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लघु व्यंग्य // मिर्ची का लगना और मिर्च झोंकना // डॉ. प्रदीप उपाध्याय

खाना भले ही चटपटा पसन्द किया जाता हो लेकिन मिर्ची के प्रयोग में सावधानी रखने की दरकार है क्योंकि लोगों को बहुत मिर्ची लगती है!यदि आप कहेंगे कि मैं रास्ते से जा रहा था,भेलपुरी खा रहा था,किसी को घुमा रहा था तो मिर्ची किसी न किसी को तो लग ही सकती है!

मिर्च में तीखापन होता ही है। जब मिर्च स्वाद और तासीर में तीखी और चरपराहट युक्त होगी तो स्वाभाविक ही है कि मिर्ची तो लगेगी। यदि किसी को मिर्ची लग जाए तो उसे मनाना भी आसान नहीं है। वैसे लोगों की आदत सी हो गई है कि जले पर मलहम की जगह नमक-मिर्च लगा देते हैं। बात करने में भी नमक-मिर्च का जब तक तड़का न हो ,बात,बात नहीं रह जाती। एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में उसकी वही स्थिति हो जाती है जैसी खिचड़ी की बात खा चिड़ी पर पहुँच जाती है। यदि सीधी-सीधी बात कह दी जाए तो उसमें वह बात कहाँ रह जाती है ।न कहने वाले को आनन्द और न ही सुनने वाले को आनन्द और फिर भड़काऊ रस पाने के लिए नमक-मिर्च युक्त बतकही जरूरी भी है वरना रोटी के लिए लड़ती दो बिल्लियों के बीच मध्यस्थ बन्दर को भी कहाँ मजा आएगा!

बहरहाल पहले लोग आँखों में धूल भी झोंका करते थे। अब आँखों में धूल डालने का चलन कम हो चला है,लोग आँखों से काजल चुराने में व्यस्त हो गए हैं और दूसरी ओर सीधे-सीधे आँखों में धूल डालने वालों की आँखों में मिर्ची झोंकने का चलन चल निकला है। या फिर यह भी हो सकता है कि आँख में मिर्ची डालने वाला उस मुहावरे को समझ ही नहीं पाया हो जिसमें आँख में धूल डालने की बात कही गई है। आज जमाना बदल गया है। सीमेंट-कांक्रीट के जंगल में अब धूल की कमी महसूस की जा रही है तो झोंकने के लिए मिर्च के प्रयोग से बेहतर प्रयोग और कौन सा हो सकता है!बदला लेने,आक्रोश व्यक्त करने के लिए जूते,स्याही तो पुराने पड़ चुके, और तात्कालिक असर भी उतना नहीं जितना मिर्च का। मिर्च का असर ऊपर से नीचे तक यानी पूरे शरीर की झनझनाहट के साथ देखने-सुनने वालों को भी आनन्दित कर देता है। और फिर मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में!इससे तो बेहतर है कि इनका प्रयोग वास्तविक जीवन में ही कर लिया जाए। शायद इसीलिए चरण स्पर्श के बहाने ही सही आप की आँखों में मिर्च झोंक कर एक परिष्कृत मुहावरे को जन्म दे दिया!अब आँखों में धूल झोंकना की जगह आँखों में मिर्च झोंकना मुहावरा प्रचलन में आ सकता है। किसी को मिर्ची लगे तो लगे। हाँ,एक बात जरूर है कि उनको मनाने के लिए कहा जा सकता है कि-

“यूँ तो काफी मिर्च-मसाले हैं इस जिन्दगी में,

तुम बिन जायका फिर भी फीका सा लगता है।”

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डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

2 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही लाजवाब लेखन कार्य

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  2. बहुत बढ़िया सर.. मजा आ गया पढ़ कर ! अब किसी को मिर्ची लगे तो मै क्या करूँ।

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