7 लघुकथाएँ // डॉ. शैल चंद्रा

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        "मज़बूरी" सारे मोहल्ले में चर्चा थी। दयालूराम घूस लेते पकड़ा गया। कोई कह रहा था -"दयालूराम बड़ा सीधा-साधा आदमी है। घूस त...

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        "मज़बूरी"

सारे मोहल्ले में चर्चा थी। दयालूराम घूस लेते पकड़ा गया।

कोई कह रहा था -"दयालूराम बड़ा सीधा-साधा आदमी है। घूस तो वह सपने में भी नहीं ले सकता। पता नहीं उसे क्या हो गया था?"

दूसरा कह रहा था-",अरे भैया, हजार -पांच सौ रुपये की भी भला कोई घूस लेता है? नेता तो करोड़ों -अरबों डकार जाते हैं। उनका तो कोई बाल बांका भी नहीं कर सकता। बेचारे को जरूर किसी ने फँसाया होगा।"

तभी उन लोगों को दयालूराम के ऑफिस के बड़े बाबू आते दिखे। वे लोग दौड़ कर उनके पास पहुँचे और दयालूराम के बारे में पूछने लगे।

बड़े बाबू ने झल्लाते हुए कहा, ये दयालूराम फिसड्डी है। उसने अब तक रिश्वत लेना भी नहीं सीखा। रह गया न आखिर थर्ड क्लास कर्मचारी। हम लोगों की तो उसने नाक ही कटवा दी। अरे भई! हमसे ही रिश्वत लेने की ट्रेंनिग ले लेते तो यह स्थिति नहीं आती।"

        " रिश्वत लेने की ट्रेंनिग भी होती है?" किसी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा।

       "हाँ भई हाँ,अब सरकारी कर्मचारियों की मज़बूरी है। रिश्वत न लें तो बड़े अफसरों और नेताओं को कमीशन कहाँ से देंगें? अब खुद की जेब तो कोई काटेगा नहीं न?"

यह सुनकर वहां मौजूद लोग बड़े बाबू की बातों में हाँ में हाँ मिलाने लगे।

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आवाजें

आज उसके घर से आने वाली सारी आवाजें बंद थी। जब भी वह अपने काम से घर लौटता तो पाता घर में कोई न कोई आवाजें आती ही रहती थीं। कभी बर्तन मांजने की, कभी कपड़े धोने की तो कभी रसोई में खटर-पटर की आवाजें। जो सुधा के अस्तित्व का भान कराते। सुबह से रात तक घर में ऐसे तमाम किस्मों की आवाजों से वह चिर- परिचित था।

कभी दोपहर में वह घर आता तो उसे लगता कि शायद अब घर में कोई आवाजें नहीं आ रही होगी। शायद सुधा दोपहर में आराम कर रही होगी । तब उसे आश्चर्य होता की उस समय सुधा छत पर कपड़े तह करती हुई कपड़ों को फटकारती हुई मिलती।

जब वह रात को बिस्तर पर लेट कर कोई किताब पढ़ता होता तब वह चाहता कि अब उसके घर से आने वाली आवाजें बंद हो जाएं पर उस समय सुधा रसोई में उसके लिए गैस पर बादाम वाला दूध गर्म कर रही होती या उसके दवाई खाने के लिए गर्म पानी कर रही होती।

आज पूरा घर बिल्कुल निःशब्द था। कहीं

कोई आवाजें नहीं है। सुधा को गुजरे पूरे पंद्रह दिन हो गए थे। आश्चर्य पिछले पच्चीस सालों से उसने इन आवाजों की कभी क़द्र नहीं की। सुधा उसके लिए एक साधारण स्त्री थी ।जो उसके लिए खाना बनाती। उसके कपड़े धोती। उसका ध्यान रखती ।बिल्कुल एक सेविका की तरह ।

उसे आज महसूस हो रहा था कि सुधा को एक साधारण स्त्री समझना उसकी बहुत बड़ी भूल थी। घर में आने वाली जिन तमाम प्रकार की आवाजों को वह निरर्थक समझता रहा वह तो उसकी अभ्यर्थना थी । उसकी वंदना थी। वह बौखलाया सा पूरे घर में उन आवाजों को ढूंढने का प्रयास करने लगा ।

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उपहार

अरे वाह! आखिर उधार लेकर कार खरीद ही लिया आपने भाभी?"

ननद ने ताना मारते हुए भाभी से कहा।

       "हाँ, कुछ लोन पर कुछ गहने गिरवी रख कर हमने कार ख़रीदा है।"

     " ओह! ननद ने गहरी सांस लेते हुए बेचारगी के भाव से कहा"- वैसे भाभी, आप जैसे मिडिल क्लास लोगों को हम जैसे उद्वयोग पतियों से होड़ नहीं लेनी चाहिए। ऐसे तो हमारे घर दस-दस कार हैं। ये तो आप जानती ही हैं?"

       "हाँ दीदी, पर मेँ आप से होड़ बिल्कुल नहीं ले रही हूँ न तो दिखावा के लिए ही यह कार मैने लिया है।"

      "तो क्यों लिया भई?आपको कार की क्या जरूरत है जो कर्ज कर के लिया है? आप के घूमने -फिरने के लिए भाई के पास बाइक है तो?" ननद ने हाथों को नचाते हुए कहा।

भाभी ने शांत स्वर से मुस्कुराते हुए कहा,"हाँ दीदी, बाइक में मैं तुम्हारे भैया और गुड़िया हम लोग सब मजे से घूम - फिर लेते है पर मांजी की उम्र इतनी हो गई है कि वे बाइक में नहीं बैठ पातीं। हम सब घूमने जाते हैं पर मांजी घर पर अकेले रह जाती हैं। यह मुझे अच्छा नहीं लगता।उनका मन भी अपने नाते- रिश्तेदारों से मिलने का करता है। बस यह कार उन्हें ही उपहार देने के लिए मैंने ख़रीदा है। दीदी ,आपको याद नहीं कल मांजी का बर्थ डे है।"

यह सुनकर ननद का गर्व भरा चेहरा अचानक बुझ सा गया।

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पांचवा आश्रम

      "दादा जी, आज आपका जन्मदिन है न? मेँ आज आपके लिए बड़ा सा बर्थ डे केक और बहुत सारा गिफ्ट पापा जी से कहकर मंगवाऊंगा।" छुटकू कह रहा था।

दादा जी ने हँसते हुए कहा, " बेटा, अब हम वृद्धों का कौन भला जन्म दिन मनाता है जिनके पांव कब्र में हो। हमारी अब किसे फ़िक्र है? "

यह कहते हुए दादा जी ने बरामदे में अख़बार में मुँह छिपाये बैठे अपने बेटे की ओर देखा ।

       "दादा जी, बताइये न? आपको कैसा गिफ्ट चाहिए?" छोटा मुन्ना पूछ रहा था।

दादा जी ने गंभीर स्वर से कहा," बेटा मेँ चाहता हूँ कि मेरी अर्थी मेरे इसी घर से उठे। क्या है हमारे धर्म में चार आश्रम थे। अब हमारे समाज में पांचवा आश्रम वृद्धाश्रम का चलन देखने में आ रहा है। आज वृद्ध माता - पिता को बेटे वृद्धाश्रम में पहुँचा आते हैं। बस मेँ वृद्धाश्रम न जाकर इसी घर को वृद्धाश्रम बनाना चाहता हूँ। "

दादा जी की यह बात बरामदे में बैठे बेटे ने सुनी तो वह चौंक कर पिता को देखने लगा।

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हिंदी की लिपि

विदेश में रहने वाले बेटे को माँ फोन पर कह रही थी-"बेटा, अच्छा है तूने वहीँ शादी कर ली है पर बहू से भी तो बात करा ?"

बेटे ने कहा," माँ , तुम्हारी बहु को अंग्रेजी बोलना आता है और तुम समझोगी नहीं? अच्छा जरा डैडी से बात कराइए।"

बेटा डैडी से कह रहा था-" डैड, आप तो फेस बुक व्हाट्सएप यूज़ करते हैं। आप अपनी बहू को हिंदी सिखाइये । बस आप हिंदी को रोमन लिपि में लिखा करें तो वह हिंदी जल्द सीख जायेगी। यहाँ तो ऐसे कई विदेशी हैं जो हिंदी समझ लेते हैं परंतु लिख और बोल नहीं सकते। क्या अच्छा होता कि हम अपनी हिंदी की लिपि बदलकर उसे रोमन में कर लें। ऐसा करने से हमारी भाषा विदेशों में भी स्थान प्राप्त कर लेगी।"

यह सुनकर माँ सोच में पड़ गई कि हमारा आचार-विचार, व्यवहार खान- पान , रहन-सहन भाषा सब तो विदेशी हो चुका है। ऐसे में जो हिंदी हिंदुस्तान में स्थान प्राप्त नहीं कर पा रही है वो विदेश में कैसे टिक पायेगी? फिर हमारी हिन्दी की देव नागरी लिपि बदल कर रोमन हो जायेगी तो हिंदुस्तान का नाम भी शायद बदलना पड़ेगा।

उधर बेटा कह रहा था-" डैड ,माँ को भी अंग्रेजी सिखाएं।"

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विडम्बना

मिसेज कोठारी आज किसी काम से मिसेज भाटिया के यहाँ गईं। मिसेज भाटिया सोफे पर पसरी कोई किताब पढ़ रहीं थीं। उन्हें किताब पढ़ते देख मिसेज कोठारी ने कहा,"अरे वाह!बहुत बढ़िया! आपको किताब पढ़ते देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। वरना आजकल लोगों को मोबाईल से फुर्सत नहीं है। वैसे आप कौन सी किताब पढ़ रही हैं?"

मिसेज भाटिया ने उनका स्वागत करते हुए कहा, अरे, आओ बहन जी, बैठो। मेँ  'नवजात कुत्तों की देखभाल कैसे करें' यह किताब पढ़ रही हूँ ।क्या है मेरी पालतू कुतिया जिमी गर्भवती है।" यह कहती हुई वे मुस्कुराने लगीं।

वे दोनों बैठकर बातें करने लगीं तभी मिसेज भाटिया की गर्भवती बहु चाय की ट्रे लिए आई।

बहु ने चाय की प्याली देते हुए कहा," मांजी,  गुड़िया के स्कूल से आने का समय हो गया है।उसे लेने जाना पड़ेगा ।और कुछ काम हो तो बताइयेगा?"

मिसेज भाटिया ने कहा,"हाँ, जरा पकौड़े तल कर ले आना।"

बहु ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा,"मांजी, गुड़िया को लेकर आ जाती हूँ फिर बना दूँगी।"

         "अरे, गुड़िया आ जायेगी। घर से पांच कदम की दुरी पर तो उसकी बस रूकती है। इतने में भला तुम्हारी गुड़िया को क्या हो जायेगा?" मिसेज भाटिया ने व्यंग्य से कहा।

बहु चुपचाप जाकर पकौड़े तलने लगी।

मिसेज कोठारी ने मिसेज भाटिया से पूछा"-अरे वाह मिसेज भाटिया ,आपकी बहु भी तो प्रेग्नेंट है और आप नवजात कुत्तों की देखभाल की किताब पढ़ रही हैं ।क्या बात है?"

मिसेज भाटिया ने तमतमाये हुए स्वर से कहा,"अब बहु तो हर डेढ़ दो साल में गर्भवती होती है पर हर बार बेटी ही पैदा करती है। अब दो बेटियाँ तो है ही और कई तो मैंने एबॉट करवा दिए क्यों की अब बेटियां ही थीं।अब जो लगातार बेटी ही पैदा करे ,उसकी क्या देखभाल?"

यह उत्तर सुनकर मिसेज कोठारी विस्मित रह गईं।

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एक ठिठुरती सुबह

दिसम्बर का आखिरी सप्ताह था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी ।शीत लहर के प्रकोप से पूरे शहर वासी कांप रहे थे फिर भी कहीं क्रिसमस तो कहीं नये वर्ष का उत्साह लोगों में छाया था।

कोई पिकनिक में जाने की तैयारी में था तो कोई क्रिसमस का महँगा केक आर्डर दे रहा था। युवा वर्ग न्यू ईयर की खुशियाँ मनाने फाइव स्टार होटल बुक कर रहा था। यह सारा उत्साह आभिजात्य था।

गरीब तबके के लोगों का इस दिसम्बर की हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड ने जीना हराम कर रखा था। ऐसे में सड़क पर गुजारा करने वाला बेघर रघुपति के परिवार का बहुत ही बुरा हाल था। आने वाले त्यौहार और नए वर्ष में उन्हें जरूर आशा थी कि कोई दयालू, संवेदन शील लोग जरूर उनको इस ठण्ड से राहत देने कम्बल या स्वेटर जरूर दान करेगा । इसी आशा से रोज वह अपने ठिठुरते बच्चों को बहलाता उन्हें आशा दिलाता।

बच्चे ठण्ड की ठिठुरन से बचने का लाख प्रयास करते पर ठंड किसी प्रेत की तरह उन्हें दबोच लेने को आतुर हो उठता। रघुपति को शहर में आग जलाने को लकड़ी भी कहाँ से मिलती? जो कुछ देर जलाकर राहत मिलती।

कल रात को ठंड ने ऐसा कहर बरपाया कि ओस से भीगी सुबह ठंड की ठिठुरन से ठिठुरती हुई आई और रघुपति के दोनों बच्चों को हमेशा के लिए ठंडा कर गई।

रघुपति को इस ठिठुरती सुबह में अब एक कफ़न नहीं बल्कि दो कफ़न की जरूरत थी।

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परिचय
डॉ. शैल चन्द्रा

जन्म- 9.10.66

शिक्षा- एम्.ए. बी. एड.एम्. फिल. पी. एच. डी. (हिंदी)

उपलब्धियां- अब तक पांच किताबें प्रकाशित।1. इक्कीसवीं सदी में भी।(काव्य संग्रह)

2. विडम्बना(लघुकथा संग्रह)

3.जूनून तथा अन्य कहानियां( कहानी संग्रह)

4. गुड़ी ह अब सुन्ना होगे( छत्तीसगढ़ी लघुकथा संग्रह)

5.घोंसला और घर और अन्य लघुकथाएं।

6.पापा बिज़ी हैं(लघुकथा संग्रह) अति शीघ्र प्रकाशित।

घर और घोंसला को कादम्बरी सम्मान तथा अस्मिता सम्मान बड़ोदरा द्वारा ।

राष्ट्रीय स्तर की पत्र -पत्रिकाओं में लघुकथा, कहानियां ,कविताओं का निरंतर प्रकाशन। यथा-हंस, कादम्बनी, पाखी, नारी अस्मिता, नारी का सम्बल, साहित्य प्रभा , विकास संस्कृति परिन्दे, तथा अन्य बहुत सारी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में  रचनाएं प्रकाशित। विभिन्न अखबारों में जैसे हरिभूमि, नई दुनिया, नवभारत, पत्रिका, दैनिक भास्कर अमृत सन्देश , देश बंधु  आदि में लगातार रचनाएं प्रकाशित।

सम्मान एवं पुरस्कार-अनेक सम्मान प्राप्त अब तक लगभग 30-35 सम्मान प्राप्त।उल्लेखनीय - नारी अस्मिता गुजरात बड़ोदरा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की लघुकथा प्रतियोगिता में सर्व प्रथम पुरस्कार प्राप्त।लघुकथा "विडम्बना "पर रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ में लघु शोध प्रबंध एम् फिल में ।

'डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथाओं का सामाजिक अनुशीलन," विषय पर रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ से पी एच डी ।जारी ।शोध केंद्र बाबूछोटे लाल श्रीवास्तव महाविद्यालय, धमतरी से।

नारी अस्मिता बड़ोदरा गुजरात द्वारा आयोजित 2018 में  अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कहानी " नई चेतना" को प्रथम स्थान प्राप्त।

हिंदी सेवा संस्थान द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त। शकुन्तला कपूर लघुकथा प्रतियोगिता 2018 ,फरीदाबाद में  सांत्वना पुरस्कार प्राप्त।

सम्प्रति-प्राचार्य, शासकीय हाई स्कूल टांगापानी ,तहसील-नगरी, जिला धमतरी में  छत्तीसगढ़ में कार्यरत

संपर्क- रावण भाठा, नगरी, जिला- धमतरी

छतीसगढ़ 493778

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रचनाकार: 7 लघुकथाएँ // डॉ. शैल चंद्रा
7 लघुकथाएँ // डॉ. शैल चंद्रा
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