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व्यंग्य आलेख // नामकरण // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

पहचान के लिए नामकरण ज़रूरी है। जबतक किसी वस्तु या व्यक्ति को कोई नाम नहीं दे दिया जाता उसकी विशिष्ट पहचान नहीं हो पाती। बच्चे के पैदा होते ही उसका कोई न कोई नाम रख दिया जाता है। उसका नामकरण बड़े समारोह पूर्वक किया जाता है। अपनी पसंद का नाम छांटिए और रख दीजिए। पर एक बार जो भी नाम पड़ गया, उसका बदलना बड़ा कठिन होता है। नाम, वस्तु या व्यक्ति से, कुछ इस प्रकार जुड़ जाता है की दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। लोटा नाम न हो तो लोटा आप किसी कहेंगे ? लेकिन एक बार सुविख्यात अंग्रेज़ी कवि विलियम शेक्सपीयर को न जाने क्या सूझी कि उन्होंने कह दिया, नाम में भला क्या रखा है ? आप किसी भी नाम से क्यों न पुकारें गुलाब तो गुलाब ही रहेगा। बस लोग ले उड़े। नाम बदलने की मुहिम शुरू हो गई। बल्कि कहना चाहिए, नाम बदलने की राजनीति ही आरम्भ हो गई। जिसका भी नाम पसंद नहीं आया, उसे बदल डाला गया। एक का बदला, दूसरे का बदला, तीसरे, चौथे का बदला। सिलसिला चल निकला। नाम बदलने का यह सिलसिला फिलहाल तो नगरों और स्थानों तक ही सीमित है, पर बात निकली है तो न जाने कहाँ तक पहुँच जाए और व्यक्तियों के भी नापसंद नाम तक बदल दिए जाएं ! जिला फैजाबाद को अयोध्या बनाया गया है। क्या पता फैज़ अहमद फैज़ को अयोध्या अहमद अयोध्या कहने पर बाध्य कर दिया जाए।

मैं गलत होऊं तो मेरा नाम बदल दें। कहने को तो खैर मैंने कह दिया, पर कौन चाहेगा इस तरह अपना नाम बदलवाना ? नाम के आगे उपनाम तो लोग बेशक रख लेते हैं। किन्हीं लोगों के दो नाम भी होते हैं। एक घर पर प्यार से पुकारने का और एक घर से बाहर अन्य लोगों द्वारा पुकारे जाने का। लोकप्रिय कवि हरिवंश राय ने अपने घर के नाम, बच्चन, को अपना उपनाम बना कर अपने मुख्य नाम के आगे जोड़ लिया। उनके यशस्वी पुत्र अमिताभ1 ने, एक कदम आगे बढ़कर, बच्चन अपना ‘सरनेम’ ही बना डाला। कोई कोई नाम इस प्रकार मजेदार यात्रा करने का अच्छा खासा मज़ा लूटते हैं।

काशी को बनारस कहें या वाराणसी वाराणसी, शहर तो वही रहेगा। बंबई मुम्बई हो गया और मद्रास, चेन्नई बन गया लेकिन शहर जैसे थे वैसे ही रहे। शेक्सपीयर ने शायद ठीक ही कहा था, गुलाब तो गुलाब ही रहेगा, आप उसे किसी भी नाम से क्यों न पुकारें ! इलाहाबाद पहले शायद प्रयाग हुआ करता था, अब प्रयागराज हो गया है। लेकिन इलाहाबाद का जो विशिष्ट इलाहाबादी मिज़ाज है, वह प्रयागी मिज़ाज तो कभी बन नहीं सकता। मैं इलाहाबाद, सौरी, प्रयागराज से बोल रहा हूँ। क्षमा कीजिए, कहना तो प्रयागराज ही चाहता था। गलती से इलाहाबाद निकल गया। क्या करूं, ज़बान इतनी चिकनी है कि बार बार फिसल कर अपने पुराने मुकाम पर आ जाती है।

राजनीति से प्रेरित कुछ लोगों को कुछ नाम गवारा नहीं होते। वे इन नागवार नामों को को मिटा देना चाहते हैं। वैसे उनका शायद बस चले तो वे जिनके ये नाम हैं, उनको ही मिटा दें। पर नाम को बदलना शायद सबसे आसान काम है। वे इस आसान काम में जुट गए हैं। जो काम करने चाहिए, वे उनके लिए, असंभव की कोटि तक कठिन थे, सो उन्होंने नाम बदलने के इस आसान काम को सिलसिलेवार उठाना शुरू कर दिया और यह सिलसिला अभी भी चालू आहे।

राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट। लोगों ने राम नाम को खूब लूटा है। किसी के नाम के आगे राम हैं तो किसी के नाम के पीछे राम विराजमान हैं। कोई राम प्रकाश है तो कोई तेनाली राम हैं। तो कोई खुद ही रामजी बने बैठे हैं। किसी के लिए राम-राम अभिवादन बन गया तो कोई धत-काम के लिए मुंह बिरा कर राम राम कहने लगा। मरने पर तो राम राम सत्य हो ही जाती है। कोई असंभव काम न हो पाए तो राम भजो। वैसे भी राम नाम के जाप की हिन्दू धर्म में बड़ी महत्ता मानी गई है। बाकी समय पर हम राम की सत्यता पर भले ही शक करें,मरने पर तो राम नाम सत्य हो ही जाता है।

जो बात अन्य वस्तुओं और व्यक्तियों पर सही है, राम पर भी सही उतरती है। राम को किसी भी नाम से क्यों न पुकारें, (भगवान कहें, ‘गौड’ कहें, अल्लाह कहें) राम तो राम ही रहेगा। नाम में क्या रखा है ?

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

१० एच आई जी / १,सर्कुलर रोड

इलाहाबाद २११००१


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1 - हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के मुताबिक, भारत की जाति-प्रथा को नकारने व खारिज करने  तथा रूढ़िवादिता को खत्म करने की गरज से उन्होंने अपने व अपने बच्चों के उप नाम जातीय व संप्रदाय के आधार पर रखने के बजाए अपने बचपन के दिए नाम 'बच्चन' का चयन किया.

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