की संवेदना को मार्क्सवाद से जोड़कर देखा है। क्या आप इस कहानी को मार्क्सवादी-चेतना की कहानी कहना चाहेंगे? यदि हाँ तो कृपया बताइए कि कहानी का कौन सा अंश, दृश्य, स्थिति आदि में से किसे मार्क्सवाद से जोड़ा जा सकता है?

‘कफ़न’ की संवेदना को मार्क्सवादी चेतना से जोड़कर देखने में कोई आपत्ति नहीं। यह तो निष्कर्ष है, आरोपण है। प्रेमचंद ने मार्क्सवाद को ध्यान में रख कर तो कोई साहित्य-रचना की नहीं। उनका मानवतावाद यदि कहीं मार्क्सवादी-चेतना की परिधि में आता है, तो वह सहज ही आता है। ‘कफ़न’ कहानी के किसी अंश या द्रश्य या स्थिति को मार्क्सवादी-चेतना से जुड़ा बताना, अनावश्यक है। वस्तुतः कलात्मक रचना का विश्लेषण गणतीय-सूत्रों द्वारा नहीं किया जा सकता। रचना का सामूहिक प्रभाव ही उसके विश्लेषण का आधार बना सकता है। ‘कफ़न’ कहानी का समग्र प्रभाव मार्क्सवादी-चेतना को समोए हुए है।

(1) ‘कफ़न’ मूल रूप से उर्दू में लिखी एवं छपी थी और ‘ज़माना’ के

दिसम्बर, 35 के अंक मे प्रकाशित हुई। इसके चार मास के बाद ‘चाँद’ में छपी। ऐसी स्थिति में क्या आप उसे उर्दू की मौलिक कहानी के रूप में स्वीकार करेंगे या हिन्दी की या दोनों की अथवा केवल मूल रूप में रची गयी भाषा में ? कृपया सर्तक उत्तर दीजिए।

(2) प्रेमचंद की हिन्दी और उर्दू की रचनाओं के संबंध में आपकी मूल नीति क्या होगी ? क्या आप उर्दू रचनाओं को भी हिन्दी की मौलिक रचनाएँ मानेंगे और चाहेंगे कि इसी रूप में हिन्दी की रचनाएँ उर्दू की मौलिक रचनाएँ मानी जाएँ। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह उर्दूकरण अथवा हिन्दीकरण पूर्ण रूप से प्रेमचंद ने नहीं किया है। उनके मित्रों, अनुवादकों का भी इसमें बड़ा योगदान है।

उर्दू हिन्दी की ही एक शैली है-अरबी-फा़रसी से प्रभावित। यह प्रभाव मात्र शब्दावली और अभिव्यक्ति-स्वरूप पर है। अन्यथा दोनों भाषाएँ लगभग समान हैं। अभिव्यक्ति-स्वरूप तो हिन्दी में घुल-मिल गया है और वह रोचक और आकर्षक भी लगता है। इससे हिन्दी की कथन-भंगिमा समृद्ध हुई है, उसका लचीलापन बढ़ा है। किन्तु, अनेक शब्द हिन्दी के नहीं बन सके हैं। वैसे हिन्दी में हज़ारों शब्द फ़ारसी के हैं। फ़ारसी के माध्यम से आये अरबी के भी पर्याप्त शब्द हिन्दी में हैं। जहाँ-जहाँ उर्दू जाती है, ज़ाहिर है हिन्दी ही जाती है। इस्लाम के मज़हबी उन्माद ने उर्दू ज़बान को पाकिस्तान में जो फैलाया वह एक तरह से हिन्दी का ही फैलना हुआ। बुराई में भलाई इसे ही कहते हैं। हिन्दी-भाषी को आज पाकिस्तान के किसी भी भाग में भाषा-संबंधी कोई बाधा शेष नहीं। चाहे वह बलूचिस्तान जाए, चाहे वह पश्तो-क्षेत्र की यात्रा करे, चाहे सिंधी-पंजाबी, कश्मीरी क्षेत्र में रहे।

‘कफ़न’ मूलरूप से उर्दू में लिखी गयी थी, अतः वह उर्दू की कहानी पहले है। प्रेमचंद चूँकि हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक बन चुके थे, अतः उनकी इस कहानी का हिन्दी-स्वरूप (अनुवाद नहीं) सहज ही हिन्दी का माना जाता है। दोनों का लेखक एक ही है। किसी अन्य व्यक्ति ने अनुवाद नहीं किया है। जहाँ अनुवादक भिन्न है, वहाँ उस रचना के भाषा-प्रवाह में अन्तर रेखांकित करना होगा। मान लीजिए, प्रेमचंद कन्नड़ के भी लेखक होते। ‘कफ़न’ यदि मूलरूप में उन्होंने कन्नड़ में लिखी होती, तो उसे कन्नड़ की कहानी माना जाता, जैसे आज उसे उर्दू की माना जाता है। कन्नड़ से उसका हिन्दी-स्वरूप उसे निश्चय ही हिन्दी-कहानी सिद्ध करता; क्योंकि लेखक एक ही व्यक्ति है। कन्नड़ और हिन्दी में पर्याप्त अन्तर है ; जबकि उर्दू और हिन्दी की गद्य-भाषा में बहुत कम। उर्दू के संदर्भ में तो बहुत-कुछ लिप्यन्तर की बात है। उर्दू-हिन्दी के स्वरूप-विवेचन में जैसा कि स्पष्ट किया गया है, उर्दू हिन्दी की ही एक शैली है। अन्यथा यों कह लीजिए कि संसार की परस्पर इतनी अधिक समानता वाली दो भाषाएँ और कोई नहीं, जितनी उर्दू-हिन्दी है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज़ी में लिखा, बाँग्ला में भी। उनकी मूल अंग्रेज़ी-रचनाओं के उन्हीं के द्वारा किये गये बाँग्ला-अनुवाद बाँग्ला-साहित्य की अमूल्य निधि हैं-बाँग्ला-साहित्य के विकास में उल्लेखनीय हैं। उन रचनाओं ने बाँग्ला-साहित्य को प्रभावित व विकसित किया है। जिस प्रकार प्रेमचंद की उर्दू-कहानियों के हिन्दी-स्वरूपों ने हिन्दी कथा-साहित्य को।

हिन्दी वाले उर्दू से परहेज़ नहीं करते; जितना मज़हबी उन्माद के कारण उर्दू वाले हिन्दी से करते हैं। यह एक कटु सत्य है कि उर्दू एक विशेष समुदाय के लोगों के मज़हबी उन्माद से जुड़ गयी है। उसके रहनुमा पाकिस्तान में बसते हैं। गै़र मुसलमान उर्दू के प्रति चाहे कितना ही प्रेम प्रदर्शित करें; चाहे उसका कितना ही प्रचार-प्रसार करें।

उर्दू को हिन्दी की एक शैली मानना मज़हबी उन्माद से ग्रस्त उर्दू के पक्षधरों को बेहूदा लगता है। किन्तु हक़ीकत अपनी जगह है। उर्दू से कोई वास्ता न होते हुए भी हम उर्दू खूब समझते हैं, खूब बोलते हैं। कठिनाई मात्र कुछ शब्द-प्रयोगों के कारण है। उर्दू के पक्षधर भले ही हिन्दी-रचनाओं को न पचा सकें, किन्तु हिन्दी-भाषा-भाषियों को उर्दू-साहित्य को हिन्दी-साहित्य में समाविष्ट कर लेना चाहिए। वह हमारे लिए हिन्दी की अनेक विभाषाओं से भी अधिक बोधगम्य है। यह ग्रहण अनुवाद द्वारा नहीं, गद्य-विधाओं में मात्र कुछ शब्दानुवादों द्वारा। ज़ाहिर है, काव्य में यह सम्भव नहीं। उर्दू के अलगाववादी चाहे कितना ज़ोर मारें, उर्दू को हिन्दी के मौलिक स्वरूप से अलग नहीं कर सकते।

आपको ज्ञात ही है कि प्रेमचंद का प्रथम उर्दू कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ (1908) था जो ज़ब्त हो गया था और जिसके कारण उन्हें ‘प्रेमचंद’ नाम ग्रहण करना पड़ा। क्या आप इस उर्दू कहानी-संग्रह को हिन्दी-कहानी-संग्रह मानेंगे ? मान सकते हैं। जैसे आप उर्दू ‘कफ़न’ को हिन्दी-कहानी मानते हैं। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि हिन्दी-कहानी के विकास में इस उर्दू कहानी-संग्रह का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है।

‘सोज़े वतन’ की कहानियाँ ‘कफ़न’ के समान ही हिन्दी की कहानियाँ मानी जानी चाहिए। हिन्दी साहित्येतिहास में अथवा हिन्दी-कहानी से संबंधित आलोचना-साहित्य में यदि इसका उल्लेख नहीं होता तो यह दृष्टि दोषपूर्ण है। हिंदी भी तो साम्प्रदायिकता से कोई कम ग्रस्त नहीं रही। संस्कृत का साम्प्रदायिक वर्चस्व समाप्त होने में तो समय लगेगा; किन्तु हिंदी आज साम्प्रदायिक सीमाएँ तोड़ चुकी है। जन-भाषा के रूप में उसका अदम्य प्रवाह इसका प्रमाण है। संकीर्ण दृष्टि वाले हिन्दी-भाषी आज उपहास के पात्र हैं। उनका अनुकरण-अनुसरण करने वाले अत्यल्प हैं। दक्षिण-भारत भी यह तथ्य समझने लगा है। ईसाइयों और मुसलमानों ने हिन्दी के विकास में जो योगदान किया है; वह सर्वविदित है। वर्तमान में उत्तर भारतीय ईसाई समाज ने हिन्दी को पूरी निष्ठा से अपना लिया है। स्वाधीनता-पश्चात् भारत के शिक्षित बुद्धिजीवी मुसलमानों ने तो बडा़ उत्कृष्ट रचनात्मक साहित्य हिन्दी में लिखा है और निरन्तर लिख रहे हैं। आज हिन्दी भाषा को साम्प्रदायिक नज़रिये से नहीं देखा जाता।

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