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विलोम शब्द युक्त 50 दोहे // भाऊराव महंत

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01 (सत्य/असत्य)

कोई कहता सत्य है, कोई कहे असत्य।
मुझको भी देते बता, ईश तुम्हारे कृत्य।।

02 (हार/जीत, जीवन/मौत)

जीवन में औ' मौत में, अंतर इतना मीत।
यह जीवन यदि हार है,मौत समझलो जीत।।

03 (घाटा-नफ़ा)

देखो मत घाटा-नफ़ा, करके प्यार महंत।
जग में सच्चे प्यार से, मिलती ख़ुशी अनंत।।

04 (ज़्यादा/कम)

ज़्यादा-कम मत देखिए, जब दे कोई दान।
देने वालों की नियत, होती बड़ी महान।।

05 (नर/नारी)

नर-नारी के बीच जब, हो न उचित व्यवहार।
चलता दोनों में तभी, जीवन भर तक़रार।।

06 (काला/गोरा)

काले-गोरे का नहीं, पालें मन में दंश।
होता सबका रंग तो, जिसका जैसा वंश।।

07 (छोटा/बड़ा, गरीब/अमीर)

कौन यहाँ छोटा-बड़ा, कौन गरीब-अमीर।
सबके जब दिखते यहाँ, एक समान शरीर।।

08 (पास/फेल)

कोर्ट-कोर्ट में खेलते,अलग-अलग से खेल।
कोई  होता   पास  तो, कोई   होता   फेल।।

09 (आगत/गत)

आगत का सत्कार कर, गत को जाओ भूल।
वर्तमान  को  ही  सदा, करिए  मीत  कबूल।।

10 (सुख/दुख)

कोई यम  के वार से, बचता  नहीं  महंत।
सुख में या दुख में रहें, होता सबका अंत।।

11 (सुख/दुख)

माता  अपने  पुत्र की, सुनकर  के  आवाज।
पल भर में लेती लगा, सुख-दुख का अंदाज।।

12 (राजा/रंक)

चाहे  कोई  भी  रहे ,  राजा - रंक  महंत।
लाखों करें उपाय पर, होना निश्चित अंत।।

13 (लड़का/लड़की)

लड़का भी कॉलेज है, लड़की भी कॉलेज।
पर  दोनों  के  बीच  में,  नाता  करे  दहेज।।

14 (बेटा/बेटी)

बेटा - बेटी में नहीं, करते हैं जो भेद।
ऐसे लोगों से कभी, किंचित करें न खेद।।

15 (रात/दिवस, सन्ध्या/सुबह)

कैसे  तेरे  प्रेम  का,  छाया  है  उन्माद।
रात-दिवस,संध्या-सुबह,आती तेरी याद।।

16 (सुबह/शाम, दिन/रात)

इतनी  तुमसे  आरजू ,  हे!  मेरे  जगदीश।
सुबह-शाम,दिन-रात मैं,तुम्हें नवाऊँ शीश।।

17 (दिन/रात)

चूल्हा  चक्की  से कहे, अपने  दिल  की  बात।
जिस दिन तुम चलती नहीं,जलूँ न मैं उस रात।।

18 (रात/दिन)

करें परिश्रम रात-दिन, होकर के मजबूर।
जो सबको सुख दे रहा, वही सुखों से दूर।।

19 (दिन/रात)

लब से जो होती नहीं, आँखें करती बात।
पड़ता सबको मानना,यदि कह दिन को रात।।

20 (दिन/रात)

बात-बात की बात पर, करते रहते बात।
काम-काज जिनको नहीं,करते हैं दिन-रात।।

21 (सुबह/शाम, दिन/रात)

मैं तुमको देखा करूँ, सुबह-शाम, दिन-रात।
तुम  मुझको  देखा  करो, तभी  बनेगी  बात।।

22 (सुबह/शाम)

आप कहें तो है सुबह, आप कहें तो शाम।
जैसा  चाहा  आपने , वैसा   होगा   काम।।

23 (माता/पिता, भाई/बहन)

हुए पराए पुत्र भी, जाते ही परदेश।
मात-पिता,भाई-बहन, भूले अपना देश।।

24 ( मात-पिता)

मात-पिता आशीष दें, करे तरक्की लाल।
दुनिया के संग्राम में,  पाए लक्ष्य विशाल।।

25 (मात-पिता)

मात-पिता की बात को, जो भी माने मीत।
जग के हर संग्राम को, पल में जाते जीत।।

26 (गुण/दोष)

दोष रहित होता अगर, मानव का संसार।
धरती पर होता सदा,गुण का ही विस्तार।।

27 (हार/जीत)

जो पर को खुश देखने, हार मान ले मीत।
उनसे यह सारा जगत, कभी सके न जीत।।

28 (जीत/हार)

जश्न मनाते हैं सभी, जीत अगर हो यार।
मानें हम उस जश्न को, होती हो जब हार।।

29 (हार/जीत)

मन के हारे हार है,मन  के  जीते  जीत।
मन से कभी न हारना, ओ मेरे मनमीत।।

30 (जल/थल)

जल थल में आकाश में, जिस ईश्वर का राज्य।
मन - मंदिर से  वो भला, कैसे  होंगे  त्याज्य।।

31 (धरती/आकाश)

जम  जाएँगे  ठंड  से,    ये  धरती  आकाश।
दिया नहीं यदि सूर्य ने,अपना नवल प्रकाश।।

32 (आज/कल)

मौके को मत ढूंढ़िए, मौका तो है आज।
अपनाए जो आज को,कल पर करता राज।।

33 (माँ-बाप)

आज्ञा जो माँ-बाप की,अक्सर लेते मान।
उनका इस संसार में, बढ़ जाता सम्मान।।

34 (माँ-बाप)

दोबारा  मिलते  नहीं, दुनिया  में  माँ - बाप।
फिर क्योंकर तरसा रहे, उन दोनों को आप।।

35 (माँ/बाप)

आँखों पर पट्टी नहीं, बाँधे अब माँ-बाप।
बच्चों की हर हरक़तें, गौर कीजिए आप।।

36 ( नर/नारी)

नर से नारी का नहीं, होगा जो संयोग।
दुनिया में होगा नहीं, कोई भी उद्योग।।

37 (गुण-/दोष)

जो गुण को गुण कह रहे, और दोष को दोष।
जग के झूठे लोग सब, करते उस पर रोष।।

38 (प्रकट/गुप्त)

प्रकट नहीं करना कभी, जो हो बातें गुप्त।
ऐसी बातों को सदा, हो जाने दो लुप्त।।

39 (लेन/देन)

लेन-देन चोखा रखें, मधुर रखे सम्बंध।
रिश्तेदारी में तभी, आए मीठी गंध।।

40 (जीना/मरना)

जीना-मरना है प्रिये, मुझे आपके संग।
जीतेंगे तब साथ में, जीवन की यह जंग।।

41 (पानी/आग, दोस्ती/दुश्मनी)

हो यदि तेरी दोस्ती, तो जस फूल-पराग।
हो यदि तेरी दुश्मनी, तो फिर पानी-आग।।

42 (जमा/खर्च, कम/अधिक)

हो जाती दौलत जमा, चाहे कम हो आय।
ख़र्च नहीं करना अधिक, इसका सरल उपाय।।

43(धरती/अम्बर)

नीला अम्बर बन गया, धरती का परिधान।
देख अचंभित हो रहे, जग के चतुर सुजान।।

44(जहर/दवा)

जहर दवाई सम लगी , मुझको उस दिन यार।
जिस दिन मेरे मौत ने, छीने कष्ट अपार।।

45 (खण्डन/मण्डन)

खण्डन-मण्डन छोड़कर, लेखन पर दे ध्यान।
तब ही साहित्य में कवि, होगा तेरा मान।।

46 (धनवान/गरीब)

कोई है धनवान तो, कोई यहाँ गरीब।
सुख-साधन उसको मिले, जिसको प्राप्त नसीब।।

47 (गर्मी/सर्दी, छाया/धूप)

गर्मी में छाया सदृश, औ' सर्दी में धूप।
मौसम के अनुरूप ही, प्रिये! तुम्हारा रूप।।

48 (लम्बी/चौड़ी)

लम्बी-चौड़ी हाँकते, दुनिया में जो लोग।
सच में करते ही नहीं, कोई भी उद्योग।।

49 (दाल/चावल, मिर्च/तेल)

दाल नहीं चावल नहीं, मिर्च न हल्दी-तेल।
हाय! गरीबी में प्रिये, बिगड़ गया सब खेल।।

50 (छोटी/मोटी)

छोटी-मोटी बात को, जो रखता है याद।
जीवन उसका सत्य ही, हो जाता बर्बाद।।

भाऊराव महंत
बालाघाट, मध्यप्रदेश

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