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संस्मरण // अब वहां राम लीला नहीं होती // हरीश कुमार

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अब वहां राम लीला नहीं होती , वरना एक समय था जब आस पास के गाँवों से भी लोग हमारे गाँव की राम लीला देखने आते। जहाँ तक मुझे याद है , दशहरे से...

अब वहां राम लीला नहीं होती , वरना एक समय था जब आस पास के गाँवों से भी लोग हमारे गाँव की राम लीला देखने आते।

जहाँ तक मुझे याद है , दशहरे से लगभग एक महीना पहले राम लीला की चहल पहल शुरू हो जाती थी। बचपन के कुछ वर्ष लखनऊ में बीते नाना के घर। वे केंद्रीय सरकार के मुलाजिम थे जिस कारण उन्हें पंजाब छोड़कर लखनऊ रहना पड़ा। मेरे जन्म के समय पंजाब के हालात ज्यादा अच्छे नहीं थे। इंदिरा गाँधी की हत्या और दिल्ली के सिख दंगों के बाद पंजाब में जो हालात बिगड़े उनमें पंजाब जल रहा था।

, संयुक्त परिवार होने के कारण पढ़ने लिखने के लिए ननिहाल भेज दिया गया। पांचवीं कक्षा तक वही पढ़ा। पुराने लखनऊ का ठाकुरगंज ।

खस्ते, जलेबियों, कचौरियों , रबड़ी और कुल्हड़ में बिकती चाय और दूध से महकती सुबह , पान की पीक से रंगी सड़कें और दीवारें , पतंगों से ढके आसमान और चौंक की हसीं शामों वाली रौनक का समय। अमृत लाल नागर अपने 'बूँद और समुन्द्र' वाले लेखक यही चौंक से तो थे। हाँ तो मैं बात कर रहा था दशहरे के सुहाने दिनों की।

ठाकुरगंज में बाबा हजार बाग़ की राम लीला के चर्चे दूर दूर तक थे। महंत हरिकिशन जी जिन्हे हम गुरु बाबा कहा करते , बड़ी धूम धाम से दशहरे का आयोजन करवाते। उनका डेरा लगभग 50 एकड़ में फैला था। डेरे की बड़ी भव्य इमारत में भगवान् कृष्ण का मंदिर , बाबा हजारा बाग़ की दो सौ वर्ष पुराणी समाधी और धूना जिसमें एक चिमटा गड़ा होता , वहां सब माथा टेकते। उनके बाद गद्दी पर बैठने वाले बाबा इमरती दास और अन्य महंतों की भव्य समाधियां भी डेरे में बनी हुई थी। एक तरफ कुछ घर थे जो किराये पर दे दिए गए थे , के लोग सुबह सुबह डेरे की समाधियों के चबूतरे पर बैठ के अखबार पढ़ते और गप्प लड़ाते। बच्चे फुर्सत में क्रिकेट खेला करते।

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महंत जी डेरे की भव्य इमारत के बाहर बने दालान में एक बड़ी कुर्सी पर थोड़ा देर बैठते। जो भी वहां आता पहले उनके चरण छूता और उनसे आशीर्वाद लेता। वे सबकी खैर पूछते और उनके साथ बात करते। महंत जी दया की मूरत थे। कोई भी राहगीर , यात्री , साधु और सन्यासी डेरे से बिना जलपान किये न जाता। डेरे के भीतर बड़ा रसोई घर था और इसके बाहर खुले आंगन में गोल जगत से घिरा एक पुराना कुआँ। रोजाना डेरे में काम करने वाले सेवकों और आने जाने वालों के लिए खाना बनता। डेरे में बने भगवान् कृष्ण के मंदिर में सुबह शाम आरती होती थी। कोई भी त्यौहार हो , धूमधाम से बनाया जाता। बढ़ साल में एक बार संतों का बड़ा एकहड़ा और दो साल में एक बार छोटा अखाडा लगता जिसमें दूर से साधु महात्मा डेरे में आते और रहते। अंत में बड़ा भंडारा होता , उस दिन सभी साधुओं को पंगत में बिठाकर भोजन कर्तव्य जाता और महंत जी सबको दक्षिणा देकर विदा करते । ये डेरा उदासी सम्प्रदाय से जुड़ा था पर सब सम्प्रदाय के संत महात्मा यहां आते ।

एक तरफ फैले खेतों में गोभी , सरसों और अन्य सब्जियों की फसल उगाई जाती थी। दशहरे से पहले खेत का बड़ा हिस्सा साफ़ करवा लिया जाता। एक तरफ राम लीला की स्टेज सजती। रावण , मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले बनाने वाले कारीगर बरेली से आते। ये सभी पुतले तैयार करने में लगभग एक महीना लग ही जाता। सत्तर अस्सी फुट से कम के पुतले नहीं होंगे। कितने ही अलग अलग साइज के बांस और बल्लियों का पहले ढांचा तैयार होता , विशाल काय भुजाएं और सर के ढाँचे जो खेत में पड़े ऐसे लगते मानों कोई विशाल दैत्य कटा छँटा मृत पड़ा हो। फिर उन पर आटे की लेई बनाकर कितने ही अख़बार और गत्ते की तह चिपकाई जातीं। रंग बिरंगे कागजों से उनके शरीर को ढककर फिर चेहरे की आँखें , नाक , कान , मूंछें , कुण्डल बनाए जाते। सर और उनके बांसों से बने शरीर के ढांचे में पटाखे आतिशबाजी , अनार लगाने के लिए अलग कारीगर होते। मैं कई बार सोचता हूँ की क्या जादू था उन कारीगरों के हाथों में जो बिना थके बड़ी शांति से अपने काम को पूरा करते। कहते है कि पुतलों के सर में लगाई जाने वाली आतिशबाजी पर ही सारा चमत्कार निर्भर था। जब पुतलों में आग लगाई जाए तो पहले नाभि का अनार चले , फिर छाती से बम फूटे और सर को आतिशबाजी उड़ाकर दूर पीछे की तरफ खुले खेत में ले जाए जहाँ लोग न हो। कमाल की इंजनीयरिंग थी कारीगरों की।

हम बच्चे इन कारीगरों से बहुत प्रभावित होते और घर में उनकी देखा देखी दो डंडे लेकर उनका एक जोड़ का निशान सा बना लेते फिर उन पर अखबार लपेटकर उनका मुंह सर बना लेते। छोटे पटाखे बाजार से लाकर उनमें ठूंस देते , सर में एक आतिशबाजी लगा देते। चलिए पुतला तैयार हो जाता फिर मोहल्ले के सभी बच्चों को इकट्ठा कर के पुतले में आग लगा देते। दो मिनट में ठूं ठा हो जाती। इस तरह दशहरे से पहले कई बार पुतला जलने के ट्रेलर हम लांच कर डालते।

दोपहर के वक्त रामलीला करने वाले डेरे के अंदर बने आंगन में अपने अपने डायलॉग की रिहर्सल करते। मुझे याद है मैं और मेरा एक दोस्त जो वही डेरे के एक मकान में किरायेदार था , अभी सात आठ साल के रहे होंगे , भारत शत्रुघ्न का रोल करते। पूरी रामलीला में हमारे रोल तो बस उनके बाल रूप के कारण एक दो दिन होते थे पर हमें बड़ा गर्व सा होता जब हमें मोहन माली हमारे चेहरों को रंग बिरंगे रंगों से सजाता , छोटे छोटे सितारों से हमारी भवों के ऊपर डिजाइन बनाता। उसके मुंह से महकते पान की खुशबु हमारे नथनों से टकराती रहती। चमचमाते राज कुमारों वाले कपडे और शानदार मुकुट , हाथ में छोटे छोटे तीर कमान देकर हमें अपने रोल के लिए तैयार किया जाता।

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रामलीला रात आठ बजे शुरू हो जाती। पहले रामलीला के सभी सदस्य मंगल गान गाते। भारत माता का जयगान करते और फिर 'बोल सियावर रामचंद्र की जय ' कहकर पर्दा हटाया जाता। सभी पात्र मंच के सामने वाली सारी जगह लगभग भर जाती। तब टीवी और केबल का वो आतंक नहीं छाया था , जिसने सबको अपने अपने घरों में दुबका दिया है , न ही तब मोबाईल का चलन था कि आदमी नेटफ्लिक्स देखकर मजा लेता रहे। रामलीला के पात्र अपने अपने डायलॉग बोलते और मंच के एक तरफ बैठे राधेलाल और उनके साथी ढोलक , हारमोनियम बजाकर साथ साथ में बैकग्राउंड म्यूजिक देते। जहाँ मंच के कलाकार अभिनय और संवाद में अपनी रूह दाल देते वही दर्शक हर दृश्य पर भाव विभोर होते। शूर्पणखा की नाक काटते देख जहाँ तालियां बजती तो वही सीता हार्न के बाद वन में भटकते राम की दशा देखकर सब भावुक हो जाते , लोगों की आंखों से आंसूं टपक पड़ते। मास्टर बलदेव का रावण का रोल तो दूर दूर तक मशहूर था। उनका भयानक हसने का अंदाज जब माइक पर गूंजता तो घरो के बच्चे माँ की गोद में दुबक जाते और बड़े उस हंसने की स्कूल , मोहल्ले में नकल करते। गाँव के देसी दवा वाले डाक्टर साहब राम का रोल करते। पतली सी काया थी उनकी पर उनके बोलने की मधुर वाणी देखने वालों में श्रद्धा जग देती। राजा जनक और सीता का रोल भी गांव ही के बनियों के लड़के करते और लोगों को खूब भावुक कर देते। ताड़का का रोल करने वाला बाबूलाल तो बच्चों के लिए हौवा बन चूका था। इसी प्रकार देसराज हलवाई हनुमान बनता। जितने दिन राम लीला चलती वह जमीन पर सोता और खूब हनुमान चालीसा का पाठ करता।

बनवास को जाते हुए केवट द्वारा रामचंद्र जी को नाव से नदी पार करवाने वाला सीन खेत में ही करवाया जाता। केवट का रोल डेरे के खेत जोतने वाला किसान मतौड़ी निभाता। खेत में ही थोड़ी खुदाई कर के एक छोटा तालाब बनाया जाता। फिर सभी पात्र उसमें बैठते और नदी पार करवाने का अभिनय पूरा होता। ये सब बड़ा ही चौंकाने वाला होता था हमारे लिए। देखने वालों और अभिनय करने वालों के मन में बड़ी श्रद्धा और आदर का भाव होता।

खूब तालियां बजती , जय श्री राम के उद्घोष होते। लोग बाग़ अपने अपने हिसाब से रामलीला की तारीफ़ करते। मूंगफली , चूर्ण , गोलगप्पे , चाट बेचने वालों का भी आस पास जमावड़ा रहता। यूँ कहिये एक तरह से पूरा मेला जमता। लोग खाते पीते आनंद लेते।

राम मंदिर और अयोध्या वाली बात तब किसी के मुंह से नहीं सुनी थी। सभी मिलजुल कर त्यौहार की रौनक का मजा लेते थे।

रोज रामलीला समाप्त होने पर महंत हरिकिशन दास सभी पात्रों को मिठाई और पैसे दिया करते। सब चहकते कूदते मेले का आनंद लेते।

रामलीला की समाप्ति के बाद सुबह चार बजे तक नौटंकी का कार्यक्रम आरम्भ हो जाता था। नौटंकी करने वाले भी मथुरा , बरेली , आगरा और कई अन्य क्षेत्रों से आते थे। राजा हरिश्चंद्र और अन्य लोक कथाओं पर आधारित नौटंकी खेली जाती थी। ये सब पारसी रंगमंच के अद्भुत नमूने थे। नाना जी के साथ छुट्टी वाले दिन जिद करके मैं नौटंकी देखने रुक जाता । देखते देखते सो जाता और भोर के समय कब घर आकर सो जाता , पता ही नहीं चलता था।

सब में बड़ा सौहार्द था और लोग बाग़ खुल के इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते , चढ़ावा और सहयोग देते।

दशहरे वाले दिन रावण वध और पुतला धन देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती। सब नए कपड़े पहन दोपहर से ही दशहरा ग्राउंड में जुटने लगते रावण और अन्य के भीम काय पुतले जैसे हर तरफ अपना आधिपत्य जता रहे हों , उन्हें देखकर ऐसा ही लगता। मैं भी अपने घरवालों के साथ चाट पकौड़ी खाते हुए मेले का आनंद लेता।

जैसे जैसे रात होती दशहरे के मेले पर रंगीन रोशनियां छा जाती। श्री राम की जय जय कार के उद्घोष के बीच पहले कुंभकर्ण फिर मेघनाथ और अंत में रावण के पुतले को आग लगती। कान फोड़ू पटाखों की गर्जना और उनके मनोरम दृश्य के बीच कारीगरों की इंजनीयरिंग कमाल दिखती और रावण का सर अंत में उड़ता हुआ पीछे की तरफ गिरता। तालियां , सीटियां और जय जय कार के बीच लोग इस दृश्य का मजा लेते।

बचपन के लगभग दस साल लखनऊ में बिताकर अपने घर पंजाब लौटा। यहाँ भी दशहरे की ऐसी ही भव्यता देखी थी। पिता जी भी राम लीला कमिटी के प्रमुख सदस्य थे। खुद भी रोल करते , और मुझसे भी छोटा मोटा रोल करवाते रहते। मुझे याद है जब हम कुछ मित्र जंगल के यात्रियों का रोल किया करते थे जिन्हें राक्षस बीच रास्ते में पकड़ कर मार देते हैं। इसमें हम सब राहगीर के रोल में गीत गाते चलते हैं -

"अजब ये वन सुहाना है ,

अहा है हो अहा है हे'।"

भव्य मंच , खचा खच भीड़ से भरा मैदान , मजा आ जाता। मुझे और मेरे मित्र को राम लक्ष्मण के वेश में सजाकर रथ यात्रा शहर से निकलती तो सब जौ चढ़ाते और हमारे पैर छूते। मेरा गणित बचपन से कमजोर रहा , जिस कारण स्कूल के गणित टीचर से हमेशा मार पड़ती , पर रथ यात्रा वाले दिन वो भी मेरे पैर छूता तो मैं झेंप जाता।

पर फिर धीरे धीरे सब कुछ बदल गया। देश में उदारीकरण और बाजारवाद ने एक नया समाजीकरण पैदा कर दिया। अब लोग उपभोक्ता हो गए और बाकी सब वस्तुएं। शायद बाजार हम पर बहुत अधिक हावी हो गया।

ये ऑनलाइन का जमाना बड़ा तेज है , सुविधाएं है पर आनंद का रंग रूप शायद बदल गया है। टीवी के चैनल बढ़ गए और नौजवानों ने अपनी नैतिकताएं लगभग खो दी । उन पर हर मौज मस्ती और आनंद के लिए तर्क कुतर्क का हास्य , मोबाईल और सेक्रेड गेम्स सवार हो गया। शायद सब कुछ जान लेना भी आनंद के लिए घातक है। सब बातें सब मौज मस्तियाँ उसके मतलब जानकर नहीं किये जाते। लड़के लडकिया इश्क़बाजी , छेड़ छाड़ और नशे की गिरफ्त में आ गए। राम लीला के पात्र समय के साथ बूढ़े हो गये और रामलीला का मंच इन बिगड़ैल और फैशन ग्रस्त, नशा ग्रस्त, लौंडिया ग्रस्त नौजवानों के हाथ आ गया। उन्होंने राम लीला के पात्रों पर अपना हक़ जमाया और देखते ही देखते रामलीला राज नीति का अखाडा बन गयी।

उधर लखनऊ में भी महंत जी नहीं रहे। सुना है लोकल राजनेताओं और लठैतों के अधीन डेरे का प्रबंध अराजकता और राजनीति का शिकार हो गया। पुराने पात्रों मास्टर बलदेव , डा साहब आदि को बेइज्जत करके राम लीला कमिटी से बाहर कर दिया गया , या शायद उनके देखने लायक परिस्थितियां अब यहाँ नहीं रही इसलिए उन्होने इस वातावरण से चुपचाप बाहर जाना ही बेहतर समझा।

अब वहां खाना पूर्ति के लिए और प्रशासन की मजबूरी के चलते दशहरा मना कर खाना पूर्ति भर कर ली जाती है।

पहले साल लोग अपने वही पुराने अनुभव लेकर रामलीला देखने आये पर जब उन्होंने लड़की भगा कर ले जाने वाले कल्लू चपरासी के लड़के को राम का रोल करते देखा तो खुसर फुसर करने लगे यही नहीं हनुमान के रोल में मोहल्ले के बदमाश लड़के धीरू को देखा गया जो अपने रोल से पहले हनुमान की ड्रेस पहने परदे के पीछे खूब बीड़ी फूंकता और खैनी खाता। सीता का रोल करने के लिए कोई तैयार नहीं था तो वह रोल गांव के एक चरसी को पैसो का लालच देकर दे दिया गया। कुछ पुराने मेंबर अभी भी रामलीला कमिटी में टिके थे पर जब वानर सेना और रावण सेना के सीन के बाद रामलीला समाप्त होने के बाद दोनों सेनाओं के पात्रों के बीच असली तलवारबाजी हो गयी और मामला थाने के दरवाजे के बाहर बड़ी मुश्किल से सुलझा तो वो बचे खुचे पुराने मेंबर भी भाग खड़े हुए।

अगले साल ही रामलीला देखने आने वालों में कुछ गरीब मजदूर मुहल्लों के लोग बच गए। उनके घरों में अभी केबल कल्चर नहीं आया था। बाकी गाँवों ने आना छोड़ दिया। वे रामानंद सागर की रामायण और अरुण गोविल में ही आनंद लेने लगे। लड़कियों का आना जाना भी काम हो गया। छेड़ छाड़ की घटनायें बढ़ने लगी। राम लीला रात को खतम होती और लौटते हुए कोई नौजवान दर्शक दुकानों , गलियों में लगे बल्ब फोड़ देते। किसी का दरवाजा खटखटाकर भाग जाते , बड़ा उपद्रव होता। एक आशिक तो अपनी प्रेमिका के घर घुसते हुए दबोच लिया गया और खूब पिटा। कई तो शराबी हालत में गालियां बकते हुए लौटते , कईओं की लड़ाई हो जाती , थाने में मामला जाता और उन्हें ले देकर छोड़ दिया जाता।

अब जमाना बदला रहा था , मोबाइल से लेकर परिवार नियोजन के साधनों की बिक्री खूब जोरों पर थी , जब भी रात को कोई धार्मिक उत्सव होता , इन सब चीजों का खूब प्रयोग होता। समय और आस पास फैले खेत ऐसी घटनाओं का खूब साथ देते। ये एक अलग तरह का व्यभिचारी मनोरंजन था।

राम लीला तो फिर तीसरे साल तक ही चली , हर साल सामान चोरी होने लगा। पात्रों के रोल के लिए भी झगडे होने लगे। गाँव के ही अफीमची मुरली ने जब हनुमान का रोल माँगा तो उस पर बाकी शोहदों ने हँसते हुए यह आरोप लगाया कि इसे रोल न दिया जाए इसका 'औजार' बड़ा है। अब सारी स्थिति 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर वाले ' संवादों जैसी हो गयी थी। मुक्तिबोध की लम्बी कविता वाले 'डोमाजी उस्ताद " जैसों का गाँव में आधिपत्य हो गया था। शरीफ लोगों ने विरोध न करने के बजाय भीष्म पितामह की तरह अपने घर में चुप रहने का निश्चय किया। आज लगभग 20-22 वर्ष बीत चुके है। तबसे लेकर आज तक गाँव में राम लीला नहीं होती बस पुलिस और राजनीतिक दबाव के चलते गाँव के कुछ तथाकथित चौधरी दशहरे का आयोजन करवा देते हैं। कोई न कोई गाने वाला या गाने वाली भीड़ जुटाने के लिए बुला ली जाती है। शोहदों की भीड़ जुटती है। दारु के चुग्गड़ पीते हुड़दंड मचाते लोग अब मेले की रौनक होते हैं। अब गाँव में राम लीला नहीं होती।

मैं भी अब टी वी पर दशहरे का आनंद लेता हूँ और पुरानी बातों को याद करता हुआ दिल बहला लेता हूँ। हर साल दशहरा आता और ऐसे ही बीत जाता है। घर में दस दिन पहले कुछ बर्तनों में जौ बोये जाते हैं और दशहरे की सुबह गोबर से रावण के दस सर बनाकर उन पर हरे जौ को रखकर माथा टेक लिया जाता है।

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रचनाकार: संस्मरण // अब वहां राम लीला नहीं होती // हरीश कुमार
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