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अभिषेक शुक्ला की रचनायें......


1.'मर्दानी'

"एक ही रानी लक्ष्मीबाई यहाँ नहीं दुश्मनों  संग लड़ती है,

भूख,प्यास,बेरोजगारी संग तो रोज़ ही बलिवेदी सजती है।

समर क्षेत्र में तो रोज यहाँ हर मर्दानी लड़ती है।

दो जून की रोटी खातिर वो तो सब कुछ करती है।

बेटे को पीठ पर दे सहारा वह दुर्गा आगे चलती है,

धर रूप काली का वह तो काल का खण्डन करती है।

तलवार पुरानी हो गयी पर भुजाओं में बल रखती है,

काट शीश असंभावनाओं का वह तो आगे बढ़ती है।

विपरीत है परिस्थितियां पर वह मर्यादा रखती है,

इस तरह मर्दानी माँ का फर्ज भी पूरा करती है।"


2.

सच्ची निशानी

"सिर पर मेरे ताज नहीं ये तसला है,

दो वक़्त की रोटी का सब ये मसला है।

शौहर मेरा शाहजहाँ जैसा धनी तो नहीं है,

रूप मेरा मुमताज जैसा सुन्दर तो नहीं है।

पर मुस्कान मेरी प्यार की सच्ची निशानी है,

चेहरे पर सजा गुलाल वो देश की माटी है।

हम गरीब प्रेम भावों को खूब समझते है,

हमारे बन्धन तो सात जन्मो तक बंधते है।

हम जीवन भर एक-दूजे का साथ निभाते है,

हम जीते जी अपनों की कब्र नहीं खुदवाते है।

हमारे यहाँ ऐसा उपहार नहीं दिया जाता है,

जो है जीवित उसे मृत नहीं कहा जाता है।

हम तो प्रेम में संग जीते संग मर जाते है,

हमें ताबूत-ए-संगमरमर नहीं दिये जाते है।"

3.क्रूरता

मुझ पर यूं रौब तुम दिखाते हो,

गरीब को तुम भी खूब सताते हो।
किस्मत ने छीन लिया सब कुछ,
तुम भी इस अनाथ को रुलाते हो।
न भीख न दया में कुछ माँगा मैंने,
न चोरी की न ही डाका डाला मैंने।
हर तकलीफ़ मुसीबत झेली मैंने,
पर मेहनत मजदूरी न छोड़ी मैंने।
पर यह सब भी तुमको क्यों खल गया?
बोलो मानवता धर्म तुम्हारा कहाँ गया?

4.

पापी पेट

"पापी पेट की खातिर सब कुछ कर लिया,

खुद से ज्यादा वजन कंधों पर सह लिया।

जठराग्नि मिटती नहीं जतन सब कर लिया,

दो जून की रोटी खातिर मैं खूब भटक लिया।

हाय इस गरीबी ने और भी है डस लिया,

ऊपर से बुढ़ापे ने जी भर है रुला दिया।

मैंने किसी तरह अपने पेट को भर लिया,

आज जीवन ने काल को फिर है हरा दिया।

भूख मिटाई दोनों ने फर्क इतना हो गया,

सबने खाकर फेंका, मैंने उठाकर खा लिया।"


5.

घुमक्कड़ हुनरबाज

"रद्दी को भी लाइब्रेरी बना लेते हैं,

मेहनत से किस्मत चमका लेते हैं।

फेंके हुये कागज़ के टुकड़ों पर,

हम अपना हुनर आजमा लेते हैं।

कोई नहीं सिखाता है सबक पर,

जिन्दगी से ही हम सीख लेते हैं।

किताबों में है सब अच्छी बात पर,

वजूद इसका जमाने में देख लेते हैं।

हमारी बस्तियों में कोई नहीं आता पर,

हम घुमक्कड़ सारा जमाना देख लेते हैं।"


6.

"हिन्दी"

"हिन्दी तो है हिन्द की भाषा,

अपनी तो है शान मातृभाषा।

जो लिखो वही है पढ़ा जाता,

सबके मन को यह खूब भाता।

'अ' से अज्ञानी है जाना जाता,

'ज्ञ' से ज्ञानी तो ये हमें बनाता।

इसके महत्व को लो सब जान,

इसका प्रयोग करना लो ठान।

राजभाषा का हो सबको ज्ञान,

"हिन्दी" का विश्व में हो सम्मान।"


7.

सदा यूँ ही

"धड़कन रुकने को थी नब्ज़ भी मेरी थमने को थी,
प्रियतम को मेरे फिर भी पल भर की फुरसत न थी।
रिश्ता हमारा अन्तिम आहों पर सिसक रहा था,
उनका जश्न-ए-आजादी अपनों संग चल रहा था।
खुश थे बहुत वो मुझ बिन ये मैं देख रहा था,
दुख दिये मैंने ही सब क्या ये मैं सोच रहा था।
मैं तन्हाईयों को समेटे उनका इंतजार कर रहा था,
वो भूलकर मुझे अपनों संग महफिल सजा रहा था।
उनके महफिलों के दौर अब सदा यूँ ही चलते रहे,
वो मुझसे बेफिक्र होकर अब सदा यूँ ही हँसते रहे।"

8.

ऐसा मत करना

"सफलता के आयामों पर कभी फख्र मत करना,
मिला मेहनत से उसका कभी जिक्र मत करना।
किस्मत की लकीरें भी बदल जाती है मगर,
हुनर से अपने कभी कोई समझौता मत करना।
जुनून रखना जीतने का पर इतना खयाल रखना,
अपनों का दिल दुखे कभी कुछ ऐसा मत करना।
आजमाना अपनी बुलंदियों को तुम शिखर तक,
इंसानियत पीछे छूट जाये कभी ऐसा मत करना।"

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