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सफल_कौन_है__(हास्य_व्यंग्य) // आदित्य मंथन

ऐसे  आदमी रोज देर से उठे, पर सन्डे को और देर से उठता है, क्योंकि उस दिन  निठल्लापन का "राफेल" उसके पास होता है। पर पिछले सन्डे हम  थोड़ा जल्दी उठे और सबसे पहिले मोबाइल खोले। प्राण मुंह में आ गया। कारण हमारे एकमात्र पिता जी का 7 छूटी काल। मेरी छुट्टी तो हो गई। फिर चूंकि हम व्हाइट सच बोलना सीखे हैं, अपने प्रधान सेवक से सो जवाब सोच लिए। खैर दिन आगे बढ़ा।  दूसरा काम हम टीवी खोलने का किए । अच्छा वहां भी हर चैनल पर एक एंकर मुर्गा लड़ा रही थी। कहीं मंदिर कब बनेगा तो कहीं देशभक्त कौन है तो कहीं कोई गुरु /पण्डित/ज्ञानी भविष्य और राशिफल  बता रहा था। सोचे यही देख लेते हैं । ये कहीं कुछ सच बताए। काहे की पेपर के भविष्य वाणी जो आता है उ बहुत खतरनाक होता है। अभी कुछ दिन पहिले एगो मित्र अपने फैमिली प्लानिंग का सोच रहे थे और असफल प्रयास भी कर रहे थे लेकिन साला अखबार वाला उनके राशिफल में रोज  लिख रह था कि "मित्रों के सहयोग से ही कार्य संपादित होगा"। घोर कलयुग है भइया।

फिर सन्डे को हम संत हो जाते हैं सो सोच रहे थे कि हम इस शमशान सॉरी संसार में पैदा ही काहे हुए। एक्चुअल में पैदा तो प्लानिंग से आजकल के टैडी वियर होते हैं हम तो आनंद के परिणामस्वरूप अवतार लिए थे। काहे कि उस समय आनंद के इतने साधन ही नहीं थे।इसलिए तो बचपन में हमारा घर भी भरा भरा लगता था।

खैर जो भी हो पर आज  लगता है हम फेसबुक पर लाइक कॉमेंट पोस्ट, इंस्टा , व्हाट्सएप पर स्टेटस अपडेट और यूट्यूब पर वीडियो देखने और सोशल मीडिया  पर थू थू करने के लिए  ही पैदा हुए हैं। हालांकि इतने के बाद भी आप एवरेज मेडियोकोर ही है यदि आप सुबह सुबह बीट करने से पहले ट्वीट नहीं करते और राष्ट्रवाद ,मंदिर और धर्म पर प्रवचन नहीं देते। साथ ही आप अगर डेट पर नहीं गए तो कम से कम तारीख़ पर जाने की योग्यता प्राप्त करनी होगी । ये ही सिर्फ सफल होने की शर्तें नहीं है। अपने जीवन में सफल होने के लिए आपको बडका वाला भक्त भी बनना पड़ेगा और अपने मालिक और नेता के फार्ट (fart) को भी आर्ट सिद्ध करते रहना होगा।

अभी उसी सन्डे को हम बाहर एनएच 28 पर पैदल घूम रहे थे कि मेरे पैर में गोबर लग गया। अब मेरे दिमाग में ये सवाल कौंधा कि भई ये किसका गोबर है। गर गाय का हुआ तो फिर किसी भक्त राष्ट्रवादी से देशभक्ति वाला साटिक फिटिक ले लिया जाए। अहा जहां चाह वहां राह , मिल गया एक ज्ञानी भक्त और पूछ बैठे हम कि ये किसका गोबर है। जो पैर में लग गया आज।

पहिले तो उ हमको संस्कृत बोलके डरा दिया फिर 11 गो प्रधान मंत्री को एक जोराह से गरियाया। फिर बोला देखो मियां,,,,,,,,

हम हाथ जोर के तुरंत बोले की मालिक मियां मत बोलिए हम हिन्दू हैं हालाकि जनेऊ नहीं है लेकिन खांटी हिंदू और उसमें भी क्षत्रिय ।

फिर उ ज्ञानी गोबर छूते हुए बोले कि ये को जो गोबर लगा है ......ये गाय का नहीं उंट का है। और महान राजस्थान के  ऊंटो ने ही हमें यहां खींच बुलाया है। ठीक वैसे ही जैसे वाराणसी में गंगा मैया, बिहार में वैशाली,नालंदा , चाणक्य;

महाराष्ट्र में वीर शिवाजी, मध्यप्रदेश में मां नर्मदा ने बुलाया था ।

यकीन मानिए  मैं खुद पर शर्मिंदा था कि मैंने आज एक ऐसे भक्त की परीक्षा ली जो अपने भगवान से भी आगे निकल चुका था। हालाकि उस पर दया भी आई कि बेरोजगार, फटेहाल, बीमार और भूखे होते हुए भी वह कितना समर्पित है और कॉन्फिडेंट है और पैसावला भी कि हर बात में बिना पूछले भी कहता है कि  मंदिर वहीं बनाएंगे। सचमुच इसका जीवन सफल है, और एक हम हैं कि जो गाय और उंट के गोबर का अंतर नहीं समझ पा रहे हैं। बाबू जी ठीक ही कहते हैं" महा बुरबक और पढ़ल लिखल गदहा हैं हम।"

आदित्य मंथन

पावरग्रिड (ऊर्जा मंत्रालय)

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