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ललित व्यंग्य // सजन मत जा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

वो बार बार रटे जा रही थी - सजन मत जा। ऐसा लगता था मानों सजन उसे छोड़ कर जाने की जिद किए बैठा हो। जब कि जहां तक मैं समझता हूँ, उसे संभवत: ऑफिस जाने की जल्दी थी। शायद वह इस बात को समझती भी थी। तभी तो ‘सजन मत जा’ जुमले को, या कहें बोल को, कुछ इस तरह गाए चली जा रही थी कि उसके दुहराव में ‘जा सजन जा’ के आदेश की भी झलक मिल जाती थी। कभी कभी तो “जा सजन जा, मत जा” दोनों ही बातें एक साथ बोल जाती थी। उसे कोई कन्फ्यूज़न रहा हो न रहा हो, मैं तो जब तक वह गाती रही उसके बोल से बड़ा भ्रमित रहा। आखिर वो चाहती क्या है ? सजन जाए या न जाए ?

शास्त्रीय संगीत की तो बात ही अलग है। यह पूरी तरह शास्त्रीय होता है। जैसा शास्त्रों में लिखा है बस, वैसे ही गाया-बजाया जाता है। एक भी स्वर इधर से उधर नहीं हो सकता। लेकिन सिर्फ स्वरों को सुनने के लिए भी तो अपना कान एकदम शास्त्रीय होना चाहिए। अब आम आदमी के पास ऐसा शास्त्रीय कान भला कहाँ से आए ? लेकिन प्रजातंत्र में हर चीज़ को आम आदमी तक पहुंचाना ज़रूरी है। शायद इसीलिए शास्त्रीय संगीत में “बोल” जोड़ दिए गए। भले स्वर न समझे, ‘सजन मत जा’ – इन बोलों को तो सभी समझ सकते हैं| लेकिन इन बोलों को जब स्वरों के उतार-चढ़ाव में ढाला जाता है, भ्रम की स्थिति तभी पैदा होती है। बेचारा संगीतज्ञ युगों से रटता चला जा रहा है, सजन मत जा, लेकिन सजन को वह अभी तक मना नहीं पाया। गलती सजन की भी नहीं है।

“कल न परे दिन रैन” , “बलमा नहीं आए’ आदि, कुछ बोल भी इसी केटगरी के हैं। ये सिर्फ गाने वाले का ही चैन लूटते हैं। मुझे बड़ा तरस आता है उस पर। अधिकतर श्रोता तो मज़े में हैं उनकी पत्नियां / पति तो घर पर ही हैं। पर उन्हें अनावश्यक रूप से इस प्रकार बेकल क्यों किया जा रहा है ? उनका तो आज भी सुरक्षित है और भगवान् ने चाहा तो कल भी सुरक्षित ही रहेगा।

माना कि शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए बड़े पापड बेलने पड़ते है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव जब तक नहीं होता आप एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते। पर संगीत की बारीकियां बताने में गुरु आनाकानी करने लगे तो क्या किया जा सकता है। संगीत शिक्षा देने के लिए उससे बस निवेदन ही तो किया जा सकता है। उस रोज़, जब रहा न गया, बेचारी एक संगीताकांशी शिष्या अपने गुरु के समक्ष बड़ी शिद्दत से यह तराना छेड़ बैठी, “तनन तनन देदे ना दाता रे !”

आप गले से गले मिल सकते हैं, अभिवादन के लिए हाथ मिला सकते हैं। लेकिन कम से कम शारीरिक रूप से आँख से आँख नहीं मिला सकते। आपकी खुद की आँखें तो एक दूसरे से कभी मिल ही नहीं सकतीं दूसरे की आँख से अपनी आँख मिलाना भी असंभव ही है। लेकिन भाव-विव्ह्ल नायिका, ज़रा गौर करें, बड़े आराम से सार्वजनिक मंच से गाती फिरती है – नैन सू नैन मिले !

मेरे एक कवि-मित्र मिले। बोले, अब वक्त आ गया है कि शास्त्र्रीय संगीत के बरसों पुराने ये बोल अब बदल दिए जाएं। हिन्दी कविताओं और नए अंदाज़ के ‘बोलों’ से संगीत को सजाया जाए। मैंने पूंछा कैसे ? बोले, जैसे निराला की पंक्ति – वो तोड़ती पत्थर या कुछ इसी तरह के दूसरे बोल। आपने कभी सोचा एक संगीतकार ‘वह तोड़ती पत्थर’ इस बोल को अपने स्वरों में किस किस अंदाज़ में कह सकता है। आने राग में ढालते हुए कभी ‘तोड़ती’ पर तो कभी ‘पत्थर’ पर वह बल देगा तो कभी ‘वो’ को लंबा खींच देगा। इससे संगीत का जो माहौल बनेगा एक दम वह प्रगतिशील हो जाएगा। अगर आ(पको प्रगतिशीलता पसंद न हो तो “मैं नीर भरी दुःख की बदली” भी चल सकता है। इससे संगीत की रूमानियत भी बची रहेगी और नारीवाद को बढ़ावा भी मिलेगा। उदाहरण कई और भी दिए जा सकते हैं लेकिन, शास्त्रीयता के मारे हमारे संगीतज्ञ तैयार हों तब ना। हम तो चाहते हैं संगीत की परिपाटी एकदम बदल दी जाए और प्रगतिशील ही नहीं, बल्कि उसे थोड़ा तरक्कीपसंद और विकासशील भी बनाया जाए। शासन चाहे तो संगीत के बोल बदलने के लिए एक कमिटी बना सकती है जिसमें कुछ प्रगतिशील और विकासप्रेमी कवियों के साथ एकाध संगीतज्ञ को भी शामिल किया जा सकता है। हर्ज ही क्या है ? शायद कोई हल निकल ही आए।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहबाद -२११००१

1 टिप्पणियाँ

  1. जा रे बदरा बैरी जा गीत के बोलों की तरह आप मनमानी छेड़खानी कर सकते है भले ही आप संगीतज्ञ या कवि हो न हो, सजन मत जा व्यंग्य है ...शब्द, स्वर, प्रेमी, संगीतज्ञ और शास्त्रीयता पर एकसाथ जबरदस्त व्यंग्य वाह जनाब मान गए

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