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लघुकथा // संरचना // ज्योत्सना सिंह

सान लिया था उसने ख़ुद को माटी में और द्वार पर बैठ दुःखी मन से अपने बाबा की बाट जोह रही थी। अपनी जिद पूरी करवाने को।

अम्मा की जली-कटी अभी भी छन-छन कर उसके कानों से टकरा रही थी।

“बड़ा चुटिया पटका चाही इनका इतना शौक़ रहे तो काहे कुम्हारन के घरे जन्मी? कह देती उस कुम्हार से की बड़ी कोख में सँवारते तोहे, तो ख़ूब करती त्यौहार आऊर साज सिंगार।”

धूल माटी में सने बाबा अपनी गठरी को कलेजे से लगाये द्वार पर जैसे ही आये बिटिया को देख जुड़ा गये और बोले।

“काहे री, कुम्हार का पूरा खजाना काहे तन पर लपेटे हो?”

वह रूठी हुई ही बाबा से बोली।

“बाबा! तुम्हीं और माई कहे रहे की अबकी दीवाली पर नीक-नीक फ़ारक दिलाई आऊर ख़ूब सारे दिया भी जलावे का मिली। पर अब माना कर रही है।”

“काहे हो! मना कर रही हो? देखो बड़ी कोठी पर साँझ का दिया बारे जाए का है। अबकी कोठी पर विदेशी झलार न जली दिया सजी।

तुम नाहक धरती मूड पर धरे हो बिटिया के भाग से सब नीके नीक होई।

आऊर बिटिया देखो हम फ़िराक़ लई के आयें हैं।”

कहते हुए वह अपनी रची सबसे प्यारी संरचना को पुचकारने लगा।

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ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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