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अडालज बावड़ी - कहानी 520 साल पुराने एयर कंडीशनर की! - रोली मिश्रा

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अडालज बावड़ी-कहानी 520 साल पुराने एसी की
                 गुजरात बावड़ियों का राज्य है। लगभग 120 से ऊपर स्टेपवेल हैं यहाँ और कुछ तो वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल हैं। ये कोई साधारण जल संचय के स्थान नहीं,सभी स्थापत्य कला के नायाब उदाहरण हैं। लगभग सभी के साथ दिलचस्प किंवदन्तियाँ जुड़ी हुई है। इन्हीं में से एक अडालज बावड़ी जो कि अहमदाबाद से करीब 18 किलोमीटर दूर अडालज गाँव में है, को देखने पर ये एक surprise पैकेज सी लगी और मन इसकी भव्यता से अभिभूत हो गया।
                 पाँच मंज़िला इस बावड़ी में हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य के खूबसूरत तालमेल को देख कर आश्चर्य होता है। पर इस से जुड़ी कहानी को जानकर कोई भी इसके तर्क को समझ सकता है।1498  में इसे जनता के हित में वाघेला वंश के राणा वीर सिंह ने बनवाना शुरू किया पर कुछ ही दिनों बाद सुल्तान महमूद बेगड़ा के हमले में वो मारे गए। वीर सिंह की पत्नी रानी रूपबा के सौंदर्य से आकृष्ट होकर बाद में महमूद ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रक्खा। रानी ने शर्त रक्खो कि पहले उसे बावड़ी का काम पूरा करवाना होगा। महमूद ने हिन्दू और जैन देवी देवताओं के साथ इस्लामिक प्रतीकों को भी पत्थर पर अंकित कराया। रानो रूपबा अपनी पूर्व नियोजित योजना पर चलीं और जब वे इसे देखने गयीं तो इसी बावड़ी में कूदकर उन्होंने अपनी जान दे दी। इस वाव(बावड़ी) की कोई प्रतिकृति न बना पाए इसलिए इसको बनाने वाले 6 मुख्य कारीगरों को महमूद ने प्राणदण्ड दे दिया जिनकी कब्रें यहीं देखी जा सकती हैं।
                 मानव निर्मित इस अद्भुत कलाकृति की कुछ लाजवाब तकनीकी खूबियाँ भी हैं। इसकी हर मंज़िल पर जगह, हवा और भरपूर प्रकाश की प्राकृतिक व्यवस्था है।नीचे जाने पर बाहर के वातावरण से 5 डिग्री कम तापमान रहता है। इसे महसूस करने के लिए यहाँ लोग दोपहर में आते हैं। बहुत ठन्डे पानी को छूकर ही अंदाज़ा लग जाता है कि उस प्राचीन समय में ग्रामीण लोगों के लिए ये बावड़ी कितनी जीवनोपयोगी रही होगी। पानी के अंदर जाती अबूझ सीढियाँ जाने क्यों दिमाग को उन जनश्रुतियों तक पहुँचा देती हैं जिनमें ग्रामीण मानते हैं कि रानी रूपबा की आत्मा यहां मँडराती है...मुक्तिबोध की कविता "ब्रह्मराक्षस" की पंक्तियाँ याद आने लगती हैं---
              

  "सीढ़ियाँ डूबीं अनेकों,
                 उस पुराने घिरे पानी में--
                 समझ में न आ सकता हो
                 जैसे बात का आधार
                 लेकिन बात गहरी हो.."

                                             ---- रोली मिश्रा

1 टिप्पणियाँ

  1. रोचक आलेख। मुझे लगता था कि बावड़ी केवल राजस्थान और दिल्ली में ही है। गुजरात में 120 बावड़ियों के विषय में जानकर अच्छा लगा। जल्द ही इधर की घुमक्क्ड़ी करूँगा। आभार।

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