नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

कहानी // हमारे इधर के लोग – सुधीर ओखदे

image

महाराष्ट्र में आए हमें दशक के ऊपर का समय हो गया है फिर भी हम यहाँ के नहीं बन पाए हैं। पाकिस्तान में मुहाजिरों की तरह यहाँ भी हम तुरंत पहचान लिये जाते हैं। मुलाकाती दूसरे मिनट में ही पूछ बैठता है, "जी आप कहाँ के रहने वाले हैं?"

ऐसा ही है जी हमारा प्रदेश और वहाँ के लोग। कहीं भी फौरन एक्सपोज हो जाते हैं। कहाँ भी जाएंगे। तो फौरन पायजामे की तरह सामने आ जाएंगे।

आप अगले को समझाते रहिए कि "अब तो हम यहीं के हैं। देखिए हमने यहाँ घर बना लिया है। बच्चा कितनी अच्छी मराठी बोलता है, पत्नी कितनी अच्छी पुरनपोली बनाती है।" "लेकिन नहीं, सामने वाला अगले ही पल पूछेगा, "वह सब तो ठीक है। लेकिन आप हैं कहाँ के?"

हमारे इधर के लोग पहले जूता निकालते है फिर बात करते हैं। कभी-कभी जूता जिसे वे 'पनही' भी कहते हैं, निकालने की झंझट में पड़े बिना ही पनही सहित पैर सामने वाले के सिर में दे मारते हैं।

बड़ा गरम दिमाग है जी हमारे इधर के लोगों का। बहस की बात हो, लड़ाई-झगड़े की बात हो तो पूछिए मत। दिमाग एकदम सक्रिय हो जाता है। मुँह से पुष्प झरने लगते हैं और भुजाएँ फड़़कने लगती हैं।

वैसे इमारे इधर का आदमी यदि इस प्रकार नहीं मिलेगा तो वह फिर मिल ही नहीं पाएगा। अगले से बात करने का आत्मविश्वास उसमें गाली-गलौच करने या जूता उठाए बिना आता ही नहीं।

राशन की लाइन लगी हो हमारे यहाँ तो देखिए बातचीत कितने मोड़ लेती है।

"धक्का काहे दे रहे यार। खड़े रहने दो न ठीक से।"

[post_ads]

"धक्का साले क्या हम दे रहे हैं। पीछे से आ रहा है हम क्या करें ?"

"यार तुम्हें तो बात करने की तमीज नहीं है। हम यार-यार कर रहे हैं और तुम घुसे ही जा रहे हो।"

"कौन माँ का घुसा जा रहा है ? तमीज-तमीज क्या कर रहा है बे? राशन की लाइन में खड़ा है कि चुनाव में खड़ा है ?"

"साले हम तुम्हें चुनाव में खड़े होने लायक अपराधी लगते हैं। हद होती है यार बदतमीजी की।"

"तेरी तो......."

"तेरी तो......."

"राजनीति की बात तो आप छेड़िए ही मत। हर गली-मोहल्ले में लोग आपको राजनीति करते हुए मिल जाएंगे। राजनीति यहाँ का प्रिय व्यवसाय है।" प्रदेश की राजनीति ऐसी कि प्रत्येक व्यक्ति आपको राजनीति से जुड़ा नजर आएगा। बातें सुनेंगे तो सिर फोड़ लेंगे.......

"राम राम राजा साहब।"

"राम राम भैया, कैसे हो ?"

"सब आप ही की कृपा है। आप हो जाए क्या राजधानी?"

"हद हो गई यार! हम चिरकुट हैं क्या जो उस साले को छोड़ देंगे। एक बार ठान ली सो ठान ली। मंत्री उसका होगा तो क्या, मुख्यमंत्री ससुरा तो हमारा आदमी है।"

"मुख्यमंत्री जी से क्या बात हुई राजा साहब, जरा बताइए तो।"

"यार अब हम अपने मुँह से क्या बोलें। आप तो हमारे संबंध जानते ही हैं। दरवाजा खटखटाया तो वह ससुर मुख्यमंत्री......."

अब सोचिए जो आदमी इतने आत्मविश्वास के साथ मुख्यमंत्री को ससुर कहने की हिम्मत कर सकता हो उसकी राजनीतिक पकड़ पर कोई क्या बोले। और बड़े बोल तो देखिए मुख्यमंत्री के घर पहुँचकर यह सीधे दरवाजा खटखटाता है और मुख्यमंत्री भी ताक में रहते हैं कि कब यह खटखटाए और कब वे सारे काम छोड़कर दरवाजे खोलने को लपकें। लेकिन हमारे इधर ऐसी ही बातें होती हैं और अगला बड़े धैर्य से उसे सुनता है।

[post_ads_2]

हाँ, एक बात जरूर है। हमारे यहाँ के लोग 'लेडीज' को बड़ा सम्मान देते हैं। शब्द पर ध्यान दीजिए, 'लेडीज' यानी पढ़ी-लिखी, फैशनेबल खुशबूदार शहर की औरतें।

सही कहें तो हमारे इधर के लोग इन्हें ही लेडीज मानते हैं और इनके लिए बिना जान-पहचान के खून तक करने को तैयार रहते हैं। लेडीज ने कहा, "भाई साहेब सुनिए तो!" "अब‍ समझिए, भाई साहेब तो अब सुनेंगे ही सुनेंगे।"

"हाँ कहिए मैडम ?"

"मुझे जरा सामने तक साथ देंगे? दो गुंडे मेरा पीछा कर रहे हैं।"

"कौन हैं वे हरामजादे?........"

"नहीं-नहीं रहने दीजिए। आप उन्हें कुछ मत कहिए बस हमें वहाँ तक पहुँचा दीजिए।"

"पहुँचाने की बात नहीं है मैडम! वह तो हम पहुँचाएँगे ही। लेकिन हम जरा अपने "सालों" से भी तो मिल लें।"

फिर भैया पूछो मत। उन दो की शामत के साथ उस मैडम जी को भी शामत आ जाती है, क्योंकि उन गुंडों को तो भाई साहेब 'साले' बना चुके हैं। अत: मैडम से अपना संबंध वे स्पष्ट कर देते हैं। और उस प्रकार कालांतर में मैडम के पिताजी को एक दामाद यों ही प्राप्त हो जाता है।

बस चल रही हो और ठसाठस भरी हो लेकिन यदि कोई लेडीज कहीं से चढ़ जाए तो हड़कम्प मच जाता है। लोग-बाग अपने बग़ल के आदमी को धकियाने लगते हैं और चारों तरफ बस में शोर मच जाता है, "लेडीज सवारी आई है। लेडीज सवारी आई है।" वैसे वह दृश्य छोटे शहर-कस्बों में देखने को मिले तो समझो आप धन्य हो गए।

"लेडीज सवारी आई तो क्या जान ले लोगे ?"

"अरे यार तुम्हें तो तमीज भी नहीं है। लेडीज सवारी क्या खड़ी रह कर यात्रा करेगी।"

"तो और किसी को उठाओ। पिछली दफा भी हमें ही उठाया था।"

"कब की बात करता है बे......"

"पिछले महीने जब स्टेशन से लाली-पाउडर वाली नटनिया चढ़ी थी तो हमें ही उठाए थे।"

"साले लेडीज को नटनिया कहता है। और का हमें याद नहीं, उसी के पास नीचे बैठ गया था और नथूने फुल-फुला कर उसे सूंघे जा रहा था। साले मैं क्या तुझे जानता नहीं। चल उठ, बैठने दे मैडम को वहाँ।

"आज तो हम न उठेंगे। हमने भी टिकट लिया है।"

"साले तेरी टिकट की तो ऐसी-तैसी। हम कह रहे हैं न कि तुमको जगह देंगे। उठ! क्यों इज्जत खराब करता है बे। उठ।"

"कहाँ जगह दोगे कंडेक्टर बाबू ? का अपने सिर पर बैठाओगे ?"

"उठ हराम-जादे।" कंडेक्टर की आँखों में खून उतर आता है और लेडीज बैठ जाती है। वह ग्रामीण फिर लेडीज के पास नीचे बैठ कर नथुने फुला-फुलाकर मन-ही-मन उसे निचोड़ने लगता है। ऐसे हैं हमारे इधर के लोग लेडीज को सम्मान देने के मामले में।

हमारे इधर के लोगों को शिक्षा में तो इतनी रूचि है कि पूछिए मत। दो-तीन विषयों में एम.ए. करने के बाद भी नौकरी नहीं लगी तो एल.एल.बी. कर डालते हैं। हमारे यहाँ का हर चौथा नौजवान काफी शिक्षित होता है। उसका कहना है कि खाली बैठने से डिग्री बढ़ाना अच्छी बात है। डिग्री बढ़ाने और जेल जाने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होता।

"क्या कर रहे हो भैया आजकल?"

"कुछ नहीं यार पिछले साल पपलू के दद्दा को उड़ा दिये थे। सो आजकल उसी के मुकदमे उलझे हैं।"

"अरे हम ये पूछ रहे हैं कि क्या पढ़ रहे हो ?"

"अच्छा वो ? एल.एल.बी. कर रहे हैं। पिछले साल डबल एम.ए. कर लिया था। अब सोचा बैठे से तो एल.एल.बी. अच्छी।"

"अच्छा तो आगे वकालत का इरादा?"

"अरे काहे की वकालत ! अपने यहाँ कहाँ चलती है वकालत। लोग-बाग खुद ही फैसला कर लेते हैं। अब हमीं को देखो। पपलू हमारे दद्दा को उड़ाए। हमने उनके दद्दा को उड़ा दिया।

रूमाल रखने की प्रवृत्ति भी हमारे इधर के लोगों में खूब पाई जाती है। चलती ट्रेन या बस में भाई ने अपना रूमाल रख दिया तो समझ लीजिए वह सीट उसकी हो गई।

जी-जान लगा देगा और अपने रूमाल रखने के बल पर ऐसे-ऐसे तर्क देगा कि आपकी सारी विद्वत्ता एक क्षण में गायब हो जाएगी। अगला भी चूँकि हमारे ही इधर का आदमी है अत: बातचीत काफी तर्कपूर्ण रहेगी.....

"काहे भैया, कहाँ बैठ रहे रूमाल दिख नहीं रहा क्या ?"

"ये उठ गया रूमाल। हमने तो अब सीट पर अपनी धर दी ।"

"धर दी पर लात पड़े तो सब भूल जाओगे राजा।"

"अरे मर गए लात जमाने वाले। हम क्या मूरख हैं जो लात खा कर दाँत निपोरे बैठ रहेंगे।"

"अबे उठ।"

"चुप।"

"उठ।"

"अरे काहे उठें ?"

"हमने रूमाल रखा था।"

"ले लो अपना रूमाल, हमने कौन सी उससे नाक पोंछनी है।"

"काहे बे उठ काहे नहीं रहे। बाहर से आए हो क्या ? इतना भी नहीं समझते कि रूमाल रख दिया सो रख दिया।"

इसके पूर्व कि कुछ अनहोनी हो, यदि दूसरी सीट खाली है या किसी सीट पर अत्यंत गरीब मजदूर किस्म का आदमी बैठा है अथवा कोई तथाकथित लेडीज सीट की दावेदार नहीं है तो कंडेक्टर दोनों राजाओं को अलग-अलग सीटों पर बैठा देता है और जवाब में वह दोनों की गालियाँ सुनता है।

हमारे इधर के लोगों में जबरदस्त आत्मविश्वास है। इतना आत्मविश्वास कि सामने वाले का आत्मविश्वास लड़खड़ाने लगे। यही कारण है कि यहाँ के लड़के प्रतियोगी परीक्षाओं में अन्य प्रदेशों के लड़कों की तुलना में ज्यादा निकलते हैं।

गलत उत्तर पर भी इस जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ डटे रहते हैं कि परीक्षक का खुद का ज्ञान डगमगाने लगता है।

चूँकि हमारे इधर के लोगों की अंग्रेजी जरा कमजोर होती है अत: वे हिन्दी के जबरदस्त समर्थक होते हैं। लेकिन प्रभाव डालने के लिए बातचीत में हर तीसरा शब्द अंग्रेजी का जरूर फिट कर देते हैं और ऐसा फिट करते हैं कि अगले को मानना पड़ता है कि इसे अंग्रेजी का पर्याप्त ज्ञान है।

अब इतने वर्णन के बाद भी यदि हमें अपने प्रदेश का नाम बताना पड़ा तो धिक्कार है हम पर। हमारे प्रदेश का डंका ऐसे ही तो नहीं बजता रहता है। कहीं कोई तो बात जरूर होगी हमारे इधर के लोगों में जो उन्हें दूसरों से अलग करती है। पहचानो!

-----------

परिचय

सुधीर ओखदे

——————-

जन्म -21 दिसम्बर 1961 (बीना मध्य प्रदेश)

शिक्षा -रीवा ,शहडोल और छतरपुर मध्य प्रदेश में .....

1-कला स्नातक -(B.A.)

2-पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान स्नातक -(B.Lib.I.sc)बी.लीब .आई एस सी

लेखन -सभी प्रतिष्ठित हिंदी पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य ,आलोचना , कवितायें और संस्मरण प्रकाशित .

प्रकाशित पुस्तकें -(व्यंग्य)

1-बुज़दिल कहीं के ...

2-राजा उदास है

3-सड़क अभी दूर है

4-गणतंत्र सिसक रहा है

विशेष -1-मुंबई विश्वविद्यालय के B.A. (प्रथम वर्ष) में 2013 से 2017 तक “प्रतिभा शोध निकेतन “व्यंग्य रचना पाठ्यक्रम में समाविष्ट

2-अमरावती विश्वविद्यालय के B.Com (प्रथम वर्ष) में 2017 से “खिलती धूप और बढ़ता भाईचारा”व्यंग्य रचना पाठ्यक्रम में शामिल .

सुधीर ओखदे की अनेक रचनाओं का मराठी और गुजराती में उस भाषा के तज्ञ लेखकों द्वारा भाषांतर प्रकाशित

इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी सहित अनेक साहित्य वार्षिकी और महाराष्ट्र में प्रसिद्ध दीपावली अंकों में रचनाओं का प्रकाशन

आकाशवाणी के लिए अनेक हास्य झलकियों का लेखन जो “मनवा उठत हिलोर“और “मुसीबत है “शीर्षक तहत प्रसारित

सम्प्रति -आकाशवाणी जलगाँव में कार्यक्रम अधिकारी

सम्पर्क -33, F/3 वैभवी अपार्टमेंट व्यंकटेश कॉलनी

साने गुरुजी कॉलनी परिसर जलगाँव(महाराष्ट्र)425002

ईमेल -ssokhade@gmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.