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(कहानी) // टुकडा-टुकड़ा आदमी - अंकुश्री

अंकुश्री (Ankushri)


बाजार में वह कुछ देर तक इधर-उधर घूमता रहा. बाजार और उसकी हर दुकान को वह गौर से देख रहा था. वहां खरीद-फरोस कर रहे लोगों को भी वह गौर कर रहा था. उसने महसूस किया कि बाजार की जगह भर पहले वाली बची है, उसमें लगी हुई हर दुकान पूरी तरह बदल चुकी है. स्टेशन से बाजार आये हुए उसे आधा घंटा बीत गया. वह कुछ देर और इधर-उधर देखता रहा. उसकी निगाहें बाजार में गांव के परिचितों को तलाश रही थी. लेकिन उसे कोई परिचित दिखाई नहीं दिया. अंत में वह अकेले ही अपने गांव की ओर बढ़ चला.

वह अभी कुछ ही दूर चल पाया था कि रास्ते में उसे रकटू मिल गया. उसने रकटू को रोकते हुए पूछा, ‘‘रकटू काका ! क्या हाल है ?’’

‘‘अरे ! बबुआ ?’’ उसे देख कर रकटू आश्चर्य में पड़ गया. कोटरों में धंसी अपनी बूढ़ी आंखों से रकटू उसकी ओर निहारते हुए बोला, ‘‘हमार ठीक बा, आपन सुनावऽ - - -.’’ तू ढ़ेर दिन पर गांवे आवत बाड़ - - -.’’ रकटू हजाम था. गांव के लोगों की हजामत बनाया करता था. जब वह गांव में रहता था तो उसकी हजामत भी रकटू ही बनाता था.

‘‘गांव का क्या हाल है काका ?’’ बात के सिलसिले में वह भी रकटू काका की चाल में धीरे-धीरे चलने लगा था.

‘‘अरे बबुआ ! तुहों का पूछलऽ ?’’ रकटू के चेहरे पर उदासी और व्यंग्य की रेखायें छा गयीं, ‘‘अब त सभे आपन आ अपना परिवार के हाल-समाचार में अझुराइल बा. गांव के हाल-समाचार के केकरा फिकिर बा ? आ बबुआ एह खातिर केहू के फुरसतो त नइखे - - -.’’

बात करते हुए वह गांव की ओर बढ़ा जा रहा था. रकटू की चाल में चलने के कारण वह बहुत धीरे-धीरे गांव की ओर बढ़ रहा था. तब तक गांव के कुछ नये-पुराने और लोग उसके साथ हो लिये थे. साथ चलने वालों में जिस-जिसने उसे पहचान लिया था, वे दूसरों को धीरे से उसका परिचय दे देते हैं.

‘‘काका, मैं देख रह हॅू कि गांव में बिजली लग गयी है. कुछ सड़कें भी पक्की हो गयी है.’’ वह गांव में घुस गया था, ‘‘इससे तो गांव के विकास में बहुत सहायता मिली होगी ?’’ उसके इस प्रश्न पर रकटू लगभग चीखते हुए बोला,

‘‘गांव में भले शहर लेखा बिजली चौंधिया गइल बा, मोटर धउरे लागल बा, रेडियो घनघनाये आउर टी0भी टिमटिमाये लागल बा, बाकिर गांव के ई सब बिकास ऊपरे-ऊपर बा. भीतर से त पूरा गांव खीरा लेखा फाट गइल बा - - -.’’

रकटू उससे तब तक बात करते रहा, जब तक कि वह अपने दरवाजे पर नहीं पहुंच गया. घर पहुंचने तक उसने गांव के बारे में बहुत सारी बातें सुन ली. अचानक अपने गांव के बारे में आशा के विपरीत इतनी सारी बातें सुन कर उसने दांतों तले अंगुली दबा ली.

घर पहुंचते ही पास-पड़ोस के लोगों से उसने सुना कि गांव में पिछले साल एक राजपूत की हत्या हो गयी है. किसी ने कहा, ‘‘राजेश और सुरेशवा ने भाला गांथ कर सीताराम सिंह को मार दिया.’’

‘‘उन दोनों ने तो केवल भाला गांथा था. लेकिन हत्या में कुंजवा, शत्रुघना और ललबबुआ ने भी साथ दिया था.’’ यह दूसरे किसी की आवाज थी, जिसका तुरंत किसी ने खण्डन कर दिया, ‘‘नहीं, नहीं ! ऐसी बात नहीं है. कुंजवा, शत्रुघना और ललबबुआ को तो इस केस में झूठमूठ के फंसाया गया है. वे तीनों तो कांड के समय वहां थे भी नहीं. - - - दिन के करीब बारह बजे यह बारदात हुई थी. उस समय वे तीनों रामदेव सिंह के खेत में काम कर रहे थे.’’ घटना बीच गांव में घटी थी. रामदेव सिंह का खेत गांव से बहुत दूर था. इसीलिये कुछ लोग यह संभावना व्यक्त कर रहे थे कि सीताराम सिंह की हत्या करने में कुंजवा, शत्रुघना और ललबबुआ का हाथ नहीं हो सकता.

तथाकथित हत्या के संबंध में जितने मुंह - उतनी बातें उसे सुनने को मिल रही थीं. लेकिन यह बात निर्विवाद सत्य थी कि तीज व्रत के दिन, जब गांव के प्रायः घर-घर में पेडूकिया गुंथा और छना रहा था, दिन के बारह बजे के आसपास सीताराम सिंह को भाला गांथ कर मार दिया गया था. भाला गांथने का काम किसने किया था - वस्तुतः हत्यारे के अलावे यह बात किसी को पता नहीं थी. घटना दोपहर के समय घटी थी. गांव के मर्द लोग खेत-खलिहान में व्यस्त थे और औरतें पेडूकिया गूंथने-छानने में. लेकिन एक बात सभी स्वीकार कर रहे थे कि सीताराम सिंह को मारने के लिये न तो भाला की जरूरत थी और न इतने सारे लोग की.

सीताराम सिंह दुबला-पतला रोगी आदमी था. हाल ही में उसे पीलिया भी हो गयी थी. कहने को तो उसका पीलिया रोग खत्म हो गया था, लेकिन उसकी देह के रंग में पीलापन तब भी बरकरार था. लोगों का कहना था कि उसे प्रायः कोई न कोई रोग लगा ही रहता था. लेकिन असल बात यह थी कि वह आर्थिक रोगी था और उसी रोग से निपटने के प्रयास में पिछड़ कर शारीरिक रूप से रोगी बन गया था. गरीबी और रोगी जीवन जीने के कारण ही उसने शादी नहीं की थी. दरअसल उसकी शादी के लिये कोई अगुआ ही नहीं आया था; जिससे उसे कुंआरा रह जाना पड़ा था. वह नहीं समझ पा रहा था कि सीताराम जैसे आदमी को मारने के लिये इतने लोगों की जरूरत क्यों पड़ गयी.

किसी ने उसे बताया कि जब वह घटना घटी उस समय कुंजवा, शत्रुघना और ललबबुआ - तीनों रामदेव बाबू के खेत में काम कर रहे थे. जंगल की आग की तरह फैली हत्या की खबर सुन कर खेत में काम छोड़ कर वे तीनों जिज्ञासावश घटना स्थल पर पहुंच गये थे. यह सब रामा साव के दरवाजे पर हुआ था. तीनों के पहुंचने के बाद गांव के बाकी मर्द लोग वहां पहुंचे थे. उन तीनों के हाथ में ऊंचे-ऊंचे आदमकद लाठियों को देख कर गांव के राजपूतों द्वारा उनके नाम भी घटना के साथ जोड़ दिये गये थे. मृतक सीताराम सिंह राजपूत था. घटना स्थल पर पहुंचने वाला पहला राजपूत महेन्द्र सिंह था. कहा जाता है कि महेन्द्र सिंह का उन तीनों से पुराना खार था. इसीलिये उसने उन तीनों के नाम उस घटना के साथ जोड़ दिया था.

सीताराम सिंह की दिन-दहाड़े हुई हत्या की खबर जिस रफ्तार से गांव में फैली थी, उसी रफ्तार से बात गांव के बाहर भी पहुंच गयी थी. एक-दो दिनों में ही दूर-दराज के लोग अपनी जाति की हत्या पर गांव में क्रोध उगलने आ गये थे. ऐसा लग रहा था कि मरने वाला सीताराम सिंह आदमी नहीं, राजपूत था. इसलिये उसकी हत्या को राजपूतों ने अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था.

कुंजवा, शत्रुघना और ललबबुआ - वे तीनों नोनिआ जाति के थे. एक ही खानदान के वे तीनों नवयुवक अपनी आर्थिक दुर्बलता के कारण पढ़ नहीं पाये थे. गांव में दूसरों के खेत-खलिहान और घरों में खट कर वे अपना पेट पाल रहे थे. माता-पिता खुश थे कि उनका बेटा कमासुत हो गया है. हत्या के साथ अपना नाम घसीटे जाने के कारण तीनों कमासुत गांव छोड़ कर भाग गये थे.

सुरेशवा को मुख्य अभियुक्त माना जा रहा था. वह जाति का बढ़ई था. खानदानी पेशा में अपने बूढ़े बाप की सहायता करते हुए उसने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी. कहीं नौकरी का जुगाड़ लग जाये, परिवार वाले इसी आशा में थे कि यह घटना घट गयी थी.

घटना बहुत ही साधारण तरीके से घटी थी. सुरेशवा के दरवाजे के निकट पास-पड़ोस के लोग कूड़ा फेंका करते थे. जब वह कुछ बड़ा हुआ तो उसे अपने दरवाजे के पास लोगों का कूड़ा फेंकना खराब लगने लगा. बस, यहीं पर उससे गलती हो गयी थी. एक-दो बार उसने पड़ोसियों को मना भी किया था. लेकिन उसके पड़ोसी वहां कूड़ा फेंकते रहे थे. वह जब इस बात का विरोध करना चाहता तब उसका बूढ़ा बाप उसे बोलने से दाब देता था. बाप का कहना था, ‘‘बड़े आदमियों से विरोध नहीं करना चाहिये.’’ उसके पड़ोसी मुख्यतः राजपूत थे, जो गांव के बड़े आदमी समझे जाते थे. लेकिन सुरेशवा ने एक गलती और कर दी थी. उसकी समझ में यह बात नहीं आ पायी थी कि बड़ा आदमी क्या होता है. वह कहता था कि आदमी बस आदमी है, क्या बड़ा और क्या छोटा ?

उस दिन सुरेशवा जब दरवाजे से निकल रहा था तभी पड़ोस के राजपूत की पत्नी अपने घर से निकली और सुरेशवा के दरवाजे के पास कूड़ा फेंक गयी. चल रही तेज हवा के कारण सुरेशवा का पूरा शरीर कूड़े से भर गया. वह सोचने लगा कि क्या लोगों के कूड़ा फेंकने के डर से व अपने दरवाजे पर उठना-बैठना छोड़ दे ? नहीं, अब वह ऐसा नहीं होने देगा. अपनी स्थिति के बारे में सोचते-सोचते वह गुस्से से आग-बबूला हो गया. उसने गुस्से में जोर-जोर से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘यहां किसी को कूड़ा नहीं फेंकने दिया जायेगा. - - - देखते हैं, अब कौन यहां कूड़ा फेंकता है ! ’’

‘‘कूड़ा यहीं फेंकाता रहा है और यहीं फेंकाता रहेगा - - -.’’ यह सीताराम सिंह की आवाज थी. सुरेशवा की आवाज सुन कर उधर से गुजरते समय वह रूक गया था, ‘‘किसकी हिम्मत है जो यहां कूड़ा फेंकने से किसी को रोक ले - - -.’’ दोनों में बहस छिड़ गयी. बहस शुरू हुई थी कूड़ा फेंकने को लेकर, लेकिन वह जाति की ऊंचता और निम्नता पर आकर टिक गयी थी. सीताराम सिंह ने कहा था, ‘‘तेरे बाप-दादे हमारे यहां नौकरी करते थे और तू हम पर सिर उठाता है ! - - - साले, बढ़ई की औलाद ! तेरी यह मजाल कि तू - - -.’’ और बस, बात थम नहीं पायी. उफनती उम्र, हीन दिखाने से मन आहत हो गया था. छप्पर में खोंसा हुआ भाला खींच कर सुरेशवा सीताराम सिंह पर झपट पड़ा था.

इस घटना के बाद सुरेशवा गांव में कभी नहीं आया. कुछ दिनों के बाद लोगों ने यह जरूर सुना था कि सुरेशवा ने कोर्ट में आत्म-समर्पण कर दिया है. लेकिन सुरेशवा को गांव के किसी ने देखा नहीं. मुकदमा चला और उसे फांसी की सजा हो गयी. जिस दिन सुरेशवा को फांसी हुई थी उस दिन गांव के राजपूतों ने सत्यानारायण स्वामी की कथा सुनी थी और प्रसाद स्वरूप मिठाइयां बांटी थीं.

सुरेशवा के सहयोगी के रूप में राजेश का भी नाम था. राजेश गांव के लालाजी का बेटा था. वह सुरेशवा के बचपन का साथी था. दोनों साथ-साथ उठा-बैठा करते थे. गांव के जमींदार साहेब का पोता होने के बावजूद उसमें ऊंच-नीच की भावना नहीं थी. गांव के सभी तरह के लोगों से उसकी संगत थी. उठने-बैठने में वह कोई जातिगत बंधन नहीं मानता था. इससे गांव के अन्य कायस्थ उसे अच्छी निगाह से नहीं देखते थे. वह ज्यादातर सुरेशवा के साथ ही रहता था. इसी कारण उस पर सीताराम सिंह की हत्या में सहयोग का अभियोग लगाया गया था. मुकदमा में उसका नाम भी था. लेकिन बाद में वह बरी हो गया था.

उसे राजेश के दादा की याद आ गयी. राजेश के घर के ठीक सामने उसका घर था. जमींदार होते हए भी राजेश के दादा के व्यवहार में कितनी नरमी थी ? वह उन्हें काका कहता था - जमींदार काका. जमींदार काका के दालान में गांव के लोग एकजुट होकर किसी बात पर विचार-विमर्श किया करते थे. सभी तरह की पंचायतें भी वहीं हुआ करती थीं. किसी का व्यक्तिगत मसला हो या पारिवारिक, किसी को पड़ोसी से झगड़ा हो गया हो या दूसरे किसी से, लोग अपने परिवार वालों से लड़े हों या संबंधियों से - - - सभी तरह के झगड़े जमींदार काका के गैर-पंचायती पंचायत में सुलझ जाते थे.

जमींदार काका के दालान में बैठ कर गांव वाले चीलम फूंका करते थे. गरमी के दिनों में भांग भी छनती थी. लेकिन उसे पता चला कि अब काका के दालान में कोई नहीं जाता है. गांव के सुरेन्द्र सिंह और पुरुषोत्तम दुबे के पोते, जो इन दिनों कॉलेज में पढ़ने लगे हैं, अपने-अपने दादा को जमींदार काका के पास बैठने से मना करते हैं.

गांव में राजपूतों की संख्या सबसे अधिक थी. ब्राह्मणों और कायस्थों की संख्या भी कम नहीं थी. इसके अलावा नोनिया, मुसहर, बढ़ई, तेली, कोइड़ी, सोनार, लोहार, कुम्हार, धोबी, चमार, दूसाध, पासी, डोम, मुसलमान आदि जातियों के लोग भी गांव में रहते थे. गांव के सभी लोग एक-दूसरे से सहकारी भावना से जुड़े हुए थे. गांव में वे जातियां भी हैं, वे लोग भी हैं. लेकिन उनके बीच सहकारिता की जो भावना थी, वह खत्म हो गयी है. वह सोचने लगा कि आखिर गांव वालों की सहकारिता की भावना कहां चली गयी और क्यों चली गयी ?

उसे याद है, गांव में लड़ाइयां तब भी हुआ करती थीं, जातियां तब भी थीं. मगर उनका संदर्भ दूसरा था. उसे एक घटना अब भी याद है. उन दिनों वह गांव में रहा करता था. भोलवा की लड़की गांव के उस पार रामनरेश सिंह के खेत में काम कर रही थी. शाम को अकेली लौट रही थी. रास्ते में पड़ोसी गांव का कोई युवक उसे छेड़ना चाहा, मगर छेड़ नहीं पाया. जब गांव वालों को यह बात मालूम हुई तो वे दूसरे दिन ही लाठियां लेकर पड़ोसी गांव से आमने-सामने हो गये थे. भाला-गंड़ासा भी निकल गया था. जब पड़ोसी गांव के मुखिया ने उसके गांव के मुखिया का पैर पकड़ कर माफी मांगी तब जाकर कहीं बात टल पायी थी.

तब का उसका गांव अब इतना बदल गया होगा - अमरीका में रहते हुए वह इस बात को सपने में भी नहीं सोच सकता था. वह अपने गांव और वहां के लोगों से मिलने की ललक लिये हुए वहां आया था. उसने उच्च विद्यालय की पढ़ाई गांव में ही पूरी की थी. उसके बाद गांव छोड़ दिया था. आज वह अमरीका में स्पेस साइंटिस्ट है. अपनी व्यस्ततापूर्ण जिंदगी में वह बहुत मुश्किल से अपने गांव की यात्रा का कार्यक्रम बना पाया था.

उसने सोचा था कि गांव पहुंचने पर अमरीका-प्रवास का अनुभव सुनने के लिये लोग उसे घेर लेंगे. वह सबों को अमरीका-प्रवास का अपना अनुभव सुनायेगा. वहां के रहन-सहन, उद्योग-धंधों, विज्ञान, शिक्षा आदि के बारे में लोगों को सुनाने के लिये सोचा था. उसने यह भी सोचा था कि वह अमरीका के शहरों और गांवों के बारे में भी लोगों को बतायेगा.

शाम होते-होते पूरे गांव में यह बात फैल गयी कि अमरीका से दुबेजी आये हुए है. उनके स्वागत में गांव की ओर से एक बैठकी का आयोजन किया गया.

बैठकी का आयोजन गांव के बाजार पर किया गया था. ईमली के घने-विशाल पेड़ों के नीचे पहले गांव का साप्ताहिक बाजार लगता था, जो वर्षों से बंद हो गया है. अब बाजार वाली उस सामूहिक जमीन पर गांव के किसी का व्यक्तिगत अधिकार हो गया है. पहले तो कुछ दिनों तक उस जमीन से हट कर कच्ची सड़क के किनारे बाजार लगता रहा. लेकिन सड़क किनारे लगने वाला हाट अधिक दिनों तक जम नहीं पाया. इस तरह गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार की प्रथा धीरे-धीरे खत्म हो गयी. मगर उस स्थान को अब भी ‘बाजार पर’ कहा जाता है.

देखते-देखते बाजार पर लाउडस्पीकर घनघनाने लगा. छोटी-बड़ी बत्तियों से बाजार और उसके आस-पास का क्षेत्र चकाचौंध हो गया. जब उसने गांव छोड़ा था, उस समय उसके गांव में बिजली तो नहीं ही पहुंची थी, कभी लाउडस्पीकर भी नहीं बजा था. उसका गांव अंधेरा था. लेकिन आज उसके गांव में प्रायः सभी घरों में बिजली-बत्ती चमक रही है. पहले कूंड़ और रेहट से होने वाली सिंचाई पर ही गांव की कृषि आश्रित थी. किंतु आज सिंचाई और कृषि के तरह-तरह के साधन गांव में दिखाई दे रहे हैं.

उसे याद है कि जिन दिनों उसने गांव छोड़ा था, उन दिनों पूरे गांव में एक नरेश लाल थे, जो बी0ए0 तक पढ़े थे. उनकी पढ़ाई की दूर-दूर तक चर्चा थी. लेकिन आज गांव की हालत भिन्न हो गयी है. बोलने का सउर भले न हो, मगर गांव में सैकड़ों लोगों के पास बी0ए0 की डिग्री है. गांव में एक तरफ शैक्षणिक डिग्रियां बढ़ी हैं तो दूसरी ओर व्यावहारिक अज्ञानता में उससे भी ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है. लोगों ने इतिहास को याद करने के चक्कर में वर्तमान को भुला दिया है.

लोगों का रहन-सहन देख कर वह गांव की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचने लगता है. गांव में गरीबी पहले भी थी, आज भी है. तब और अब की गरीबी को वह गौर करने लगता है. पहले गांव में धनीमानी व्यक्ति के पास सूती और खादी के अलावा सिल्क के कुछ कपड़े हुआ करते थे. सिल्क के उनके कपड़े किसी खास मौके पर ही बक्सा से बाहर निकला करते थे. लेकिन आज गांव के गरीब कहलाने वालों की देह पर भी जो कपड़े हैं, वे पहले की अपेक्षा अधिक साफ दिखाई दे रहे हैं. सिंथेटिक कपड़ों ने गांव के सूती, खादी या सिल्क के कपड़ों को अस्तित्वहीन करके बिलकुल खदेड़-सा दिया है. धोती, खलीता और गमछी वालों की संख्या सीमित हो गयी है. यहां तक कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है. पहले गांव के कुछ खास लोगों के यहां से ही नहाने के साबुन, स्नो-पाउडर, शैम्पू और सेंट की सुगंध आया करती थी और वह भी खास-खास मौकों पर ही. लेकिन अब तो साबुन, स्नो-पाउडर, शैम्पू और सेंट की खुशबू जैसे पूरे गांव की देह से आ रही है. गांव के युवाओं का यह विशेष शौक हो गया है. इन सामग्रियों का आवश्यकता के लिये नहीं, शौक के लिये उपयोग किया जाता है.

उसे आभास होता है कि गांव के लोगों का जीवन व्यस्त हो गया है. इस व्यस्तता ने रिश्तों को तोड़ने में अपनी अहम भूमिका निभायी है. उसे दादी बताती हैं कि पैदल या बैलगाड़ी के भरोसे पहले जो रिश्ते नज़दीक लगा करते थे, वही बस, कार, मोटरसाइकिल और मोपेड के युग में आज दूर होते जा रहे हैं.

उसे बताया जाता है कि अमरीका-प्रवास की उसकी बातें सुनने के लिये पास-पड़ोस के गांवो से भी कुछ लोग आये हुए हैं. वह देखता है कि बैठकी में बहुत थोड़े-से लोग आये हुए हैं. आज उसने गांव में जिन-जिन चेहरों को देखा था, उन परिचित चेहरों में से भी एक-दो चेहरे ही बैठकी में दिखायी दे रहे थे. ‘‘सभी लोगों को नहीं कहा गया है क्या ?’’ वह पासैठे बड़े भाई और चाया से यूं ही पूछ लेता है. उसके बड़े भई ने बताया, ‘‘मालूम तो सभी लोगों को है. मगर चूंकि हम ब्राह्मण हैं, इसलिये इस बैठकी में केवल ब्राह्मण ही आये हुए हैं.’’

अमरीका-प्रवास के अनुभव का ब्राह्मण से क्या संबंध हो सकता है - इस बात को वह नहीं समझ सका. किसी बात की जानकारी प्राप्त करने में ऐसा जातिगत बंधन ? स्थिति के बारे में सोचते हुए वह मानसिक उलझन में पड़ गया. लेकिन बात उसकी समझ में नहीं आ पायी.

कुछ लोगों की प्रतीक्षामें बैठकी शुरू होने में अभी देर थी. बातचीत के दौरान उसे पता चला कि कुछ दिन पहले गांव में एक संत आये हुए थे. संत यद्यपि बहुत पहुंचे हुए थे, लेकिन किसी ने गांव वालों से कह दिया था कि संत अमुक गांव के राजपूत थे, जो बचपन में ही घर-परिवार छोड़ चुके थे. संत की जाति का पता चलते गांव के अन्य सभी जाति वालों ने उनके पास जाना छोड़ दिया था. वह संत गांव में जितने दिनों तक रहे, उनके सत्संग में गांव के केवल राजपूत ही पहुंचते थे. दूसरी जाति वाले उनकी ओर फिर कभी ताकने भी नहीं गये.

इन्हीं बातों में उलझा हुआ वह बैठकी में बैठा था. लोग बैठकी की तैयारी में लगे हुए थे. बैठकी शुरू होने में अभी देर थी. वह जमींदार काका से बात करने लगा. जमींदार काका उसे बता रहे थे, ‘‘आठ दिन पहले ही गांव में कुशवाहा सभा हुई थी, जिसमें गाव के केवल कोईड़ी-महतो ने भाग लिया था. गांव में आये दिन रैदास सभा, विश्वकर्मा संगत और शौण्डिक सभा जैसे आयोजन होते रहते हैं. और बबुआ, एक बात बताऊं ! यह जान कर तुम्हें आश्चर्य होगा कि गांव में इस तरह की जितनी सभाएं होती हैं, वे सभी जागरूकता के नाम पर होती हैं.’’ जमींदार काका उसे गांव के बारे में अधिकाधिक जानकारी दे देना चाहते थे.

गांव में पिछले दिन हुई हत्या के बारे में जमींदार काका उसे बताते हैं, ‘‘पीलिअहवा सीतरमवा तो भाला की नोक सटने से ही मर गया. लेकिन उस घटना ने गांव को टुकड़ा-टुकड़ा कर दिया. गांव तो उस घटना से पहले ही टुकड़ों में बंट चुका था. लेकिन खीरा की तरह यह ऊपर से मिला हुआ दिखायी देता था. गांव के जो भी टुकड़े थे, वे अंदर ही अंदर थे. ऊपर से सब कुछ ठीक-ठीक लगता था. लेकिन अब तो हर बात प्रत्यक्ष हो गयी है.’’ बोलते-बोलते जमींदार काका का गला रूंध जाता है. वे गला साफ कर भरी हुई आवाज में बोलते हैं, ‘‘बबुआ, कोर्ट द्वारा भले एक सुरेशवा को फांसी दी गयी, लेकिन सांच बात यह है कि इस घटना ने पूरे गांव को फांसी पर लटका दिया है. लेकिन अफसोस तो इस बात का होता है कि गांव के गले में फांसी का फंदा अभी कसा ही था कि रस्सा टूट गया. गांव को फांसी तो नहीं हो सकी, लेकिन फंदा गला में कसा रह गया. अब देखना यह है कि गांव के गले में लगा फांसी का फंदा पूरा कसता है या उसे ढ़ीला कर गांव को मुक्त किया जाता है.’’ आगे कहते-कहते जमींदार काका का गला फिर भर आता है. वे बहुत मुश्किल से कह पाते हैं, ‘‘लगता है, गांव को न फांसी होगी, न उसे फांसी के फंदा से मुक्ति ही मिलेगी. गांव के गले में फांसी का फंदा यों ही लगा रहेगा.’’

उसे लगा कि गांव के गले में सचमुच फांसी का फंदा लगा हुआ है. गांव की जातियां ही फंदे का रस्सा है. जब से गांव है, तभी से गांव की जातियां भी हैं. लेकिन जाति का नाम पहले शादी-विवाह और पर्व-त्योहारों पर ही लिया जाता था. दैनिक जीवन में जाति का कोई भेद-भाव नहीं था. लड़ाई-झगड़े में तो जाति का संदर्भ ही नहीं आता था. बाहर से वह जिसे गांव समझ रहा था, वह अब गांव नहीं रह कर अंदर ही अंदर टुकड़ों में बंट गया है. वह सोचने लगा कि गांव का वर्तमान विकास जिस विज्ञान की देन है, वह विज्ञान खुद आदमी की देन है. आदमी विज्ञान के विकास में रोज कुछ न कुछ जोड़ते जा रहा है. लेकिन आदमी खुद जुड़ते जाने के बजाये टुकड़ों में बंटता जा रहा है.

उसके गांव में लोग टुकड़ों में बंट कर न केवल एक-दूसरे से अलग हो गये हैं, बल्कि वे एक-दूसरे की अवहेलना भी करने लगे हैं और एक-दूसरे के जानी दुश्मन तक हो गये हैं या होते जा रहे हैं. गांव के बच्चे-बच्चे को यह पता चल गया है कि वह किस जाति का है और गांव में उसकी जाति के कौन-कौन से लोग हैं.

बैठकी में जिन-जिन लोगों को आना था, जब वे पहुंच गये तो माईक पर गांव के नवयुवक कृष्णा तिवारी ने अनाउंस किया, ‘‘आज हमें इस बात की बहुत खुशी है कि हमारे बीच अमरीका से आये हुए हमारे ही गांव के श्री एस0 के0 दुबे मौजूद हैं. आप लोगों में से बहुतों को इनके बारे में जानकारी है. लेकिन कुछ लोग शायद इनके बारे में प्रत्यक्ष रूप से नहीं जानते हैं. मैं संक्षेप में इनका परिचय देते हुए इनसे अनुरोध करूंगा कि ये अमरीका-प्रवास के अपने कीमती अनुभव से हम सबों को अवगत करावें.’’

उपस्थित श्रोताओं में दुबेजी के अमरीका-प्रवास का अनुभव सुनने की उत्कंठा बनी हुई थी.अनाउंसर कृष्णा तिवारी ने दुबेजी का परिचय देते हुए कहा, ‘‘श्री एस0 के0 दुबे हमारी ब्राह्मण जाति के सदस्य हैं एवं हमारी जाति के लिये नाज़ हैं. इनसे हम तमाम ब्राह्मण जाति - - -.’’

अपना परिचय सुन कर उसे लगा कि उसके कान फट जायेंगे. वह आगे कुछ नहीं सुन सका. जमींदार काका को साथ लेकर वह धीरे से बैठकी से बाहर चला गया.

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अंकुश्री

8, प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,

नामकुम, रांची(झारखण्ड)-834 010


E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

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