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"बांग्ला साहित्य में रामायण की प्रासंगिकता" - डॉ0 रानू मुखर्जी

Ranu photo

भारतीय प्रज्ञा पर रामकथा धारा ने व्यापक प्रभाव डाला है. भारत भूमि राम की निर्मात्री होने के कारण अत्यंत महिमामयी है. क्योंकि राम भारत के ही नहीं वरन विश्व इतिहास के महापुरुष हैं.

एक समय था जब रामायण का पठन बंगाल के लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया था. फलस्वरूप धनी - दरिद्र, शिक्षित अशिक्षित, साक्षर - निरक्षर सभी स्तर के लोग रामायण तथा महाभारत की कहानी को आत्मसात करते थे. क्रमशः मुद्रण विस्तार, शिक्षा तथा समाज की धारा में परिवर्तन आने के फलस्वरूप बंगाल के लोगों की जीवन धारा में परिवर्तन आने लगा.

रामायण पाठ भ्रमण वृंद के मध्य विशेष रीति नीति में आबाद हो गया. परंतु हम जानते हैं कि रामायण में जो पारिवारिक बंधन, पारिवारिक सौहार्द की बात कही गई है वह भारतीय जन जीवन से बड़ी गहराई से जुड़ा हुआ है और साथ ही साथ बंगाल के भी.

समाज में परिवर्तन तथा मूल्य बोध में परिवर्तन के साथ-साथ वह सभी संपर्क सूत्र तथा बंधन में परिवर्तित होने पर भी मानवता बोध के लिए रामायण आज भी प्रासंगिक है. इस कथा के मध्य बड़े स्वाभाविक रूप से समकालीन - समाज और लोक-जीवन निहित है. उसी लोक-जीवन को जानने के लिए तथा स्पर्श करने के लिए और पहचानने के लिए ही रामायण का पठन मनन अति आवश्यक है. रामायण का सांस्कृतिक परिचय अति विस्तृत है. इसलिए इसका प्रभाव समसामयिक है और उत्तरकाल के साहित्य में, शिल्प में, जीवन चर्चा में, दैनिक आचरण में इस भारत भूखंड में आज भी व्यवहृत हो रहा है.

बांग्ला साहित्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं हैं. युगों से रामायण ने बंगाल के लोगों के जीवन में प्रभाव विस्तार किया है. मध्ययुग के बांग्ला साहित्य में रामायण का प्रभाव प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों रूप में दिखता है. सती साध्वी सीता तथा भ्रातृ भक्त देवर लक्ष्मण बांग्ला समाज में आदर्श के रूप में परिचित हैं.

बांग्ला भाषा में रामायण के प्रथम अनुवादक तथा रचनाकार पंचम शताब्दी के कृतिबास ओझा है. "श्रीराम पांचाली" जो "कृतिबास रामायण" नाम से विदित है मूल रूप से बाल्मीकि रचित संस्कृत रामायण को आधार बनाकर लिखा होने पर भी इसमें समकालीन बंगाल के लोगों की जीवन गाथा ही स्पष्ट होती है. भक्तिनत चित्त, वैष्णवोचित विनय द्वारा वह बंगाल के घर-घर की कथा बन गई. पारिवार्रिक ऐतिह्य, भ्रातृत्व, सामजिक अवस्थान इत्यादि सूत्रों के अनुसार रामायण को कृतिवास ने बंगालियों के जीवन के साथ संपृक्त कर दिया था. अतः रामायण का प्रसंग सुदूर अयोध्या-पंचवटी-दंडकारण्य का न होकर बंगाल प्रदेश की सजल-स्यामलिमा में बंगालियों के जन जीवन की चर्चा तथा चर्चा का रूप बन जाता है.

सुखमय भट्टाचार्याजी ने "रामायणेर चरिताबली" के अन्तर्गत प्रधान-अप्रधान प्रायः सभी पात्रों को समसामयिक सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप चित्रित किया है. उनके राम जन-जन पर अपना प्रभाव विस्तार करते हैं. यहीं पर राम न इतिहास लगते हैं, न मात्र किसी पौराणिक कथा के नायक. वो तो लोकनायक हैं जो जन-जन से जुड़ जाते हैं. जन-जन का मन राम में लय हो जाता है तथा राम जन में. लोकनायक राम का मूल भाव "करूणा" है. वे "दिनदयाल" हैं. अहल्या के मुक्तिदाता हैं. निषाध, भील-कोल, किरात, खर सभी को अभयदान करते हैं. समदृष्टि का ऐसा सुन्दर उदाहरण शायद ही कहीं चित्रित हुआ है. राम सभी को गले लगा लेते हैं.

अमलेश भट्टाचार्या रचित "रामायण कथा" का प्रकाशन वर्ष है १९८८. इस ग्रन्थ में उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम राम के विशाल हृदय के कोमल तथा दृड़ भावों को समकालीनता के साथ जोड़कर यह स्पष्ट कर दिया है कि समय की दूरी होने पर भी आज भी रामायण हमारे मार्ग दर्शक के रूप में हमारे अंतस में हैं. पारिवारिक नीति, समाज नीति तथा राष्ट्र नीति की चरम मर्यादा, परम सीमा, हमें "रामायण कथा" में देखने को मिलते हैं.

रामायण में मूल रूप से तपस्या की कथा है. प्रेम के लिए तपस्या, त्याग के लिए तपस्या, दुःख के लिए तपस्या, सुख के लिए तपस्या हैं. रामायण की प्रतिष्ठा सत्य पर है. रामायण के राम ने लौकिक सत्य को मर्यादा देकर धर्म की रक्षा की है. धर्म की रक्षा का प्रश्न उठाते ही रामायण की प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है. राजा दशरथ एक धार्मिक निर्दोष व्यक्ति थे परन्तु परिस्थितिवश उनको लांछित होना पड़ा था.

"मरा से राम" निबंध के अंतर्गत लेखक ने अरण्य जीवन का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है. अरण्य का अंतर्जीवन अनेक प्रकार की विरोधिता को मिटाकर मिलन प्रसंग, कवंध राक्षस दिव्यज्ञानी, नरखादक विराध भक्त श्रेष्ठ, शूद्रा शबरी सिद्धतपा, परम धर्मात्मा मरा से राम की यात्रा में हमें वन प्रान्त की अनेक विशेषताओं का परिचय मिलता है. "रामायण कथा" में हमें मानवीय मूल्यों का जीवन में विशिष्ट स्थान होना दर्शाता है. राम का जीवन मानव संघर्ष की गाथा है. जो अत्याचारी, दानव शक्ति को मिटाने के लिए सदैव तत्पर रहें हैं. आधुनिक समाज में उपजती नित नई दानव शक्तियों को मिटाने के लिए राम की अति आवश्यकता है.

बांग्ला साहित्य में कवयत्रि चंद्रावती रचित "चंद्रवती रामायण" का विशिष्ट स्थान है. इस ग्रन्थ में चंद्रावती ने सीता निर्वासन की कथा को बड़े विस्तार के साथ लिखा है. परन्तु यह कथा वाल्मीकि रामायण से एकदम भिन्न है. चंद्रावती ने लिखा हैं -

लक्ष्मीर अधिष्ठाने आईला गो अलक्षी जन्मील|

अमृत फलेर तिताबीजेर गो फुल जे फलिल||

चन्द्रावती के रामायण में नारी चरित्र अंततः अन्य चरित्रों से विशेष रूप से पुरुष चरित्रों की तुलना में अधिक प्रकाशमान हैं. यह कहा जा सकता है कि चंद्रावती का रामायण "रामायण" न होकर "सीतायन" हो गया है. कवयित्री ने सीता के दुःख तथा उनकी अंतर्ज्वाला के चित्र को बड़ी व्याकुलता से चित्रित किया है. इस कारण पुरुष प्रधान समाज में एक पक्षीय दृष्टिकोण पर आलोक पात किया है. यह कहा जा सकता है कि चंद्रावती ने अपने जीवन की गंभीर वेदना सीता की वेदना के साथ एकात्म होकर उनके दुःख को अनुभव करने की कोशिश की है. अतः सीता का दुःख चंद्रावती का ही दुःख - शोक का एक विकल्प प्रतिरूप हो उठा है.

नरेंद्रनारायण अधिकारी रचित "राम विलाप" में रावण द्वारा सीता हरण के पश्चात् जटायु से मिलने तक के राम के करूण विलाप का वर्णन है. सीता के विरह में सीता के सौन्दर्य को प्रकृति के विभिन्न उपादानों में देखकर राम के हृदय में सीता का विरह जाग उठता है. दांपत्य जीवन का सुंदर उदहारण है. एक पत्नी व्रती राम आधुनिक समाज को सही मार्ग दिखाते हैं.

जब भी उपादेयी परंपराओं की चर्चा होती है "रामायण" किसी न किसी रूप में उपस्थित हो जाता है. यही वह कथा है जिसमें वर्त्तमान की ही नहीं भविष्य की भी नींव रखी जा सकती है. समाज तथा मानवजाति के लिए शाश्वत नियमों व आदर्शों को प्रस्तुत करनेवाली यह रामायण अपने आप में पूर्ण है, प्रभावशाली है, युग विहीन है, सर्वकालीन एवं सर्ब देशीय है.

वर्तमान संदर्भों में भी विद्वान् मनीषी, चिंतक एवं साहित्यकार चिंतित हैं. भारत के समग्र समाज रूपी सिद्धाश्रम में व्याप्त अनाचार के प्रति, भ्रष्टाचार के प्रति, अराजकता के प्रति और इस विषम परिस्थितियों में सर्वार्थ नेतृत्व के प्रति. आवश्यक है रामवतार की, उनकी दीक्षा की, तथा प्रतीक्षा है उस दीक्षानुसार आचरण में समाज में फ़ैली अनाचार की समाप्ति की.

राम के रामत्व की उनके अस्तित्व की अनुभूति सर्वत्र की जा सकती है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हम स्वामी विवेकानन्द, अरविंद, विनोबा भावे, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों के अस्तित्व की अनुभूति आज भी करते हैं. किन्तु उस अनुभूति हेतु हृदय में सच्ची श्रद्धा और सच्चे प्रेम का होना आवश्यक है. अगर हमारे हृदय में इन महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं है तो हम इस अनुभूति को प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकते. इसलिए कहा गया हैं -

हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रगट होंही मैं जाना.

रामराज्य में प्रजातान्त्रिक सुव्यवस्था की रमणीय झलक मिलती हैं. राम के राज्य में कहीं विषमता का नाम न था. सारी प्रजा सुखी थी. सब अपने कार्य में संलग्न थे. सबको राजा की आलोचना का अधिकार था. यथा राजा तथा प्रजा का सनातन सत्य उतना सार्थक कभी नहीं हुआ जितना राम के राज्य में.

वर्त्तमान युग चुनौतियों का युग है. शारीरिक व आत्मिक दृष्टि से, नैतिक चारित्रिक, सामाजिक, राजनीतिक, प्रत्येक स्तर पर चुनौतियाँ हैं. भौतिक सुख - सुविधाओं की बढ़ती मांग हमें कुछ सोचने के मार्ग पर रोड़ा अटका रही है. अतः हम मानसिक और आत्मिक तृप्ति नहीं पा रहें हैं. झूठ, रिश्वतखोरी, बेईमानी जीवन पद्धति में इस प्रकार से धुल-मिल गई हैं जैसे जीवन का एक अंग हो. स्वार्थपरता और स्वेच्छाचारिता का प्राधान्य है. इसके साथ ही संयुक्त परिवार व्यवस्था अपना मूल्य खो रही है. चारों ओर असुरक्षा का भाव जन्म ले रहा है.

आधुनिक तेज रफ़्तार व निरंतर बदलती जीवन प्रणाली में दम तोड़ते प्राचीन मूल्यों को आज के सन्दर्भ में पुनःस्थापित करने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है. प्राचीन मान्यतों और परम्पराओं से बंधकर जीवन बिताना मुश्किल है और नई मान्यताओं का निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं है. अतः हमें विचार करना होगा कि प्राचीन परम्पराओं की विशेषताओं को प्रासंगिक बनाकर जीवन प्रणाली में स्वीकार कर लेना या उनके अनुरूप कार्य करना ही एक मात्र सही उपाय है. एक मात्र रामायण ही वह कथा है जो हमें सही मार्ग पर ले जा सकती है.

उन्नीसवीं शताब्दी के बांग्ला साहित्यकार रामायण से प्रभावित देखे जाते हैं. इनमें ईश्वरचंद्र विद्यासागर, माइकेल मधुसूदन दत्त, रघुनन्दन गोस्वामी आदि रामायण पर आधारित रचनाएँ रचकर यशस्वी हुए.

बीसवीं सदी के दिनेशचंद्र सेन, राजशेखर बासु, रामानंद चट्टोपाध्याय, उपेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, शिशिर कुमार नियोगी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, द्विजेन्द्रनाथ राय, उपेन्द्र किशोर रायचौधरी आदि वरेण्य साहित्यकारों ने रामायण को आधार बनाकर अनेक रचनाएँ की हैं.

रामायण के बारे में कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कहना है कि - भारतीयों के लिए राम-लक्ष्मण-सीता जितने सत्य हैं उतने उनके घर के लोग नहीं हैं. परिपूर्णता के प्रति भारतवर्ष के लिए प्राणों की आकांक्षा है. इसको वास्तव सत्य का अतीत कहकर अवज्ञा नहीं किया हैं, अस्वीकार नहीं किया है. इसको इन्होने वास्तव सत्य कहकर स्वीकार किया है और आनंदित हुए हैं. उसी परिपूर्णता की आकांक्षा को ही उदघोषित तथा तृप्त करके रामायण का कवि भारतवर्ष के भक्तों के हृदय को मोल ले लिया हैं. इसमें जो सौभ्रात्र, जो सत्यपरायणता, जिस प्रभु भक्ति का वर्णन हुआ है उसके प्रति यदि सरल श्रद्धा तथा अंतर की भक्ति की रक्षा कर सकें तो हमारे घर के वातायन के अन्तर्गत महासमुद्र की निर्मल वायु प्रवेश का पथ खुला रहेगा.

जिस ग्रंथ को आधार बनाकर कवि ने यह मंतव्य लिखा है वह ग्रन्थ है दिनेशचंद्र सेन रचित "रामायणी कथा". राम के चरित्र की उदात्तता को उभार कर समाज व्यवस्था के संचालक के रूप में प्रस्तुत किया है.

विश्व कवि ने रामायण की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए अपनी कृतियों में रामायण को आधार बनाया है. उनके द्वारा रचित "वाल्मीकि प्रतिभा" (गीति नाट्य) में मानव जीवन के गूढ़ गंभीरतम उपादान, वेदना और करुणा को प्रधानता दी गई है. "काल मृगया" की रचना में भी रामायण की कथा है. "मानसी" काव्य में "अहल्यार प्रति" कविता में रामचंद्र के स्नेहधीन होकर अहल्या की शाप मुक्ति का प्रसंग है. राम यहाँ उद्धारक के रूप में चित्रित हैं. कवि ने इस काव्य के माध्यम से विश्व बोध का जो पाठ पढाया है वही रामायण के अन्यतम व्याख्या है. "सोनार तरी" काव्य के अंतर्गत "पुरस्कार" कविता में रामायण के कुछ विशेष मुहूर्तों को अंकित किया है. राम-सीता-लक्ष्मण द्वारा ऐश्वर्या का त्याग करके वल्कल परिधान करके वन गमन का प्रसंग आवश्यकता पड़ने पर संसार का त्याग करने की मानसिकता का पाठ पढ़ाता है. रवीन्द्रनाथ के अनुसार "रामकथा में एक ओर कर्त्तव्य है जो कठिन और दुरूह है और दूसरी तरफ भाव का अपरिसीम माधुर्य, सब एकत्र सम्मिलित है."

"बिष्णुपुरी रामायण" के राम परंपरागत राम - चरित्र के अनुसार कर्तव्यनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ और सच्चरित्र तो हैं ही, वे ऋषि-मुनियों के दर्शन, उनकी सेवा तथा उनके कष्टों का भी ध्यान रखते हैं. वनवासी लोगों की सेवा और उनके शिक्षा-दीक्षा के द्वारा उनकी आत्मनिर्भरता प्रदान करना ही वे अपना दायित्व मानते हैं.

राम स्वयं कठिन श्रम करते हैं वाल्मीकि के आश्रम में पहुंचकर राम, सीता और लक्ष्मण सहित स्वयं अपनी कुटिया का निर्माण एवं अन्य व्यवस्थाएं करते हैं. यहाँ हमें राम के कर्म भक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है. राम सीता को शस्त्र शिक्षा देते हैं जिससे सिद्ध होता है कि राम स्त्रियों की आत्मनिर्भरता के प्रबल पक्षधर थे. उनमें बुद्धि-कौशल तथा युद्ध-कौशल का अद्भुत समन्वय है. राम श्रेष्ठतम आदर्शवादी है मर्यादा पुरुषोत्तम हैं.

बाल्मीकि रामायण को आधार बनाकर आधुनिक युग में अनेक साहित्यकार उपन्यास - सृजन कर रहें हैं. उसका कारण संभवतः यह भी है कि बाल्मीकि के राम मानव के अधिक निकट हैं तथा वर्तमान समय की वैज्ञानिक एवं विश्वसनीय दृष्टि को देव रूप राम की नहीं वरन मानव रूप राम की आवश्यकता है जो मानव समाज के प्रेरणास्पद हो सके. इन साहित्यकारों की श्रृंखला में प्रतिष्ठित एवं चर्चित नाम है डॉ. रामनाथ त्रिपाठी का. अजेय पुरस्कार से सम्मानित अपने "रामगाथा" में लिखते हैं - बाल्मीकि के राम ऐतिहासिक महापुरुष है. उन्होंने घर-परिवार-समाज के समक्ष स्नेह और त्याग के भव्य आदर्श प्रस्तुत किए हैं. वे अपने सदगुणों के कारण कालांतर में नर से नारायण मान लिए गए हैं- -| तुलसी के सहृदय ब्रह्म "राम" भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ उपलब्धियों के पुंज हैं. वे इतिहास नहीं अपितु निरंतर होनेवाली स्वस्थ परंपरा है.

रामगाथा में जिस राम का वर्णन है वह जीता जागता मानव है. उसे सुई चुभोई जाए तो उसी प्रकार रक्त निकलेगा जैसे हम सबके शरीर से निकलता है. अतः स्पष्ट है कि डॉ. त्रिपाठी परंपरागत रामकथा को अपनी नवीन दृष्टि के आधार पर कल्पना के रंग में रंगकर प्रासंगिक युगानुरूप बनाते हैं तथा काल-चेतना की आवश्यकता के अनुसार उसे पाठक के सम्मुख रखतें हैं.

साहित्यकार समकालीन परिस्थितियों से अप्रभावित नहीं रह सकता है. उसके चिंतन में, उसकी कल्पना के केंद्र में देश-काल-स्थिति-मनुष्य और समाज होता है. उसके चिंतन में, लेखक की स्थिति सहभोक्ता और सहयात्री की होती है. वर्त्तमान समय के साहित्यकार जिस परिवेश और वातावरण में सांस ले रहे है वह बेहद जटिल, तनावयुक्त, त्रासदायी और संघर्षपूर्ण है. परन्तु सबसे अधिक जटिल और समस्यात्मक प्रश्न सामाजिक-आर्थिक विषमता, मूल्यमूढ़ता, अनजानेपन, अलगावपन, टूटन, घुटन, संत्रास, भय, आतंक, पारिवारिक और सामाजिक विघटन, राजनीतिक मूल्य हीनता, अवसरवादिता, अनुशासन हीनता, भ्रष्टाचार और मोह भंग का है. साहित्यकार इन स्थितियों का वर्णन-विवेचन-समय और परिस्थितियों तथा जीवन के साथ उनके अन्तः सूत्रों एवं अंत संबंधों के आलोक में करने का प्रयास करते हैं.

आधुनिक समाज में यह भी अनुभव किया गया कि भारतीय समाज के नैतिक मूल्य, आदर्श-चरित्र की उदारता और "सर्वे भवन्तु सुखिनः" का आधार पतोंन्मुखी हो रहा है. इसे सही दिशा की ओर मोड़ने हेतु पुनः संस्कृति की धरोहर स्वरूपी पौराणिकता के वातायनो से स्वस्थ हवा प्राप्त करने की आवश्यकता है. अतः भारतीय संस्कृति के पौराणिक युग के प्रमुख आदर्श कृति रामायण हमारे मार्ग दर्शक के रूप में हैं. उसमें निहित हर प्रसंग आज भी प्रासंगिक हैं.

रामायण एक संस्कार प्रधान कृति है. यह आज के भौतिकवादी संसार के लिए संजीवनी की भूमिका निभा रही है. वो कैसा राष्ट्र है जहाँ राम नहीं भूपति! वो वन भी बन जाए राष्ट्र जहाँ जाकर बसे रघुपति. यहाँ राष्ट्र शब्द का प्रयोग विशेष रूप से किया गया है. सत्ता के लिए स्पर्धा में श्रद्धा, विश्वास सब कुछ ख़त्म हो जाता है इसलिए आवश्यकता है राम जैसे चरित्र की जो सत्ता को ठुकराकर वन को चले गए. भरत का त्याग अनुकरणीय है. पिता की अंतिम क्रिया के पश्चात् राज्याभिषेक को नकारकर वन में अपने भाई राम को लाने चले जाते हैं. भरत के मन में एक ही इच्छा है राम के चरणों में जाकर बैठ जाना. पूरा राज परिवार भरत के पीछे राज को वापस लाने निकाल पड़ता है. सत्ता के लोलुप आज के मानव के लिए भरत की त्याग वृत्ति एक आदर्श है.

रामायणकार ने राम के रचनात्मक और आदर्श भरे जीवन के माध्यम से मानवजाति को जीने की कला का पथ पढाया है. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है - रामायण सामाजिक जीवन का महाकाव्य है.

अंततः मैं यह कहना चाहूंगी कि जब तक सृष्टि रहेगी तब तक रामायण की प्रासंगिकता बनी रहेगी.

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों का परिचय कराना।


संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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