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प्राची - सितम्बर 2018 - कहानी // विषकन्या // डॉ. बलदेव पाण्डेय

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पि छले दो घंटों से वह उस कस्बाई शहर के स्टेशन पर दिल्ली जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रही थी। दिन के ग्यारह बज रहे थे। उमस भरी गर्मी से प्लेट...

पिछले दो घंटों से वह उस कस्बाई शहर के स्टेशन पर दिल्ली जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रही थी। दिन के ग्यारह बज रहे थे। उमस भरी गर्मी से प्लेटफार्म पर गाड़ी के इंतजार में खड़े लोग काफी परेशान थे। उसके पास भी स्टेशन की बेंच पर बैठकर मोबाइल पर गेम खेलने या फिर गाना सुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. हालांकि इन चीजों में आज उसका मन नहीं लग रहा था। दादी की याद आते ही उसका मन बेचैन हो उठता। बीमार दादी को छोड़कर किसी भी हाल में वह दिल्ली नहीं जाना चाहती थी, लेकिन दादी की जिद्द के आगे उसकी एक नहीं चली। वह समझ नहीं पा रही थी कि गाँव के एक कमरे वाले उस गंदे मकान में क्या रखा है कि दादी उसे छोड़कर दिल्ली चलने को तैयार नहीं हुई।

अचानक उसकी तंद्रा भंग हुई. एक हमउम्र लड़की ने अपना बैग ठीक उसके बगल में बेंच पर रखा। उसके ठीक पीछे लगभग चौबीस साल का एक युवक एक वृद्ध के साथ आ खड़ा हुआ। वृद्ध के शरीर के निचले भाग में एक मटमैली धोती अटकी पड़ी थी। उसके कंधे से झूलते जनेऊ एवं माथे पर लगे चौड़े चंदन का टीका उसके परिचय के लिए पर्याप्त था कि वह ब्राह्मण है।

लड़की बेंच पर बैठ गई; जबकि बूढ़ा उस युवक को कुछ दूर ले जाकर बहुत कुछ समझाता रहा। लगभग एक घंटे क्लास लेने के बाद जब वे वापस लौटे तो लड़की खड़ी हो गई और सिर्फ इतना कहा कि समय पर खाना खा लेना. फिर लड़की और वृद्ध जाने का उपक्रम करने लगे। लड़के ने झुककर वृद्ध के पाँव छुए और उस लड़की के सिर पर हाथ फेरा। अब तक वह समझ चुकी थी कि वह लड़की उसकी बहन है और वह वृद्ध उसका दादा है।

दोनों के चले जाने के बाद वह युवक बैग हटाकर बैठ गया। लड़के की जीन्स और टी-शर्ट जरूर साधारण थी, किंतु उसकी आँखों में एक खास प्रकार का संस्कारजन्य सम्मोहन था। लड़की ने उस ओर से ध्यान हटाने के लिए अपनी सोच को एक झटका दिया और वह अपने गाँव के गलियारों में खो गई।

पहली बार होश संभालने पर वह अपने गाँव आई थी, वह भी अपने माता-पिता से बिना कुछ कहे सुने भागकर। इस अनियोजित और रोमांचक यात्रा में उसे बहुत मजा आया था, किंतु उसकी इस नादानी ने माँ-बाप को अच्छी-खासी परेशानी में डाल दिया था।

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स्टेशन से गाँव के लोगों से घर का पता पूछ-पूछकर जब अचानक वह अपनी दादी के पास पहुँची और अपना परिचय दिया तो बूढ़ी दादी के शरीर में न जाने कहाँ का बल आ गया था। उसने बिजली की गति से लपककर उसे गोद में भर लिया था। बहुत देर तक दादी रोती रही थीं और वह भी अश्रुपात करती रही थी। दादी-पोती के इस महा-मिलन के आवेग की आँधी जब थमीं, तब जाकर घर छोड़कर भागी हुई बेटी को माँ बाप की याद आई और उसने दो दिन पहले ‘स्वीच आफ्’ मोबाइल को जीवंत करते हुए घर पर फोन लगाया। रोते हुए पिता ने पहले तो यह जानना चाहा कि किस हाल में है और बाद में जब यह जाना कि वह सुरक्षित अपने गाँव वाले घर में अपनी दादी के पास खड़ी है तो उनके आश्चर्य का ठिकाना रहा।

उन्होंने फोन पर ही डाँटते हुए कहा कि गांव देखने और दादी से मिलने का इतना ही शौक था तो वह उनसे कहती, किंतु वह जानती थी कि हर बार की तरह उसे झूठी दिलासा ही मिलती।

गाँव पहुँचकर और वहाँ एक हफ्ता रहकर उसे जो खट्टा-मीठा अनुभव हुआ था, इससे अठारह साल की उस लड़की को कुछ-कुछ समझ में आने लगा था कि दिल्ली में रहने वाले उसके पिता अपनी बेटी को अपनी जन्मभूमि और जन्म देने वाली बूढ़ी माँ से मिलवाने से क्यों कतराते थे। पहली बार जब उसने गाँव की सरहद में कदम रखा, हर कोई उसके फैंसी कपडे और साँवले ही सही, किंतु आकर्षक रूप को देखकर उसके करीब आता, किंतु जैसे ही वह अपने दादा घरभरन राम का नाम लेती, वैसे ही उनका चेहरा बुझ जाता और आगे बढ़ जाने का इशारा कर देता। किसी के चेहरे से तो विद्रूपतापूर्ण मुस्कान तक न छुप पाती। उसके किशोर मानस को इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर अभी तक नहीं मिल पाया है कि दादी के मुहल्ले के घर गाँव के अन्य घरों की तरह पक्के और साफ सुथरे क्यों नहीं है। दादी के मुहल्ले के बच्चे सुबह-सुबह स्कूल जाने की बजाय गंदगी में लोटे हुए जानवरों के साथ गाँव के बाहर क्यों जाते हैं। मुहल्ले वालों ने जब मुहल्ले का एक सुंदर सा नाम रैदास टोली रख दिया है तो गाँव के कुछ खास लोग अभी भी उसे ‘चमटोली’ कहकर क्यों बुलाते हैं।

तभी गाड़ी के आने की पहली सूचना हुई और लड़की की तंद्रा भंग हुई। उसने बगलवाले लड़के से पूछा- "आपकी बर्थ कफंर्म है?"

लड़के ने संक्षिप्त उत्तर दिया- "अभी अभी एस सिक्स में सिक्सटी थ्री एलॉट हुआ है।"

लड़की ने मायूसी के साथ कहा- "मैं तो अभी भी वेटिंग में ही चल रही हूं, वह भी महिला कम्पार्टमेंट में। उफ् कितनी जानलेवा और बोरिंग होगी यह जर्नी। तुम्हें क्या लगता है कोई महिला एक अनजान महिला, आई मीन लड़की के साथ अपनी बर्थ शेयर करेगी?"

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फिर बिना उत्तर की प्रतीक्षा के उसने दूसरे प्रश्न का गोला दाग डाला- "क्या तुम अपनी बर्थ मेरे साथ शेयर करोगे? लेकिन तुम क्यों करोगे, तुम भी तो यही कहोगे कि मैं तुम्हें जानता तक नहीं।"

प्रत्याशा से अलग लड़की को उत्तर मिला- "ऐसा मैं कैसे कह सकता हूँ कि मैं आपको जानता तक नहीं. परिचय का क्या यह आधार कम है कि हमारा स्टेशन एक है. संभवतः हमारा गाँव भी एक है।"

लड़की ने झटाक से उत्तर दिया- "फुलवरिया गांव की हूँ मैं, और मैं अपनी दादी से मिलने पहली बार अपने गांव आई थी, वह भी अकेले।"

लड़के ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया- "अरे वाह! तब तो बहुत साहसी हो, होना ही चहिए, हो भी तो ठाकुरों के गाँव की।"

"लेकिन दादी तो कहती है कि हम रैदास है." उसने बड़ी सहजता के साथ कहा।

"तो क्या हुआ मैं तुम्हारे बगल के गाँव पाण्डेयपट्टी का हूं." लड़के ने बड़े शांत स्वर में कहा।

"अच्छा तो तुम ब्राह्मण हो. दादी कहती है कि ब्राह्मण बड़े सज्जन और दयालु होते हैं. तब तो मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगी।"

लड़के ने जवाब दिया- "गाँव के सभी लोग सज्जन और दयालु होते हैं।" तभी लगभग रेंगती हुई ट्रेन उनके सामने आ खड़ी हुई और वे दोनों ‘एस-सिक्स’ में सवार हो गए।

युवक को ऊपर वाली बर्थ मिली थी। उसने दोनों बैग ऊपर फेंके और बर्थ पर चढ़ गया। एक मिनट के भीतर दोनों बैग सेट करके बैठने की पर्याप्त जगह बना ली. फिर उसने लड़की को ऊपर चढ़ने का इशारा किया। लड़की ने बेतकल्लुफ अंदाज में अपना हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया। दोनों हाथों के जुटते ही उसका छरहरा शरीर हवा में लहराया और अगले ही पल वह बर्थ पर चढ़ चुकी थी। दोनों एक दूसरे की ओर पैर फैलाए निश्चिन्त होकर बैठ गए। नीचे से घूर रही अनुभवी आँखें इस पड़ताल में जुट गईं कि दोनों भाई-बहन हैं, कॉलेज में साथ पढ़ने वाले हैं या फिर प्रेमी-युगल हैं।

कम्पार्टमेंट की दुनिया से बेखबर दोनों अपनी दुनिया में खो गए। लड़की ने जब लड़के से खुद के बारे में कुछ बताने को कहा तो वह फिल्मी अंदाज में शुरू हो गया- "बी.ए. करने के बाद पिछले साल भर से नौकरी के लिए मारा-मारा फिर रहा हूं. गाँव के पट्टीदारों ने सारी जगह-जमीन हड़प ली है. जवान बहन की शादी का बोझ उसी के कंधों पर है। वह शहर जाकर ढेर सारे रुपये कमाना चाहता है; ताकि बहन के हाथ पीले कर सके।"

लड़की ने रुमानी अंदाज में कहा- "मतलब अगले दो साल तक मेरा कोई चांस नहीं है।"

लड़के ने तपाक् से उत्तर दिया- "बिल्कुल चांस है, यदि तुम रुपये कमाने में मेरी मदद करो. हम जल्द से जल्द रुपये जमा कर लें और लगे हाथ..."

"धत्!" लड़की शरमा गई थी।

लड़के ने झेंप मिटाने के लिए टॉपिक चेंज किया- "गांव में क्या-क्या अच्छा लगा?"

लड़की ने कहा- "बहुत कुछ!" उसने आँखें बंद कर लीं और रुमानी अंदाज में शुरू हो गई- "खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, धूल में लोटे हुए लड़के, अमराइयों में झूला झूलती लडकियां, खेतों में काम करती औरतें, सब कुछ अच्छा लगा. लेकिन गाँव में ही तुमसे दोस्ती हो जाती और तुम साथ होते तो शायद यह सब कुछ और अच्छा लगता।"

युवक ने लड़की के मन की टोह ली- "तो गाँव में क्या किसी को अपना दोस्त नहीं बनाया?"

लड़की ने झट से उत्तर दिया- "बनाया न, लाली को, वह बगल वाले मिसिर बाबा की बेटी है। एक ही हफ्ते में वह मेरी सबसे अच्छी सहेली हो गई थी, लेकिन..."

"लेकिन क्या हुआ?" लड़के ने बात आगे बढ़ाई।

कहानी सुनाने के अंदाज में लड़की आगे का घटनाक्रम सुनाती गई- "एक दिन मैं अपने आँगन में बैठी रोटी खा रही थी, तभी लाली आ धमकी। मुझसे अकेला खाया न गया और उसके लाख ना ना कहने के बाद भी मैंने रोटी का एक टुकड़ा उसके मुँह में डाल दिया और वह भी सहज भाव से खाने लगी। तभी न जाने कहाँ से उसकी चुड़ैल माँ आ धमकी। फिर क्या था, झोंटा खींचती हुई उसे आँगन के बाहर दरवाजे तक घसीटती हुई ले गई। वह लात मुक्कों से जितना उसे पीटती, उतना ही मेरी दादी को गालियाँ देती गई। मुझे लाली का जानवरों की तरह पीटा जाना सहन नहीं हुआ और मैं भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। दादी ने मुझे सीने से लगा लिया और मैं घंटों दादी की गोद में सुबकती रही। मैं लगातार एक ही रट लगाए जा रही थी, दादी! लाली को उसकी दादी ने क्यों मारा।"

दादी ने भारी मन से इतना ही कहा- "बेटी, विषकन्या है तू! तुम्हारे पोर-पोर में जात-पात और छुआछूत का विष चढ़ा हुआ है। न जाने किस ऋषि ने हमें शापित कर दिया कि हमारी बेटियों के रग-रग में कभी न उतरने वाला यह जहर चढ़ गया।"

युवक ने कम्पार्टमेंट की मद्धिम रोशनी में भांप लिया कि उसका चेहरा उतर गया है। उसने उसे सामान्य करने के लिए खाने की बात उठाई तो उसने इतना ही कहा कि उसे खाना है तो खा ले, उसे अभी भूख नहीं है। दूसरे ही पल लड़की लंबी हो गई और सोने का उपक्रम करने लगी। युवक समझ चुका था कि लड़की का मन भारी हो गया है और उसे छेड़ना और भी दुखी करना है। उसने भी दूसरी ओर मुँह फेर लिया और सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु कोशिश नाकामयाब रही और वह उसी के बारे में सोचता रहा। दूसरी ओर लड़की इत्मीनान से खर्राटे लेने लगी थी। खरबूजे को देखकर खरबूजे ने भी रंग बदल ही दिया और न जाने कब उसकी आंखें लग गई।

अचानक युवक की नींद खुली। लगभग सारे लोग गहरी नींद में थे या ऊँघ रहे थे। उसके साथ की लड़की उठकर बैठ चुकी थी और बड़े प्यार से हाथ की बनाई मोटी रोटी खा रही थी। उसके साँवले चेहरे पर फैली बाल-सुलभ मासूमियत को वह देखता रह गया था। अधनिंदिया में जगी गुलाबी आँखों पर फैली बोझिल पलकें नींद के मारे न तो पूरी तरह खुल पा रही थीं और न ही बंद हो पा रही थीं। कत्थई रंगों वाले छोटे-छोटे होंठों से बंद छोटा सा मुंह भी मानो अलसाये से निवाले को संचालित करने में असमर्थ हो पा रहा था। वह एकटक उसे देखता रहा। अब तक वह लड़की भी नींद की नीम बेहोशी से पूरी तरह उबरकर अपने काम में एकाग्र हो गई थी। कभी कभार वह अपरिचित सी उसकी ओर निर्विकार भाव से देख लेती, फिर पलकें झुकाकर मुँह चलाने में व्यस्त हो जाती। इस बार वह पलकें उठने का इंतजार करने लगा। जैसे ही पलकें उठीं, उसने रोटी शेयर करने का इशारा किया। आठ साल की अबोध बच्ची की तरह उसने सिर हिलाकर रोटी देने से एक सिरे से इंकार कर दिया। युवक उसके और करीब खिसक आया और उसे खुद अपने हाथों से रोटी खिलाने का आग्रह इशारे ही इशारों में करने लगा।

लड़की थोड़ा पीछे सरक गई और रोटी बचाओ की मुद्रा में आ गई। तब तक वह उसके और करीब पहुँच चुका था। उसने रोटी वाली कलाई पकड़ ली और एक बड़ा निवाला उस रोटी से काट लिया। क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया में लड़की का एक जोरदार झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गालों पर पड़ा। वह सहमकर पीछे हट गया। खाना छोड़कर वह लड़की विद्युत गति से पुनः उसी मुद्रा में मुंह घुमाकर लेट गई। हतप्रभ युवक ने यंत्रवत् उसका अनुसरण किया। विपरीत दिशा में शयन के बाद भी लड़की का अधिकांश जिस्म उसके शरीर से बेतकल्लुफ अंदाज में सटा हुआ था। वह उसके शरीर की थरथराहट से साफ महसूस कर रहा था कि वह रो रही है। युवक अपराध-बोध में डूबकर मन ही मन अपने किये पर पछता रहा था। सबसे ज्यादा उसे लड़की के हर्ट हो जाने का दुख खाए जा रहा था। वह मन ही आत्मबल बटोर रहा था और उन शब्दों की तलाश कर रहा था, जिनमें वह उससे अलग होते हुए माफी मांग पाएगा। धीरे-धीरे उसके बदन की थरथराहट शांत हो चुकी थी। वह भी खुद को सामान्य करने लगा। गाड़ी अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ती रही। न जाने कब उसकी आंखें लग गईं।

अचानक उसने अपने सीने पर एक बोझ महसूस किया। एक पल के लिए उसे कुछ भी समझ में नहीं आया। पूरे कम्पार्टमेंट में अंधेरा पसरा हुआ था। अब तक वह समझ चुका था कि बत्ती बुझाने का काम खुद लड़की ने किया है। उसके सीने पर पड़ा यह बोझ उस लड़की के चेहरे का था। यंत्रवत् उसका एक हाथ लड़की के गालों पर चला गया। उसने महसूस किया कि लड़की का चेहरा अभी भी आंसुओं से तर है। बेहद धीमी आवाज में लगभग फुसफुसाने वाले स्वर में उसने कहा-

"सॉरी! तुमने मुझसे अपनी बर्थ शेयर की और मैंने तुम्हें थप्पड़ मारा।"

लड़के ने कहा- "बिल्कुल ठीक किया तुमने। बर्थ शेयरिंग के बदले में मैं ‘ब्रेड शेयरिंग’ की उम्मीद रखूं, यह तो मेरी गुस्ताखी थी।"

"तुम मुझे गलत समझ रहे हो! मैं विषकन्या हूं न! मेरे होंठों का विष तुम पर भी चढ़ जाता तो...!’’

युवक ने बड़े स्नेह से कहा- "कोई विष, कोई जहर नहीं है तुम्हारे होंठ या शरीर में। विष या जहर तो लोगों के दिमाग में है। विष-पुरुष तो जात के वे ठेकेदार हैं जो हमारे जीवन को अपनी जागीर समझते हैं। कोई विष नहीं है तुम्हारे होंठों में..."

इतना कहते हुए उसने बड़े संयत से उसके होंठों पर अपने होंठ एक क्षण के लिए रख दिये और दूसरे ही पल हटा लिये।

वह ऊपर से नीचे तक झन्ना उठी। विद्युत गति से उसकी हथेली उन होंठों के बीच में दीवार बन गई।

वह मुस्कुराया- "और हां, मैं अगले दो साल तक मरूंगा नहीं। जाओ, जाकर सो जाओ।"

लड़की यथावत् युवक की विपरीत दिशा में जा लेटी, जहां उसके पैर युवक के ललाट से सट रहे थे, उस ललाट से जहां शायद पुरुष का मुकद्दर लिखा होता है।

उस निस्तब्ध रात्रि में ट्रेन पूरे वेग के साथ अपने गंतव्य की ओर भागी जा रही थी। सारी बोगी इस चिंता से बेखबर सोयी हुई थी कि तिरसठ नंबर बर्थ पर सोने वाले जोड़े को मित्र वर्ग या शत्रु वर्ग में रखा जाय या फिर उन्हें संबंधों के किस दायदे में रखा जाय।

सम्पर्क : 102, मालती मिथिलेश रेसीडेंसी,

रामनगर, हजारीबाग-825301

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रचनाकार: प्राची - सितम्बर 2018 - कहानी // विषकन्या // डॉ. बलदेव पाण्डेय
प्राची - सितम्बर 2018 - कहानी // विषकन्या // डॉ. बलदेव पाण्डेय
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