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प्राची अक्टूबर 2018 : समीक्षा // हिन्दी कहानी में सोशल मीडिया // अजीत प्रियदर्शी

कहानी

हिन्दी कहानी में सोशल मीडिया

अजीत प्रियदर्शी

"कम्प्यूटर की स्क्रीन पर एकाग्रचित होकर वह कुछ खोज रही है। कुछ खो गया है जैसे। यूं भी हर वक्त खोयी खोयी सी रहती है। बेचैन। शायद उसे फेसबुक पर किसी नये चेहरे की तलाश है। वह कब किसी को लुभावने निमंत्रण से फंसा ले, कोई नहीं जानता। सुबह दफ्रतर आते ही उसका यह खेल शुरू हो जाता है। मैसेज बॉक्स में दोस्तों से चैटिंग। ‘गुड मार्निंग। हैव ए नाइस डे। अरे कहां छुप गया है तू कठोर! साले कल तो रोमांटिक कमेंट्स भेज रहा था। मैडम यू आर सो ब्यूटीफुल। आई जस्ट वान्ट टू हग यू। ये फेसबुक भी अजब गजब दुनिया है। हर एफबी उसका दीवाना है। उसे बांहों में भरना चाहता है।”

(राजेन्द्र राजन की कहानी : फूलों को पता है)

"उन दिनों फेसबुक पर भाँति-भाँति के शिकारी और प्रेमी जन भी विचरते थे-उनकी उम्र की कोई सीमा नहीं थी, 16-17 वर्ष के लड़के से लेकर 70 वर्ष के बुजुर्ग तक, पेशा कोई भी, लेखक, पत्रकार, शिक्षक, ठेकेदार कोई भी। वे महिलाओं का प्रोफाइल देखते, स्टेटस पढ़ते, फेसबुक पर विचरने का उनका समय देखते और इनबॉक्स में दिल हथेली पर लिये उपस्थित होते। कम उम्र के लड़के अपनी माँ की उम्र की महिलाओं के इनबॉक्स में हाय-हैलो से शुरू होकर मरने-मिटने लगते, मोबाइल नंबर तक पहुंचते और फिर... कुछ की कहानी आगे बढ़ती वन डे या वन नाइट स्टैंड तक, तो कई बार वे झिड़कियां भी खा जाते, ब्लॉक हो जाते।”

(संजीव चंदन की कहानी : इनबॉक्स में रानी सारंगा-धाइले मरदवा के भेस हो)

आज पूरी दुनिया के लोगों को एक साथ जोड़ने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। पिछले दस वर्षों में सोशल मीडिया का भारतीय समाज पर दखल और असर क्रमशः बहुत बढ़़ा है। व्यक्ति के मन-मस्तिष्क और उसके व्यक्तिगत तथा सामाजिक व्यवहारों, दिनचर्या पर विभिन्न सोशल साइट्स का अच्छा-खासा असर पड़ा है। पिछड़े हुए गाँव से लेकर कस्बे तक, शहर से लेकर महानगर तक, उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक इसके असर से अछूते नहीं हैं। आज दुनिया भर में लगभग दो सौ सोशल नेटवर्किंग साइट्स हैं, जिनमें फेसबुक, ट्वीटर, माइ स्पेस, लिंक्ड इन, फ्रिलकर, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप, फेसबुक मैसेंजर, जैसे सोशल साइट्स अधिक लोकप्रिय हो चुके हैं। इनमें फेसबुक का दबदबा कायम है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्तमान समय में फेसबुक ने विश्व के हर तीसरे व्यक्ति पर अपनी पकड़ बना रखी है।

हिन्दीभाषी समाज पर सोशल मीडिया का असर पिछले एक दशक में काफी बढ़ा है। व्यक्ति के ऊपर सोशल मीडिया के नकारात्मक या सकारात्मक प्रभावों को हिन्दी साहित्य में, खासकर हिन्दी कहानी में, लगभग एक दशक से कमोबेश उकेरा जाने लगा है। हालाँकि मेरे अध्ययन और पहुँच की एक सीमा है, इसके बावजूद, यहाँ मैं पिछले एक दशक की ऐसी कहानियों की चर्चा करूँगा, जिनमें सोशल मीडिया से प्रभावित जीवन-अनुभवों को अभिव्यक्ति मिली है। हिन्दी की लोकप्रिय पत्रिकाओं में पिछले एक दशक में प्रकाशित और मेरे पास उपलब्ध लगभग तीन सौ अंकों पर सरसरी निगाह डालने के बाद मुझे सिर्फ बारह कहानियाँ मिलीं, जिनमें किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से प्रभावित जीवन की कथा कही गयी है। ऐसी कहानियों और उनके रचनाकारों के नाम इस प्रकार हैं : प्रेमचन्द सहजवाला की कहानी ‘अफसोस हम फेसबुक पर नहीं बता पायेंगे’ (हंस, जून 2012), नवीन जोशी की कहानी ‘फेसबुक और बनना पड़ोसी के मकान का’ (तद्भव, अक्टूबर 2012), अक्बर कक्कट्टिल की मलयालम कहानी (हिन्दी अनुवाद : सुमित पी.वी.) ‘फेसबुक’ (वागर्थ, मई 2013), आकांक्षा पारे काशिव की कहानी ‘शिफ्ट, कंट्रोल, आल्ट $ डिलीट’ (हंस, जनवरी 2014), पूजा अनिल की कहानी ‘भीतरी तहों में’ (पाखी, मार्च 2015), राजेन्द्र राजन की कहानी ‘फूलों को पता है’ (वर्तमान साहित्य, मई 2015), सूरज प्रकाश की कहानियाँ ‘लहरों की बाँसुरी’ (लमही, अप्रैल-जून 2015) और ‘ललिता मैडम’ (मंतव्य, जून 2016), संजीव चंदन की कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा : घइले मरदवा के भेस हो’ (हंस, दिसम्बर 2015), प्रज्ञा पाण्डेय की कहानी ‘तस्दीक (आउटलुक, नवम्बर 2016), कबीर संजय की कहानी ‘फेंगशुई’ (पल-प्रतिपल, जनवरी-सितम्बर 2017), योगिता यादव की कहानी ‘गलत पते की चिट्ठियाँ’ (पाखी, अक्टूबर 2017)। इन दर्जन भर कहानियों में, मैं उन पाँच कहानियों की चर्चा करूँगा, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया।

आज व्यक्ति अपने परिवार को वक्त नहीं दे पाता, मगर वह सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार जाने-अनजाने लोगों के सम्पर्क में बना रहता है। आज के मनुष्य का दिल-दिमाग, उसकी संवेदना, सामाजिक व्यवहार में सोशल मीडिया की संगति में काफी बदलाव दिखाई दे रहे हैं। ‘फेसबुक और बनना पड़ोसी के मकान का’ नवीन जोशी की बेहतरीन कहानी है, जिसमें कथाकार ने फेसबुक जैसे सोशल माध्यम में लगातार अनजान लोगों के बीच पापुलर रहने वाले शख्स के सामाजिक जीवन के बारे में भयावह संकेत करता है कि वह कितना असामाजिक, आत्मकेन्द्रित और असंवेदनशील होता जा रहा है। फेसबुक के मेम्बर क्या बने, पुनीत को इसकी लत लग गयी। पड़ोस के निर्माणाधीन मकान पर आए ट्रक से टेलीफोन के तार के टूटने और इंटरनेट कनेक्शन गायब होने से वह बेचैन हो जाता है। जब उसने घर बनवाया तो सारा बिल्डिंग मैटेरियल पड़ोस में खाली पड़े मकान में ही रखवाया। मगर आज वह पड़ोसी से कोई मतलब नहीं रखना चाहते और फेसबुक के आभासी दुनिया में खोया रहना चाहता है। आत्मकेन्द्रित होते जा रहे शहरी मध्यवर्ग के लोगों को फेसबुक जैसे सोशल साइट्स और भी असामाजिक और आत्मसुखी बना रहे हैं, इस सच्चाई की मार्मिक पड़ताल यहाँ विश्वसनीय ढंग से की गयी है। कहानी में उसके माँ-पिता अब भी संवेदनशील और मिलनसार दिखाई देते हैं, मगर पुनीत अत्यन्त असंवेदनशीलता का परिचय देता है। रविवार के दिन, उसके पड़ोसी रामविलास जी की छत पड़नी है, जिसकी खबर पुनीत के माँ-पिता और पत्नी को है, लेकिन पुनीत को न तो इसकी खबर है, न परवाह। नौ बजे सुबह उठकर, पुनीत फेसबुक पर भारत-आस्ट्रेलिया के बीच होने वाले क्रिकेट मैच में भारत की जीत और अपने हीरो सहवाग के सैकड़े की कामना दर्ज करता है। फिर वह लगातार टीवी पर मैच देखने में मशगूल रहा। मैच में भारत की जीत के तुरन्त बाद, रात नौ बजे, वह फेसबुक पर सहवाग के नायाब खेल के कसीदे काढ़ने में डूबा रहा। उधर पुनीत की माँ और पिता सुबह ही पड़ोसी रामविलास जी को छत पड़ने की बधाई दे आये। दोपहर में रामविलास जी लड्डू का डिब्बा लेकर उसके घर आये लेकिन टीवी पर मैच देखने में मशगूल पुनीत को इसकी खबर तक नहीं लगी। बातचीत के क्रम में पुनीत की माँ से रामविलास जी ने कहा : ‘हाँ, बहन जी, गाँव देहात में तो अब भी आपसदारी है। शहरों में ही आदमी, आदमी से दूर हो गया...’

आज भारत के साफ्टवेयर कम्पनियों के आफिस में काम करने वाले ज्यादातर टेक्निकल एक्सपर्ट्स सोशल नहीं होते। कम्प्यूटर पर बारह-चौदह घंटे बिताने वाले ऐसे लोगों में समाज से अलगाव और अकेलापन के कारण सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक, की लत हो जाती है। सोशल मीडिया की लत से व्यक्ति और भी अधिक असामाजिक, अन्तर्मुखी, अकेला, अवसादग्रस्त और चिड़चिड़ा हो जाता है। आकांक्षा पारे काशिव की चर्चित कहानी ‘शिफ्ट, कंट्रोल, आल्ट $ डिलीट’ में भयावह और प्रामाणिक इशारा है कि तकनीकी उत्पादों के अविवेकी उपभोक्ता उनकी लत के ऐसे शिकार हो जाते हैं कि उनकी संवेदनहीनता और क्रूरता पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है। मनुष्य को असहज और असंतुलित करने वाली परिस्थितियों को अत्यन्त सहजता से उद्घाटित करते हुए भी यह कहानी पाठक से आज के ‘जटिल यथार्थ-बोध’ की माँग करती है। यहाँ सोशल साइट्स और कम्प्यूटर गेम में उलझे, शहरी, मशीनीकृत कॉरपोरेट संस्कृति के जटिल जीवन यथार्थ का भयावह संकेत है। सोशल मीडिया और कम्प्यूटर गेम के एडिक्शन से उत्तेजना, हिंसक प्रवृत्ति, असंवेदनशीलता की हद, यानी हैवानियत की हद, की तरफ अग्रसर व्यक्ति की परिस्थितियों की विश्वसनीय पड़ताल यहाँ मौजूद है। कम्प्यूटर को आदेश देने वाला व्यक्ति खुद को सबका बॉस समझने लगता है और किसी की रोक-टोक बर्दाश्त नहीं कर पाता। कम्प्यूटर गेम खेलने में डिस्टर्ब करने वाली पत्नी को कथानायक सुदीप मलिक मार डालता है। यह कहानी हत्या के बाद, हत्यारे पति के क्रूर ठण्डेपन को तो उद्घाटित करती है, मगर उस हत्या की ‘भयावह त्रासदी’ से वह अछूता रह जाता है, यह कहानीकार की असफलता है।

निजी जिन्दगी में दुखी और निराश लोग सोशल मीडिया के चकाचौंध भरे आभासी संसार को ही सच मानने लगते हैं। प्रायः प्रेम सम्बन्ध टूटने से दुखी या शादीशुदा जिन्दगी में तनावग्रस्त लोग सोशल मीडिया की चैटिंग द्वारा नये रिश्ते तलाशने लगते हैं और प्रायः छले जाते हैं। नये रिश्ते की तलाश अधिकांश लोगों के लिए नये शिकार तलाशना हो जाता है। राजेन्द्र राजन की कहानी ‘फूलों को पता है’ में शादीशुदा ज़िन्दगी में टूटी हुई, मगर बाद में स्वच्छन्द और खुद की इच्छा से जीने वाली, बिंदास नयनतारा फेसबुक पर चैटिंग कर सुन्दर युवाओं को फँसाती है और उनका शोषण करती है। वह एक लोकप्रिय अखबार में ओएसडी और प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी है। सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहने वाली नयनतारा फेसबुक कमेंट और चैट में सारी हदें पार कर देती है। चेयरमैन खुराना साहब की चहेती है, अखबार के सीनियर आफिसर देव के साथ कई साल लिव इन में रह चुकी है, मगर शादी की संस्था से उसे नफरत है। उसके लिए सम्बन्ध कभी सीढ़ी तो कभी टाइम पास होते हैं। वह बोरियत और अकेलेपन से उबरने के लिए फ्लर्ट और रोमानियत को हथियार मानती है। अखबार में नये नियुक्त दो ‘यंग एण्ड ब्यूटीफुल’ बंदों को वह घर बुलाती है तथा उन्हें शराब पीने और सम्बन्ध बनाने के लिए मजबूर करती है। उनकी शिकायत पर वह नौकरी से निकाल दी जाती है। अपने चाहने वालों की निगाह में भी वह गिर जाती है और उसके साथ ‘लिव इन’ में रह चुके देव के शब्दों में ‘इट्स ए मर्डर ऑफ फेथ एण्ड ट्रस्ट’। नैतिकताविहीन स्वच्छन्दता, वर्जनाहीन भोग-विलास और ऐयाशी के रास्ते पर चलने वाली स्त्री को समाज और उसके चाहने वाले भी दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं, यह सच्चाई इस दुखांत कहानी का मर्म है।

आजकल फेसबुक के अन्तःपुर में, यानी इनबॉक्स में, भाँति-भाँति के शिकारी और प्रेमी जन दिल हथेली पर लिये उपस्थित रहते हैं। संजीव चंदन की चर्चित कहानी ‘इनबॉक्स में रानी सारंगा : धाइले मरदवा के भेस हो’ में प्रेम विवाह कर चुकी रूमी के विवाहेतर प्रेम को दर्शाया गया है। अपने प्रेमी शीतांशु से विवाह कर चुकी रूमी का विवाहेतर प्रेम, फेसबुक के इनबॉक्स में पहले मोहित से, फिर फर्नांडिस से परवान चढ़ता है। कहानी के अन्त में वह आशु की तरफ आकर्षित दिखाई देती है। विवाहित राजपूत रानी सारंगा द्वारा सदाबृज से विवाहेतर, प्रेम की लोककथा की तर्ज पर यहाँ विवाहित रूमी (आज की रानी सांरगा) द्वारा उम्र के चौथे दशक में क्रमशः मोहित और फर्नांडिस से विवाहेतर प्रेम की कहानी दिलचस्प किस्सागोई के रूप में कही गई है। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया द्वारा ‘इनबॉक्स चैट’ के माध्यम से परवान चढ़ी इस प्रेम-कहानी में ‘भारतीय समाज का भूमंडलीकृत समय’ दर्ज हुआ है। कहानी में रूमी बंधनहीन प्रेम की माँग करती है। यह कहानी प्रेम में स्वाधीनता और यौन स्वतंत्रता के सवाल के साथ स्त्री-मुक्ति का सवाल उठाती है। यहाँ कोई भी पात्र विक्टिम या खलनायक नहीं है। कहानी के सभी स्त्री-पुरुष पात्र खुले मन से अपनी बात कहते-सुनते और एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। ‘सच का सामना’ जैसे लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम से कहानीकार प्रभावित दिखता है। स्त्री विमर्श के नये ‘भूमंडलीकृत समय में’ कुंठाहरित, स्वाधीन प्रेम और सहजीवन (लिव इन) की लोकतांत्रिक कल्पना की है। कथाकार संजीव चंदन ने कल और आज के समय के द्वन्द्व, नयी तकनीक (सोशल मीडिया) और बद्धमूल मानसिकता का तनाव व्यक्त करने के लिए पारम्परिक किस्सागोई के शिल्प में पर्याप्त तोड़फोड़ की है। लेखक ने भारतीय समाज में स्त्री के विवाह के उपरान्त पति से प्रेम में ‘एकनिष्ठता’ की माँग और नैसर्गिक प्रेम में ‘स्वाधीनता’ के सवाल को स्त्री-मुक्ति के व्यापक सवाल से जोड़ दिया है।

फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया में तमाम स्त्रियाँ ऐसी हैं, जो निजी ज़िंदगी में दुखी और तनावग्रस्त होकर आभासी दुनिया में कंधा तलाशती हैं। कई बार वे किसी शातिर शिकारी के बिछाये जाल में फँस जाती हैं। सूरज प्रकाश हिन्दी के ऐसे अकेले वरिष्ठ कथाकार हैं, जिन्होंने फेसबुक जगत की
आधा-दर्जन कहानियाँ लिखी हैं। उनकी सभी छह कहानियाँ (खेल खेल में, कमजोर लड़की की कहानी, लहरों की बाँसुरी, ललिता मैम, मछली, ये जो देश है मेरा) अपने अन्तर्वस्तु, शिल्प और अनुभव में नयेपन की बानगी हैं। ‘ललिता मैडम’ कहानी की नायिका ललिता मैडम वस्तुतः एक ऐयाश, ताकतवर बिजनेस विमेन हैं। जूही, जो लम्बे समय से लंदन में रह रही प्रोफेशनल अप्रवासी भारतीय है, ने फेसबुक पर कुछ दिनों तक चैट और लंदन में हुई मुलाकात के बाद ललिता मैडम की कम्पनी में काम करने पुणे चली आती है। लंदन में अपने निठल्ले पति से बुरी तरह परेशान जूही पुणे आकर ललिता मैडम के बॉस पर्सनालिटी से परेशान होकर दो महीने में ही नौकरी छोड़ देती है। कम्पनी छोड़ने के बाद वह पुणे में ही रहने वाले फेसबुक फ्रेंड सतीश से अपनी दुखभरी कहानी सुनाती है। अन्त में, सतीश यह सनसनीखेज खुलासा करता है कि वह चार महीनों तक ललिता मैडम का टॉम बाय रह चुका है। जूही समझ नहीं पाती कि सतीश ज्यादा तकलीफ से गुजरा है या मैं. ..। कहानी के अन्त में, जूही और सतीश का, एक-दूसरे के करीब आने का संकेत है। फेसबुक फ्रेंड के बारे में उत्साह और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय आत्मघाती साबित हो सकता है, यही सच्चाई इस कहानी का मर्म है। यह कहानी पाठक को सहयात्री बनाने में सक्षम है। मगर इसमें ललिता मैडम और जूही का चरित्र और परिस्थितियों का चित्रण काफी अतिवादी है। इस कहानी में महानगरों के चमक-दमक के पीछे छिपे असली चेहरों से हमारा सामना होता है। तब हमें पता चलता है कि उनके चमक-दमक के पीछे कितना अकेलापन, डर, दर्द, उदासी भरी विसंगतियाँ हैं। भाषा-शैली में सूक्ष्म वर्णनात्मक क्षमता है। संवादों में आम व्यवहार की ताज़गी भरी भाषा मौजूद है।

निःसंदेह पिछले एक दशक की हिन्दी कहानी में सोशल मीडिया से जुड़ी कहानियाँ अपनी विविधता, परिपक्वता और विश्वसनीयता के लिहाज से उल्लेखनीय हैं। भारतीय समाज में सर्वाधिक लोकप्रिय सोशल मीडिया ‘फेसबुक’ से जुड़ी कहानियाँ ही हिन्दी कहानी में सर्वाधिक दिखाई देती हैं। इन कहानियों में स्त्री पुरुष में आया खुलापन, कैजुअल प्रेम एवं फ्लर्ट का बढ़ता रुझान, रिश्तों में ऊब या अकेलापन के कारण साथी तलाशने की प्रवृत्ति, वर्जनाहीन स्वच्छन्दता की कामना, विश्वास में लेकर छल और धोखा, नये रिश्तों में कमिटमेंट की कमी जैसे मनो-सामाजिक बदलावों का नया यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। सोशल मीडिया से जुड़ी हिन्दी कहानियाँ इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करती हैं कि आज का हिन्दी समाज इंटरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया से जुड़कर बड़ी तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया की निजी चैट में प्रायः सामाजिक, नैतिक, परिवारिक बंधन टूटने लगते हैं। सोशल मीडिया की इन कहानियों में अधिकतर शहरी मध्यवर्ग के नौकरीपेशा स्त्री-पुरुषों की खुलेपन भरी ज़िन्दगी ही अभिव्यक्ति हुई है। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों की दुनिया, ‘फेसबुक’ जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया के आगमन से, किस रूप में बदल रही है, इसकी बानगी शायद आने वाले एक-दो वर्षों में हिन्दी कहानी में दिखाई दे.


सम्पर्क : एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,

डी.ए.वी. पी.जी. कालेज, लखनऊ

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