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विनोद सिल्ला की कविताएँ

विनोद सिल्ला

1.

बूंदाबांदी

रात की हल्की
बूंदाबांदी ने
फिजां को दिया निखार
पेड़ों पे पत्तों पे
दीवारों पे मकानों पे
जमीं धूल
घुल गई
सब कुछ हो गया
नया-नया
ऐसी बूंदाबांदी
मानव मन पे भी
हो जाती
जात-पांत
धर्म-मजहब
की जमी धूल
भी जाती धुल
आज की
फिजां की तरह
जर्रा-जर्रा जाता
निखर

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2.

बड़प्पन

अक्सर बच्चे
लगा बैठते हैं जिद्द
बड़े भी
लगा लेते हैं जिद्द
बच्चे जाते हैं रूठ
बड़े भी जाते हैं रूठ
जबकि बच्चों का रूठना
होता है क्षणिक
और बड़ों की
खप जाती हैं पीढ़ियाँ
रहते हैं रूठे ही
फिर बड़ों में
कहाँ होता है बड़प्पन
नहीं मिला
बहुत खोजने पर भी



3.

मगरमच्छों से अनुरोध

सभी
बड़े-बड़े
मगरमच्छों से
मेरा विनम्र
अनुरोध है
वो छोटी-छोटी
मछलियों से
छोड़ दें पेट भरना
बनें शाकाहारी
छोटी मछलियाँ भी हैं
उन्हीं की जाति की
उन्हीं के समाज की
बड़ा बनना है
शौंक से बनो
हाथी की तरह
शाकाहारी बनो

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4.

बड़े अजीब हैं लोग

लोग काली चीजों को
मानते हैं अशुभ
दुल्हन भी
लाना चाहते हैं गोरी
रात भी
पसंद करते हैं चाँदनी
भविष्य भी चाहते हैं
उज्ज्वल
गड़बड़ी की
आशंका में
दाल में भी काला
नज़र आता है
लेकिन जो
दिल में काला है
उसे नहीं चाहते
निकालना
बड़े अजीब हैं लोग


5.

माँ

माँ ने
अपने दोनों बेटों का
पालन-पोषण
बड़े ही
लाड़-चाव से किया
उनको पढ़ाया-लिखाया
काबिल बनाया
और वे अब शायद
माँ से भी बड़े हो गए
आज वे दोनों
अलग हो गए
घर के बीचों-बीच
दीवार बन गई
घर का सारा
सामान बाँट लिया
कोशिश की आखिर उन्होंने
अपनी जननी
अपनी माँ
को बाँटने की
तो फैसला हुआ
  माँ को
दोनों बारी-बारी
रखेंगे एक-एक महीना



6.

बिछुड़ने का आनंद

मिलन होता ही
बिछुड़ने के लिए
तो गम कैसा
मिलन जितने पल का हो
देता है खुशी
देता है आनंद
जब बिछुड़ना होता है
वो भी कम लज़्ज़त भरा
नहीं होता
उसका भी
अपना आनंद है
अपना मजा है
फिर मिलने की
आशा होती है
कुछ-कुछ
बिछुड़ने का
खालीपन होता है
सबका अपना
अलग मजा है



7.

स्वर्णिम अवसर

जा रही थी
छोटी रेल
चीरती पहाड़ों को
छोड़ती पीछे
हरियाणा के
अंतिम शहर कालका को
होता जा रहा था नजदीक
शहर शिमला
हर मोड़ के बाद
हर एक सुरंग
पार करने के बाद
सवारियों का उत्साह
था देखने योग्य
ये सफर भी
किसी उत्सव से
कम नहीं था
जीवन के तनावों से
मुक्त होने का
था स्वर्णिम अवसर



8.

कितना विकास कर लिया

जहां
फसलें लहलहाती थीं
चिड़िया चहचहाती थीं
हवा की सांय-सांय
गाती थी
मिट्टी से खुशबू
आती थी
लेकिन आज सब
बदल गया

फसलों की जगह
भवन उग आए
चिड़िया की
चहचहाहट की जगह
दूधवाले-सब्जीवाले की
आवाजें हैं
नील गाय की
छलागों की जगह
गेंगस्टर की छलांगें हैं
हवा विषैली हो गई
मिट्टी की खुशबू
कंक्रीट के नीचे
जब गई
हमने कितना विकास
कर लिया



9.

कितने विचित्र है लोग

ये
कैसी व्यवस्था है
कैसी मानव-मन की
अवस्था है
संगमरमर के महलों में
फिनाइल युक्त
पानी में डूबा
पोचा लगाने वाले
हाथ तो
हैं अपवित्र
लेकिन
काला बाज़ारी में
करोड़ों का लेन-देन
करने वाले हाथ
पवित्र हैं
लोग कितने विचित्र हैं



10.

कैसे हैं यहां के लोग

वो
बाज़ार की
हर गली में
घूमती है
कपड़े डाले हैं
मैले कुचेले
फिर भी है खूबसूरत
बीनती है कूड़ा
करती है
अपना जीवनयापन
सभी उसे देखते हैं
ललचाई नज़रों से
चाहते हैं उसे पाना
लेकिन नहीं चाहते
उसे अपनाना
कैसे हैं यहां के लोग

-
-विनोद सिल्ला


परिचय

नाम - विनोद सिल्ला
शिक्षा - एम. ए. (इतिहास) , बी. एड.
जन्मतिथि -  24/05/1977
संप्रति - राजकीय विद्यालय में शिक्षक

प्रकाशित पुस्तकें-

1. जाने कब होएगी भोर (काव्यसंग्रह)
2. खो गया है आदमी (काव्यसंग्रह)
3. मैं पीड़ा हूँ (काव्यसंग्रह)
4. यह कैसा सूर्योदय (काव्यसंग्रह)


संपादित पुस्तकें

1. प्रकृति के शब्द शिल्पी : रूप देवगुण (काव्यसंग्रह)
2. मीलों जाना है (काव्यसंग्रह)
3. दुखिया का दुख (काव्यसंग्रह)


सम्मान

1. डॉ. भीम राव अम्बेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2011
2. लॉर्ड बुद्धा राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2012
3. ज्योति बा फुले राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2013
4. लाला कली राम स्मृति साहित्य सम्मान 2015
5. प्रजातंत्र का स्तंभ गौरव सम्मान 2018

पता :-

विनोद सिल्ला

गीता कॉलोनी, नजदीक धर्मशाला
डांगरा रोड़, टोहाना
जिला फतेहाबाद (हरियाणा)

पिन कोड-125120

कविता 7424639181813385108

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