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क्रांति यज्ञ // अनुपमा ठाकुर की कविताएँ

anupama

१.भारत के नेता


भारत के नेताओं के क्या कहने
दो -दो  सिपाही चलते हैं इनके दाहिने और बाहिने ,
होती है इनकी अलग ही शान
हाथ जोड़े खड़े होते हैं बड़े-बड़े विद्वान

होती है इनकी  अपनी एक विशिष्ट पहचान
रहने के लिए प्राप्त होता है इन्हें सरकारी निवास स्थान ।
घूमने के लिए होती है सरकारी वाहन 

सरकार से ही प्राप्त होता है इन्हें घूमने के लिए ईंधन
इसीलिए पेट्रोल के बढ़ते दामों पर
नहीं करते ये चिंतन
जनता का हो जाए चाहे मरन ।
इन्हें  प्राप्त होती है सरकारी सुख-सुविधाओं की शरण
ये तो चाहते हैं जनता पखारती  रहे इनके चरण
क्यों करेंगे ये फिर बढ़ती महंगाई पर मनन?
हमारे पैसों से करते हैं ये विदेशी भ्रमण 

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केवल चुनाव के समय देते हैं ये जनता को दर्शन
इनके ऊपर लागू नहीं होता है कोई नियम या अनुशासन
केवल जनता पर थोपे जाते हैं कठोर नियम और बंधन
विदेशी बैंकों में जमा होता है इनका सारा धन  और 
दूसरों के संपत्ति का करवाते हैं ये  सर्वेक्षण
इनके लिए जरूरी नहीं कोई शिक्षण या  प्रशिक्षण ,
खादी वर्दी की पोशाक पहन
   प्रदर्शित करते हैं ये अपना
भ्रष्ट आचरण
अब तो जागो है जनता जनार्दन
मत करो  ऐसे नेताओं का चयन
हे भारत के नेता आप को साष्टांग नमन।।


2.टीचर 


 
  टीचर हर वक्त होता है टीचर
चाहे घर हो या बाहर
कक्षा में हो या मैदान पर
टीचर हर वक्त होता है टीचर
कक्षा में चाहता है वह अनुशासन
वह बोलता रहे और सभी सुनते रहे उसे हर क्षण
हो जाए अगर कुछ इधर-उधर
देता है वह उपदेश घंटों अनुशासन पर

टीचर हर वक्त होता है टीचर।
थका हारा जब पहुंचता है घर पर
बीवी बच्चों से मिलकर
नहीं लेता है सांस घड़ी भर
घर में अस्त-व्यस्त सामान देखकर
प्रारंभ करता है वह अपना लेक्चर
टीचर हर वक्त होता है टीचर
जय
जब यात्रा करता है बस में बैठकर
पुरुष को बैठा और स्त्रियों को खड़ा देख कर
देता है स्त्री को जगह स्वयं उठकर
सबको देता है सबक नैतिक मूल्यों का पालन कर
टीचर हर वक्त होता है टीचर
गणेश मंडलों में गणेश उत्सव पर
लड़के लगाते हैं गाने ऊंची आवाज कर

नहीं सोचते पलभर,

हर किसी को परेशान कर
तब महोदय पहुंचते हैं हाथ में छड़ी लेकर

समझाते हैं उन्हें कान पकड़कर
सचमुच टीचर होता है हर वक्त टीचर

किसी को तीव्र गति से गाड़ी चलाता देखकर
बिना जान पहचान ही उसे रोककर
जीवन का महत्व उसे समझा कर
महोदय चल देते हैं घर प्रसन्न होकर 

सचमुच टीचर हर वक्त होता है टीचर

अपनी इच्छाओं का दमन कर
छात्रों के समक्ष आदर्श उपस्थित कर
सादा जीवन उच्च विचार अपनाकर

योग्यता का समर्पण और वफादार बनकर

बना रहता है वह हर वक्त टीचर

सचमुच टीचर हर वक्त होता है टीचर

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3-खाली दिमाग शैतान का घर

सूरज निकला, हुआ सवेरा,
प्रचंड आलस ने मुझको घेरा,
उठ बैठी मैं बिस्तर पर,
मन में यह विचार कर,
जो होगा देखा जाएगा,
आज तो यह शरीर आराम पाएगा।
 

पड़े हुए थे कई काम,
पर शरीर को चाहिए था आराम,
बहुत देर तक सुस्ताने पर,
बच्चों को लगा माँ बैठ गई धरने पर,
पति हुए थोड़े नाराज,
पर कैसे करते मेरे सामने आवाज़।
 

तुरंत एक एक्शन प्लान बनवाया,
होटल से भोजन मंगवाया,
मेरे आनंद का न था कोई ठिकाना,
भोजन कर फिर से बिस्तर पर था जाना,
बैठ बिस्तर पर मैं यह सोचने लगी,
अच्छा हो अगर हो हर रोज ऐसी,
जिंदगी सो कर उठना, उठकर खाना,
खा कर फिर बिस्तर पर लेट जाना।
 

तभी कमर में हल्का दर्द होने लगा,
मस्तिष्क भी उसका साथ देने लगा,
अचानक से सर चकराने लगा,
सबकुछ घूमता नज़र आने लगा,
लग रहा था जैसे मैं हूँ बीमार,
क्यों आ रहे थे ऐसे कुविचार?
 

तभी मेरे अंतर्मन से आवाज यह आई,
खाली बैठने की सजा तुमने है पाई,
चलो उठो, कुछ तो कर लो आलस को त्यागकर,
जानते नहीं खाली दिमाग शैतान का घर,
जब रहोगे किसी काम में हरदम व्यस्त,
तभी सदा पाओगे खुद को स्वस्थ।


4-लंगोट धारी

बापू


लंगोट धारी ने भी क्या कमाल कर दिया,
दो सौर्षों से टिके हुए गोरों को निकाल बाहर कर दिया।
 

जर्जर शरीर लाठी के सहारे चलता था,
पर इंग्लैंड में बैठा अंग्रेज भी इनसे डरता था।
 

कभी न हाथ में बंदूक उठाई,
कभी न कोई गोली चलाई,
बस अहिंसा की उंगली थाम कर,
गोरों से यह धरती खाली करवाई।
 

असहयोग का आह्वान कर
सत्य की मशाल जलाई,
देश भर में लोगों ने
विदेशी चीजों की होली जलाई।
 

निर्बल तन पर कैसे इतना ओजस्वी स्वर था,
करो या मरो के आह्वान पर
पूरा भारत मरने को तत्पर था।
 

स्तब्ध खड़ा था अंग्रेज
देख लंगोट धारी की यह अद्भुत शक्ति,
बिना किसी सेना के ही उसने
की अंग्रेजों की दुर्गति।
 

मान गए वे भी अब
यह है कोई अवतरित दैवीय शक्ति,
कोई विकल्प नहीं बचा था अब
दे दी उन्होंने भारत को मुक्ति।
 

जन -जन में जल्लोष हुआ,
राष्ट्रपिता का उद्घोष हुआ,
सत्य अहिंसा का संदेश देकर,
लंगोट धारी अंत में विलीन हुआ।
 

नतमस्तक है यह धरती
बापू आपके चरणों में,
भारत माँ का भक्त आप जैसा कोई

हुआ ना होगा, आने वाले वर्षों में।


5.नारी का जीवन

बहुत ही कठिन है नारी का जीवन,
हर एक पग है कंटीला वन,
समाज परिवार सब का है अपना पैमाना,
सभी के अनुसार उसे है चलना।
 

स्वतंत्र होते हुए भी हैं रिश्तों के बंधन,
जहाँ जीती है वह हर दिन
कर अपनी इच्छाओं का शमन,
बहुत ही कठिन है नारी का जीवन।
 

सभी के प्रति त्याग और समर्पण ही है उसका जीवन,
कई वेदनाओं एवं विपत्तियों का करके दमन,
करती है वह अपने परिवार का पालन पोषण,
प्रत्येक दायित्व का करती वह कुशलतापूर्वक वहन,
बहुत ही कठिन है नारी का जीवन।
 

समाज करता रहा उसके अधिकारों का हनन,
चुपचाप खड़ी सहती रही वह हर क्षण,
यह नहीं कि वह अबला है इसलिए साध लिया मौन,
वह दुर्गा है, वह सबला है, है वह शक्ति संपन्न,
आवश्यकता नहीं करे वह अपना शक्ति प्रदर्शन।
 

धैर्य, संयम धारण कर करती है वह क्रोध का शमन,
सही अर्थों में वह जगदंबा है,
इसीलिए है सब में पावन,

बहुत ही कठिन है नारी का जीवन।


6.हे गणपति बप्पा,


हे गणपति बप्पा,
आश्चर्य होता है मुझको,
कहते सुना है सबको
आज विदाई देनी है आपको,
कल से फिर दिखाई ना देंगे आप हम सबको।
 

कई सवाल उठ रहे मस्तिष्क में हैं,
फिर वह जो मेरे मंदिर में विराजे वह कौन हैं?
क्या केवल 10 दिवस के लिए आपमें प्राण हैं?
हर पूजा में पहले पूजे जाने वाले प्रथम पूज्य आप हैं,
फिर कैसे आप शरीर से नाशवान हैं?
 

लोगों की समझ भी हास्यास्पद है,
वे मान बैठे आपको मनुष्य हैं,
जन्म-मरण इन सब से आप परे हैं,
प्रथम पूज्य गणेश आप तो सर्वज्ञ हैं।
 

कल मैं फिर से आपकी आरती गाऊँगी,
हर पल गणेश उत्सव मनाऊँगी,
केवल मंडोल में से गानों की आवाज सुन नहीं पाऊँगी,
गणेश उत्सव को विकृत रूप
देने वालों पर अवश्य शोक मनाऊँगी।
 

ध्यान से देखो, बप्पा हम सब में हैं,
वे कहीं नहीं गए, हर दिल में हैं,
वे कहीं नहीं गए, हर अनाथ बालक में हैं,
वे यहीं कहीं, वृद्ध माता-पिता में है।
 

बप्पा को मंडल में नहीं
ह्रदय में स्थान चाहिए,
बप्पा को डीजे नहीं दीनबंधु चाहिए,
बप्पा को मोदक नहीं परोपकारी चाहिए,
बप्पा को फूलों का हार नहीं सच्चा प्यार चाहिए,
बप्पा को स्वयं का विसर्जन नहीं

कुविचारों का विसर्जन चाहिए।

 

8.खुशियाँ

एक दिन करुणा में भर
मैंने बहुत विलाप किया
क्यों मेरी संतान पढ़ाई में कमजोर है? विधाता से यह सवाल किया,
मैं ही हूँ क्यों ऐसी अभागन
जिस को सहने हैं सारे गम?
पति समय देते हैं बहुत कम
बच्चे खेलने में है व्यस्त हरदम
हे विधाता! क्यों है, मुझको ही है सारे गम?
तभी द्वार पर आवाज यह आई,
पीने पानी मिलेगा क्या माई?
द्वार खोल देखा तो सर मेरा चकराया,
बैसाखी के सहारे खड़ा एक व्यक्ति मैंने है पाया।
सड़क का काम चल रहा है,
सो पत्थर फोड़ने आया,
आज पानी लाना भूल गया
यह कहकर वह शरमाया।
पानी देकर स्तब्ध खड़ी
मै, यह विचार कर
कैसे हैं यह इतना प्रसन्न दोनों पैर ना होकर?
क्यों करते हो इतना कठिन कार्य तुम अपंग होकर?
सरकारी सुख-सुविधाएं पाकर
खा सकते हो बैठकर ?
सुनकर मेरा प्रश्न, बोला वह मुस्कुराकर
दोनों हाथ अभी है सलामत
फिर क्यों जीऊँ मैं भिक्षुक बनकर?
आँखें फटी की फटी रह गई
देख रही थी मैं उसे विस्मित होकर,
बोल पड़ी मैं ईश्वर से मन में यह पश्चाताप कर,
हे ईश्वर !है मेरी संतान स्वस्थ और सुंदर,
दी आपने मुझे ख़ुशियाँ झोली भर कर,
फिर भी मैं जी रही हूँ सतत रो रो कर,
हे करुणाकर! और न मुझ को शर्मसार कर,
जीऊंगी मैं भी अब हर पल मुस्कुराकर । 

9.क्रांति यज्ञ


अन्याय के खिलाफ जो बिगुल बजा दे
वह है क्रांति ,
सदियों से जिसने समाज में फैलाई है जनजागृति
वह है क्रांति,
क्रांति के बल पर ही भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ने अंग्रेजों को पहुंचाई थी क्षति।
क्रांति के बल पर ही क्रांति वीरों ने मुक्त करवाई हमारी धरती।
क्रांति ही तो समाज में बदलाव है लाती,
बदलाव लाने के लिए, कई क्रांतिवीरों ने क्रांति यज्ञ में दी अपनी आहुति।
राजा राममोहन राय ने शिक्षा में लाई क्रांति
तो अंबेडकर ने अपने विवेक से लाई सामाजिक क्रांति,
क्रांति के बल पर ही अन्ना हजारे ने पाई प्रसिद्धि
क्रांति में होती है, प्रचंड शक्ति
हर तरफ जो उथल-पुथल है मचा देती
जब -जब आहत होगी माँ भारती
तब-तब होगी इस धरती पर क्रांति। 


10.माता लक्ष्मी

माता लक्ष्मी का यह अनूठा त्योहार
सिखाता है हमें कैसा हो हमारा व्यवहार
स्वागत किया जाता है मां लक्ष्मी का सुन्दर रंगोली दालकर
खुश किया जाता है मां लक्ष्मी को कई मिठाईंया बनाकर
उन्हें प्रसन्न करने में लग जाता है पूरा परिवार
अपने घर की लक्ष्मी से नहीं होता है किसी को कोई सरोकार
घर की थकी हुई लक्ष्मी का करता नहीं कोई विचार
घर की लक्ष्मी से ही सारा काम करवाकर
मनाया जाता हैं यह लक्ष्मी का त्योहार
कई मिठाइयों को रखा जाता है परोसकर
बहुत से खिलौनों को रखा जाता है जमा कर
निर्जीव मूर्तियों का होता है खूब साज शृंगार
और घर की बहु रुपी लक्ष्मी के साथ होता है दुर्व्यवहार
क्यों ना मनाए हम ऐसा कोई त्यौहार
जब निर्जीव की जगह ,सजीव का हो सत्कार
घर के ही लोगों द्वारा न हो उसका कोई तिरस्कार
कम से कम वर्ष में एक बार घर के लक्ष्मी को भी मिले पुरस्कार
हर किसी से मिले उसे आदर और प्यार
भूल जए वह अपने मायके का भी दुलार
काश! ऐसा भी हो कोई लक्ष्मी का त्योहार 

कविता 8430307336817814817

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